श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 17 (श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 17 · श्लोक 12

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 28 23 मिनट का पठन 133 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अभिसंधाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्। इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥१२॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
अभिसंधाय
desiring
तु
indeed
फलम्
fruit
दम्भार्थम्
for show
अपि
also
च
and
एव
certainly
यत्
which
इज्यते
is performed
भरतश्रेष्ठ
O best of the Bharatas
तम्
that
यज्ञम्
sacrifice
विद्धि
know
राजसम्
rajasic.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

परन्तु हे भरतश्रेष्ठ! जो यज्ञ फल की इच्छा से तथा दम्भ (दिखावे) के लिए किया जाता है – उस यज्ञ को तू राजस जान।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

सनातन धर्म में 'यज्ञ' केवल अग्नि में आहुति देने की प्रक्रिया नहीं है, अपितु यह ब्रह्मांडीय संतुलन, आत्म-शुद्धि और परमात्मा के प्रति समर्पण का एक पवित्र अनुष्ठान है। श्रीमद्भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने यज्ञों का वर्गीकरण सात्विक, राजस और तामस के रूप में किया है। 'राजस यज्ञ' का विषय अत्यंत सूक्ष्म और विचारणीय है, क्योंकि यह मानवीय अहंकार और फल की आकांक्षा के उस बारीक धागे को दर्शाता है जो मनुष्य को भौतिकता की बेड़ियों में जकड़े रखता है।

वैदिक संस्कृति में यज्ञ को 'देवपूजा' कहा गया है, परंतु जब यही यज्ञ 'दम्भ' (दिखावे) और 'फल की कामना' के साथ किया जाता है, तो यह अपनी दिव्यता खो देता है। राजस यज्ञ का अर्थ है—वह कर्म जो लोक-दिखावे, अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने और सांसारिक लाभ की प्राप्ति के लिए किया जाए। यह यज्ञ केवल एक कर्मकांड बनकर रह जाता है, जिसमें हृदय की शुद्धता और निष्काम भाव का अभाव होता है। ब्रह्मांडीय दृष्टि से, राजस यज्ञ मनुष्य को 'अहंकार' के केंद्र में ले आता है, जिससे वह स्वयं को कर्ता मान बैठता है। यह स्थिति आध्यात्मिक उन्नति में सबसे बड़ा अवरोध है। जब हम किसी भी कार्य को केवल अपनी प्रशंसा या भौतिक लाभ के लिए करते हैं, तो वह कार्य हमें संसार के चक्र में और अधिक गहराई से फँसा देता है। अतः, इस श्लोक का अध्ययन हमें यह सिखाता है कि यज्ञ का वास्तविक फल 'त्याग' में है, न कि 'उपलब्धि' के प्रदर्शन में। यह अनुष्ठान हमें आत्म-अवलोकन की प्रेरणा देता है कि क्या हमारा प्रत्येक कर्म वास्तव में ईश्वर के प्रति समर्पित है, या हम केवल समाज की दृष्टि में 'धार्मिक' दिखने का प्रयास कर रहे हैं।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

अभिसंधाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् ।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ॥ १२ ॥


अन्वय: भरतश्रेष्ठ! तु (हे अर्जुन), यत् (जो यज्ञ), फलं अभिसंधाय (फल की इच्छा रखकर), अपि च (और), दम्भार्थम् (दिखावे के लिए), इज्यते (किया जाता है), तं यज्ञं (उस यज्ञ को), राजसम् विद्धि (राजस जानो)।

इस श्लोक का पाठ करते समय मन में सात्विकता का भाव होना अनिवार्य है। राजस यज्ञ की व्याख्या करते हुए भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को 'भरतश्रेष्ठ' कहकर संबोधित करते हैं, जो यह दर्शाता है कि यह ज्ञान केवल श्रेष्ठ कुलों या उच्च बुद्धि वाले साधकों के लिए ही नहीं, बल्कि प्रत्येक उस व्यक्ति के लिए है जो अपने कर्मों की शुद्धि चाहता है। इस श्लोक का नित्य पाठ करने से साधक को अपने भीतर छिपे 'दम्भ' या अहंकार को पहचानने की शक्ति मिलती है। विधि के रूप में, इसे गीता के सत्रहवें अध्याय के श्रद्धात्रयविभागयोग के अंतर्गत पढ़ा जाना चाहिए।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
अभिसंधायलक्ष्य बनाकरकिसी कार्य को केवल फल प्राप्ति के उद्देश्य से करना।
फलंप्रतिफल/लाभकर्म के बदले मिलने वाला सांसारिक सुख या यश।
दम्भार्थम्दिखावे के लिएअपनी प्रतिष्ठा और अहंकार की तुष्टि हेतु किया गया कार्य।
इज्यतेयज्ञ किया जाता हैपूजा या अनुष्ठान की प्रक्रिया।
भरतश्रेष्ठहे श्रेष्ठ भरतवंशीअर्जुन को संबोधित करते हुए उनकी पात्रता का स्मरण।
राजसम्रजोगुणीचंचलता, कामना और अहंकार से युक्त अवस्था।
विद्धिजानोज्ञान के माध्यम से सत्य को स्वीकार करना।
यज्ञंत्याग/अनुष्ठानपरमात्मा के प्रति समर्पण का भाव।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय का यह श्लोक उस समय का है जब कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से 'श्रद्धा' के स्वरूप पर प्रश्न किया था। अर्जुन जानना चाहते थे कि क्या वे लोग जो शास्त्रों के नियमों का पालन तो करते हैं, परंतु जिनकी श्रद्धा सात्विक नहीं है, उनकी गति क्या होती है? भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तर देते हुए यज्ञों के तीन प्रकार बताए। पौराणिक संदर्भों में, हम देखते हैं कि राजाओं द्वारा किए जाने वाले बड़े-बड़े यज्ञों में अक्सर 'राजस' भाव का प्रवेश हो जाता था। उदाहरण के लिए, रामायण काल में अश्वमेध यज्ञ का उद्देश्य धर्म की स्थापना था, परंतु यदि वही यज्ञ केवल अपनी विजय पताका फहराने या दूसरों को नीचा दिखाने के लिए किया जाए, तो वह राजस हो जाता है।

