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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 17 · श्लोक 27

अध्याय 17 · श्लोक 27

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते। कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते॥२७॥

yajñe tapasi dāne ca sthitiḥ sad iti cocyate | karma caiva tad-arthīyaṁ sad ity evābhidhīyate ||27||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

यज्ञे: in sacrifice; तपसि: in austerity; दाने: in charity; च: and; स्थिति: steadfastness; सत्: Sat; इति: thus; च: and; उच्यते: is called; कर्म: action; च: and; एव: indeed; तदर्थीयम्: meant for that (the Supreme); सत्: Sat; इति: thus; एव: certainly; अभिधीयते: is described.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

यज्ञ, तप और दान में स्थिति (निष्ठा) को भी "सत्" कहा जाता है, तथा उस परमात्मा के लिए किया गया कर्म भी "सत्" ही कहलाता है।

English Translation

Steadfastness in sacrifice, austerity, and charity is also called Sat; and action for the sake of the Supreme is certainly called Sat.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

इस श्लोक में "सत्" का एक और अर्थ बताया गया है – यज्ञ, तप और दान में दृढ़ निष्ठा को "सत्" कहते हैं। इसके अलावा, जो कर्म केवल परमात्मा के लिए (भगवदर्पण) किया जाता है, वह भी "सत्" है। Steadfastness in sacrifice, austerity, and charity is designated as Sat. Also, any action performed solely for the Supreme is called Sat.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।