श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 17 (श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 17 · श्लोक 9

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 28 23 मिनट का पठन 141 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः। आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥९॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
कटु
bitter
अम्ल
sour
लवण
salty
अत्युष्ण
very hot
तीक्ष्ण
pungent
रूक्ष
dry
विदाहिनः
burning
आहाराः
foods
राजसस्य
of the rajasic
इष्टाः
dear
दुःख
pain
शोक
grief
आमय
disease
प्रदाः
causing.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

कड़वे, खट्टे, नमकीन, अत्यधिक गरम, तीखे, रूखे और जलन पैदा करने वाले आहार राजस पुरुषों को प्रिय होते हैं, जो दुःख, शोक और रोग उत्पन्न करने वाले होते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

भारतीय संस्कृति और वैदिक दर्शन में 'आहार' को केवल पेट भरने का साधन नहीं, अपितु 'चित्त शुद्धि' का प्रथम सोपान माना गया है। श्रीमद्भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने आहार के तीन प्रकारों—सात्विक, राजस और तामस—का वर्णन किया है। इसमें 'राजस आहार' वह ऊर्जा है जो मनुष्य को संसार के चक्र में निरंतर दौड़ने, महत्वाकांक्षाओं के पीछे भागने और अंततः अशांति के गर्त में गिरने के लिए प्रेरित करती है।

ब्रह्मांडीय दृष्टि से, हमारा शरीर पंचमहाभूतों का एक सूक्ष्म प्रतिबिंब है। जब हम राजस आहार का सेवन करते हैं, तो हम अपनी आंतरिक अग्नि (जठराग्नि) को असंतुलित कर देते हैं। यह आहार अत्यधिक तीक्ष्ण, खट्टा और नमकीन होता है, जो मन में 'रजोगुण' की अधिकता पैदा करता है। रजोगुण का अर्थ है—गतिशीलता, लेकिन बिना दिशा के। यह वह ऊर्जा है जो व्यक्ति को सुख की खोज में बाहर की ओर भागने के लिए विवश करती है, जबकि वास्तविक सुख भीतर है। जब हम इस प्रकार के भोजन का सेवन करते हैं, तो हमारे सूक्ष्म शरीर (सूक्ष्म शरीर) में उत्तेजना का संचार होता है, जिससे एकाग्रता भंग होती है और ध्यान (Meditation) में बाधा उत्पन्न होती है। प्राचीन ऋषियों ने स्पष्ट किया है कि जैसा अन्न, वैसा मन। राजस आहार का सेवन करने वाला व्यक्ति कभी भी स्थिर चित्त नहीं रह सकता, क्योंकि यह भोजन स्वयं में अस्थिरता और व्याकुलता का प्रतीक है। यह लेख आपको इस श्लोक के माध्यम से यह समझने में सहायता करेगा कि कैसे आहार का चयन आपके कर्मों, भाग्य और आध्यात्मिक उन्नति को सीधे प्रभावित करता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥९॥

श्लोक का उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक अक्षर पर स्पष्टता रखें। 'कट्वम्ल' में 'क-टु-अ-म्ल' का स्पष्ट उच्चारण करें। 'विदाहिनः' का उच्चारण करते समय विसर्ग (:) पर हल्का श्वास छोड़ें। यह श्लोक गीता के 'श्रद्धात्रयविभागयोग' का हिस्सा है। इसे प्रतिदिन भोजन से पूर्व स्मरण करने से व्यक्ति को अपने आहार के प्रति सचेत रहने की प्रेरणा मिलती है। यह श्लोक केवल एक चेतावनी नहीं, बल्कि एक जीवन-शैली का मार्गदर्शक है जो हमें यह सिखाता है कि कैसे हम अपने शरीर को एक मंदिर के समान पवित्र रख सकते हैं।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
कटुकड़वाइंद्रियों को उत्तेजित करने वाला कड़वापन।
अम्लखट्टाअत्यधिक खटास जो मन में चंचलता लाती है।
लवणनमकीनअत्यधिक नमक जो शरीर में जल तत्व को असंतुलित करता है।
अत्युष्णअत्यधिक गर्मक्रोध और आवेश को बढ़ाने वाली उष्णता।
तीक्ष्णतीखा/मिर्चतीक्ष्णता जो विवेक को जला देती है।
रूक्षरूखास्नेहहीनता और शुष्कता का प्रतीक।
विदाहिनःजलन पैदा करने वालापाचन और मन में दाह उत्पन्न करने वाला।
राजसस्यरजोगुणी व्यक्ति कोसंसार में आसक्त रहने वाले जीव को।
इष्टाप्रियअज्ञानवश जिसे हम सुखद मानते हैं।
दुःखशोकामयप्रदाःदुःख, शोक और रोग देने वालाकर्मफल के रूप में मिलने वाला परिणाम।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक की पृष्ठभूमि कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में है, जहाँ अर्जुन अपने कर्तव्यों और मोह के बीच फंसे हैं। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि मनुष्य का स्वभाव उसके द्वारा ग्रहण किए गए 'गुणों' से निर्धारित होता है। पौराणिक कथाओं में, विशेषकर 'मार्कण्डेय पुराण' में, आहार और स्वभाव के संबंध पर विस्तृत चर्चा की गई है। ऋषि मार्कण्डेय ने बताया है कि कैसे असुरों का स्वभाव उनके तामसिक और राजसिक आहार के कारण ही उग्र था।

