आज का पंचांग (Columbus) | सूर्योदय: ०४:२९ PM | सूर्यास्त: ०५:३३ AM
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 · श्लोक 17

अध्याय 18 · श्लोक 17

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते। हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥१७॥

yasya nāhaṅkṛto bhāvo buddhir yasya na lipyate | hatvāpi sa imāḻ lokān na hanti na nibadhyate ||17||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

यस्य: whose; न: not; अहंकृतः: of ego; भावः: sense; बुद्धिः: intellect; यस्य: whose; न: not; लिप्यते: is attached; हत्वा: having killed; अपि: even; स: he; इमान्: these; लोकान्: beings; न: not; हन्ति: kills; न: not; निबध्यते: is bound.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जिसमें अहंकार का भाव नहीं है और जिसकी बुद्धि आसक्त नहीं है, वह इन सब लोगों को मारकर भी न तो मारता है और न बँधता है।

English Translation

One who is free from the sense of ego, and whose intellect is not attached – even if he kills all these people, he neither kills nor is bound.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह श्लोक अहंकाररहित स्थितप्रज्ञ के लक्षण बताता है। ऐसा व्यक्ति कर्म करते हुए भी कर्तापन के अभिमान से मुक्त रहता है, इसलिए वह पाप या बन्धन का भागी नहीं होता।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।