श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 17 (श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 17 · श्लोक 1

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 28 26 मिनट का पठन 142 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अर्जुन उवाच ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः॥१॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

17 पद
अर्जुन
Arjuna
उवाच
said
ये
those who
शास्त्रविधिम्
the ordinances of the scriptures
उत्सृज्य
having abandoned
यजन्ते
worship
श्रद्धया
with faith
अन्विताः
endowed
तेषाम्
their
निष्ठा
steadfastness
तु
indeed
का
what
कृष्ण
O Krishna
सत्त्वम्
sattva
आहो
or
रजः
rajas
तमः
tamas.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

अर्जुन ने कहा – हे कृष्ण! जो श्रद्धा से युक्त होकर शास्त्र-विधि को त्यागकर (अन्य देवताओं की) पूजा करते हैं, उनकी स्थिति क्या है? क्या वह सात्त्विक है, राजसी है या तामसी?

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अर्जुन का प्रश्न: श्रद्धा और शास्त्र-विधि का रहस्य - Bhaktilok.in

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता का सत्रहवाँ अध्याय 'श्रद्धात्रयविभागयोग' के नाम से विख्यात है। यह अध्याय मानव जीवन की सबसे सूक्ष्म और महत्वपूर्ण शक्ति—'श्रद्धा'—पर केंद्रित है। अर्जुन का यह प्रश्न केवल एक जिज्ञासा नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए एक मार्गदर्शक प्रकाश है। जब हम किसी कार्य को करते हैं, तो क्या वह कार्य केवल शारीरिक है या उसके पीछे कोई अदृश्य शक्ति कार्य कर रही है? वह शक्ति 'श्रद्धा' है।

वैदिक संस्कृति में श्रद्धा को केवल विश्वास नहीं, बल्कि आत्मा की वह वृत्ति माना गया है जो व्यक्ति को परमात्मा से जोड़ती है। अर्जुन का प्रश्न—"जो लोग शास्त्र-विधि को छोड़कर श्रद्धापूर्वक यजन करते हैं, उनकी निष्ठा क्या है?"—यह दर्शाता है कि भक्ति के मार्ग में भी भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। क्या श्रद्धा का कोई रंग होता है? क्या वह सात्विक, राजसिक या तामसिक हो सकती है? यह प्रश्न हमें यह समझने के लिए प्रेरित करता है कि धर्म के मार्ग पर केवल उत्साह पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस उत्साह का आधार 'शास्त्र' होना चाहिए। शास्त्र का अर्थ यहाँ किसी संकीर्ण नियम से नहीं, बल्कि उस शाश्वत ज्ञान से है जो सृष्टि के संतुलन को बनाए रखता है। जब श्रद्धा शास्त्र से विमुख होती है, तो वह भटक सकती है। अतः, यह अध्याय हमें अपनी आंतरिक ऊर्जा को पहचानने और उसे सही दिशा में मोड़ने का दिव्य विज्ञान प्रदान करता है। यह ब्रह्मांडीय सत्य है कि हमारी श्रद्धा ही हमारे भविष्य का निर्माण करती है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

अर्जुन उवाच

ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः॥१॥


उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक अक्षर पर स्पष्टता रखें। 'शास्त्रविधिमुत्सृज्य' का उच्चारण करते समय 'स' और 'त' के संयोग पर ध्यान दें। यह श्लोक अनुष्टुप छंद में है, जो लयबद्ध पाठ के लिए अत्यंत उपयुक्त है। इसे प्रतिदिन एकाग्रचित्त होकर तीन बार दोहराने से बुद्धि में स्पष्टता आती है और संशय का निवारण होता है।

