श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 18 (मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga))

अध्याय 18 · श्लोक 14

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 78 41 मिनट का पठन 176 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्। विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥१४॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
अधिष्ठानम्
the seat (body)
तथा
also
कर्ता
the doer
करणम्
instruments
च
and
पृथक्-विधम्
various
विविधाः
various
च
and
पृथक्
separate
चेष्टाः
efforts
दैवम्
the divine (destiny)
च
and
एव
indeed
अत्र
here
पञ्चमम्
the fifth.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

अधिष्ठान (शरीर), कर्ता, विविध प्रकार की इन्द्रियाँ, पृथक-पृथक चेष्टाएँ तथा पाँचवाँ दैव – ये (पाँच कारण) हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भक्तिलोक (Bhaktilok.in) का विशेष आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विश्लेषणात्मक ग्रंथ

सनातन धर्म में कर्म, कर्ता और दैव का शाश्वत एवं विराट् स्वरूप

सनातन वैदिक संस्कृति और श्रीमद्भागवतगीता का संपूर्ण दर्शन मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप से परिचित कराने के साथ-साथ इस ब्रह्मांडीय व्यवस्था (Cosmic Order) के रहस्यों को भी अत्यंत सहजता से उजागर करता है। जब हम श्रीमद्भागवतगीता के अठारहवें अध्याय (मोक्षसंन्यास योग) के इस चौदहवें श्लोक का अध्ययन करते हैं, तो हमारे समक्ष कर्म के संपादन में सम्मिलित होने वाली उन पाँच महान शक्तियों का अनावरण होता है, जिनके बिना इस संसार में पत्ता भी नहीं हिल सकता। यह श्लोक केवल दार्शनिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, अपितु यह मनुष्य के अहंकार को चूर-चूर कर उसे पूर्णतः समर्पण की भावना से ओतप्रोत करने वाला एक महामंत्र है।

मानव जीवन में अक्सर यह भ्रम उत्पन्न हो जाता है कि "मैं ही सब कुछ करने वाला हूँ" (अहंकार)। मनुष्य अपनी सफलता का श्रेय अकेले अपने पुरुषार्थ को देता है और असफलता का शोक भी स्वयं ही भोगता है। किंतु, महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित और भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए इस दिव्य उपदेश के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि संसार में किसी भी कर्म की सिद्धि के पीछे पाँच मूल आधार या घटक कार्य कर रहे होते हैं। इनमें शरीर से लेकर दैवीय शक्तियों तक का अद्भुत समन्वय होता है।

भक्तिलोक (Bhaktilok.in) के इस पावन मंच पर हम इसी गूढ़ श्लोक का शास्त्रीय, व्याकरणिक, दार्शनिक और व्यावहारिक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं। इस आलेख का उद्देश्य केवल शब्दों के अर्थ बताना नहीं है, बल्कि साधक के मन में कर्मयोग की उस सच्ची भावना को जागृत करना है जहाँ वह अपने आपको निमित्त मात्र (Instrument) समझकर अपने कर्तव्यों का पालन करे। इस श्लोक की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्ता इस बात में निहित है कि यह मनुष्य को कर्म के बंधन से मुक्त होकर मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा देता है। जब साधक इन पाँचों कारणों को समझ लेता है, तो उसके भीतर कर्तापन का अहंकार स्वतः ही समाप्त होने लगता है और जीवन में अगाध शांति, मानसिक स्थिरता तथा परमेश्वर के प्रति अनन्य भक्ति का उदय होता है। आइए, इस पावन श्लोक के सागर में गोता लगाते हैं और इसके प्रत्येक रत्न को अपने जीवन में आत्मसात करते हैं।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

अथ श्रीमद्भगवद्गीता अष्टादशोध्यायः (मोक्षसंन्यासयोग) - श्लोक १४


अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥ १४ ॥

(उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय 'अधिष्ठानम्' के अनुस्वार, 'पृथग्विधम्' के विसर्ग तथा 'पञ्चमम्' के उच्चारण पर विशेष ध्यान देना चाहिए। इसे शांत चित्त से प्राणायाम के पश्चात प्रातःकाल या संध्या बेला में गाना या पाठ करना अत्यंत फलदायी माना गया है।)

