आज का पंचांग (Columbus) | सूर्योदय: ०४:२९ PM | सूर्यास्त: ०५:३३ AM
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 17 · श्लोक 3

अध्याय 17 · श्लोक 3

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥३॥

sattvānurūpā sarvasya śraddhā bhavati bhārata | śraddhā-mayo’yaṁ puruṣo yo yac-chraddhaḥ sa eva saḥ ||3||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

सत्त्वानुरूपा: according to the nature; सर्वस्य: of everyone; श्रद्धा: faith; भवति: is; भारत: O Bharata; श्रद्धामयः: made up of faith; अयम्: this; पुरुषः: person; यः: who; यत्: what; श्रद्धः: whose faith; सः: he; एव: indeed; सः: that.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे भारत! प्रत्येक व्यक्ति की श्रद्धा उसके स्वभाव के अनुसार होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है – वह जैसी श्रद्धा वाला होता है, वैसा ही वह स्वयं होता है।

English Translation

O Bharata, the faith of each is in accordance with his nature. The person is made up of his faith; as one's faith is, so is he.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह श्लोक एक महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रतिपादित करता है कि मनुष्य का चरित्र और व्यक्तित्व उसकी श्रद्धा (गहरी आस्था) से निर्मित होता है। जैसी श्रद्धा, वैसा मनुष्य। यह बताता है कि आस्था के अनुसार व्यक्ति का स्वरूप बनता है। This verse establishes that a person's character is shaped by his fundamental faith. As is the faith, so is the person.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।