यह श्लोक अर्जुन की उस व्याकुलता को दर्शाता है जो एक सच्चे जिज्ञासु के मन में उत्पन्न होती है। अर्जुन यहाँ भगवान श्रीकृष्ण को 'कृष्ण' कहकर संबोधित करते हैं, जो उनके सखा और मार्गदर्शक दोनों हैं। यह संबोधन इस बात का प्रतीक है कि जब हम अपने जीवन के कठिन निर्णयों में उलझें, तो हमें अपने भीतर के 'कृष्ण' (विवेक) से प्रश्न करना चाहिए।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
येजोउन व्यक्तियों का संकेत जो मार्ग की खोज में हैं।
शास्त्रविधिम्शास्त्रों के विधानवे नियम जो ऋषि-मुनियों द्वारा सत्य के अनुभव से रचे गए हैं।
उत्सृज्यछोड़करअज्ञान या अहंकार के कारण नियमों की उपेक्षा करना।
यजन्तेपूजा/यज्ञ करते हैंकिसी उच्च शक्ति या फल की प्राप्ति हेतु किया गया कर्म।
श्रद्धयान्विताःश्रद्धा से युक्तहृदय की वह अटूट निष्ठा जो कर्म को बल देती है।
तेषांउनकीउन साधकों का समूह जो शास्त्र से परे कार्य कर रहे हैं।
निष्ठास्थिति/आस्थावह मानसिक अवस्था जो व्यक्ति के चरित्र को परिभाषित करती है।
सत्त्वम्सात्विक गुणप्रकाश, ज्ञान और सात्विकता का प्रतीक।
रजःराजसिक गुणकामना, क्रियाशीलता और चंचलता का प्रतीक।
तमःतामसिक गुणअंधकार, आलस्य और अज्ञान का प्रतीक।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के ठीक पहले, जब अर्जुन ने अपने सगे-संबंधियों को शत्रु पक्ष में देखा, तो उनका मन विचलित हो गया। गीता का उपदेश केवल युद्ध के लिए नहीं, बल्कि जीवन के हर उस मोड़ के लिए है जहाँ व्यक्ति धर्मसंकट में फँस जाता है। सत्रहवें अध्याय की पृष्ठभूमि तब बनती है जब अर्जुन ने भगवान से पूछा कि जो लोग शास्त्रों का पालन नहीं करते, उनकी श्रद्धा का स्वरूप क्या है? यह प्रश्न अत्यंत गहरा है क्योंकि उस समय समाज में विभिन्न प्रकार के संप्रदाय और उपासना पद्धतियाँ प्रचलित थीं।

पौराणिक संदर्भों में, वेदों और उपनिषदों में 'श्रद्धा' को 'देवता' माना गया है। ऋग्वेद में श्रद्धा सूक्त (१०.१५१) में श्रद्धा की स्तुति की गई है। अर्जुन का यह प्रश्न इसी वैदिक परंपरा को आगे बढ़ाता है। महाभारत के अनुशासन पर्व में भी भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को बताया था कि श्रद्धा ही मनुष्य का सबसे बड़ा धन है। यदि श्रद्धा शुद्ध है, तो कर्म का फल भी शुद्ध होगा। अर्जुन का यह प्रश्न भगवान श्रीकृष्ण को यह अवसर देता है कि वे 'गुणत्रय' (सत्व, रज, तम) के आधार पर श्रद्धा का वर्गीकरण करें। यह संवाद हमें सिखाता है कि भक्ति केवल भावनाओं का खेल नहीं है, बल्कि यह एक विज्ञान है। शास्त्र वे दिशा-निर्देश हैं जो हमें उस विज्ञान को समझने में मदद करते हैं। जब अर्जुन यह पूछते हैं, तो वे वास्तव में हम सभी की ओर से पूछ रहे होते हैं, क्योंकि हम भी अक्सर बिना सोचे-समझे किसी परंपरा का पालन करते हैं या किसी के प्रभाव में आकर उपासना करते हैं। श्रीकृष्ण का उत्तर इस अध्याय में यह स्पष्ट करता है कि श्रद्धा का स्वरूप हमारे भोजन, यज्ञ, तप और दान से निर्धारित होता है। इस प्रकार, यह श्लोक गीता के दर्शन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है जो हमें 'अंधविश्वास' और 'सच्ची श्रद्धा' के बीच का अंतर समझाता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक स्पष्टता: इस श्लोक का नियमित चिंतन करने से मन में उठने वाले अनावश्यक संशय समाप्त होते हैं।
  • विवेक की जागृति: यह श्लोक साधक को सही और गलत के बीच भेद करने की बुद्धि प्रदान करता है।
  • श्रद्धा का शुद्धिकरण: बार-बार पाठ करने से हमारी श्रद्धा का स्तर तामसिक से सात्विक की ओर अग्रसर होता है।
  • अहंकार का नाश: यह बोध कराता है कि हम जो भी कर रहे हैं, वह गुणों के प्रभाव में है, जिससे अहंकार कम होता है।
  • सकारात्मक ऊर्जा: शास्त्रों के प्रति सम्मान और श्रद्धा का भाव मन में सकारात्मक तरंगें उत्पन्न करता है।
  • कर्मों में सात्विकता: यह प्रेरणा देता है कि हमारे दैनिक कार्य शास्त्र-सम्मत हों, जिससे जीवन में शांति बनी रहे।
  • दैवीय कृपा: भगवान श्रीकृष्ण के प्रति समर्पण का भाव दृढ़ होता है, जिससे साधक को आंतरिक सुरक्षा का अनुभव होता है।
  • तनाव मुक्ति: जब हम अपने जीवन को शास्त्र के प्रकाश में देखते हैं, तो व्यर्थ की चिंताएँ स्वतः समाप्त हो जाती हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' (Editorially Curated Content) के अंतर्गत आती है। इसमें श्रीमद्भगवद्गीता के मूल श्लोकों के साथ-साथ आचार्यों के भाष्य और दार्शनिक व्याख्याओं का समावेश किया गया है। संदर्भ के लिए 'श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप' (ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद) और 'गीता प्रेस गोरखपुर' के व्याख्यात्मक संस्करणों का आधार लिया गया है। यह लेख पूर्णतः आध्यात्मिक शोध और वैदिक सिद्धांतों के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य पाठकों को शास्त्र-सम्मत ज्ञान प्रदान करना है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

