श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 17 (श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 17 · श्लोक 3

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 28 27 मिनट का पठन 164 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥३॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
सत्त्वानुरूपा
according to the nature
सर्वस्य
of everyone
श्रद्धा
faith
भवति
is
भारत
O Bharata
श्रद्धामयः
made up of faith
अयम्
this
पुरुषः
person
यः
who
यत्
what
श्रद्धः
whose faith
सः
he
एव
indeed
सः
that.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे भारत! प्रत्येक व्यक्ति की श्रद्धा उसके स्वभाव के अनुसार होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है – वह जैसी श्रद्धा वाला होता है, वैसा ही वह स्वयं होता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

सनातन धर्म के महाग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता के १७वें अध्याय का तीसरा श्लोक मानव जीवन के सबसे गूढ़ रहस्य को उद्घाटित करता है। यह श्लोक केवल एक उपदेश नहीं, बल्कि मानव मनोविज्ञान और आध्यात्मिक विकास का एक पूर्ण विज्ञान है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को संबोधित करते हुए कहते हैं कि मनुष्य का संपूर्ण अस्तित्व उसकी 'श्रद्धा' का प्रतिबिंब है। श्रद्धा का अर्थ केवल अंधविश्वास नहीं, बल्कि वह आंतरिक ऊर्जा है जो व्यक्ति के अंतःकरण को दिशा प्रदान करती है।

ब्रह्मांडीय दृष्टि से देखें तो यह श्लोक 'यथा दृष्टि, तथा सृष्टि' के सिद्धांत को पुष्ट करता है। जिस प्रकार का बीज बोया जाता है, वृक्ष वैसा ही होता है; ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार की श्रद्धा व्यक्ति के हृदय में प्रतिष्ठित होती है, उसका व्यक्तित्व, उसके कर्म और उसका भविष्य उसी के अनुरूप ढल जाता है। यह श्लोक हमें आत्म-अवलोकन (Self-Introspection) की प्रेरणा देता है। यदि हम अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन चाहते हैं, तो हमें अपनी श्रद्धा के केंद्र को शुद्ध करना होगा। यह सिद्धांत न केवल व्यक्तिगत उन्नति के लिए, बल्कि सामाजिक और वैश्विक शांति के लिए भी अनिवार्य है। जब व्यक्ति की श्रद्धा सात्विक होती है, तो वह स्वयं के लिए और संपूर्ण जगत के लिए कल्याणकारी बन जाता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि हम जो कुछ भी देखते, सुनते या अनुभव करते हैं, वह हमारी श्रद्धा का ही विस्तार है। अतः, अपनी श्रद्धा को उच्च कोटि का बनाना ही मानव जीवन का परम पुरुषार्थ है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥३॥

उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक अक्षर का स्पष्ट उच्चारण करना चाहिए। 'सत्त्वानुरूपा' में 'त्त्व' का उच्चारण करते समय जिह्वा को तालु से स्पर्श कराएं। 'श्रद्धामयोऽयं' में अनुस्वार का ध्यान रखें। इस श्लोक का पाठ प्रातःकाल स्नान के पश्चात पूर्व दिशा की ओर मुख करके करना अत्यंत फलदायी माना गया है। इसे कंठस्थ करने से व्यक्ति के विचारों में स्थिरता आती है और वह अपने लक्ष्यों के प्रति अडिग रहता है। प्रतिदिन कम से कम ११ बार इसका मानसिक जप करने से अंतःकरण की शुद्धि होती है और व्यक्ति को अपने जीवन के प्रति स्पष्ट दृष्टिकोण प्राप्त होता है। यह श्लोक गीता के 'श्रद्धात्रयविभागयोग' का आधार स्तंभ है, जो हमें यह बताता है कि श्रद्धा ही वह सेतु है जो जीव को परमात्मा से जोड़ती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
सत्त्वानुरूपाअंतःकरण के अनुरूपव्यक्ति का स्वभाव उसके संस्कारों और गुणों के अनुसार ढलता है।
सर्वस्यसभी प्राणियों कीयह नियम सार्वभौमिक है, किसी एक व्यक्ति या जाति तक सीमित नहीं।
श्रद्धाआस्था या विश्वासहृदय की वह शक्ति जो किसी लक्ष्य को सत्य मानकर उसे स्वीकार करती है।
भवतिहोती हैयह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, जो जन्म-जन्मांतर से चली आ रही है।
भारतहे भरतवंशी (अर्जुन)यह संबोधन हमें याद दिलाता है कि हम महान पूर्वजों की संतान हैं।
श्रद्धामयःश्रद्धा से निर्मितमनुष्य का शरीर और मन केवल मांस-मज्जा नहीं, बल्कि विश्वास का पुंज है।
अयम्यहवर्तमान में उपस्थित जीव की बात हो रही है।
पुरुषःमनुष्यचेतन आत्मा जो शरीर में निवास करती है।
यो यच्छ्रद्धःजो जैसी श्रद्धा वाला हैव्यक्ति की पसंद, नापसंद और कार्य उसकी श्रद्धा के अधीन हैं।
स एव सःवह वैसा ही हैपरिणामस्वरूप, व्यक्ति का व्यक्तित्व उसकी श्रद्धा का ही प्रतिरूप है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता के १७वें अध्याय का यह श्लोक उस समय प्रकट हुआ जब कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न पूछा था। अर्जुन ने जानना चाहा था कि जो लोग शास्त्रों की विधि को त्यागकर अपनी कल्पना के अनुसार पूजा करते हैं, उनकी स्थिति क्या होती है? क्या वे सात्विक हैं, राजसिक हैं या तामसिक? भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तर देते हुए इस श्लोक के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि श्रद्धा ही वह मूल तत्व है जो व्यक्ति के कर्मों को दिशा देती है।

पौराणिक संदर्भों में देखें तो महर्षि वेदव्यास ने इस श्लोक के माध्यम से यह समझाया है कि श्रद्धा का अर्थ केवल मंदिर जाना नहीं है, बल्कि जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण क्या है। महाभारत के युद्ध के दौरान, जब अर्जुन मोहग्रस्त थे, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें यह बोध कराया कि 'श्रद्धा' ही वह शक्ति है जो मनुष्य को कायरता से वीरता की ओर ले जाती है। यदि अर्जुन की श्रद्धा अपने गुरुओं और परिजनों के प्रति मोह में होती, तो वह युद्ध नहीं कर पाते, किंतु जब उनकी श्रद्धा भगवान के आदेश और धर्म के पालन में स्थापित हुई, तो वे 'गांडीवधारी' बन गए।

