श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 17 (श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 17 · श्लोक 27

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 28 23 मिनट का पठन 149 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते। कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते॥२७॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

17 पद
यज्ञे
in sacrifice
तपसि
in austerity
दाने
in charity
च
and
स्थिति
steadfastness
सत्
Sat
इति
thus
च
and
उच्यते
is called
कर्म
action
च
and
एव
indeed
तदर्थीयम्
meant for that (the Supreme)
सत्
Sat
इति
thus
एव
certainly
अभिधीयते
is described.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

यज्ञ, तप और दान में स्थिति (निष्ठा) को भी "सत्" कहा जाता है, तथा उस परमात्मा के लिए किया गया कर्म भी "सत्" ही कहलाता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

सनातन धर्म के विशाल वाङ्मय में 'सत्' शब्द केवल एक संज्ञा नहीं, अपितु अस्तित्व का मूल आधार है। श्रीमद्भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय के इस सत्ताइसवें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने 'सत्' की परिभाषा को अत्यंत व्यापक और व्यावहारिक धरातल पर स्थापित किया है। सामान्यतः हम 'सत्' को सत्य या विद्यमानता के रूप में जानते हैं, किंतु यहाँ भगवान ने इसे यज्ञ, तप और दान की निष्ठा के साथ जोड़कर कर्मयोग का एक नया आयाम प्रस्तुत किया है।

ब्रह्मांड की रचना में 'ॐ तत् सत्' का त्रिविध निर्देश परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। जब कोई साधक अपने जीवन के प्रत्येक कर्म को—चाहे वह यज्ञ हो, तप हो या दान—परमात्मा के प्रति समर्पित भाव से करता है, तो वह कर्म 'सत्' की श्रेणी में आ जाता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि आध्यात्मिकता केवल गुफाओं में बैठकर ध्यान करने का नाम नहीं है, बल्कि सांसारिक कर्तव्यों को 'सत्' के भाव से करने का नाम ही योग है। जब हमारे यज्ञ (कर्तव्य पालन), तप (इंद्रिय संयम) और दान (परोपकार) में परमात्मा के प्रति अटूट निष्ठा होती है, तो हमारे कर्मों का फल भी 'सत्' हो जाता है। यह श्लोक एक साधक के लिए मार्गदर्शक है कि वह कैसे अपने दैनिक जीवन के छोटे-छोटे कार्यों को दिव्य अनुष्ठान में बदल सकता है। यह चेतना का वह स्तर है जहाँ कर्ता और कर्म का भेद मिटकर केवल परमात्मा का अस्तित्व शेष रह जाता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते॥२७॥


"यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सत् इति च उच्यते।
कर्म च एव तदर्थीयम् सत् इति एव अभिधीयते॥"

इस श्लोक का पाठ करते समय साधक को मन में यह भाव रखना चाहिए कि वह जो कुछ भी कर रहा है, वह स्वयं के लिए नहीं, अपितु उस परम सत्ता के लिए है। विधि यह है कि प्रातःकाल उठकर, स्नान-ध्यान के पश्चात, गीता के इस श्लोक का तीन बार उच्चारण करें और संकल्प लें कि आज का प्रत्येक कर्म 'सत्' के भाव से ओत-प्रोत होगा। यह केवल श्लोक नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक पद्धति है जो मनुष्य को भौतिकता से आध्यात्मिकता की ओर ले जाती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
यज्ञेयज्ञ मेंसमष्टि कल्याण हेतु किए गए निस्वार्थ कर्म।
तपसितप मेंइंद्रियों के संयम और आत्म-शुद्धि का प्रयास।
दानेदान मेंअहंकार त्यागकर पात्र को वस्तु अर्पण करना।
स्थितिःदृढ़ निष्ठाकर्म में अडिग भाव और श्रद्धा का होना।
सदिति'सत्' ऐसापरमात्मा का स्वरूप जो शाश्वत है।
चोच्यतेकहा जाता हैशास्त्रों और संतों द्वारा स्वीकृत परिभाषा।
कर्मक्रियाजीवन में की जाने वाली प्रत्येक गतिविधि।
तदर्थीयम्उसके लिएपरमात्मा की प्रसन्नता के लिए किया गया।
अभिधीयतेमाना जाता हैसत्य की कसौटी पर खरा उतरना।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता का सत्रहवां अध्याय 'श्रद्धात्रयविभागयोग' के नाम से जाना जाता है। इस अध्याय की पृष्ठभूमि कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में है, जहाँ अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से प्रश्न किया था कि जो लोग शास्त्रों के विधि-विधान को नहीं जानते, किंतु श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं, उनकी स्थिति क्या है? इसी प्रश्न के उत्तर में भगवान ने 'सत्', 'चित्' और 'आनंद' के स्वरूप को स्पष्ट किया है।

