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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 17 · श्लोक 11

अध्याय 17 · श्लोक 11

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते। यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः॥११॥

aphalākāṅkṣibhir yajño vidhi-dṛṣṭo ya ijyate | yaṣṭavyam eveti manaḥ samādhāya sa sāttvikaḥ ||11||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अफलाकाङ्क्षिभि: by those who desire no fruit; यज्ञ: sacrifice; विधिदृष्ट: according to the scriptural ordinance; य: which; इज्यते: is performed; यष्टव्यम्: should be performed; एव: indeed; इति: thus; मन: mind; समाधाय: fixing; स: that; सात्त्विक: sattvic.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जो यज्ञ फल की इच्छा न रखने वालों द्वारा, केवल यह मानकर कि यह कर्तव्य है, शास्त्र-विधि के अनुसार किया जाता है – वह सात्त्विक होता है।

English Translation

That sacrifice which is performed according to the scriptures, by those who desire no fruit, and with the mind fixed on the idea that it is a duty to be performed – that is sattvic.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

सात्त्विक यज्ञ वह है जो बिना किसी फल की आकांक्षा के, केवल कर्तव्य-बुद्धि से, शास्त्रीय विधि के अनुसार किया जाता है। यह शुद्ध भाव और समर्पण का प्रतीक है। A sattvic sacrifice is performed without desire for reward, strictly according to scriptural rules, with the conviction that it is one's duty.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।