श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 17 (श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 17 · श्लोक 8

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 28 24 मिनट का पठन 138 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः। रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥८॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
आयुः
life
सत्त्व
strength of mind
बल
strength
आरोग्य
health
सुख
happiness
प्रीति
cheerfulness
विवर्धनाः
promoting
रस्याः
juicy
स्निग्धाः
oily
स्थिराः
substantial
हृद्याः
agreeable
आहाराः
foods
सात्त्विकप्रियाः
dear to the sattvic.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो आहार आयु, बुद्धि (सत्त्व), बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले हों, रसयुक्त, चिकने, स्थिर और हृदय को अच्छे लगने वाले हों – ऐसे आहार सात्त्विक पुरुषों को प्रिय होते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

सात्त्विक आहार: आयु, बल और आरोग्य का दिव्य विज्ञान

ब्रह्मांडीय चेतना और आहार का संबंध

भारतीय संस्कृति में 'अन्न' को केवल उदरपूर्ति का साधन नहीं, अपितु 'ब्रह्म' माना गया है। "अन्नं वै ब्रह्म" की उद्घोषणा हमारे उपनिषदों में की गई है। आहार का सीधा प्रभाव हमारे अंतःकरण, चित्त की वृत्तियों और सूक्ष्म शरीर पर पड़ता है। जब हम सात्त्विक आहार की बात करते हैं, तो हम केवल भोजन के भौतिक गुणों की चर्चा नहीं कर रहे होते, बल्कि हम उस ऊर्जा की बात कर रहे होते हैं जो हमें परमात्मा से जोड़ती है।

सात्त्विक आहार वह है जो प्रकृति के सानिध्य में उत्पन्न हुआ हो, जिसमें हिंसा का लेशमात्र भी न हो और जो शरीर में तामसिक आलस्य या राजसिक उत्तेजना के स्थान पर सात्त्विक शांति का संचार करे। यह आहार हमारे शरीर के सप्त धातुओं को पुष्ट करता है और मन को ध्यान की अवस्था में ले जाने के लिए आवश्यक स्थिरता प्रदान करता है। आयुर्वेद और योग शास्त्र दोनों ही इस बात पर एकमत हैं कि जैसा अन्न, वैसा मन। यदि हम दीर्घायु, ओजस्वी बल और रोगमुक्त काया चाहते हैं, तो हमें अपनी थाली को सात्त्विक गुणों से सुसज्जित करना होगा। यह श्लोक केवल एक निर्देश नहीं, बल्कि एक दिव्य सूत्र है जो मनुष्य को भौतिक जगत की सीमाओं से ऊपर उठाकर आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर अग्रसर करता है। यह आहार ही है जो हमारे सूक्ष्म शरीर के चक्रों को संतुलित रखता है और कुंडलिनी जागरण में सहायक सिद्ध होता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥८॥

उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक शब्द के उच्चारण पर ध्यान देना चाहिए। 'आयुः' में विसर्ग का उच्चारण स्पष्ट हो। 'सात्त्विकप्रियाः' का पाठ करते समय मन में सात्त्विकता के प्रति समर्पण का भाव रखें। यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के 17वें अध्याय का आठवां श्लोक है, जो श्रद्धात्रयविभागयोग के अंतर्गत आता है। इसे भोजन ग्रहण करने से पूर्व स्मरण करने से भोजन का संस्कार बदल जाता है और वह 'प्रसाद' के रूप में परिवर्तित हो जाता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्दसरल हिंदी अर्थआध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
आयुःजीवन की अवधिदीर्घायु जो ईश्वर की सेवा में व्यतीत हो।
सत्त्वमानसिक शक्तिचित्त की शुद्धि और सात्त्विक बुद्धि का विकास।
बलशारीरिक/आत्मिक शक्तिप्राण ऊर्जा का संचय जो साधना में सहायक हो।
आरोग्यनिरोगताशरीर का वह अवस्था जहाँ रोग बाधा न बनें।
सुखआनंदबाह्य सुख नहीं, अपितु आत्मिक संतोष।
प्रीतिप्रेम/रुचिभोजन के प्रति सात्त्विक लगाव और तृप्ति।
रस्याःरसयुक्तभोजन का प्राकृतिक स्वाद और जीवंतता।
स्निग्धाःचिकना/स्निग्धशरीर को कोमलता और ऊर्जा देने वाला।
स्थिरास्थिर रहने वालाजो शरीर में लंबे समय तक ऊर्जा बनाए रखे।
हृद्याहृदय को प्रियजो मन को प्रसन्नता और शांति प्रदान करे।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता के 17वें अध्याय में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से उन लोगों के बारे में पूछते हैं जो शास्त्रों के विधि-विधानों को छोड़कर अपनी श्रद्धा से पूजा करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण वहाँ 'श्रद्धा' के तीन प्रकार बताते हैं—सात्त्विक, राजसिक और तामसिक। इसी क्रम में वे आहार के भेदों का वर्णन करते हैं। यह श्लोक सात्त्विक आहार की महिमा का उद्घोष करता है।

