श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 17 (श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 17 · श्लोक 10

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 28 25 मिनट का पठन 130 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्। उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥१०॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
यातयामम्
cooked (and kept) stale
गतरसम्
tasteless
पूति
putrid
पर्युषितम्
spoiled
च
and
यत्
which
उच्छिष्टम्
leavings
अपि
also
च
and
अमेध्यम्
impure
भोजनम्
food
तामसप्रियम्
dear to the tamasic.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो भोजन पका हुआ (और बासी) हो, रसहीन हो, दुर्गन्धित हो, सड़ा हुआ हो, जूठा हो और अपवित्र हो – वह तामस पुरुषों को प्रिय होता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

तामस आहार का आध्यात्मिक विश्लेषण - श्रीमद्भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय का दसवां श्लोक मानव जीवन की आहार-शैली और उसके मनोवैज्ञानिक प्रभावों का एक अत्यंत सूक्ष्म और वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। भारतीय दर्शन में 'आहार' केवल पेट भरने का साधन नहीं, अपितु यह हमारे चित्त की शुद्धि और बुद्धि की स्पष्टता का आधार है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझाते हैं कि जिस प्रकार का अन्न हम ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार का हमारा व्यक्तित्व और विचार-प्रवाह निर्मित होता है। तामस आहार, जिसे 'तमोगुणी' भोजन कहा गया है, वह अंधकार, अज्ञान, आलस्य और प्रमाद का प्रतीक है। जब मनुष्य अपनी जिह्वा के वशीभूत होकर सड़ा-गला, बासी, अपवित्र या दूसरों द्वारा छोड़ा हुआ भोजन ग्रहण करता है, तो वह अनजाने में अपने भीतर की सात्विक ऊर्जा को नष्ट कर रहा होता है। यह श्लोक केवल भोजन के प्रकारों का वर्णन नहीं है, बल्कि यह एक चेतावनी है कि कैसे अशुद्ध भोजन हमारी चेतना को भौतिकता के निम्न स्तरों पर बांध देता है। ब्रह्मांडीय ऊर्जा के प्रवाह में, तामस आहार एक अवरोधक की भांति कार्य करता है, जो मनुष्य को ईश्वर से दूर, जड़ता और मोह की गहरी खाइयों में धकेल देता है। इस श्लोक का अध्ययन हमें यह बोध कराता है कि यदि हमें अपने भीतर की दिव्य अग्नि को प्रज्वलित रखना है, तो हमें अपने खान-पान में विवेक और पवित्रता का समावेश करना अनिवार्य है। यह न केवल शारीरिक स्वास्थ्य का प्रश्न है, बल्कि यह आध्यात्मिक उत्थान का प्रथम सोपान है, जहाँ हम अपनी इंद्रियों को शुद्ध करके परमात्मा की ओर अग्रसर होते हैं।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥१०॥


