श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 18 (मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga))

अध्याय 18 · श्लोक 17

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 78 46 मिनट का पठन 135 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते। हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥१७॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

17 पद
यस्य
whose
न
not
अहंकृतः
of ego
भावः
sense
बुद्धिः
intellect
यस्य
whose
न
not
लिप्यते
is attached
हत्वा
having killed
अपि
even
स
he
इमान्
these
लोकान्
beings
न
not
हन्ति
kills
न
not
निबध्यते
is bound.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जिसमें अहंकार का भाव नहीं है और जिसकी बुद्धि आसक्त नहीं है, वह इन सब लोगों को मारकर भी न तो मारता है और न बँधता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अध्यात्म और कर्मयोग का सर्वोच्च शिखर

सनातन संस्कृति और वेदान्त दर्शन में श्रीमद्भागवत गीता का स्थान केवल एक धार्मिक ग्रंथ का नहीं, बल्कि मानव जीवन के प्रत्येक संशय को चीरकर उसे परम सत्य से अवगत कराने वाले शाश्वत प्रकाशपुंज का है। जब मनुष्य संसार के जागतिक प्रपंच, मोह-माया, राग-द्वेष और नाना प्रकार के कर्तव्यों के बीच उलझ जाता है, तब भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानवता को उस दिव्य स्थिति का दर्शन कराते हैं जहाँ कर्म और अकर्म का भेद मिट जाता है। यह श्लोक—"यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते..."—गीता के अठारहवें अध्याय (मोक्षसंन्यास योग) का एक अत्यंत मर्मस्पर्शी और क्रांतिकारी श्लोक है, जो अहंकार के पूर्ण अवसान और बुद्धि की निरलेपता (अनसक्ति) का सजीव चित्रण करता है।

सांसारिक जीवन में प्रत्येक प्राणी अपने कर्मों के परिणामों से बंधा हुआ है। कोई भी कार्य किया जाए, उसका फल—चाहे वह अच्छा हो या बुरा—मनुष्य की चेतना पर अपनी छाप छोड़ता है जिसे हम कर्म-बंधन कहते हैं। परंतु एक 'स्थितप्रज्ञ' या ज्ञानी पुरुष जब विधि के विधान के अनुसार अपने कर्तव्यों का निर्वाह करता है, तब उसके भीतर 'मैं कर्ता हूँ' (अहंकार) का भाव पूर्णतः विलीन हो चुका होता है। इस उच्च आध्यात्मिक अवस्था में उसकी बुद्धि किसी भी प्रकार के संताप, मोह या वासना से दूषित नहीं होती। सांस्कृतिक और ब्रह्मांडीय दृष्टिकोण से यह श्लोक यह संदेश देता है कि मनुष्य का वास्तविक पतन कर्म करने से नहीं, बल्कि कर्म में स्वयं को 'कर्ता' मान बैठने के अहंकार से होता है। जब अहंकार की यह दीवार ढह जाती है, तब व्यक्तिगत चेतना समष्टिगत दिव्य चेतना के साथ एककार हो जाती है।

Bhaktilok.in के इस पावन मंच पर हम वेदों, उपनिषदों और गीता के इस महान संदेश को आपके सम्मुख प्रस्तुत कर रहे हैं, ताकि आधुनिक युग की इस भागदौड़ और मानसिक अशांति के बीच, आप अपने भीतर उस अचल, शांत और निर्विकार चैतन्य का अनुभव कर सकें जो हर प्रकार के कर्म-बंधनों से परे है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

श्रीमद्भागवत गीता — अध्याय १८ (मोक्षसंन्यास योग), श्लोक १७

यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥ १७॥

श्लोक का सरल पदावलियों में उच्चारण एवं पाठ विधि:

इस श्लोक का पाठ प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में या संध्यावंदنا के समय शांत मन से करना चाहिए। पाठ करते समय शरीर को सीधा रखें और श्वास-प्रश्वास को नियंत्रित करते हुए प्रत्येक शब्द के आंतरिक अर्थ पर ध्यान केंद्रित करें।

श्लोक का सामान्य हिंदी अनुवाद:

