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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 17 · श्लोक 4

अध्याय 17 · श्लोक 4

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः। प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः॥४॥

yajante sāttvikā devān yakṣa-rakṣāṁsi rājasāḥ | pretān bhūta-gaṇāṁś cānye yajante tāmasā janāḥ ||4||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

यजन्ते: worship; सात्त्विका: the sattvic (people); देवान्: the gods; यक्षरक्षांसि: the yaksas and raksasas; राजसाः: the rajasic; प्रेतान्: the departed spirits; भूतगणान्: the hosts of bhutas (goblins); च: and; अन्ये: others; यजन्ते: worship; तामसा: the tamasic; जनाः: people.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

सात्त्विक लोग देवताओं की पूजा करते हैं, राजस लोग यक्षों और राक्षसों की पूजा करते हैं, और तामस लोग प्रेतों और भूत-प्रेतों की पूजा करते हैं।

English Translation

The sattvic people worship the gods; the rajasic worship the yaksas and raksasas; the tamasic people worship the departed spirits and the hosts of bhutas.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह श्लोक तीनों गुणों के अनुसार पूजा के विभिन्न रूपों को दर्शाता है। सात्त्विक लोग उच्च देवताओं की उपासना करते हैं, राजस लोग शक्ति और धन के प्रतीक यक्ष-राक्षसों की, और तामस लोग निम्न योनियों (प्रेत, भूत) की। This verse categorizes different forms of worship according to the three gunas, showing how the object of worship reflects the worshipper's inner quality.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।