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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 17 · श्लोक 1

अध्याय 17 · श्लोक 1

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अर्जुन उवाच ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः॥१॥

arjuna uvāca ye śāstra-vidhim utsṛjya yajante śraddhayānvitāḥ | teṣāṁ niṣṭhā tu kā kṛṣṇa sattvam āho rajas tamaḥ ||1||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अर्जुन: Arjuna; उवाच: said; ये: those who; शास्त्रविधिम्: the ordinances of the scriptures; उत्सृज्य: having abandoned; यजन्ते: worship; श्रद्धया: with faith; अन्विताः: endowed; तेषाम्: their; निष्ठा: steadfastness; तु: indeed; का: what; कृष्ण: O Krishna; सत्त्वम्: sattva; आहो: or; रजः: rajas; तमः: tamas.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

अर्जुन ने कहा – हे कृष्ण! जो श्रद्धा से युक्त होकर शास्त्र-विधि को त्यागकर (अन्य देवताओं की) पूजा करते हैं, उनकी स्थिति क्या है? क्या वह सात्त्विक है, राजसी है या तामसी?

English Translation

Arjuna said: Those who, endowed with faith, worship (the gods), but who have abandoned the ordinances of the scriptures, what is their condition? Is it sattva, rajas or tamas?

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

अर्जुन का प्रश्न उन लोगों के बारे में है जो शास्त्रीय विधानों का पालन न करते हुए भी श्रद्धापूर्वक उपासना करते हैं। वह जानना चाहते हैं कि उनकी श्रद्धा किस गुण से प्रभावित है। Arjuna's question pertains to those who worship with faith but without following scriptural injunctions, and he wants to know the nature of their faith.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।