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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 17 · श्लोक 6

अध्याय 17 · श्लोक 6

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः। मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्॥६॥

karṣayantaḥ śarīra-sthaṁ bhūta-grāmam acetasaḥ | māṁ caivāntaḥ-śarīra-sthaṁ tān viddhy āsura-niścayān ||6||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

कर्षयन्तः: tormenting; शरीरस्थम्: dwelling in the body; भूतग्रामम्: the aggregate of elements; अचेतसः: senseless; माम्: Me; च: and; एव: also; अन्तःशरीरस्थम्: dwelling within the body; तान्: them; विद्धि: know; आसुरनिश्चयान्: of demonic resolves.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

…वे अचेत (मूर्ख) लोग शरीर में स्थित भूतसमुदाय (पंचभौतिक शरीर) को तथा अन्तर्यामी रूप में शरीर में स्थित मुझ परमात्मा को भी पीड़ा पहुँचाते हैं। उन्हें तू आसुरी निश्चय वाला जान।

English Translation

…senselessly tormenting the aggregate of elements in the body, and Me also, who dwells within the body – know these to be of demonic resolves.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

पिछले श्लोक में वर्णित लोग न केवल अपने शरीर (भूत-समुदाय) को क्षति पहुँचाते हैं, बल्कि अज्ञानवश उस परमात्मा को भी पीड़ित करते हैं जो उनके हृदय में स्थित है। उनका दृष्टिकोण आसुरी होता है। Such people, by tormenting their own body and the indwelling Self, act with demonic determination.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।