उत्तर: शास्त्र-विधि के बिना की गई पूजा व्यर्थ नहीं होती, परंतु वह अपूर्ण हो सकती है। भगवान श्रीकृष्ण आगे के श्लोकों में समझाते हैं कि श्रद्धा का स्वरूप ही यह तय करता है कि उसका फल क्या होगा। शास्त्र हमें एक सुरक्षित मार्ग प्रदान करते हैं, जबकि बिना शास्त्र के श्रद्धा भटक सकती है।

उत्तर: सात्विक श्रद्धा देवताओं की पूजा की ओर ले जाती है, राजसिक श्रद्धा यक्षों और राक्षसों की ओर, और तामसिक श्रद्धा प्रेतों और भूतों की ओर। यह श्रद्धा का वर्गीकरण हमारे आहार, तप और दान के आधार पर होता है।

उत्तर: हाँ, शास्त्र-विधि का अर्थ केवल कर्मकांड नहीं है, बल्कि अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करना भी है। यदि हम अपने जीवन को सात्विक आहार और सदाचार के साथ जोड़ें, तो हम शास्त्र-सम्मत जीवन जी सकते हैं।

उत्तर: अर्जुन एक जिज्ञासु शिष्य हैं। वे यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि भक्ति के मार्ग में कहीं कोई भ्रम न रहे। वे चाहते थे कि आने वाली पीढ़ियाँ यह समझ सकें कि श्रद्धा का आधार क्या होना चाहिए।

उत्तर: निश्चित रूप से। सत्संग, स्वाध्याय और सात्विक जीवनशैली के माध्यम से हम अपनी श्रद्धा के स्तर को ऊपर उठा सकते हैं। श्रद्धा एक गतिशील शक्ति है जिसे अभ्यास से शुद्ध किया जा सकता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

अर्जुन भगवान कृष्ण से प्रश्न करते हैं कि जो लोग शास्त्रों के नियमों की अवहेलना करते हुए भी श्रद्धापूर्वक देवताओं की पूजा करते हैं, उनकी आस्था की प्रकृति क्या है – सात्त्विक, राजसी या तामसी? यह प्रश्न धार्मिक आचरण और शास्त्रीय आज्ञा के बीच के संबंध को स्पष्ट करने के लिए है।

Arjuna asks Krishna: What is the nature of the faith of those who worship with devotion but disregard scriptural injunctions? Is it sattvic, rajasic, or tamasic? This question sets the stage for the classification of faith and actions according to the three gunas.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 17: श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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