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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 · श्लोक 15

अध्याय 18 · श्लोक 15

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः। न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः॥१५॥

śarīra-vāṅ-manobhir yat karma prārabhate naraḥ | nyāyyaṃ vā viparītaṃ vā pañcaite tasya hetavaḥ ||15||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

शरीर-वाक्-मनोभिः: with body, speech, and mind; यत्: which; कर्म: action; प्रारभते: undertakes; नरः: a man; न्याय्यम्: right; वा: or; विपरीतम्: wrong; वा: or; पञ्च: five; एते: these; तस्य: its; हेतवः: causes.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

शरीर, वाणी और मन से मनुष्य जो कुछ कर्म करता है, चाहे वह उचित हो या अनुचित, उसके ये पाँच कारण हैं।

English Translation

Whatever action a man performs with his body, speech, or mind – whether right or wrong – these five are its causes.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

इस प्रकार शुभाशुभ सभी कर्मों के मूल में ये पाँच कारण विद्यमान हैं। इसलिए जीव को कर्तापन के अभिमान से मुक्त होना चाहिए।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।