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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 17 · श्लोक 15

अध्याय 17 · श्लोक 15

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥१५॥

anudvega-karaṁ vākyaṁ satyaṁ priya-hitaṁ ca yat | svādhyāyābhyasanaṁ caiva vāṅ-mayaṁ tapa ucyate ||15||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

अनुद्वेगकरम्: not causing distress; वाक्यम्: speech; सत्यम्: truthful; प्रियहितम्: agreeable and beneficial; च: and; यत्: which; स्वाध्यायाभ्यसनम्: study of the scriptures; च: and; एव: also; वाङ्मयम्: of speech; तप: austerity; उच्यते: is said.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जो वचन न अप्रिय हो, सत्य हो, प्रिय हो और हितकारी हो, तथा वेदादि शास्त्रों का स्वाध्याय – यह वाणी से किया जाने वाला तप है।

English Translation

Speech which causes no distress, which is truthful, agreeable, and beneficial, and the regular study of the scriptures – these are said to be austerity of speech.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

वाणी का तप है: ऐसी बोली जो किसी को पीड़ा न पहुँचाए, सत्य हो, प्रिय और हितकर हो। साथ ही शास्त्रों का नियमित अध्ययन भी इसमें सम्मिलित है। Austerity of speech involves speaking words that are not agitating, truthful, pleasant, and beneficial, along with regular study of scriptures.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।