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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 · श्लोक 21

अध्याय 18 · श्लोक 21

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्। वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्॥२१॥

pṛthaktvena tu yaj jñānaṃ nānā-bhāvān pṛthag-vidhān | vetti sarveṣu bhūteṣu taj jñānaṃ viddhi rājasam ||21||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

पृथक्त्वेन: as separate; तु: but; यत्: which; ज्ञानम्: knowledge; नाना-भावान्: diverse entities; पृथक्-विधान्: of various kinds; वेत्ति: knows; सर्वेषु: in all; भूतेषु: beings; तत्: that; ज्ञानम्: knowledge; विद्धि: know; राजसम्: rajasic.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

किन्तु जो ज्ञान सम्पूर्ण भूतों में नाना प्रकार के पृथक् भावों को अलग-अलग जानता है, उस ज्ञान को राजस जानो।

English Translation

But that knowledge which sees in all beings various entities of diverse kinds as separate – know that knowledge to be rajasic.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

राजस ज्ञान भेददर्शी है। यह प्राणियों में विभिन्नता और पृथक्त्व को ही देखता है, एकत्व का अनुभव नहीं कर पाता। यह अपूर्ण और द्वैत पर आधारित ज्ञान है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।