पौराणिक संदर्भों में, राजा बलि का उदाहरण यहाँ अत्यंत प्रासंगिक है। जब राजा बलि ने अपना सर्वस्व दान कर दिया, तो उनका वह दान 'सत्' की श्रेणी में आया क्योंकि उसमें अहंकार का लेशमात्र भी नहीं था। इसी प्रकार, महर्षि दधीचि का अस्थि दान भी 'सत्' का ही एक रूप है, जहाँ उन्होंने लोक कल्याण के लिए अपने शरीर का त्याग किया। ये उदाहरण हमें समझाते हैं कि 'सत्' केवल एक शब्द नहीं, बल्कि एक जीवन-दर्शन है। महाभारत के युद्ध में अर्जुन का कर्म भी 'सत्' था, क्योंकि वह व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना के लिए था। भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया है कि जब कर्म 'तदर्थीयम्' (परमात्मा के लिए) हो जाता है, तो वह कर्म न रहकर 'यज्ञ' बन जाता है। यह श्लोक वेदों के 'यज्ञो वै विष्णुः' (यज्ञ ही विष्णु है) के सिद्धांत को पुष्ट करता है। इतिहास गवाह है कि जिन महापुरुषों ने अपने कर्मों को 'सत्' के साथ जोड़ा, वे काल के प्रवाह में अमर हो गए। यह श्लोक हमें सिखाता है कि हम अपने जीवन को कैसे एक महायज्ञ बना सकते हैं, जहाँ प्रत्येक श्वास और प्रत्येक क्रिया परमात्मा की सेवा में समर्पित हो।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक एकाग्रता: इस श्लोक का नित्य जप करने से मन में व्याप्त चंचलता कम होती है और एकाग्रता बढ़ती है।
  • कर्मों की शुद्धि: साधक के मन में यह भाव जागृत होता है कि उसका हर कर्म परमात्मा के लिए है, जिससे पाप-पुण्य के बंधनों से मुक्ति का मार्ग खुलता है।
  • अहंकार का नाश: 'तदर्थीयम्' का भाव अहंकार को नष्ट करता है, क्योंकि कर्ता स्वयं को केवल एक निमित्त मात्र मानने लगता है।
  • सकारात्मक आभा (Aura): नित्य पाठ से साधक के चारों ओर एक सात्विक ऊर्जा का निर्माण होता है, जो नकारात्मक शक्तियों को दूर रखती है।
  • दैवीय कृपा: भगवान श्रीकृष्ण का यह वचन साधक को सीधे परमात्मा के संरक्षण में ले आता है।
  • तनाव मुक्ति: जब हम फल की चिंता छोड़कर कर्म को 'सत्' के लिए करते हैं, तो मानसिक तनाव स्वतः समाप्त हो जाता है।
  • नैतिक उत्थान: यह श्लोक व्यक्ति को सदाचार और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
  • आत्म-साक्षात्कार: निरंतर अभ्यास से साधक को यह अनुभव होने लगता है कि वह स्वयं भी उसी 'सत्' का अंश है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'Bhaktilok.in' के संपादकीय विभाग द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय के मूल संस्कृत श्लोकों और भाष्यकारों (जैसे शंकराचार्य और रामानुजाचार्य) के सिद्धांतों के आधार पर 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' है। हमारा उद्देश्य पाठकों को शास्त्रों के गूढ़ अर्थों को सरल और व्यावहारिक भाषा में उपलब्ध कराना है। यह लेख किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देता, अपितु भारतीय दर्शन की वैज्ञानिक और आध्यात्मिक गहराई को रेखांकित करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

नहीं, 'सत्' का अर्थ केवल सत्य बोलना नहीं है। गीता के अनुसार, यज्ञ, तप और दान में दृढ़ निष्ठा और परमात्मा के प्रति समर्पण ही 'सत्' है। यह अस्तित्व का वह भाव है जो शाश्वत है।

अपने प्रत्येक कर्म को करने से पहले यह संकल्प लें कि यह कार्य मैं अपनी तुष्टि के लिए नहीं, बल्कि परमात्मा की सेवा के लिए कर रहा हूँ। कर्म के अंत में फल को परमात्मा को समर्पित कर देना ही 'तदर्थीयम्' है।

यह श्लोक विशेष रूप से गृहस्थों के लिए है। एक गृहस्थ अपने परिवार का पालन-पोषण, दान और सेवा के माध्यम से भी 'सत्' की स्थिति प्राप्त कर सकता है, बशर्ते उसका भाव निष्काम हो।

इसका अर्थ है कि इन कार्यों को करते समय मन में कोई छल, कपट या दिखावा न हो। कार्य पूरी श्रद्धा और निरंतरता के साथ किया जाए, तभी वह 'सत्' कहलाता है।

इसका पाठ ब्रह्ममुहूर्त में या किसी भी शुभ कार्य को प्रारंभ करने से पूर्व करना अत्यंत फलदायी होता है। यह मन को सात्विक विचारों से भर देता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

"सत्" शब्द का एक और प्रयोग बताया गया है: यज्ञ, तप और दान में स्थित (दृढ़) रहना भी "सत्" कहलाता है। इसके अलावा, जो भी कर्म उस परमात्मा के उद्देश्य से (उनकी प्रसन्नता के लिए) किया जाता है, वह भी "सत्" ही कहा जाता है।

Steadfastness in performing sacrifice, austerity, and charity is also called Sat. Moreover, any action that is done for the sake of the Supreme (dedicated to Him) is certainly termed Sat.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 17: श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 27 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 27/28 96% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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