श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) – श्लोक 3
श्लोक ३ में कहा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति की श्रद्धा उसके स्वभाव के अनुरूप होती है, और मनुष्य श्रद्धामय है। Verse 3: Faith is according to one's nature; a person is made of faith.
संस्कृत श्लोक
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥३॥
sattvānurūpā sarvasya śraddhā bhavati bhārata | śraddhā-mayo’yaṁ puruṣo yo yac-chraddhaḥ sa eva saḥ ||3||
पदच्छेद / शब्दार्थ
सत्त्वानुरूपा: according to the nature; सर्वस्य: of everyone; श्रद्धा: faith; भवति: is; भारत: O Bharata; श्रद्धामयः: made up of faith; अयम्: this; पुरुषः: person; यः: who; यत्: what; श्रद्धः: whose faith; सः: he; एव: indeed; सः: that.
हिंदी अनुवाद
हे भारत! प्रत्येक व्यक्ति की श्रद्धा उसके स्वभाव के अनुसार होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है – वह जैसी श्रद्धा वाला होता है, वैसा ही वह स्वयं होता है।
English Translation
O Bharata, the faith of each is in accordance with his nature. The person is made up of his faith; as one's faith is, so is he.
टीका / Commentary
यह श्लोक एक महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रतिपादित करता है कि मनुष्य का चरित्र और व्यक्तित्व उसकी श्रद्धा (गहरी आस्था) से निर्मित होता है। जैसी श्रद्धा, वैसा मनुष्य। यह बताता है कि आस्था के अनुसार व्यक्ति का स्वरूप बनता है। This verse establishes that a person's character is shaped by his fundamental faith. As is the faith, so is the person.