श्लोक का उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक अक्षर पर स्पष्टता और गंभीरता होनी चाहिए। 'यातयामं' में 'या' का दीर्घ उच्चारण, 'पर्युषितं' में 'षि' की स्पष्टता और 'तामसप्रियम्' में अनुस्वार का नासिक्य उच्चारण करना चाहिए। इसे प्रतिदिन भोजन ग्रहण करने से पूर्व स्मरण करने से व्यक्ति को अपने आहार के प्रति सचेत रहने की प्रेरणा मिलती है। यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि हम जो खा रहे हैं, वह हमारे कर्मों का आधार बन रहा है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
यातयामंजो बहुत देर का पका हुआ होसमय के साथ ऊर्जा का ह्रास, जो प्राणशक्ति को क्षीण करता है।
गतरसंजिसका रस निकल गया होनीरस भोजन, जो मन में उत्साह और आनंद का संचार नहीं करता।
पूतिदुर्गंधयुक्त या सड़ा हुआविकृति का प्रतीक, जो शरीर में विषाक्तता और मन में अशुद्धि लाता है।
पर्युषितंबासी भोजनअतीत के बोझ और जड़ता का प्रतीक, जो वर्तमान की सजगता को मारता है।
चऔरसमुच्चयबोधक, जो इन सभी दोषों को एक साथ जोड़ता है।
यत्जोउस विशिष्ट भोजन की ओर संकेत।
उच्छिष्टमजूठा भोजनदूसरों की अशुद्ध ऊर्जा का ग्रहण, जो अहंकार और हीनता को जन्म देता है।
अमेध्यंअपवित्रअधर्म से अर्जित या अशुद्ध विधियों से बना भोजन।
तामसप्रियम्तमोगुणी मनुष्यों को प्रियअज्ञान और मोह में डूबे हुए व्यक्तियों की स्वाभाविक रुचि।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता के 17वें अध्याय का नाम 'श्रद्धात्रयविभागयोग' है। इस अध्याय में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से उन लोगों की स्थिति के बारे में पूछते हैं जो शास्त्रों के विधि-विधानों का पालन नहीं करते, परंतु फिर भी श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण उत्तर देते हुए बताते हैं कि श्रद्धा तीन प्रकार की होती है—सात्विक, राजसिक और तामसिक। इसी क्रम में वे आहार का वर्णन करते हैं क्योंकि आहार ही मनुष्य की श्रद्धा और प्रकृति का निर्माण करता है।

पौराणिक संदर्भों में, हम देखते हैं कि ऋषि-मुनियों ने हमेशा 'मिताहार' और 'सात्विक आहार' पर बल दिया है। रामायण और महाभारत के काल में, तपस्वियों का भोजन कंद-मूल और फल होता था, जो सात्विक ऊर्जा का स्रोत थे। इसके विपरीत, असुरों और तामसिक प्रवृत्तियों वाले व्यक्तियों का वर्णन अक्सर ऐसे भोजन के साथ किया गया है जो मांस, मदिरा या अशुद्ध वस्तुओं से युक्त होता था। उदाहरण के लिए, जब दुर्योधन ने कृष्ण के शांति प्रस्ताव को ठुकराकर अपनी तामसिक बुद्धि का परिचय दिया, तो वह उसी अशुद्ध अहंकार का परिणाम था जो तामसिक आहार और संगति से पोषित हुआ था। वेदों में 'अन्नं ब्रह्म' कहा गया है, जिसका अर्थ है कि अन्न ही ब्रह्म का स्वरूप है। यदि हम अन्न को ही अपवित्र कर देंगे, तो हम अपने भीतर के ब्रह्म को कैसे अनुभव कर पाएंगे? यह श्लोक हमें सिखाता है कि भोजन केवल शरीर का पोषण नहीं है, बल्कि यह हमारे सूक्ष्म शरीर (मन, बुद्धि, अहंकार) का निर्माण करने वाली सामग्री है। तामस आहार का सेवन करने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे अपनी विवेक शक्ति खो देता है और उसे सही और गलत के बीच का अंतर समझ नहीं आता। यही कारण है कि शास्त्रों में तामस आहार को 'अधर्म' की श्रेणी में रखा गया है क्योंकि यह मनुष्य को उसकी दिव्य संभावनाओं से वंचित कर देता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • विवेक की जागृति: इस श्लोक के निरंतर चिंतन से व्यक्ति में भोजन के प्रति विवेक जागृत होता है, जिससे वह अशुद्ध आहार से दूर रहने में सक्षम होता है।
  • मानसिक स्पष्टता: सात्विक आहार की ओर झुकाव होने से मन की चंचलता कम होती है और एकाग्रता में वृद्धि होती है।
  • ऊर्जा का स्तर: तामसिक भोजन का त्याग करने से शरीर में आलस्य और प्रमाद का नाश होता है, जिससे व्यक्ति अधिक ऊर्जावान अनुभव करता है।
  • कर्म शुद्धि: शुद्ध आहार से उत्पन्न विचार शुद्ध होते हैं, जो अंततः व्यक्ति के कर्मों को भी पवित्र बनाते हैं।
  • आध्यात्मिक उन्नति: यह श्लोक साधक को योग के मार्ग पर चलने के लिए आवश्यक शारीरिक और मानसिक आधार प्रदान करता है।
  • सकारात्मक आभा (Aura): शुद्ध भोजन से शरीर की आभा मंडल (Aura) में सकारात्मकता आती है, जो नकारात्मक ऊर्जाओं को दूर रखती है।
  • दैवीय कृपा: जब हम अपने शरीर को मंदिर मानकर उसे पवित्र रखते हैं, तो ईश्वर की कृपा सहज ही प्राप्त होती है।
  • दीर्घायु और स्वास्थ्य: बासी और सड़े हुए भोजन का त्याग करने से पाचन तंत्र स्वस्थ रहता है, जिससे रोगों का नाश होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय के मूल श्लोकों और भाष्यकारों (जैसे आदि शंकराचार्य और स्वामी विवेकानंद) के दृष्टिकोणों के आधार पर संकलित किया गया है। यहाँ प्रस्तुत अर्थ और व्याख्याएं वैदिक परंपरा के अनुरूप हैं और इनका उद्देश्य पाठकों को आध्यात्मिक मार्ग पर प्रेरित करना है। किसी भी प्रकार के स्वास्थ्य संबंधी निर्णयों के लिए कृपया अपने विवेक और चिकित्सक का परामर्श लें, परंतु आध्यात्मिक शुद्धि के लिए शास्त्रों का यह मार्गदर्शन सर्वोपरि है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

