श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 17 (श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 17 · श्लोक 11

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 28 24 मिनट का पठन 137 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते। यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः॥११॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
अफलाकाङ्क्षिभि
by those who desire no fruit
यज्ञ
sacrifice
विधिदृष्ट
according to the scriptural ordinance
य
which
इज्यते
is performed
यष्टव्यम्
should be performed
एव
indeed
इति
thus
मन
mind
समाधाय
fixing
स
that
सात्त्विक
sattvic.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो यज्ञ फल की इच्छा न रखने वालों द्वारा, केवल यह मानकर कि यह कर्तव्य है, शास्त्र-विधि के अनुसार किया जाता है – वह सात्त्विक होता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

सात्त्विक यज्ञ का महात्म्य - श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय १७, श्लोक ११

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

सनातन धर्म की आधारशिला 'यज्ञ' है। यज्ञ का अर्थ केवल अग्नि में आहुति देना नहीं है, अपितु यज्ञ का अर्थ है—'त्याग' और 'समर्पण'। जब हम अपने व्यक्तिगत स्वार्थों की आहुति परमात्मा के चरणों में समर्पित कर देते हैं, तब वह क्रिया यज्ञ का रूप ले लेती है। श्रीमद्भगवद्गीता के १७वें अध्याय का ११वां श्लोक हमें 'सात्त्विक यज्ञ' की परिभाषा समझाता है, जो मानव जीवन को भौतिकता के दलदल से उठाकर दिव्यता के शिखर तक ले जाने का मार्ग है।

ब्रह्मांडीय दृष्टि से, यह संपूर्ण सृष्टि ही एक महायज्ञ है। सूर्य का प्रकाश देना, नदियों का बहना, वृक्षों का फल देना—यह सब बिना किसी फल की आकांक्षा के हो रहा है। जब मनुष्य भी इसी 'सात्त्विक' भाव को अपने जीवन में उतारता है, तो वह प्रकृति के साथ एकाकार हो जाता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि कर्म करना हमारा अधिकार है, किंतु कर्म के फल पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होना चाहिए। 'यष्टव्यमेवेति'—अर्थात 'यज्ञ करना ही मेरा कर्तव्य है', यह भावना ही मनुष्य को अहंकार के बंधन से मुक्त करती है। यह श्लोक केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक ऐसी कला है जो मानसिक तनाव, चिंता और अवसाद को जड़ से मिटाकर व्यक्ति को 'स्थितप्रज्ञ' की अवस्था की ओर ले जाती है। सात्त्विक यज्ञ का पालन करने वाला साधक न केवल स्वयं का कल्याण करता है, बल्कि वह अपने आसपास के वातावरण में भी सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है, जिससे लोक-कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥ ११ ॥


उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक अक्षर का स्पष्ट उच्चारण करें। 'अफलाकाङ्क्षिभिः' में विसर्ग का ध्यान रखें। 'यष्टव्यमेवेति' को लयबद्ध तरीके से पढ़ें। यह श्लोक अनुष्टुप छंद में है, अतः इसे गाते समय एक निश्चित गति और ठहराव का पालन करना अत्यंत आवश्यक है। इसे प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के पश्चात शुद्ध मन से तीन बार पाठ करने से चित्त की शुद्धि होती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
अफलाकाङ्क्षिभिःफल की इच्छा न रखने वालों द्वारायह अनासक्ति का प्रतीक है, जो कर्म को बंधन से मुक्त करता है।
यज्ञःयज्ञ / पवित्र कर्मपरमात्मा की प्रसन्नता हेतु किया गया निस्वार्थ अनुष्ठान।
विधिदृष्टःशास्त्रों के अनुसारअनुशासन और मर्यादा का पालन, जो अराजकता को रोकता है।
य इज्यतेजो किया जाता हैकर्म की निरंतरता और कर्तव्य का बोध।
यष्टव्यम्यज्ञ करना ही चाहिएकर्तव्य का पालन करना ही धर्म है, न कि फल की प्राप्ति।
एवहीनिश्चयात्मकता, जो संकल्प की दृढ़ता को दर्शाती है।
इतिइस प्रकारबुद्धि का वह स्तर जहाँ तर्क और श्रद्धा का मिलन होता है।
मनः समाधायमन को स्थिर करकेएकाग्रता, जो योग की प्रथम सीढ़ी है।
सःवहसात्त्विक यज्ञ का स्वरूप।
सात्त्विकःसात्त्विक (शुद्ध)प्रकाश, ज्ञान और सात्विकता का गुण।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता का यह १७वां अध्याय 'श्रद्धात्रयविभागयोग' के नाम से जाना जाता है। कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में जब अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि जो लोग शास्त्रों की विधि को छोड़कर अपनी कल्पना से पूजा करते हैं, उनकी स्थिति क्या होती है, तब भगवान ने श्रद्धा के तीन प्रकारों—सात्त्विक, राजसिक और तामसिक—का वर्णन किया।