शास्त्रों में उल्लेख है कि 'दम्भ' वह विष है जो यज्ञ की अग्नि को बुझा देता है। महाभारत में ही कई ऐसे प्रसंग हैं जहाँ राजाओं ने अपनी शक्ति प्रदर्शन के लिए यज्ञ किए, जिससे उन्हें तात्कालिक यश तो मिला, परंतु आत्मिक शांति नहीं। यह श्लोक हमें सिखाता है कि यज्ञ का अर्थ 'अग्नि में आहुति' नहीं, बल्कि 'अहंकार की आहुति' है। जब तक मनुष्य का मन 'मैं' और 'मेरे' के भाव से मुक्त नहीं होता, तब तक उसका कोई भी अनुष्ठान सात्विक नहीं हो सकता। यह श्लोक हमें वैदिक काल से लेकर आधुनिक युग तक के उन सभी कर्मकांडों के प्रति सचेत करता है जो केवल दिखावे के लिए किए जाते हैं। महर्षि वेदव्यास ने इस श्लोक के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि ईश्वर को कर्म की मात्रा से अधिक कर्म के पीछे छिपे 'भाव' से प्रेम है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • अहंकार का शमन: इस श्लोक का चिंतन करने से मन में दम्भ के प्रति वैराग्य उत्पन्न होता है।
  • कर्म की शुद्धि: साधक अपने दैनिक कार्यों में 'फल की आसक्ति' को कम करने का प्रयास करने लगता है।
  • मानसिक स्पष्टता: दिखावे की प्रवृत्ति समाप्त होने से मानसिक तनाव और प्रतिस्पर्धा का भाव कम होता है।
  • सात्विक श्रद्धा का उदय: राजस भाव को पहचानने से व्यक्ति धीरे-धीरे सात्विक यज्ञ (निष्काम कर्म) की ओर अग्रसर होता है।
  • आत्म-अवलोकन: यह श्लोक एक दर्पण की तरह है, जो हमें अपने कार्यों के पीछे के वास्तविक उद्देश्य को देखने में मदद करता है।
  • दैवीय कृपा: जब कर्म में दम्भ नहीं होता, तो ईश्वर की कृपा सहज ही प्राप्त होती है।
  • कौशल में वृद्धि: निष्काम भाव से किए गए कार्य में एकाग्रता और दक्षता अधिक होती है।
  • शांति की प्राप्ति: फल की चिंता छोड़ने से मन में असीम शांति और स्थिरता का अनुभव होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'भक्तिलोक' के संपादकीय विभाग द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय (श्रद्धात्रयविभागयोग) के श्लोक संख्या 12 के आधार पर 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' है। हमने इसे प्रामाणिक भाष्यों और वेदान्त दर्शन के सिद्धांतों के अनुरूप तैयार किया है ताकि साधक को राजस यज्ञ के सूक्ष्म अंतर को समझने में सरलता हो। हमारा उद्देश्य केवल श्लोक का अनुवाद करना नहीं, बल्कि उसके पीछे के दार्शनिक मर्म को जन-जन तक पहुँचाना है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

राजस यज्ञ पाप नहीं है, परंतु यह बंधनकारी है। यह आपको संसार के चक्र में उलझाए रखता है। इसे 'पाप' नहीं, बल्कि 'अपूर्ण' या 'अज्ञानपूर्ण' कर्म कहा जा सकता है।

दम्भ का अर्थ है—दिखावा। जब हम कोई धार्मिक कार्य केवल इसलिए करते हैं ताकि लोग हमें 'धार्मिक' या 'महान' समझें, तो वह दम्भ है।

सात्विक यज्ञ शास्त्र-विहित, कर्तव्य समझकर और फल की इच्छा के बिना किया जाता है। राजस यज्ञ फल की कामना और दिखावे के लिए किया जाता है।

हाँ, आज के समय में सोशल मीडिया पर अपनी दान-पुण्य की फोटो डालना या केवल प्रतिष्ठा के लिए बड़े आयोजन करना, राजस यज्ञ का ही आधुनिक स्वरूप है।

अपने प्रत्येक कार्य को ईश्वर को समर्पित करें। 'मैं कर रहा हूँ' के भाव को त्यागकर 'यह प्रभु का कार्य है' का भाव लाएं।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे भरतश्रेष्ठ (अर्जुन)! जो यज्ञ फल की इच्छा रखकर तथा दम्भ (प्रदर्शन) के उद्देश्य से किया जाता है, उसे राजस यज्ञ जानो। राजस यज्ञ में कर्ता का स्वार्थ और अहंकार झलकता है।

O best of the Bharatas (Arjuna)! That sacrifice which is performed with a desire for its fruits and for the sake of ostentation – know that to be rajasic. In such a sacrifice, the performer is motivated by selfishness and ego.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 17: श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 12 का अध्ययन कर रहे हैं।
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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