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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 17 · श्लोक 12

अध्याय 17 · श्लोक 12

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अभिसंधाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्। इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥१२॥

abhisandhāya tu phalaṁ dambhārtham api caiva yat | ijyate bharata-śreṣṭha taṁ yajñaṁ viddhi rājasam ||12||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अभिसंधाय: desiring; तु: indeed; फलम्: fruit; दम्भार्थम्: for show; अपि: also; च: and; एव: certainly; यत्: which; इज्यते: is performed; भरतश्रेष्ठ: O best of the Bharatas; तम्: that; यज्ञम्: sacrifice; विद्धि: know; राजसम्: rajasic.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

परन्तु हे भरतश्रेष्ठ! जो यज्ञ फल की इच्छा से तथा दम्भ (दिखावे) के लिए किया जाता है – उस यज्ञ को तू राजस जान।

English Translation

But that sacrifice which is performed desiring fruit, and also for the sake of ostentation – know that to be rajasic, O best of the Bharatas.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

राजस यज्ञ वह है जिसमें फल की आकांक्षा और दिखावा (प्रतिष्ठा) प्रमुख होता है। ऐसा यज्ञ भक्ति और कर्तव्य की भावना से रहित होता है। A rajasic sacrifice is performed with the desire for rewards and for ostentation, lacking purity of motive.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।