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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 · श्लोक 16

अध्याय 18 · श्लोक 16

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः। पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥१६॥

tatraivaṃ sati kartāram ātmānaṃ kevalaṃ tu yaḥ | paśyaty akṛta-buddhitvān na sa paśyati durmatiḥ ||16||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

तत्र: there; एवम्: thus; सति: being; कर्तारम्: the doer; आत्मानम्: the self; केवलम्: alone; तु: but; यः: who; पश्यति: sees; अकृत-बुद्धित्वात्: due to untrained intellect; न: not; स: he; पश्यति: sees; दुर्मतिः: evil-minded.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

ऐसी स्थिति में जो असंस्कृत बुद्धि वाला मनुष्य केवल आत्मा को ही कर्ता मानता है, वह दुर्मति ठीक से नहीं देखता।

English Translation

Therefore, one who, due to untrained intellect, sees the Self alone as the doer – that evil-minded one does not see (the truth).

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

जो व्यक्ति अविवेकी है और आत्मा को ही एकमात्र कर्ता मानता है, वह वास्तविकता को नहीं समझता। वह पाँच कारणों की भूमिका को नकारकर भ्रम में पड़ जाता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।