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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 17 · श्लोक 14

अध्याय 17 · श्लोक 14

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्। ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥१४॥

deva-dvija-guru-prājña-pūjanaṁ śaucam ārjavam | brahmacaryam ahiṁsā ca śārīraṁ tapa ucyate ||14||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

देव: the gods; द्विज: the twice-born; गुरु: the teacher; प्राज्ञ: the wise; पूजनम्: worship; शौचम्: purity; आर्जवम्: straightforwardness; ब्रह्मचर्यम्: celibacy; अहिंसा: non-injury; च: and; शारीरम्: of the body; तप: austerity; उच्यते: is said.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

देवताओं, ब्राह्मणों, गुरुओं और बुद्धिमानों की पूजा, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा – यह शारीरिक तप कहा जाता है।

English Translation

Worship of the gods, the twice-born, the teacher, and the wise; purity, straightforwardness, celibacy, and non-injury – these are said to be austerity of the body.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

शारीरिक तप के अंतर्गत शरीर द्वारा किए जाने वाले धार्मिक आचरण आते हैं – जैसे देवता, गुरु और ज्ञानियों का सम्मान, बाहरी और आंतरिक शुद्धि, सरल व्यवहार, ब्रह्मचर्य और अहिंसा। Physical austerity consists of reverential service to gods, brahmins, teachers, and the wise, along with cleanliness, honesty, celibacy, and non-violence – all performed through the body.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।