श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 17 (श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 17 · श्लोक 5

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 28 22 मिनट का पठन 141 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः। दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः॥५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

8 पद
अशास्त्रविहितम्
not prescribed by the scriptures
घोरम्
severe
तप्यन्ते
perform
ये
those who
तपः
austerity
जनाः
persons
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः
filled with hypocrisy and egoism
कामरागबलान्विताः
possessed by the force of desire and attachment.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो लोग दम्भ और अहंकार से युक्त होकर, कामना, आसक्ति और बल (हठ) से प्रेरित होकर, शास्त्रों द्वारा अविहित घोर तप करते हैं,

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अशास्त्रविहितं घोरं तपः - श्रीमद्भगवद्गीता आध्यात्मिक विश्लेषण

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता का 17वां अध्याय 'श्रद्धात्रयविभागयोग' के नाम से विख्यात है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझाते हैं कि मनुष्य की श्रद्धा ही उसके व्यक्तित्व, कर्म और गंतव्य का निर्धारण करती है। प्रस्तुत श्लोक (17.5) उन व्यक्तियों की मनोदशा और उनके द्वारा किए गए 'अशास्त्रविहित' (शास्त्रों के विरुद्ध) तप का चित्रण करता है। भारतीय संस्कृति में तपस्या का अर्थ केवल शरीर को कष्ट देना नहीं है, अपितु इंद्रियों का संयम और चित्त की शुद्धि है।

जब कोई व्यक्ति शास्त्रों के मार्गदर्शन को त्यागकर, केवल अपने अहंकार, दंभ और काम-वासना की पूर्ति के लिए कठोर तप करता है, तो वह तपस्या न होकर एक प्रकार का मानसिक और शारीरिक उपद्रव बन जाता है। ब्रह्मांडीय दृष्टि से, ऐसी तपस्या प्रकृति के नियमों के विरुद्ध होती है, जो अंततः साधक के सूक्ष्म शरीर को हानि पहुँचाती है। यह श्लोक हमें सचेत करता है कि भक्ति और तप का मार्ग 'स्वैच्छिक' नहीं, बल्कि 'शास्त्रीय' होना चाहिए। शास्त्रों का अर्थ यहाँ केवल पुस्तकें नहीं, बल्कि ऋषियों द्वारा अनुभूत वे शाश्वत नियम हैं जो आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का सेतु हैं। जो तप अहंकार को पुष्ट करता है, वह बंधन का कारण है, और जो तप अहंकार को विसर्जित करता है, वही मोक्ष का द्वार है। इस श्लोक का अध्ययन हमें आत्म-वंचना से बचाकर सही दिशा प्रदान करने में सक्षम है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥ ५ ॥


उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक अक्षर का स्पष्ट उच्चारण करें। 'अशास्त्रविहितं' में 'अ' का उच्चारण दीर्घ न करें। 'दम्भाहङ्कार' में अनुस्वार का ध्यान रखें। यह श्लोक अनुष्टुप छंद में है, अतः इसका लयबद्ध पाठ मन को एकाग्र करने में सहायक होता है। इसे प्रातःकाल के ध्यान सत्र में सम्मिलित करने से साधक को अपने अहंकार के प्रति सजग रहने की प्रेरणा मिलती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
अशास्त्रविहितंशास्त्रों के विरुद्धजो विधि शास्त्रों द्वारा अनुमोदित नहीं है, वह कर्म केवल शारीरिक कष्ट है।
घोरंभयानक/कठोरशरीर और इंद्रियों को अनावश्यक पीड़ा पहुँचाने वाली तपस्या।
तप्यन्तेतप करते हैंतपस्या का अर्थ है ताप, जो अशुद्धियों को जला दे, न कि स्वयं को जलाए।
जनाःलोगवे मनुष्य जो अज्ञानवश तपस्या के वास्तविक स्वरूप को नहीं जानते।
दम्भपाखंड/दिखावादूसरों को प्रभावित करने के लिए किया गया धार्मिक प्रदर्शन।
अहङ्कारअहं की भावना'मैं' का भाव, जो तपस्या के फल को नष्ट कर देता है।
कामइच्छाएंसांसारिक भोगों की तीव्र लालसा।
रागआसक्तिवस्तुओं या व्यक्तियों के प्रति मोह का बंधन।
बलान्विताःबल से युक्तअपनी शारीरिक या मानसिक शक्ति का दुरुपयोग करना।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

भारतीय पौराणिक कथाओं में तपस्या के अनेक उदाहरण मिलते हैं, जहाँ 'अशास्त्रविहित' तप का परिणाम विनाशकारी सिद्ध हुआ। श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक का संदर्भ महाभारत के युद्धक्षेत्र से है, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को 'सात्त्विक', 'राजसिक' और 'तामसिक' तप के बीच का अंतर समझा रहे हैं।