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक में जिन पाँच कारणों का उल्लेख किया गया है, उन्हें समझने के लिए हमें इसके प्रत्येक पद के शाब्दिक अर्थ के साथ-साथ उसके आन्तरिक दार्शनिक मर्म को भी समझना होगा। नीचे दी गई सारणी इस श्लोक के प्रत्येक शब्द का संपूर्ण विश्लेषण प्रस्तुत करती है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
अधिष्ठानम् (अधिष्ठानं) आश्रय, आधार, रहने का स्थान या शरीर। यह वह भौतिक ढांचा या शरीर है जिस पर समस्त कर्मों की नींव टिकी होती है। आत्मा इस शरीर रूपी आलय में निवास करती है।
तथा और, इसी प्रकार। यह शब्द पिछले और अगले घटकों को जोड़ने का कार्य करता है, जो यह दर्शाता है कि ये सभी कारक संयुक्त रूप से कार्य करते हैं।
कर्ता करने वाला, जीव, अहंकारयुक्त आत्मा। यह वह जीवात्मा है जो अज्ञानतावश अपने आपको शरीर मानकर कर्मों का फल भोगने की इच्छा रखता है और 'मैं करता हूँ' ऐसा मानता है।
करणम् (करणं) साधन, इंद्रियाँ (ज्ञानेंद्रियाँ और कर्मेंद्रियाँ)। वे माध्यम जिनके द्वारा मनुष्य देखता, सुनता, बोलता और कार्य करता है। आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा, हाथ-पैर आदि इसके अंतर्गत आते हैं।
च और। समुच्चयबोधक अव्यय जो सूची को आगे बढ़ाता है और सभी अंगों की अनिवार्यता को सिद्ध करता है।
पृथग्विधम् भाँति-भाँति के, अनेक प्रकार के। इंद्रियाँ और साधन एक जैसे नहीं हैं, बल्कि वे अपने अपने विषयों के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार की प्रवृत्तियों वाले होते हैं।
विविधाः अनेक प्रकार की, नाना प्रकार की। चेष्टाओं और क्रियाओं की अनंत विविधता को दर्शाता है जो इस संसार में निरंतर चलती रहती है।
च तथा, और। पुनः सभी गतिविधियों के संकलन और उनकी महत्ता को रेखांकित करने के लिए प्रयुक्त।
पृथक् चेष्टाः (पृथक्चेष्टा) अलग-अलग क्रियाएँ, प्राण आदि की गतियाँ। प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान—इन पाँचों प्राणों की गतियाँ तथा शरीर के भीतर होने वाली जैविक और मानसिक चेष्टाएँ।
दैवम् (दैवं) भाग्य, अदृष्ट, पूर्वजन्म के संस्कार, ईश्वरीय विधान। वह पांचवाँ और सबसे रहस्यमयी कारक जो मनुष्य के नियंत्रण से बाहर है—अर्थात प्रकृति के नियम, पूर्वकर्म और परमात्मा की इच्छा।
च एव अत्र (चैवात्र) और ही यहाँ, निश्चित रूप से इस प्रकरण में। यह इस बात की पुष्टि करता है कि किसी भी कार्य की सफलता में इन पाँचों का होना अनिवार्य रूप से सत्य है।
पञ्चमम् पाँचवाँ कारक। इन सभी में दैव (अदृष्ट) को पाँचवाँ और अंतिम निर्णायक कारक माना गया है जो परिणाम को निर्धारित करता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भागवतगीता के अठारहवें अध्याय की यह पृष्ठभूमि महाभारत के कुरुक्षेत्र के मैदान से जुड़ी हुई है। जब अर्जुन विषादग्रस्त होकर गांडीव धनुष नीचे रख देते हैं और युद्ध करने से स्पष्ट मना कर देते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें सांख्य योग, कर्मयोग, ज्ञानयोग और अंत में मोक्षसंन्यास योग का उपदेश देते हैं। अर्जुन के मन में यह संशय था कि मनुष्य जो कुछ भी करता है, उसका कर्ताधर्ता कौन है? क्या मनुष्य अपने कर्मों के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है या कोई अन्य शक्ति भी इसमें कार्य करती है?

इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने सांख्य दर्शन के उन मूलभूत सिद्धांतों का सार प्रस्तुत किया है जो वेदों और उपनिषदों में वर्णित हैं। महर्षि वेदव्यास ने महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत इस भगवद्गीता को संकलित किया है। ऐतिहासिक और पौराणिक संदर्भों में देखें तो प्राचीन काल में महर्षि कपिल द्वारा रचित 'सांख्य शास्त्र' में भी प्रकृति और पुरुष के संयोग से कार्यसिद्धि का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया था। श्रीकृष्ण उसी प्राचीन ज्ञान को अत्यंत सरल और वैज्ञानिक रूप में अर्जुन के समक्ष रखते हैं।

शास्त्रों में इस बात का बार-बार उल्लेख मिलता है कि जब तक मनुष्य अपने अहंकार में जीता है कि "सब कुछ मैं ही कर रहा हूँ," तब तक वह कर्मों के बंधनों (कमीज़ और फल की आसक्ति) में उलझा रहता है। पौराणिक कथाओं में राजा जनक, प्रह्लाद और ध्रुव जैसे महान भक्तों का प्रसंग आता है जिन्होंने इस रहस्य को भली-भांति समझ लिया था। वे राज्य का संचालन करते हुए भी स्वयं को केवल एक निमित्त मानते थे और अपनी हर सफलता का श्रेय 'दैव' यानी परमात्मा की कृपा को देते थे। यह श्लोक हमें सिखाता है कि हमारे जीवन का हर कार्य इन पाँचों चक्रों के घूमने से पूरा होता है—शरीर (अधिष्ठान), अहंकार (कर्ता), इंद्रियाँ (करण), प्राणों की गति (चेष्टा) और अदृष्ट भाग्य (दैव)। जब साधक इस पृष्ठभूमि को समझ लेता है, तो उसके भीतर का अभिमान भस्म हो जाता है और वह पूर्ण शरणागति की अवस्था को प्राप्त कर लेता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

इस महान श्लोक का नियमित पठन, मनन और इसके अर्थ का स्मरण करने से साधक के जीवन में अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। इसके प्रमुख आध्यात्मिक और मानसिक लाभ निम्नलिखित हैं:

  • अहंकार का शमन (Ego Dissolution): इस श्लोक का स्मरण करने से व्यक्ति के भीतर से "मैं ही सब कुछ करने वाला हूँ" (कर्तापन का भाव) समाप्त हो जाता है, जिससे अहंकार का नाश होता है।
  • मानसिक शांति और तनाव मुक्ति (Mental Peace): जब मनुष्य यह जान लेता है कि असफलता या सफलता में 'दैव' (भाग्य और ईश्वरीय विधान) की भी बड़ी भूमिका है, तो वह अत्यधिक चिंता और तनाव से मुक्त हो जाता है।
  • कर्मों की शुद्धि और निष्काम भाव (Karmic Purification): यह श्लोक मनुष्य को फल की इच्छा छोड़े बिना अपने कर्तव्यों का पालन करने (निष्काम कर्म) की प्रेरणा देता है, जिससे उसके पिछले पाप कर्मों का क्षय होता है।
  • सकारात्मक ऊर्जा का संचार (Positive Aura): इसके नियमित जप से साधक के चारों ओर एक उच्च आध्यात्मिक और सकारात्मक ऊर्जा का आवरण बनता है, जो नकारात्मक विचारों को दूर रखता है।
  • दैवीय कृपा की प्राप्ति (Divine Grace): जब साधक अपनी हर क्रिया में पांचवें कारक 'दैव' को स्वीकार करता है और भगवान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है, तो उसे ईश्वर की अहेतुकी कृपा प्राप्त होती है।
  • आत्म-अनुशासन और एकाग्रता (Self-Discipline & Focus): शरीर (अधिष्ठान) और इंद्रियों (करण) के सटीक नियंत्रण को समझने से मानसिक एकाग्रता तीव्र होती है और ध्यान (Meditation) में गहराई आती है।
  • कर्तव्यपरायणता में वृद्धि (Sense of Duty): यह श्लोक आलस्य को त्यागकर अपनी विविध चेष्टाओं और प्राणिक ऊर्जा को सही दिशा में लगाने के लिए प्रेरित करता है।
  • मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होना (Path to Liberation): अंततः यह ज्ञान मनुष्य को संसार के चक्रव्यूह और कर्मबंधनों से मुक्त कर मोक्ष की ओर अग्रसर करता है, जो जीवन का परम लक्ष्य है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