पौराणिक संदर्भों में, ऋषि मुनियों के आश्रमों में जो भोजन ग्रहण किया जाता था, वह पूर्णतः सात्त्विक होता था। कंद-मूल, फल, और गोदुग्ध से निर्मित आहार ही उनकी तपस्या का आधार था। महाभारत के युद्ध के समय भी, जब श्रीकृष्ण ने पांडवों का मार्गदर्शन किया, तो उन्होंने आहार की शुद्धता पर विशेष बल दिया। सात्त्विक आहार का अर्थ केवल शाकाहार नहीं है, बल्कि वह भोजन है जो 'अहिंसा' के सिद्धांत पर आधारित हो। जब हम ऐसा भोजन करते हैं, तो हम प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाते हैं। वेदों में कहा गया है कि 'अन्न' ही प्राण है। यदि अन्न शुद्ध है, तो प्राण शुद्ध होंगे, और यदि प्राण शुद्ध हैं, तो विचार शुद्ध होंगे। यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि हमारा शरीर एक मंदिर है, और इसमें केवल वही वस्तु जानी चाहिए जो इस मंदिर की पवित्रता को बनाए रखे। प्राचीन काल में, भोजन बनाने वाले व्यक्ति की मानसिक स्थिति का भी भोजन पर प्रभाव माना जाता था, इसीलिए 'सात्त्विक' आहार के लिए मन की शांति अनिवार्य है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • चित्त की एकाग्रता: सात्त्विक आहार के चिंतन और सेवन से मन की चंचलता कम होती है और ध्यान में गहराई आती है।
  • सकारात्मक आभा (Aura): शरीर में सात्त्विक ऊर्जा का संचार होने से व्यक्ति के चारों ओर एक दिव्य आभा मंडल का निर्माण होता है।
  • कर्मिक शुद्धि: सात्त्विक आहार हिंसा से मुक्त होता है, जिससे नकारात्मक कर्मों का संचय रुकता है।
  • मानसिक शांति: यह भोजन क्रोध, लोभ और मोह जैसी तामसिक वृत्तियों को नियंत्रित करने में सहायक है।
  • दैवीय अनुकंपा: सात्त्विक व्यक्ति ईश्वर के प्रति अधिक संवेदनशील होता है, जिससे उसे दैवीय संकेतों का अनुभव होने लगता है।
  • रोग प्रतिरोधक क्षमता: शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार से साधना में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं।
  • दीर्घायु का वरदान: शरीर की कोशिकाओं का पुनरुद्धार होता है, जिससे आयु और ओज की वृद्धि होती है।
  • आत्म-अनुशासन: भोजन पर नियंत्रण व्यक्ति को इंद्रिय-विजयी बनाने की प्रथम सीढ़ी है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 17, श्लोक 8 के मूल संस्कृत पाठ और विभिन्न भाष्यकारों (जैसे आदि शंकराचार्य और स्वामी रामसुखदास जी) के व्याख्यानों के आधार पर संकलित किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को सात्त्विक जीवनशैली के प्रति जागरूक करना है। यह लेख किसी भी प्रकार के चिकित्सा परामर्श का विकल्प नहीं है, अपितु यह आध्यात्मिक और जीवनशैली संबंधी मार्गदर्शन प्रदान करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

सात्त्विक आहार में ताजे फल, हरी सब्जियां, अंकुरित अनाज, सूखे मेवे, शुद्ध गाय का दूध, घी और प्राकृतिक मिठास (जैसे शहद या गुड़) शामिल हैं। यह भोजन ताजा और हल्का होना चाहिए।

सात्त्विक आहार शाकाहारी तो है ही, लेकिन हर शाकाहारी भोजन सात्त्विक नहीं होता। अत्यधिक तीखा, तला-भुना, बासी या बहुत अधिक मसालेदार भोजन राजसिक या तामसिक श्रेणी में आ सकता है।

'हृद्या' का अर्थ है जो हृदय को प्रिय हो। जब हम प्रेम और कृतज्ञता के साथ भोजन करते हैं, तो वह भोजन शरीर में औषधि के समान कार्य करता है।

जी हाँ, सात्त्विक आहार मन में शांति और स्थिरता लाता है। यह मस्तिष्क में सेरोटोनिन जैसे रसायनों के संतुलन को बनाए रखने में मदद करता है, जिससे तनाव कम होता है।

बिल्कुल। आधुनिक जीवन की भागदौड़ में भी हम घर का बना ताजा भोजन, समय पर भोजन और भोजन करते समय मोबाइल/टीवी से दूरी बनाकर सात्त्विकता को अपना सकते हैं।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान् सात्त्विक आहार के गुण बताते हैं: यह आयु (दीर्घायु), सत्त्व (मानसिक बल), शारीरिक बल, आरोग्य, सुख और प्रीति (संतोष) को बढ़ाने वाला होता है। यह रसयुक्त (स्वादिष्ट), स्निग्ध (तैलीय), स्थिर (पुष्टिकर) और हृदय को प्रिय होता है। ऐसा भोजन सात्त्विक व्यक्तियों को प्रिय होता है।

The Lord describes sattvic food: it increases longevity, mental strength, physical vigor, health, happiness, and delight. It is juicy, fatty (wholesome), substantial, and pleasing to the heart. Such food is dear to those who are sattvic.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 17: श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 8 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 8/28 29% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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