पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदश्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
जो यज्ञ फल की इच्छा न रखने वालों द्वारा, केवल यह मानकर कि यह कर्तव्य है, शास्त्र-विधि के अनुसार किया जाता है – वह सात्त्विक होता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व
सनातन धर्म की आधारशिला 'यज्ञ' है। यज्ञ का अर्थ केवल अग्नि में आहुति देना नहीं है, अपितु यज्ञ का अर्थ है—'त्याग' और 'समर्पण'। जब हम अपने व्यक्तिगत स्वार्थों की आहुति परमात्मा के चरणों में समर्पित कर देते हैं, तब वह क्रिया यज्ञ का रूप ले लेती है। श्रीमद्भगवद्गीता के १७वें अध्याय का ११वां श्लोक हमें 'सात्त्विक यज्ञ' की परिभाषा समझाता है, जो मानव जीवन को भौतिकता के दलदल से उठाकर दिव्यता के शिखर तक ले जाने का मार्ग है।
ब्रह्मांडीय दृष्टि से, यह संपूर्ण सृष्टि ही एक महायज्ञ है। सूर्य का प्रकाश देना, नदियों का बहना, वृक्षों का फल देना—यह सब बिना किसी फल की आकांक्षा के हो रहा है। जब मनुष्य भी इसी 'सात्त्विक' भाव को अपने जीवन में उतारता है, तो वह प्रकृति के साथ एकाकार हो जाता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि कर्म करना हमारा अधिकार है, किंतु कर्म के फल पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होना चाहिए। 'यष्टव्यमेवेति'—अर्थात 'यज्ञ करना ही मेरा कर्तव्य है', यह भावना ही मनुष्य को अहंकार के बंधन से मुक्त करती है। यह श्लोक केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक ऐसी कला है जो मानसिक तनाव, चिंता और अवसाद को जड़ से मिटाकर व्यक्ति को 'स्थितप्रज्ञ' की अवस्था की ओर ले जाती है। सात्त्विक यज्ञ का पालन करने वाला साधक न केवल स्वयं का कल्याण करता है, बल्कि वह अपने आसपास के वातावरण में भी सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है, जिससे लोक-कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।
संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥ ११ ॥
उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक अक्षर का स्पष्ट उच्चारण करें। 'अफलाकाङ्क्षिभिः' में विसर्ग का ध्यान रखें। 'यष्टव्यमेवेति' को लयबद्ध तरीके से पढ़ें। यह श्लोक अनुष्टुप छंद में है, अतः इसे गाते समय एक निश्चित गति और ठहराव का पालन करना अत्यंत आवश्यक है। इसे प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के पश्चात शुद्ध मन से तीन बार पाठ करने से चित्त की शुद्धि होती है।
पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ
धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि
श्रीमद्भगवद्गीता का यह १७वां अध्याय 'श्रद्धात्रयविभागयोग' के नाम से जाना जाता है। कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में जब अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा कि जो लोग शास्त्रों की विधि को छोड़कर अपनी कल्पना से पूजा करते हैं, उनकी स्थिति क्या होती है, तब भगवान ने श्रद्धा के तीन प्रकारों—सात्त्विक, राजसिक और तामसिक—का वर्णन किया।
पौराणिक संदर्भों में, यज्ञ का इतिहास सृष्टि के आरंभ से जुड़ा है। ब्रह्मा जी ने जब सृष्टि की रचना की, तब उन्होंने यज्ञ के साथ ही मनुष्यों को उत्पन्न किया और कहा कि 'यज्ञ के द्वारा तुम उन्नति करो'। रामायण में महर्षि वशिष्ठ और विश्वामित्र के प्रसंगों में यज्ञ की रक्षा का महत्व बताया गया है। यज्ञ केवल अग्नि में सामग्री डालना नहीं है, बल्कि यह 'यज्ञपुरुष' भगवान विष्णु की आराधना है। महाभारत में युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ हो या अश्वमेध यज्ञ, इन सभी के पीछे एक ही भाव था—धर्म की स्थापना।
भगवान श्रीकृष्ण यहाँ अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि यज्ञ का फल यज्ञ करने वाले के हाथ में नहीं है। जब राजा बलि ने अपना सर्वस्व दान कर दिया, तो उन्होंने भी 'यष्टव्यमेवेति' (कर्तव्य समझकर) ही किया था। यह श्लोक हमें सिखाता है कि हम जो भी कार्य करें—चाहे वह घर का काम हो, ऑफिस का कार्य हो या समाज सेवा—उसे 'यज्ञ' मानकर करें। जब हम फल की चिंता छोड़ देते हैं, तो हम स्वयं को भगवान के हाथों का यंत्र बना लेते हैं। यही सात्त्विक यज्ञ की पराकाष्ठा है, जहाँ कर्ता का अहंकार मिट जाता है और केवल 'कर्तव्य' शेष रहता है।
नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ
यह सामग्री 'श्रीमद्भगवद्गीता' के १७वें अध्याय के ११वें श्लोक पर आधारित है। इसे 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' के अंतर्गत रखा गया है, जिसमें गीता प्रेस गोरखपुर के प्रामाणिक अनुवादों और शंकराचार्य भाष्य के सार को समाहित किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को वेदों और उपनिषदों के गूढ़ रहस्यों को सरल भाषा में उपलब्ध कराना है। यह लेख किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देता, अपितु कर्मयोग के वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर प्रकाश डालता है।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान् कहते हैं कि जो यज्ञ फल की इच्छा न रखने वाले व्यक्तियों द्वारा, शास्त्रों में बताए गए विधान के अनुसार, केवल यह भाव रखते हुए कि यज्ञ करना कर्तव्य है, किया जाता है – वह यज्ञ सात्त्विक कहलाता है।
The Lord says: That sacrifice is sattvic which is performed according to the scriptural injunctions, by those who have no desire for the fruits, and who perform it with the firm conviction that it is their duty.