"जिस पुरुष के अंतःकरण में 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा अहंकारयुक्त भाव नहीं है और जिसकी बुद्धि (विषयों में) लिप्त नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर (युद्ध आदि में संहार करके भी) न तो मारता है और न ही (कर्मों के बंधनों में) बंधता है।"

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

गीता के प्रत्येक शब्द में गूढ़ वेदांतिक रहस्य छुपा हुआ है। आइए, इस श्लोक के एक-एक पद का सूक्ष्मता से विश्लेषण करते हैं ताकि इसके दार्शनिक आयाम को पूरी तरह से समझा जा सके।

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
यस्य जिस (पुरुष) का वह उच्च कोटि का ज्ञानी, जिसका चित्त संसार से विरक्त और परमात्मा में लीन हो चुका है।
न अहंकृतः अहंकाररहित (मैं और मेरी का अभाव) 'मैं शरीर हूँ', 'यह कर्म मैंने किया है'—इस प्रकार के झूठे अहंकार और ममत्व से पूर्ण मुक्ति।
भावः स्वभाव, स्थिति या अंतःकरण की स्थिति मनुष्य की वह आंतरिक मानसिक अवस्था जो बाह्य प्रभावों से पूरी तरह अप्रभावित रहती है।
बुद्धिः निर्णय शक्ति, अंतःकरण, विवेक वह दिव्य बुद्धि जो सत्य और असत्य, नित्य और अनित्य के भेद को स्पष्ट रूप से जानती है।
यस्य जिस (पुरुष) की उस स्थितप्रज्ञ और जितेन्द्रिय महापुरुष की।
न लिप्यते लिप्त नहीं होती, आसक्त नहीं होती जैसे कमल का पत्ता जल में रहकर भी जल से गीला नहीं होता, वैसे ही ज्ञानी पुरुष विषयों में रहकर भी उनसे अछूता रहता है।
हत्वा अपि मारकर भी (युद्ध या अनिवार्य कर्तव्य के रूप में संहार करके भी) धर्मरक्षा या युद्धभूमि में दैवीय आदेशानुसार प्राण लेने जैसे कठोर कार्य को करते हुए भी।
सः वह (ज्ञानी पुरुष) वह ब्रह्मलीन और मुक्त आत्मा।
इमान् लोकान् इन समस्त लोकों को, प्राणियों को इस संपूर्ण सृष्टि और इसमें निवास करने वाले समस्त जीव-समुदाय को।
न हन्ति न मारता है (वास्तविक हत्या का पाप उसे नहीं लगता) क्योंकि वह केवल निमित्त मात्र है; मारने वाली शक्ति तो प्रकृति या परमात्मा की है।
न निबध्यते और न ही बंधता है वह किसी भी प्रकार के शुभ या अशुभ कर्म-फल के पाश में नहीं फंसता, उसे मोक्ष प्राप्त होता है।

विशेष टिप्पणी: इस तालिका के माध्यम से स्पष्ट होता है कि भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि पाप और पुण्य का निर्धारण केवल बाह्य कर्म से नहीं होता, बल्कि कर्म करने वाले के भीतर के भाव (अहंकार और आसक्ति) से होता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के उस महासमर से जुड़ी हुई है जब कौरव और पाण्डव सेनाएं कुरुक्षेत्र के मैदान में आमने-सामने खड़ी थीं। अर्जुन, जो स्वयं महान धनुर्धर थे, अपने ही गुरुओं (द्रोणाचार्य), पितामह (भीष्म) और संबंधियों को देखकर मोहग्रस्त हो जाते हैं। उनके हाथ से गाण्डीव धनुष छूट जाता है और वे युद्ध करने से स्पष्ट मना कर देते हैं। अर्जुन का यह विषाद केवल व्यक्तिगत दुर्बलता नहीं था, बल्कि यह हर उस साधारण मनुष्य का संशय है जो कर्तव्य और मोह के बीच उलझ जाता है।

तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जो उपदेश दिया, वही श्रीमद्भागवत गीता के रूप में अमर हो गया। अठारहवें अध्याय में आकर भगवान गीता के संपूर्ण सार का उपसंहार करते हैं। यहाँ यह प्रश्न उठता है कि यदि युद्ध करना क्षत्रिय का धर्म है और युद्ध में प्राणों का नाश होता है, तो क्या अर्जुन को इस भीषण संहार का पाप नहीं लगेगा? इसी गंभीर दार्शनिक शंका का समाधान करते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने इस सत्रहवें श्लोक का उच्चारण किया। भगवान ने स्पष्ट किया कि युद्ध करना अर्जुन की व्यक्तिगत इच्छा नहीं है, बल्कि वह तो केवल निमित्त मात्र है। जब कोई व्यक्ति अपने व्यक्तिगत अहंकार ("मैं मार रहा हूँ" या "यह मेरा यश है") को त्यागकर, ईश्वर की इच्छा और लोक-संग्रह के लिए कर्तव्य कर्म करता है, तब उसके द्वारा किया गया कर्म भी बंधन का कारण नहीं बनता।

महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत और श्रीमद्भागवत गीता का यह प्रसंग हमें यह सिखाता है कि जीवन की हर विषम परिस्थिति में—चाहे वह युद्ध का मैदान हो या सांसारिक संघर्ष—व्यक्ति को अपने अहंकार का त्याग करना चाहिए। इतिहास में ऋषि महर्षियों, जैसे जनक और वामदेव का उदाहरण भी इसी बात की पुष्टि करता है कि राजपाट और बड़े उत्तरदायित्वों का निर्वाह करते हुए भी आंतरिक रूप से पूरी तरह विरक्त और अहंकारमुक्त रहा जा सकता है। यह शास्त्रीय इतिहास हमें यह प्रेरणा देता है कि हम अपने जीवन के कर्तव्यों से भागे नहीं, बल्कि कर्तापन के अहंकार को गलाकर अपने प्रत्येक कर्म को ईश्वर को समर्पित कर दें।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भागवत गीता के इस पावन श्लोक का नियमित पठन, मनन और इसके अर्थ पर ध्यान केंद्रित करने से साधक को अनेकानेक आध्यात्मिक, मानसिक और मनोवैज्ञानिक लाभ प्राप्त होते हैं। यहाँ इसके प्रमुख सिद्ध लाभों का विस्तृत विवरण दिया गया है:

1. अहंकार का शमन और विनम्रता

नियमित पाठ से मन में 'मैं' और 'मेरा' का अहंकार धीरे-धीरे गलने लगता है, जिससे साधक के स्वभाव में अगाध विनम्रता और सहजता आती है।

2. मानसिक शांति और तनाव मुक्ति

कर्मफल की चिंता और कर्तापन के बोझ से मुक्ति मिलने के कारण मस्तिष्क का तनाव समाप्त होता है और प्रगाढ़ मानसिक शांति की अनुभूति होती है।

3. कर्मों के बंधनों से शुद्धि (कर्म शुद्धि)

जब कर्म अहंकाररहित होकर किए जाते हैं, तो उनके अच्छे-बुरे फल साधक को प्रभावित नहीं करते, जिससे संचित कर्मों का क्षय होता है।

4. बुद्धि की स्थिरता (स्थितप्रज्ञता)

सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय की परिस्थितियों में भी बुद्धि विचलित नहीं होती, बल्कि समभाव में स्थित रहती है।

5. सकारात्मक और दिव्य औरा (Aura) का विकास

इस श्लोक के कंपन से साधक के आस-पास एक उच्च आध्यात्मिक ऊर्जा का आवरण बनता है, जो नकारात्मक शक्तियों को दूर रखता है।

6. निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि

आसक्तिहीन बुद्धि पक्षपात और मोह से मुक्त होकर सदा न्यायसंगत और धर्मयुक्त निर्णय लेने में समर्थ होती है।

7. ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण (शरणागति)

साधक अपने जीवन की हर गतिविधि को ईश्वर की कृपा मानते हुए जीता है, जिससे परम भक्ति और भगवद् प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

