श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 17 (श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 17 · श्लोक 6

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 28 25 मिनट का पठन 145 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः। मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्॥६॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
कर्षयन्तः
tormenting
शरीरस्थम्
dwelling in the body
भूतग्रामम्
the aggregate of elements
अचेतसः
senseless
माम्
Me
च
and
एव
also
अन्तःशरीरस्थम्
dwelling within the body
तान्
them
विद्धि
know
आसुरनिश्चयान्
of demonic resolves.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

…वे अचेत (मूर्ख) लोग शरीर में स्थित भूतसमुदाय (पंचभौतिक शरीर) को तथा अन्तर्यामी रूप में शरीर में स्थित मुझ परमात्मा को भी पीड़ा पहुँचाते हैं। उन्हें तू आसुरी निश्चय वाला जान।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता का सत्रहवां अध्याय 'श्रद्धात्रयविभागयोग' के नाम से विख्यात है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को उन सूक्ष्म मानसिक अवस्थाओं के बारे में समझा रहे हैं जो मनुष्य के कर्मों को निर्धारित करती हैं। प्रस्तुत श्लोक—"कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः। मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्॥"—मानव जीवन के सबसे गहरे अंधकारमय पक्ष, यानी 'आसुरी स्वभाव' पर प्रकाश डालता है।

वैदिक दर्शन के अनुसार, हमारा शरीर केवल मांस-मज्जा का ढांचा नहीं है, बल्कि यह पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) का एक पवित्र समुदाय है। जब कोई व्यक्ति अज्ञानता के वशीभूत होकर अपनी शारीरिक और मानसिक ऊर्जा का दुरुपयोग करता है, तो वह न केवल स्वयं को कष्ट पहुँचाता है, बल्कि अपने भीतर विराजमान परमात्मा (अंतर्यामी) को भी प्रताड़ित करता है। यह श्लोक हमें सचेत करता है कि धर्म के मार्ग से विमुख होकर की गई तपस्या या कर्म यदि अहंकार और हिंसा से प्रेरित हैं, तो वे 'आसुरी' हैं।

सांस्कृतिक दृष्टि से, यह श्लोक भारतीय दर्शन की उस महान परंपरा को रेखांकित करता है जहाँ शरीर को 'देवों का मंदिर' माना गया है। यदि हम अपने शरीर को शुद्ध नहीं रखते, सात्विक आहार का सेवन नहीं करते, और अनैतिक कार्यों में लिप्त रहते हैं, तो हम उस दिव्य ज्योति को मलिन कर रहे हैं जो हमारे हृदय में स्थित है। यह श्लोक केवल एक चेतावनी नहीं, बल्कि आत्म-साक्षात्कार की एक मार्गदर्शिका है, जो हमें यह सिखाती है कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए शरीर का सम्मान और मन की शुद्धि अनिवार्य है। ब्रह्मांडीय स्तर पर, यह श्लोक हमें यह समझाता है कि मनुष्य का प्रत्येक कर्म पूरे ब्रह्मांड के स्पंदन को प्रभावित करता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः।

मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्॥

उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक अक्षर का स्पष्ट उच्चारण करें। 'कर्षयन्तः' में 'र' का रेफ और 'शरीरस्थं' में सकार का उच्चारण शुद्ध होना चाहिए। इसे शांत चित्त होकर, पद्मासन या सुखासन में बैठकर, अपने हृदय में स्थित परमात्मा का ध्यान करते हुए पढ़ना चाहिए। यह श्लोक हमें यह स्मरण कराता है कि हम जो भी कर्म कर रहे हैं, उसका साक्षी स्वयं परमात्मा है। प्रतिदिन प्रातः काल स्नान के पश्चात इस श्लोक का तीन बार पाठ करने से मन में सात्विक विचारों का उदय होता है और आसुरी प्रवृत्तियों का नाश होता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
कर्षयन्तःकष्ट पहुँचाते हुएअपनी इंद्रियों को व्यर्थ के भोगों में झोंककर आत्मा को क्लेश देना।
शरीरस्थंशरीर में स्थितपंचभूतों से निर्मित यह भौतिक शरीर जो आत्मा का निवास स्थान है।
भूतग्रामंभूतों के समुदाय कोशरीर को बनाने वाले पंचमहाभूतों का समूह।
अचेतसःमूर्ख/अज्ञानीजो विवेकहीन हैं और आत्म-ज्ञान से शून्य हैं।
मांमुझे (परमात्मा)हृदय में स्थित अंतर्यामी परमात्मा, जो साक्षी रूप में विद्यमान हैं।
चऔरसमुच्चय बोधक, जो शरीर और आत्मा दोनों के कष्ट को जोड़ता है।
अन्तःशरीरस्थंशरीर के भीतर स्थितआत्मा के रूप में हृदय में विराजमान ईश्वर।
तान्उनकोऐसे व्यक्तियों को जो आसुरी मार्ग पर चल रहे हैं।
विद्धिजानोसमझो या पहचानो।
आसुरनिश्चयान्आसुरी निश्चय वालेजिनका लक्ष्य केवल विनाश और स्वार्थ है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के कुरुक्षेत्र के मैदान में निहित है। जब अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से उन लोगों के बारे में पूछा जो शास्त्रों के विधि-विधानों को छोड़कर अपनी मनमानी तपस्या करते हैं, तब भगवान ने इस श्लोक के माध्यम से 'आसुरी स्वभाव' का पर्दाफाश किया। पौराणिक संदर्भों में, हिरण्यकशिपु और रावण जैसे पात्रों को 'आसुरनिश्चय' का प्रतीक माना जाता है। उन्होंने अपनी शारीरिक शक्ति और तपस्या का उपयोग केवल दूसरों को प्रताड़ित करने और स्वयं को ईश्वर के समान स्थापित करने के लिए किया।

वेदों में शरीर को 'रथ' कहा गया है। कठोपनिषद में स्पष्ट है कि यदि रथ का सारथी (बुद्धि) विवेकहीन हो, तो घोड़े (इंद्रियां) अनियंत्रित होकर विनाश की ओर ले जाते हैं। जो व्यक्ति अपने शरीर को व्यर्थ के दुर्व्यसनों, हिंसा, और तामसिक आहार से कष्ट देता है, वह वास्तव में अपने भीतर बैठे परमात्मा का अपमान करता है। भगवान श्रीकृष्ण यहाँ यह स्पष्ट कर रहे हैं कि ईश्वर केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि हमारे शरीर रूपी मंदिर में भी स्थित हैं। जो व्यक्ति अपने शरीर का दुरुपयोग करता है, वह ईश्वर के प्रति द्रोह करता है। यह शिक्षा हमें रामायण के उस प्रसंग की याद दिलाती है जहाँ विभीषण ने रावण को समझाया था कि धर्म का त्याग करने से विनाश निश्चित है, क्योंकि धर्म ही शरीर और आत्मा का रक्षक है। यह श्लोक हमें आत्म-संयम और सात्विकता का मार्ग अपनाने की प्रेरणा देता है, ताकि हम आसुरी प्रवृत्तियों से मुक्त होकर दैवीय गुणों को धारण कर सकें।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • आत्म-जागरूकता: इस श्लोक के निरंतर चिंतन से व्यक्ति को अपने शरीर के प्रति सम्मान और पवित्रता का भाव जागृत होता है।
  • सात्विक आहार का महत्व: यह श्लोक तामसिक भोजन और व्यसनों को छोड़ने की प्रेरणा देता है, जिससे शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।
  • मानसिक शांति: आसुरी प्रवृत्तियों (क्रोध, लोभ, मोह) पर नियंत्रण पाने में सहायता मिलती है।
  • अंतर्यामी से जुड़ाव: हृदय में स्थित परमात्मा के प्रति श्रद्धा बढ़ती है, जिससे एकांत में भी व्यक्ति स्वयं को अकेला नहीं पाता।
  • कर्म शुद्धि: व्यक्ति अपने कर्मों के प्रति सचेत हो जाता है और अनैतिक कार्यों से दूर रहने का प्रयास करता है।
  • नकारात्मकता का नाश: यह श्लोक एक सुरक्षा कवच की तरह कार्य करता है, जो नकारात्मक ऊर्जाओं को दूर रखता है।
  • विवेक की वृद्धि: अज्ञानता का पर्दा हटता है और सही-गलत के बीच अंतर करने की क्षमता विकसित होती है।
  • दैवीय कृपा: जब हम अपने शरीर को मंदिर मानकर उसकी रक्षा करते हैं, तो ईश्वर की कृपा सहज ही प्राप्त होती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: यह व्याख्या श्रीमद्भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय के छठे श्लोक पर आधारित है। इसमें प्रयुक्त दार्शनिक विश्लेषण स्वामी रामसुखदास जी की 'साधक संजीवनी' और शंकराचार्य कृत गीता भाष्य के सिद्धांतों से प्रेरित है। यह सामग्री पाठकों को आध्यात्मिक उन्नति के लिए प्रेरित करने हेतु तैयार की गई है। किसी भी प्रकार के अनुष्ठान या जीवन परिवर्तन के लिए इसे एक मार्गदर्शक के रूप में देखें, न कि किसी चिकित्सा विकल्प के रूप में।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