महाभारत में भी, जब दुर्योधन और कौरवों के भोजन का वर्णन आता है, तो वह अत्यधिक राजसिक और तामसिक प्रवृत्तियों का परिचायक है। इसके विपरीत, पांडवों का वनवास के दौरान कंद-मूल और सात्विक आहार उनके धैर्य और धर्म के प्रति अडिग रहने का आधार बना। शास्त्रों के अनुसार, 'रजोगुण' ब्रह्मा जी का गुण है जो सृष्टि की रचना (गति) के लिए आवश्यक है, परंतु जब यह भोजन के माध्यम से अनियंत्रित हो जाता है, तो यह 'अहंकार' को जन्म देता है। वेदों में 'अन्नं ब्रह्म' कहा गया है, जिसका अर्थ है कि अन्न ही ब्रह्म है। यदि हम अशुद्ध या अत्यधिक उत्तेजक अन्न ग्रहण करते हैं, तो हम अपने भीतर के ब्रह्म (चेतना) को ढक लेते हैं। यह श्लोक हमें सचेत करता है कि हमारी जिह्वा की लोलुपता हमारे भविष्य के दुखों का कारण बन सकती है। यह ज्ञान परंपरा हमें सिखाती है कि आहार केवल पोषण नहीं, बल्कि एक 'यज्ञ' है। यदि हम इस यज्ञ में राजस आहार की आहुति देते हैं, तो हमें परिणाम स्वरूप अशांति ही प्राप्त होगी।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • विवेक जागृति: इस श्लोक का नियमित चिंतन करने से व्यक्ति को भोजन चुनते समय 'विवेक' प्राप्त होता है।
  • मानसिक स्थिरता: राजस आहार का त्याग करने से मन की चंचलता कम होती है और ध्यान में गहराई आती है।
  • रोग मुक्ति: आयुर्वेद के अनुसार, अधिकांश रोग असंतुलित आहार से होते हैं; इस ज्ञान से शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।
  • भावनात्मक संतुलन: क्रोध, शोक और ईर्ष्या जैसे राजसिक विकारों पर नियंत्रण पाना सरल हो जाता है।
  • कर्म शुद्धि: सात्विक आहार की ओर बढ़ने से कर्मों में पवित्रता आती है और पुण्य का संचय होता है।
  • दिव्य कृपा: जब शरीर और मन शुद्ध होते हैं, तो ईश्वर की कृपा का अनुभव सहज होने लगता है।
  • ऊर्जा का प्रबंधन: शरीर की ऊर्जा व्यर्थ के कार्यों में नष्ट होने के बजाय आध्यात्मिक उन्नति में लगती है।
  • सकारात्मक आभा (Aura): व्यक्ति के व्यक्तित्व में सौम्यता और शांति का संचार होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: यह लेख श्रीमद्भगवद्गीता के 17वें अध्याय (श्रद्धात्रयविभागयोग) के श्लोक 9 पर आधारित है। इसमें दी गई व्याख्याएं 'गीता प्रेस गोरखपुर' के प्रामाणिक संस्करणों और वैदिक आहार विज्ञान के सिद्धांतों के अनुरूप हैं। हमारा उद्देश्य पाठकों को प्राचीन ज्ञान के माध्यम से आधुनिक जीवन में संतुलन स्थापित करने में सहायता करना है। यह सामग्री किसी भी प्रकार के चिकित्सा परामर्श का विकल्प नहीं है, अपितु एक आध्यात्मिक मार्गदर्शिका है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

नहीं, राजस आहार पूरी तरह वर्जित नहीं है, परंतु इसका अत्यधिक सेवन हानिकारक है। गृहस्थ जीवन में सक्रिय रहने के लिए रजोगुण की आवश्यकता होती है, लेकिन इसे सात्विकता के साथ संतुलित करना अनिवार्य है।

राजस आहार मन को उत्तेजित करता है, जिससे व्यक्ति अति-महत्वाकांक्षी हो जाता है। जब उसकी इच्छाएं पूरी नहीं होतीं, तो वह शोक और दुःख का अनुभव करता है। यह भोजन मन की शांति छीन लेता है।

हाँ, अत्यधिक कैफीन युक्त पदार्थ, जो उत्तेजक होते हैं, राजस श्रेणी में आते हैं क्योंकि ये तंत्रिका तंत्र को उत्तेजित कर मन की स्थिरता को भंग करते हैं।

सात्विक आहार मन को शांति, प्रसन्नता और आयु प्रदान करता है, जबकि राजस आहार शरीर में जलन, रोग और मन में अशांति पैदा करता है।

धीरे-धीरे अत्यधिक तीखे, खट्टे और बासी भोजन का त्याग करें। ताजा, सुपाच्य और सात्विक भोजन को अपनी दिनचर्या में शामिल करें और भोजन करते समय ईश्वर का स्मरण करें।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

राजस आहार वे खाद्य पदार्थ हैं जो अत्यधिक कड़वे, खट्टे, नमकीन, गरम, तीखे, रूखे और जलन पैदा करने वाले होते हैं। ये राजसी प्रकृति के लोगों को प्रिय होते हैं, किन्तु ये दुःख, शोक और रोगों को जन्म देते हैं। ऐसा आहार मन और शरीर में अशांति लाता है।

Rajasic foods are those that are excessively bitter, sour, salty, hot, pungent, dry, and cause burning sensations. They are liked by people of rajasic nature, but they produce pain, grief, and disease. Such foods disturb the equilibrium of mind and body.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 17: श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 9 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 9/28 32% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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