श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 17 (श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 17 · श्लोक 13

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 28 23 मिनट का पठन 132 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्। श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥१३॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

8 पद
विधिहीनम्
devoid of scriptural direction
असृष्टान्नम्
without distribution of food
मन्त्रहीनम्
devoid of mantras
अदक्षिणम्
without gifts (fees) to priests
श्रद्धाविरहितम्
devoid of faith
यज्ञम्
sacrifice
तामसम्
tamasic
परिचक्षते
declare.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो यज्ञ विधि-हीन हो, बिना अन्न-वितरण का हो, मन्त्र-हीन हो, बिना दक्षिणा का हो और श्रद्धा-रहित हो – वह तामस कहा जाता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना: यज्ञ की गरिमा और तामस वृत्ति का निषेध

भारतीय संस्कृति में 'यज्ञ' केवल अग्नि में आहुति देने का नाम नहीं है, अपितु यह ब्रह्मांडीय संतुलन, आत्म-समर्पण और निस्वार्थ सेवा का एक पवित्र अनुष्ठान है। श्रीमद्भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने श्रद्धा के तीन प्रकारों का वर्णन करते हुए 'तामस यज्ञ' की व्याख्या की है। यह श्लोक हमें सचेत करता है कि जब कोई अनुष्ठान बिना किसी शास्त्रीय आधार, मंत्रोच्चार की शुद्धता, श्रद्धा के भाव और लोक-कल्याणकारी दान के किया जाता है, तो वह केवल एक 'दिखावा' बनकर रह जाता है।

ब्रह्मांड की रचना में 'यज्ञ' का स्थान सर्वोपरि है। गीता में कहा गया है कि प्रजापति ने यज्ञ के साथ ही मनुष्यों की रचना की। अतः, जो यज्ञ विधिहीन है, वह न केवल निष्फल है, बल्कि वह साधक की तामसिक प्रवृत्तियों को और अधिक पुष्ट करता है। तामस यज्ञ का अर्थ है—अंधकारमय कर्म। जब मनुष्य अपने अहंकार की तुष्टि के लिए, बिना किसी शास्त्र-मर्यादा के, केवल प्रदर्शन के लिए कोई कार्य करता है, तो वह दैवीय ऊर्जा से वंचित रह जाता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि जीवन के प्रत्येक कार्य में 'विधि' (नियम), 'मंत्र' (संकल्प), 'श्रद्धा' (विश्वास) और 'दक्षिणा' (त्याग) का होना अनिवार्य है। इसके बिना किया गया कोई भी कार्य न तो समाज के लिए हितकारी है और न ही आत्मा की उन्नति के लिए। यह अनुभाग हमें उन सूक्ष्म त्रुटियों से अवगत कराता है जो हमारे दैनिक जीवन के कर्मों को 'तामस' की श्रेणी में धकेल देती हैं, जिससे हम सत्वगुण की ओर अग्रसर होने का मार्ग प्रशस्त कर सकें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥१३॥


अन्वय: विधिहीनम्, असृष्टान्नम्, मन्त्रहीनम्, अदक्षिणम्, श्रद्धाविरहितम् यज्ञम् तामसम् परिचक्षते।

इस श्लोक का पाठ करते समय साधक को यह स्मरण रखना चाहिए कि यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के 17वें अध्याय (श्रद्धात्रयविभागयोग) का 13वां श्लोक है। इसका उच्चारण करते समय स्वर की स्पष्टता और अर्थ की गंभीरता पर ध्यान देना आवश्यक है। विधि का अर्थ है—शास्त्रों द्वारा निर्धारित मार्ग। असृष्टान्न का अर्थ है—जहाँ अन्न का वितरण न हुआ हो। मंत्रहीन का अर्थ है—जहाँ वैदिक ध्वनियों का अभाव हो। दक्षिण का अर्थ है—त्याग की भावना। श्रद्धा का अर्थ है—अटूट विश्वास। जब ये पाँचों तत्व किसी भी यज्ञ या शुभ कार्य से लुप्त हो जाते हैं, तो वह तामस कहलाता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
विधिहीनम्शास्त्रों के नियमों से रहितअहंकारवश अपनी मनमानी करना ही विधिहीनता है।
असृष्टान्नम्अन्न का वितरण न करनाभोजन का वितरण परोपकार का प्रतीक है; इसका अभाव स्वार्थ है।
मन्त्रहीनम्मंत्रों के उच्चारण से रहितमंत्र चेतना को जागृत करते हैं; इनके बिना कार्य केवल यांत्रिक है।
अदक्षिणम्दक्षिणा या दान से रहितदक्षिणा अहंकार के त्याग का प्रतीक है।
श्रद्धाविरहितम्श्रद्धा से शून्यश्रद्धा के बिना किया गया कार्य आत्मा से नहीं जुड़ता।
यज्ञम्धार्मिक अनुष्ठानसमस्त कर्म जो लोक-कल्याण के लिए किए जाएं।
तामसम्अंधकारमय या अज्ञानपूर्णजड़ता, आलस्य और अज्ञान से प्रेरित कर्म।
परिचक्षतेकहा जाता हैज्ञानी महापुरुषों का यह स्पष्ट मत है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता के 17वें अध्याय की पृष्ठभूमि कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में अर्जुन का मोहभंग और भगवान श्रीकृष्ण द्वारा उन्हें 'श्रद्धा' के विज्ञान को समझाना है। अर्जुन ने प्रश्न किया था कि जो लोग शास्त्रों की विधि को छोड़कर केवल अपनी कल्पना से पूजा करते हैं, उनकी स्थिति क्या है? तब भगवान ने सत्व, रज और तम के आधार पर यज्ञों का वर्गीकरण किया।