आयुर्वेद और योग के अनुसार, भोजन को पकाने के 3-4 घंटे के भीतर ग्रहण कर लेना चाहिए। फ्रिज में रखा भोजन अपनी 'प्राणशक्ति' खो देता है, इसलिए इसे तामसिक की श्रेणी में रखा जाता है। ताजा भोजन ही सात्विक ऊर्जा प्रदान करता है।

उच्छिष्ट का अर्थ है जूठा भोजन। किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा खाया हुआ या किसी के द्वारा छोड़ा गया भोजन ग्रहण करना आध्यात्मिक दृष्टि से अशुद्ध माना जाता है क्योंकि इसमें उस व्यक्ति की ऊर्जा और लार के माध्यम से अशुद्धियाँ सम्मिलित हो जाती हैं।

तामस आहार मन में जड़ता, क्रोध, मोह, और अज्ञान पैदा करता है। यह व्यक्ति की सोचने की क्षमता को कुंद कर देता है और उसे आलस्य की ओर ले जाता है, जिससे वह अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में असमर्थ हो जाता है।

आध्यात्मिक साधक के लिए तामसिक भोजन का पूर्ण त्याग ही श्रेयस्कर है। यदि आप आत्म-साक्षात्कार और मानसिक शांति की खोज में हैं, तो सात्विक आहार ही एकमात्र विकल्प है।

जो भोजन बासी हो, जिसमें दुर्गंध हो, जो बहुत अधिक मसालेदार या सड़ा हुआ हो, और जिसे बनाने में प्रेम या पवित्रता का अभाव हो, वह तामसिक है। ताजा, शाकाहारी और सादगीपूर्ण भोजन ही सात्विक होता है।

© 2024 Bhaktilok.in - आध्यात्मिक ज्ञान का पावन स्रोत।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

तामस आहार वह है जो पकने के बहुत समय बाद (बासी), रसहीन, दुर्गन्धित, सड़ा हुआ, अपवित्र, और दूसरों द्वारा छोड़ा हुआ (जूठा) हो। ऐसा भोजन तामसी प्रवृत्ति के लोगों को प्रिय होता है, क्योंकि यह अज्ञान और आलस्य को बढ़ाता है।

Tamasic food is that which is overcooked/stale, tasteless, putrid, decomposed, impure, and leftovers of others. It is liked by those with tamasic nature, as it promotes ignorance, dullness, and inertia.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 17: श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 10 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 10/28 36% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!