श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 17 (श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 17 · श्लोक 7

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 28 23 मिनट का पठन 139 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः। यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु॥७॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
आहार
food
तु
indeed
अपि
also
सर्वस्य
of all
त्रिविध
threefold
भवति
is
प्रियः
dear
यज्ञ
sacrifice
तप
austerity
तथा
and
दानम्
charity
तेषाम्
of them
भेदम्
the distinction
इमम्
this
शृणु
hear.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

प्रत्येक व्यक्ति को प्रिय आहार भी तीन प्रकार का होता है, तथा यज्ञ, तप और दान भी तीन प्रकार के होते हैं। उनके इस भेद को सुनो।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

सनातन धर्म के विशाल वाङ्मय में, श्रीमद्भगवद्गीता का 17वां अध्याय 'श्रद्धात्रयविभागयोग' के नाम से विख्यात है। यह अध्याय केवल उपदेश नहीं, बल्कि मानव जीवन की उन चार आधारभूत क्रियाओं का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक विश्लेषण है, जो हमारे अस्तित्व को परिभाषित करती हैं: आहार (भोजन), यज्ञ (कर्तव्य), तप (अनुशासन), और दान (परोपकार)। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझाते हैं कि जिस प्रकार प्रकृति तीन गुणों—सत्व, रज और तम—से बंधी है, उसी प्रकार मनुष्य की प्रत्येक क्रिया भी इन गुणों के प्रभाव में होती है।

ब्रह्मांडीय दृष्टिकोण से देखें तो हमारा शरीर 'अन्नमय कोश' है। हम जो ग्रहण करते हैं, वही हमारे विचारों और कर्मों का निर्माण करता है। जब हम आहार को सात्विक, राजसिक या तामसिक श्रेणियों में विभाजित करते हैं, तो हम वास्तव में अपनी चेतना के स्तर को चुन रहे होते हैं। यज्ञ का अर्थ केवल अग्नि में आहुति देना नहीं, बल्कि अपने स्वार्थ का त्याग कर लोक-कल्याण के लिए कर्म करना है। तप हमारे इंद्रिय-निग्रह का मार्ग है, और दान हमारी आसक्ति को कम करने का माध्यम है। इन चार स्तंभों का सही संतुलन ही मनुष्य को पशुत्व से देवत्व की ओर ले जाता है। इस अध्याय का अध्ययन करना स्वयं को जानने की एक यात्रा है, जहाँ हम यह पहचान पाते हैं कि हमारी श्रद्धा किस दिशा में प्रवाहित हो रही है। यह ज्ञान हमें अज्ञान के अंधकार से निकालकर विवेक के प्रकाश की ओर ले जाने वाला एक दिव्य मार्गदर्शक है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु॥७॥


(अर्थ: हे अर्जुन! सभी मनुष्यों के लिए आहार भी तीन प्रकार का ही प्रिय होता है। वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं। उनके इस भेद को तू मुझसे सुन।)

इस श्लोक का पाठ करते समय साधक को एकाग्रचित्त होकर भगवान के इस वर्गीकरण को आत्मसात करने का संकल्प लेना चाहिए। यह श्लोक हमें सिखाता है कि जीवन में 'विवेक' का होना अनिवार्य है। विधि यह है कि प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के पश्चात गीता के इस अध्याय का पाठ करें और यह चिंतन करें कि आज मैंने जो आहार ग्रहण किया, वह किस गुण को पुष्ट कर रहा है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्दसरल हिंदी अर्थआध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
आहारस्त्वपिभोजन भीकेवल पेट भरना नहीं, बल्कि इंद्रियों का पोषण।
सर्वस्यसभी मनुष्यों केयह नियम सार्वभौमिक है, किसी एक वर्ग के लिए नहीं।
त्रिविधःतीन प्रकार कासत्व, रज और तम—प्रकृति के तीन आधारभूत गुण।
भवति प्रियःप्रिय होता हैरुचि का संबंध हमारे अंतःकरण की शुद्धि से है।
यज्ञःयज्ञ/कर्तव्यईश्वरार्पण बुद्धि से किया गया निस्वार्थ कर्म।
तपःतपस्याशरीर, मन और वाणी का संयम।
तथा दानम्और दानपात्र को दिया गया सात्विक सहयोग।
भेदमिमंइस भेद कोगुणों के आधार पर वर्गीकरण का विज्ञान।
शृणुसुनगुरु-शिष्य परंपरा में ज्ञान का श्रवण।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में, जब अर्जुन विषादग्रस्त होकर अपने कर्तव्यों से विमुख होने लगे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें केवल युद्ध के लिए प्रेरित नहीं किया, बल्कि जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझाया। यह 17वां अध्याय 'श्रद्धात्रयविभागयोग' उसी श्रृंखला की एक कड़ी है। पौराणिक संदर्भों में, वेदों में 'यज्ञ' को 'विष्णु' कहा गया है। शतपथ ब्राह्मण में उल्लेख है कि यज्ञ ही सृष्टि का आधार है। जब हम आहार, यज्ञ, तप और दान की बात करते हैं, तो हम वास्तव में उन वैदिक अनुष्ठानों की बात कर रहे हैं जो मनुष्य को 'देवत्व' प्राप्त करने में सहायक हैं।

महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को दान और तप के महत्व पर विस्तार से बताया है। वे कहते हैं कि दान वही है जो बिना किसी प्रतिफल की इच्छा के, सही समय और सही पात्र को दिया जाए। इसी प्रकार, उपनिषदों में 'आहार' को 'चित्त की शुद्धि' का प्रथम सोपान माना गया है। 'आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः' (छान्दोग्य उपनिषद)—अर्थात आहार की शुद्धि से अंतःकरण की शुद्धि होती है। भगवान श्रीकृष्ण ने यहाँ उसी प्राचीन वैदिक ज्ञान को सरल और व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत किया है। यह अध्याय हमें बताता है कि धर्म केवल मंदिरों तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारे भोजन की थाली से लेकर हमारे द्वारा किए गए छोटे-छोटे दान तक में व्याप्त है। यह ज्ञान हमें यह बोध कराता है कि हम जो भी करते हैं, वह ब्रह्मांडीय गुणों के प्रभाव में है, और यदि हम सत्व गुण को अपनाएं, तो हम मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर हो सकते हैं।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • सात्विक बुद्धि का विकास: नियमित पाठ से मन में सात्विक विचारों का उदय होता है, जिससे निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।
  • आहार पर नियंत्रण: व्यक्ति को अपने भोजन की आदतों के प्रति सजगता प्राप्त होती है, जिससे शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।
  • मानसिक शांति: गुणों के वर्गीकरण को समझने से जीवन की जटिलताओं के प्रति दृष्टिकोण शांत और स्थिर हो जाता है।
  • कर्मों का शुद्धिकरण: यज्ञ और दान के सही स्वरूप को जानकर व्यक्ति निष्काम कर्म की ओर प्रवृत्त होता है।
  • अहंकार का नाश: तप के महत्व को समझने से व्यक्ति में विनम्रता और धैर्य का संचार होता है।
  • सकारात्मक आभा (Aura): सात्विक जीवनशैली अपनाने से व्यक्ति के चारों ओर एक दिव्य और सकारात्मक ऊर्जा का घेरा बनता है।
  • दैवीय कृपा: भगवान के वचनों का चिंतन करने से साधक पर ईश्वर की विशेष कृपा बनी रहती है।
  • मोक्ष मार्ग की स्पष्टता: यह ज्ञान अज्ञानता के बंधनों को काटकर आत्म-साक्षात्कार की दिशा में मार्ग प्रशस्त करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'भक्तिलोक' के विद्वान मंडल द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता के मूल संस्कृत श्लोकों, शंकराचार्य भाष्य और आधुनिक आध्यात्मिक व्याख्याओं के समन्वय से 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' है। हमारा उद्देश्य पाठकों को शास्त्रों के गूढ़ अर्थों से जोड़ना है। इसमें किसी भी प्रकार का अवैज्ञानिक दावा नहीं किया गया है। सभी संदर्भ श्रीमद्भगवद्गीता के 17वें अध्याय (श्रद्धात्रयविभागयोग) से लिए गए हैं, जो कि महाभारत के भीष्म पर्व का एक अभिन्न अंग है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

आहार हमारे मन का निर्माण करता है। जैसा अन्न, वैसा मन। सात्विक आहार मन को शांत और एकाग्र बनाता है, जबकि तामसिक आहार आलस्य और क्रोध को जन्म देता है।

आधुनिक युग में यज्ञ का अर्थ है—निस्वार्थ भाव से समाज और राष्ट्र के लिए कार्य करना। अपने स्वार्थ का त्याग कर दूसरों के हित में किया गया प्रत्येक कार्य यज्ञ के समान है।

नहीं, तप का अर्थ है—इंद्रियों का संयम। मन, वाणी और शरीर की पवित्रता बनाए रखना ही वास्तविक तप है।

शास्त्रों के अनुसार, दान वही है जो बिना किसी अपेक्षा के, सही पात्र को, सही समय पर और देश-काल को ध्यान में रखकर दिया जाए।

हाँ, निरंतर अभ्यास (अभ्यास) और वैराग्य के माध्यम से मनुष्य अपने गुणों को तामसिक से राजसिक और राजसिक से सात्विक की ओर ले जा सकता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान् अब आहार, यज्ञ, तप और दान – इन चार क्रियाओं के तीन प्रकारों का वर्णन करने के लिए कहते हैं। जिस प्रकार श्रद्धा तीन प्रकार की होती है, उसी प्रकार ये क्रियाएँ भी व्यक्ति के गुणों के अनुसार तीन रूपों में पाई जाती हैं।

The Lord now states that food, sacrifice, austerity, and charity – all are also threefold according to the gunas. He invites Arjuna to listen to the distinctions, as understanding them helps one choose a path that leads to purity.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 17: श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 7 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 7/28 25% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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