पौराणिक संदर्भों में, हम देखते हैं कि राजा वेन का यज्ञ तामस यज्ञ का एक उत्कृष्ट उदाहरण माना जा सकता है। राजा वेन ने ऋषियों की आज्ञा का उल्लंघन किया और यज्ञ में मंत्रों के स्थान पर अपनी स्तुति गान को प्राथमिकता दी। परिणाम स्वरूप, वह यज्ञ न केवल निष्फल रहा, बल्कि विनाशकारी सिद्ध हुआ। इसी प्रकार, रामायण काल में रावण के द्वारा किए गए अनेक अनुष्ठान, जो केवल शक्ति प्रदर्शन और अहंकार की तुष्टि के लिए थे, उन्हें भी तामस यज्ञ की श्रेणी में रखा जा सकता है।

शास्त्रों के अनुसार, यज्ञ का उद्देश्य 'यज्ञो वै विष्णु:' (यज्ञ स्वयं विष्णु है) को प्राप्त करना है। जब यज्ञ में 'विधि' का लोप होता है, तो वह 'अविधि' बन जाता है। 'असृष्टान्न' का अर्थ केवल भोजन बांटना नहीं, बल्कि अपनी ऊर्जा का साझा करना है। यदि कोई व्यक्ति स्वयं तो भोग करे परंतु समाज को कुछ न दे, तो वह यज्ञ तामस है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि कर्म की शुद्धि ही जीवन की शुद्धि है। वेदों में यज्ञ को 'अध्वर' कहा गया है, जिसका अर्थ है 'हिंसा रहित'। तामस यज्ञ में अक्सर हिंसा और अहंकार का समावेश होता है, जो इसे अधर्म की श्रेणी में ले आता है। अतः, यह श्लोक केवल एक निषेध नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक है जो हमें सात्विक यज्ञ की ओर प्रेरित करता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • आत्म-अवलोकन: इस श्लोक का चिंतन करने से साधक अपने दैनिक कार्यों में हो रही त्रुटियों को पहचान पाता है।
  • अहंकार का शमन: 'विधिहीन' और 'अदक्षिण' जैसे शब्दों पर विचार करने से व्यक्ति में विनम्रता का संचार होता है।
  • सात्विक बुद्धि का विकास: तामस प्रवृत्तियों को जानने से व्यक्ति स्वतः ही सत्वगुण की ओर आकर्षित होता है।
  • कर्म की शुद्धता: यह श्लोक हमें सिखाता है कि कार्य की पूर्णता उसके नियमों के पालन में है।
  • मानसिक शांति: जब हम निष्काम और शास्त्र-सम्मत कार्य करते हैं, तो मन में द्वंद्व समाप्त हो जाता है।
  • परोपकार की भावना: 'असृष्टान्न' का निषेध हमें दान और सेवा के महत्व को समझने के लिए प्रेरित करता है।
  • दैवीय कृपा का पात्र: शास्त्र-सम्मत आचरण करने से व्यक्ति ईश्वर की कृपा का सहज पात्र बनता है।
  • कर्मिक शुद्धि: अज्ञानवश किए गए तामस कर्मों का प्रायश्चित करने की प्रेरणा मिलती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: यह लेख श्रीमद्भगवद्गीता के 17वें अध्याय के 13वें श्लोक पर आधारित है। इस सामग्री को तैयार करते समय 'श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप' (स्वामी प्रभुपाद) और 'गीता प्रेस गोरखपुर' के भाष्य का संदर्भ लिया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को सनातन धर्म के गूढ़ सिद्धांतों को सरल और प्रामाणिक रूप में प्रस्तुत करना है। यह सामग्री किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देती, अपितु शास्त्र-सम्मत जीवन जीने की प्रेरणा देती है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

तामस यज्ञ वह है जो शास्त्रों के नियमों, मंत्रों, श्रद्धा और दान के बिना किया जाता है। यह केवल दिखावे के लिए होता है।

नहीं, मंत्र यज्ञ की प्राण-शक्ति हैं। मंत्रों के बिना यज्ञ केवल एक भौतिक क्रिया है, आध्यात्मिक अनुष्ठान नहीं।

दक्षिणा का अर्थ है 'त्याग'। यह हमारे अहंकार को गलाने का माध्यम है। इसके बिना यज्ञ अधूरा माना जाता है।

पाप का अर्थ है अज्ञान। तामस यज्ञ अज्ञानता को बढ़ाता है, जिससे व्यक्ति का आध्यात्मिक पतन होता है।

सात्विक यज्ञ वह है जो शास्त्रों के अनुसार, श्रद्धापूर्वक, मंत्रों के साथ और लोक-कल्याण की भावना से किया जाता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान् बताते हैं कि जो यज्ञ शास्त्र-विधि से रहित है, जिसमें अन्न का वितरण नहीं होता, मन्त्रों का उच्चारण नहीं होता, दक्षिणा नहीं दी जाती, और जो श्रद्धा से रहित होता है – वह तामस यज्ञ कहलाता है। ऐसा यज्ञ निष्फल और निम्न श्रेणी का होता है।

The Lord declares: That sacrifice which is contrary to the scriptural injunctions, in which no food is distributed, which is devoid of mantras, gifts to priests, and faith – is called tamasic. Such a sacrifice is fruitless and of the lowest quality.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 17: श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 13 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 13/28 46% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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