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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 17 · श्लोक 25

अध्याय 17 · श्लोक 25

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः। दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥२५॥

tad ity anabhisandhāya phalaṁ yajña-tapaḥ-kriyāḥ | dāna-kriyāś ca vividhāḥ kriyante mokṣa-kāṅkṣibhiḥ ||25||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

तत्: Tat; इति: thus; अनभिसन्धाय: without desiring; फलम्: fruit; यज्ञ: sacrifice; तपः: austerity; क्रियाः: acts; दान: charity; क्रियाः: acts; च: and; विविधाः: various; क्रियन्ते: are performed; मोक्षकाङ्क्षिभि: by those seeking liberation.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

फल की इच्छा न रखते हुए, "तत्" का उच्चारण करके, मोक्ष के इच्छुक पुरुषों द्वारा यज्ञ, तप और दान की विविध क्रियाएँ की जाती हैं।

English Translation

Uttering Tat, without desiring the fruits, the various acts of sacrifice, austerity, and charity are performed by the seekers of liberation.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

जो लोग मोक्ष के आकांक्षी हैं, वे फल की इच्छा त्यागकर, केवल "तत्" (वह – परब्रह्म के उद्देश्य से) का उच्चारण करते हुए यज्ञ, तप और दान करते हैं। इससे उनके कर्म निष्काम हो जाते हैं। Those who desire liberation perform acts of sacrifice, austerity, and charity uttering "Tat", without any longing for the fruits, thus dedicating all actions to the Supreme.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।