पौराणिक संदर्भों में, यज्ञ का इतिहास सृष्टि के आरंभ से जुड़ा है। ब्रह्मा जी ने जब सृष्टि की रचना की, तब उन्होंने यज्ञ के साथ ही मनुष्यों को उत्पन्न किया और कहा कि 'यज्ञ के द्वारा तुम उन्नति करो'। रामायण में महर्षि वशिष्ठ और विश्वामित्र के प्रसंगों में यज्ञ की रक्षा का महत्व बताया गया है। यज्ञ केवल अग्नि में सामग्री डालना नहीं है, बल्कि यह 'यज्ञपुरुष' भगवान विष्णु की आराधना है। महाभारत में युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ हो या अश्वमेध यज्ञ, इन सभी के पीछे एक ही भाव था—धर्म की स्थापना।

भगवान श्रीकृष्ण यहाँ अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि यज्ञ का फल यज्ञ करने वाले के हाथ में नहीं है। जब राजा बलि ने अपना सर्वस्व दान कर दिया, तो उन्होंने भी 'यष्टव्यमेवेति' (कर्तव्य समझकर) ही किया था। यह श्लोक हमें सिखाता है कि हम जो भी कार्य करें—चाहे वह घर का काम हो, ऑफिस का कार्य हो या समाज सेवा—उसे 'यज्ञ' मानकर करें। जब हम फल की चिंता छोड़ देते हैं, तो हम स्वयं को भगवान के हाथों का यंत्र बना लेते हैं। यही सात्त्विक यज्ञ की पराकाष्ठा है, जहाँ कर्ता का अहंकार मिट जाता है और केवल 'कर्तव्य' शेष रहता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक शांति: फल की चिंता न करने से मन का बोझ हल्का होता है और तनाव में कमी आती है।
  • एकाग्रता में वृद्धि: 'मनः समाधाय' का अभ्यास करने से ध्यान लगाने की क्षमता विकसित होती है।
  • अहंकार का नाश: जब हम स्वयं को केवल एक माध्यम मानते हैं, तो अहंकार स्वतः ही विलीन होने लगता है।
  • सकारात्मक आभा (Aura): सात्त्विक कर्म करने से व्यक्ति के चारों ओर एक दिव्य और सकारात्मक ऊर्जा का घेरा बनता है।
  • कर्मिक शुद्धि: निष्काम भाव से किए गए कर्मों का कोई पाप-पुण्य का बंधन नहीं होता, जिससे आत्मा शुद्ध होती है।
  • दैवीय कृपा: भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है कि जो मुझे समर्पित होकर कार्य करता है, उसका योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ।
  • निर्णय लेने की क्षमता: शास्त्रों के अनुसार कार्य करने से बुद्धि में स्पष्टता आती है और भ्रम दूर होता है।
  • जीवन में अनुशासन: 'विधिदृष्टः' का पालन करने से जीवन में एक व्यवस्थित दिनचर्या और अनुशासन का संचार होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'श्रीमद्भगवद्गीता' के १७वें अध्याय के ११वें श्लोक पर आधारित है। इसे 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' के अंतर्गत रखा गया है, जिसमें गीता प्रेस गोरखपुर के प्रामाणिक अनुवादों और शंकराचार्य भाष्य के सार को समाहित किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को वेदों और उपनिषदों के गूढ़ रहस्यों को सरल भाषा में उपलब्ध कराना है। यह लेख किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देता, अपितु कर्मयोग के वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर प्रकाश डालता है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

सात्त्विक यज्ञ का अर्थ है—बिना किसी स्वार्थ या फल की इच्छा के, केवल कर्तव्य समझकर शास्त्रों के अनुसार किया गया पवित्र कार्य। यह पूर्णतः समर्पण भाव पर आधारित है।

निश्चित रूप से। आधुनिक जीवन में अपने उत्तरदायित्वों को बिना किसी शिकायत और फल की चिंता के, पूरी ईमानदारी से निभाना ही सबसे बड़ा यज्ञ है।

बिल्कुल नहीं। इसका अर्थ है—कर्म पूरी कुशलता से करना, लेकिन परिणाम को भगवान पर छोड़ देना। यह आलस्य नहीं, बल्कि अनासक्ति है।

विधिदृष्ट का अर्थ है शास्त्रों द्वारा निर्धारित मर्यादा। यह हमें मनमानी करने से रोकता है और समाज में संतुलन बनाए रखता है।

नियमित ध्यान, स्वाध्याय और भगवान के नाम का स्मरण करने से मन धीरे-धीरे स्थिर होने लगता है और सात्त्विक भाव जागृत होता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान् कहते हैं कि जो यज्ञ फल की इच्छा न रखने वाले व्यक्तियों द्वारा, शास्त्रों में बताए गए विधान के अनुसार, केवल यह भाव रखते हुए कि यज्ञ करना कर्तव्य है, किया जाता है – वह यज्ञ सात्त्विक कहलाता है।

The Lord says: That sacrifice is sattvic which is performed according to the scriptural injunctions, by those who have no desire for the fruits, and who perform it with the firm conviction that it is their duty.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 17: श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 11 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 11/28 39% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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