8. भय और मृत्यु के संताप से मुक्ति

जो यह जान लेता है कि आत्मा अमर है और वह केवल निमित्त मात्र है, उसके मन से मृत्यु और भविष्य का अज्ञात भय हमेशा के लिए मिट जाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन संस्कृति के मूल ग्रंथों—विशेषकर महर्षि वेदव्यास विरचित श्रीमद्भागवत गीता, आदि शंकराचार्य के भाष्य और विभिन्न प्रामाणिक वेदान्त टीकाओं के गहन अध्ययन पर आधारित संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। हमारे विद्वान भाषाविदों और संस्कृत आचार्यों ने यह सुनिश्चित किया है कि प्रत्येक श्लोक का अर्थ व्याकरण की कसौटी पर खरा उतरे और आधुनिक पाठकों के लिए सहज बोधगम्य हो।

हम किसी भी प्रकार के अंधविश्वास या अतिश्योक्तिपूर्ण दावों से दूर रहते हुए केवल शास्त्रसम्मत, तार्किक और आध्यात्मिक सत्यों को पाठकों तक पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। हमारा उद्देश्य सनातन ज्ञान की पवित्रता को अक्षुण्ण रखते हुए उसे डिजिटल युग के जिज्ञासुओं तक सरल हिंदी में पहुँचाना है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

यह श्लोक श्रीमद्भागवत गीता के अठारहवें अध्याय (मोक्षसंन्यास योग) का १७वाँ (17th) श्लोक है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने संन्यास और त्याग के वास्तविक स्वरूप को समझाया है।

बिलकुल नहीं। यह हिंसा का समर्थन नहीं करता है। इसका संदर्भ कुरुक्षेत्र के युद्ध से है जहाँ अर्जुन को क्षत्रिय धर्म के नाते युद्ध करना था। श्लोक का अर्थ है कि यदि कोई ज्ञानी पुरुष अहंकार और राग-द्वेष से मुक्त होकर, धर्म की रक्षा के लिए कोई अनिवार्य कठोर कार्य (जैसे युद्ध) भी कर ले, तो भी उसे उस कर्म का पाप या बंधन नहीं लगता क्योंकि वह स्वयं को कर्ता नहीं मानता।

इसका तात्पर्य यह है कि मनुष्य अपने सभी पारिवारिक, सामाजिक और व्यावसायिक कर्तव्यों का पूरी ईमानदारी से निर्वाह करे, परंतु उसके मन में कर्मों के फलों (सफलता, असफलता, प्रशंसा या निंदा) के प्रति कोई आसक्ति या मोह नहीं होना चाहिए। जैसे जल में रहने वाला कमल का पत्ता जल से भीगता नहीं, वैसे ही ज्ञानी संसार में रहकर भी उससे लिप्त नहीं होता।

इस श्लोक का नियमित स्मरण करने से व्यक्ति के भीतर का अहंकार और अहम्मन्यता कम होती है। इससे मानसिक तनाव, भविष्य की चिंता और काम-कोध जैसी नकारात्मक वृत्तियों पर नियंत्रण पाने में सहायता मिलती है तथा जीवन में समभाव और शांति का विकास होता है।

इसे जीवन में उतारने के लिए प्रत्येक कार्य को करते समय यह भाव रखें कि "मैं केवल एक साधन (निमित्त) हूँ, कराने वाली शक्ति परमात्मा या प्रकृति है।" अपनी सफलता का श्रेय खुद लेने के बजाय ईश्वर या सहयोगियों को दें और असफलताओं से निराश न होकर उन्हें अपनी त्रुटियों को सुधारने का अवसर मानें।

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संकलन: मुख्य devotional scholar एवं संस्कृत भाषाविद् टीम, Bhaktilok.in

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जिसमें अहंकार का भाव नहीं है और जिसकी बुद्धि आसक्त नहीं है, वह इन सब लोकों को (लोगों को) मारकर भी न तो मारता है और न बँधता है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

अहंकार के अभाव में कर्म कर्ता को छूते नहीं। ऐसा व्यक्ति केवल निमित्त मात्र है। इसलिए निष्काम कर्मयोगी बन्धन मुक्त रहता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 17 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 17/78 22% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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पंचांग
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