यह श्लोक हमें यह भी सिखाता है कि श्रद्धा का निर्माण हमारे पूर्व कर्मों (संस्कारों) से होता है। वेदों में भी श्रद्धा को 'देवता' माना गया है। ऋग्वेद में श्रद्धा सूक्त के माध्यम से श्रद्धा की स्तुति की गई है। यह श्लोक उसी वैदिक परंपरा का विस्तार है। जब हम इस श्लोक का चिंतन करते हैं, तो हम वास्तव में अपने भीतर के उस 'पुरुष' को जागृत कर रहे होते हैं जो सत्य को पहचानने में सक्षम है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि हम जो कुछ भी हैं, वह हमारी श्रद्धा का परिणाम है। यदि हम अपनी श्रद्धा को शास्त्र सम्मत और सात्विक बना लें, तो हम निश्चित रूप से आत्म-कल्याण के मार्ग पर अग्रसर हो सकते हैं। यह श्लोक गीता के उन चुनिंदा श्लोकों में से है जो व्यक्ति को स्वयं का निर्माता बनने की शक्ति प्रदान करते हैं।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक स्पष्टता: नियमित पाठ से मन में व्याप्त भटकाव कम होता है और विचारों में स्पष्टता आती है।
  • आत्म-विश्वास में वृद्धि: यह श्लोक व्यक्ति को यह बोध कराता है कि वह अपनी श्रद्धा का स्वामी है, जिससे आत्मविश्वास बढ़ता है।
  • नकारात्मकता का नाश: सात्विक श्रद्धा का चिंतन करने से मन से ईर्ष्या, द्वेष और भय जैसे नकारात्मक भाव दूर होते हैं।
  • कर्मों की शुद्धि: जब व्यक्ति को यह ज्ञात होता है कि उसकी श्रद्धा ही उसके कर्मों को निर्धारित करती है, तो वह अपने कार्यों के प्रति अधिक सजग हो जाता है।
  • दैवीय कृपा की प्राप्ति: श्रद्धा ही भक्ति का द्वार है। इस श्लोक का जप करने से हृदय में ईश्वर के प्रति प्रेम और समर्पण का भाव जागृत होता है।
  • एकाग्रता में सुधार: ध्यान और जप के माध्यम से यह श्लोक मन को एक बिंदु पर केंद्रित करने में सहायता करता है।
  • जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण: यह श्लोक सिखाता है कि हम अपनी श्रद्धा को बदलकर अपने भाग्य को बदल सकते हैं।
  • आध्यात्मिक जागृति: यह श्लोक साधक को भौतिक जगत से ऊपर उठकर आत्म-साक्षात्कार की ओर प्रेरित करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री श्रीमद्भगवद्गीता के १७वें अध्याय के तीसरे श्लोक पर आधारित है। इसे 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' के अंतर्गत रखा गया है, जिसमें गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित 'श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप' और स्वामी चिन्मयानंद जी के भाष्य को आधार माना गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को शास्त्र सम्मत और प्रामाणिक आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करना है। यह लेख पूर्णतः सनातन धर्म के सिद्धांतों के अनुरूप है और किसी भी प्रकार के भ्रामक दावों से मुक्त है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

हाँ, श्रद्धा को सत्संग, स्वाध्याय और सात्विक जीवनशैली के माध्यम से बदला जा सकता है। जैसे-जैसे हम अपने विचारों को शुद्ध करते हैं, हमारी श्रद्धा का स्तर भी ऊपर उठता है।

विश्वास तर्क पर आधारित हो सकता है, लेकिन श्रद्धा हृदय की एक गहरी निष्ठा है जो तर्क से परे अनुभव पर आधारित होती है। श्रद्धा में समर्पण का भाव होता है।

नहीं, यह श्लोक एक मनोवैज्ञानिक सत्य है। हर व्यक्ति की किसी न किसी चीज में श्रद्धा होती है—चाहे वह विज्ञान हो, धन हो, या मानवता। यह श्लोक हमें अपनी श्रद्धा के चुनाव के प्रति सचेत करता है।

ब्रह्ममुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व) का समय सबसे उत्तम माना गया है, क्योंकि उस समय मन शांत और ग्रहणशील होता है।

सात्विक श्रद्धा मन में शांति लाती है, जिससे तनाव कम होता है। आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि सकारात्मक विश्वास (Positive Belief) शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है।

Bhaktilok.in - सनातन धर्म के ज्ञान का पावन स्रोत।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान् अर्जुन (भारत) को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति की श्रद्धा उसके अंतर्मन की प्रकृति के अनुरूप होती है। मनुष्य श्रद्धा से ही निर्मित है – उसका व्यक्तित्व उसकी श्रद्धा का प्रतिबिंब है। जैसी उसकी श्रद्धा, वैसा ही वह होता है।

The Lord tells Arjuna: Everyone's faith corresponds to their inner nature. A person is verily made of faith – whatever his faith is, that he indeed becomes. This verse underscores the power of belief in shaping one's entire being.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 17: श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 3 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 3/28 11% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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