आसुरी निश्चय का अर्थ है वह मानसिक स्थिति जहाँ व्यक्ति केवल अपने स्वार्थ, अहंकार और दूसरों को कष्ट देने के उद्देश्य से कार्य करता है। ऐसे लोग शास्त्रों के नियमों को नहीं मानते और अपनी इंद्रियों के दास होते हैं।

परमात्मा प्रत्येक जीव के हृदय में 'साक्षी' के रूप में स्थित हैं। जब हम अपने शरीर को व्यसनों, हिंसा या अधर्म में लिप्त करते हैं, तो हम उस पवित्र स्थान को अपवित्र करते हैं जहाँ ईश्वर का वास है। अतः, शरीर का दुरुपयोग ईश्वर के प्रति अनादर है।

नहीं, उपवास (व्रत) सात्विक तपस्या है। यह शरीर को शुद्ध करने और इंद्रियों पर नियंत्रण पाने के लिए किया जाता है। आसुरी कष्ट वह है जो तामसिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए किया जाए, जबकि उपवास ईश्वर प्राप्ति के लिए किया जाता है।

प्रतिदिन अपने कार्यों का आत्म-निरीक्षण करें। पूछें कि क्या मेरा कार्य किसी को कष्ट पहुँचा रहा है? क्या मैं अपने शरीर को स्वस्थ और सात्विक रख रहा हूँ? जब हम सचेत होकर जीना शुरू करते हैं, तो आसुरी प्रवृत्तियाँ स्वतः समाप्त होने लगती हैं।

हाँ, गीता का संदेश ही यह है कि मनुष्य अपनी श्रद्धा और कर्मों को बदलकर अपना उद्धार कर सकता है। सत्संग, स्वाध्याय और ईश्वर के प्रति शरणागति से अज्ञानता का अंधकार दूर किया जा सकता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान् कहते हैं कि ऐसे अज्ञानी लोग, जो शास्त्रविरुद्ध तप करते हैं, न केवल अपने शरीर (भूत-समुदाय) को कष्ट पहुँचाते हैं, बल्कि उस अन्तर्यामी परमात्मा को भी, जो उनके शरीर में स्थित है। उनका निश्चय आसुरी होता है – वे असुरों के समान हैं।

The Lord declares: Such senseless people, by tormenting the physical elements of their body, also torment Me who dwells within as the Inner Self. Know them to be of demonic resolves, because their actions are against the divine purpose.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 17: श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 6 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 6/28 21% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!