पौराणिक संदर्भ में, हिरण्यकशिपु और रावण जैसे असुरों का उदाहरण लिया जा सकता है। उन्होंने कठोर तपस्या की, किंतु उनका उद्देश्य लोक-कल्याण या आत्म-साक्षात्कार नहीं था। उनका तप 'दम्भ' और 'अहंकार' से प्रेरित था। उन्होंने अपनी शक्ति का उपयोग दूसरों को पीड़ा पहुँचाने के लिए किया। शास्त्रों का स्पष्ट मत है कि तपस्या का उद्देश्य 'अहंकार का नाश' होना चाहिए, न कि 'अहंकार की वृद्धि'। जब कोई व्यक्ति अपनी इच्छाओं (काम) और आसक्तियों (राग) के वशीभूत होकर तप करता है, तो वह तपस्या 'तामसिक' श्रेणी में आती है।

वेदों में तप को 'तपस' कहा गया है, जिसका अर्थ है 'आंतरिक अग्नि'। यह अग्नि जब शास्त्रों के अनुशासन (धर्म) के साथ जलती है, तो वह ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न करती है। लेकिन जब यह अग्नि 'दम्भ' के ईंधन से जलती है, तो वह साधक को ही भस्म कर देती है। भगवान श्रीकृष्ण यहाँ अर्जुन को सचेत कर रहे हैं कि तपस्या का मार्ग सरल नहीं है; यह अत्यंत सूक्ष्म है। यदि तपस्या में 'मैं' का भाव शेष है, तो वह तपस्या नहीं, बल्कि एक प्रकार का 'अहंकारी प्रदर्शन' है। यह शिक्षा हमें सिखाती है कि हमारे प्रत्येक कर्म के पीछे का 'उद्देश्य' (Intent) ही उस कर्म की पवित्रता निर्धारित करता है।

नियमित पाठ एवं दर्शन के आध्यात्मिक लाभ

  • आत्म-अवलोकन: इस श्लोक का नियमित चिंतन साधक को अपने अहंकार के प्रति सचेत करता है।
  • पाखंड से मुक्ति: यह श्लोक हमें दिखावे की भक्ति से दूर रहकर निश्छल भाव से ईश्वर की शरण में जाने की प्रेरणा देता है।
  • मानसिक शांति: जब हम अपनी इच्छाओं और रागों को नियंत्रित करते हैं, तो मन में स्वतः ही शांति का संचार होता है।
  • कर्म शुद्धि: शास्त्रों के अनुसार कर्म करने से कर्मों के बंधन शिथिल होते हैं।
  • सकारात्मक आभा (Aura): सात्त्विक तप से साधक के चारों ओर एक दिव्य और सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण होता है।
  • दिव्य कृपा: अहंकार के विसर्जन से ही ईश्वर की कृपा का पात्र बना जा सकता है।
  • भ्रम का निवारण: यह श्लोक अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर सही मार्ग का दर्शन कराता है।
  • संतुलित जीवन: जीवन में अनुशासन और संयम का महत्व समझ में आता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'श्रीमद्भगवद्गीता' के 17वें अध्याय के 5वें श्लोक पर आधारित है। इसे 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' के अंतर्गत रखा गया है, जिसमें वेदों, उपनिषदों और गीता के भाष्यकारों के विचारों का समन्वय किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को शास्त्र-सम्मत ज्ञान प्रदान करना है ताकि वे आध्यात्मिक पथ पर भटकाव से बच सकें। यह लेख किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देता, अपितु विवेकपूर्ण भक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

जो तपस्या शास्त्रों के नियमों, सदाचार और लोक-कल्याण के विरुद्ध हो, उसे अशास्त्रविहित तप कहते हैं। यह केवल अहंकार की तुष्टि के लिए किया जाता है।

कठोर तपस्या गलत नहीं है, यदि वह सात्त्विक उद्देश्य से की जाए। यदि वह दम्भ और अहंकार से प्रेरित है, तो वह हानिकारक है।

दम्भ बाहरी दिखावा है, जबकि अहंकार आंतरिक 'मैं' की भावना है। दोनों ही आध्यात्मिक प्रगति में बाधक हैं।

यह श्लोक हमें सिखाता है कि हम जो भी कार्य करें, वह निस्वार्थ भाव से और धर्म के मार्ग पर चलकर करें।

शास्त्रों का ज्ञान दिशा प्रदान करता है। बिना दिशा के भक्ति भटक सकती है, इसलिए शास्त्रों का अध्ययन मार्गदर्शक के रूप में आवश्यक है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान् कहते हैं कि कुछ लोग शास्त्रों में न बताए गए घोर तप को करते हैं, जो दम्भ (पाखंड) और अहंकार से युक्त होते हैं, तथा कामना, आसक्ति और हठ के बल से प्रेरित होते हैं। ऐसी तपस्या का उद्देश्य आध्यात्मिक उन्नति न होकर सांसारिक लाभ या प्रतिष्ठा होता है।

The Lord says: There are those who practice severe austerities not prescribed by the scriptures, full of hypocrisy and egoism, driven by the force of desire and attachment. Such austerities are performed for show or worldly gains, not for spiritual purification.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 17: श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 5 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 5/28 18% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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