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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 · श्लोक 12

अध्याय 18 · श्लोक 12

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्। भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्॥१२॥

aniṣṭam iṣṭaṃ miśraṃ ca tri-vidhaṃ karmaṇaḥ phalam | bhavaty atyāgināṃ pretya na tu sannyāsināṃ kvacit ||12||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अनिष्टम्: undesirable; इष्टम्: desirable; मिश्रम्: mixed; च: and; त्रि-विधम्: threefold; कर्मणः: of action; फलम्: fruit; भवति: accrues; अत्यागिनाम्: to the non-renouncers; प्रेत्य: after death; न: not; तु: but; संन्यासिनाम्: to the renouncers; क्वचित्: at any time.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

इष्ट, अनिष्ट और मिश्र – ऐसे तीन प्रकार के कर्मफल मरने के बाद त्यागरहित पुरुषों को मिलते हैं, परन्तु संन्यासियों को कभी नहीं मिलते।

English Translation

The threefold fruit of action – desirable, undesirable, and mixed – accrues after death to those who are non-renouncers, but never to renouncers.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

जो लोग फल की आसक्ति रखते हैं, उन्हें मृत्यु के बाद कर्मों के अनुसार तीन प्रकार के फल भोगने पड़ते हैं। किन्तु जिन्होंने फल का त्याग कर दिया है, वे इन फलों से मुक्त हो जाते हैं।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।