भक्तिलोक (Bhaktilok.in) अपने पाठकों को अत्यंत प्रामाणिक, वेदान्त सम्मत और शास्त्रीय रूप से जाँखी गई सामग्री प्रदान करने के लिए कटिबद्ध है। यह आलेख वेदों, उपनिषदों और श्रीमद्भागवतगीता के मूल संस्कृत भाष्यों (विशेषकर आदि शंकराचार्य और स्वामी रामानुजचार्य के दृष्टिकोण) के गहन अध्ययन के पश्चात संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। हमारे विद्वान संपादकों और संस्कृत भाषाविदों ने यह सुनिश्चित किया है कि श्लोक का अर्थ, उसका व्याकरण, और उसकी दार्शनिक व्याख्या पूरी तरह सनातन धर्म के मूल ग्रंथों के अनुकूल हो। किसी भी प्रकार के अतिशयोक्तिपूर्ण या असत्यापित दावों से बचते हुए, हमने यहाँ केवल शुद्ध ज्ञान और आचार-संहिता को प्रस्तुत किया है ताकि साधक अपने दैनिक जीवन में इसका लाभ उठा सकें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

"अधिष्ठान" का शाब्दिक अर्थ आधार या आश्रय होता है। श्रीमद्भागवतगीता के इस संदर्भ में अधिष्ठान से अभिप्राय हमारा यह भौतिक शरीर है, जो समस्त कर्मों के संपादन के लिए एक प्राथमिक मंच या घर के रूप में कार्य करता है। आत्मा और कर्म इसी शरीर रूपी आधार पर टिके होते हैं।

"दैव" से तात्पर्य अदृष्ट भाग्य, पूर्वजन्म के संस्कार और ईश्वरीय विधान से है। मनुष्य भले ही अपनी पूरी शक्ति (शरीर, इंद्रियाँ, अहंकार और प्राण) लगा दे, किंतु अंतिम परिणाम प्रकृति के नियमों और परमात्मा की इच्छा (दैव) के अधीन होता है। यही वह पाँचवाँ और सबसे महत्वपूर्ण निर्णायक कारक है।

हाँ, इस श्लोक के नियमित मनन और इसके मर्म (निष्काम कर्म और कर्तापन के अहंकार का त्याग) को जीवन में उतारने से मनुष्य के भीतर कर्म-फल की आसक्ति कम होती है। जब आसक्ति समाप्त हो जाती है, तो नए कर्मों के बंधन नहीं बनते और दिव्य ज्ञान के प्रकाश से पुराने कर्मों के संस्कारों का क्षय होने लगता है।

"करण" उन साधनों या उपकरणों (जैसे ज्ञानेंद्रियाँ और कर्मेंद्रियाँ—आँख, हाथ, पैर आदि) को कहते हैं जिनके माध्यम से हम कार्य करते हैं। जबकि "पृथक्चेष्टा" उन विविध क्रियाओं और प्राणिक गतियों (जैसे प्राण, अपान आदि की हलचल तथा आंतरिक जैविक क्रियाएँ) को कहा जाता है जो उन उपकरणों को ऊर्जा प्रदान करती हैं।

गृहस्थ जीवन में व्यक्ति को पूरी ईमानदारी और पुरुषार्थ के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए, साथ ही यह स्मरण रखना चाहिए कि सफलता और असफलता दोनों पर पूर्ण नियंत्रण उसका नहीं है। अपने अहंकार को त्यागकर कर्म को ईश्वर को समर्पित करना और परिणाम को 'दैव' (ईश्वरीय विधान) के अधीन मानकर प्रसन्न रहना ही इस श्लोक का व्यावहारिक प्रयोग है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

अधिष्ठान (शरीर), कर्ता (अहंकार से युक्त जीव), विविध प्रकार की इन्द्रियाँ, पृथक-पृथक चेष्टाएँ (प्राण आदि की क्रियाएँ) तथा पाँचवाँ दैव (अदृष्ट) – ये पाँच कारण हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

कर्म के ये पाँच कारण बताकर भगवान् यह स्पष्ट करते हैं कि आत्मा स्वयं कर्ता नहीं है। वह तो इन सबसे परे है। इस ज्ञान से साधक निर्लिप्त रहता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 14 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 14/78 18% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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पंचांग
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