आज का पंचांग (Columbus) | सूर्योदय: ०४:२९ PM | सूर्यास्त: ०५:३३ AM
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 17 · श्लोक 2

अध्याय 17 · श्लोक 2

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

श्रीभगवानुवाच त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा। सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु॥२॥

śrī-bhagavān uvāca tri-vidhā bhavati śraddhā dehināṁ sā svabhāva-jā | sāttvikī rājasī caiva tāmasī ceti tāṁ śṛṇu ||2||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

श्रीभगवान्: the Lord; उवाच: said; त्रिविधा: threefold; भवति: is; श्रद्धा: faith; देहिनाम्: of the embodied beings; सा: that; स्वभावजा: born of one's own nature; सात्त्विकी: sattvic; राजसी: rajasic; च: and; एव: indeed; तामसी: tamasic; च: and; इति: thus; ताम्: that; शृणु: hear.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

श्रीभगवान् ने कहा – मनुष्यों की श्रद्धा उनके स्वभाव के अनुसार तीन प्रकार की होती है – सात्त्विकी, राजसी और तामसी। उसे मुझसे सुनो।

English Translation

The Blessed Lord said: Threefold is the faith of the embodied beings, which is inherent in their nature – the sattvic, the rajasic, and the tamasic. Hear about it from Me.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

भगवान् अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुए बताते हैं कि प्रत्येक जीव की श्रद्धा उसके अंतर्निहित स्वभाव (संस्कारों) से उत्पन्न होती है और तीन गुणों में विभाजित है। यह वर्गीकरण आगे के विवेचन का आधार बनता है। The Lord replies that faith arises from one's innate nature and is of three types according to the three gunas – sattva, rajas, and tamas.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।