श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 17 (श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 17 · श्लोक 25

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 28 23 मिनट का पठन 145 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः। दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥२५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
तत्
Tat
इति
thus
अनभिसन्धाय
without desiring
फलम्
fruit
यज्ञ
sacrifice
तपः
austerity
क्रियाः
acts
दान
charity
क्रियाः
acts
च
and
विविधाः
various
क्रियन्ते
are performed
मोक्षकाङ्क्षिभि
by those seeking liberation.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

फल की इच्छा न रखते हुए, "तत्" का उच्चारण करके, मोक्ष के इच्छुक पुरुषों द्वारा यज्ञ, तप और दान की विविध क्रियाएँ की जाती हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

तदित्यनभिसन्धाय - मोक्ष का मार्ग और निष्काम कर्म का रहस्य

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

सनातन धर्म के ग्रंथों में 'मोक्ष' को जीवन का अंतिम और सर्वोच्च लक्ष्य माना गया है। श्रीमद्भगवद्गीता का १७वां अध्याय, जो 'श्रद्धात्रय विभाग योग' के नाम से विख्यात है, हमें यह सिखाता है कि किस प्रकार मनुष्य अपनी श्रद्धा और कर्मों के माध्यम से परब्रह्म की प्राप्ति कर सकता है। प्रस्तुत श्लोक—"तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः। दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥"—निष्काम कर्मयोग का वह आधार स्तंभ है, जो साधक को सांसारिक बंधनों से मुक्त करने की कुंजी प्रदान करता है।

जब हम 'तत्' शब्द का उच्चारण करते हैं, तो हम वास्तव में उस निराकार, अनंत और सर्वव्यापी परमात्मा को संबोधित कर रहे होते हैं जो सृष्टि के कण-कण में विद्यमान है। सांस्कृतिक दृष्टिकोण से, यह श्लोक हमें सिखाता है कि यज्ञ, तप और दान केवल भौतिक अनुष्ठान नहीं हैं, बल्कि ये आत्मा की शुद्धि के उपकरण हैं। जब कोई साधक फल की आकांक्षा का त्याग कर देता है, तो उसके द्वारा किए गए कर्म 'कर्म' न रहकर 'योग' बन जाते हैं। यह ब्रह्मांडीय सत्य है कि जो कुछ भी है, वह 'तत्' (वह परमात्मा) ही है। इस बोध के साथ किया गया प्रत्येक कार्य साधक को जन्म-मरण के चक्र से ऊपर उठाकर मोक्ष के द्वार तक ले जाता है। यह श्लोक न केवल एक निर्देश है, बल्कि एक आध्यात्मिक विज्ञान है जो अहंकार के विसर्जन और परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण का मार्ग प्रशस्त करता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥२५॥


उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय मन को शांत रखें। 'तत्' शब्द पर विशेष ध्यान दें, जो परब्रह्म का वाचक है। इसे प्रतिदिन संध्याकाल में तीन बार जपते हुए अपने दिनभर के कर्मों को परमात्मा को समर्पित करने का संकल्प लें। यह विधि साधक के चित्त में सात्विक भावों का संचार करती है और उसे अहंकारी वृत्तियों से मुक्त करती है।

भावार्थ: जो मनुष्य मोक्ष की इच्छा रखते हैं, वे फल की कामना का त्याग करके, केवल 'तत्' (परब्रह्म) का स्मरण करते हुए यज्ञ, तप और दान रूपी विविध क्रियाएं संपन्न करते हैं। उनके लिए कर्म का फल गौण हो जाता है और परमात्मा की प्राप्ति ही मुख्य लक्ष्य बन जाती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
तत्वह (परब्रह्म)यह परमात्मा का वाचक है, जो सृष्टि का मूल आधार है।
इतिइस प्रकारपरमात्मा के प्रति समर्पण का भाव प्रकट करने हेतु।
अनभिसन्धायबिना इच्छा केफल की आसक्ति का पूर्ण त्याग, निष्काम भाव।
फलम्परिणामकर्मों के भौतिक या स्वर्गीय सुखों की कामना।
यज्ञहवन/अनुष्ठानदेवताओं और समाज के प्रति कर्तव्य पालन।
तपःतपस्याइंद्रियों का संयम और चित्त की एकाग्रता।
दानपरोपकारसात्विक भाव से पात्र को दी गई सहायता।
मोक्षकाङ्क्षिभिःमोक्ष चाहने वालेजो जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति के आकांक्षी हैं।
विविधाःअनेक प्रकार कीविभिन्न प्रकार के सात्विक कर्म।
क्रियन्तेकिए जाते हैंसाधक द्वारा निरंतर किए जाने वाले अनुष्ठान।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेशों का हिस्सा है। जब अर्जुन ने कर्मों के फल और उनके बंधन के बारे में प्रश्न किया, तब भगवान ने स्पष्ट किया कि बंधन कर्म से नहीं, बल्कि कर्म के प्रति 'आसक्ति' से होता है। पौराणिक संदर्भों में, हम देखते हैं कि राजा बलि, ध्रुव और प्रह्लाद जैसे भक्तों ने इसी 'तत्' भाव को अपनाकर परमात्मा को प्राप्त किया।

वेदों में 'तत्' को 'तत्वमसि' (वह तुम ही हो) के महावाक्य से जोड़ा गया है। उपनिषदों के अनुसार, जब तक मनुष्य 'मैं' और 'मेरा' के भाव में रहता है, तब तक वह संसार के चक्र में फंसा रहता है। महाभारत के युद्ध के दौरान, श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह समझाया कि युद्ध करना तुम्हारा धर्म है, लेकिन यदि तुम इसे 'मेरे लिए' (परमात्मा के लिए) करोगे, तो तुम पाप और पुण्य दोनों से परे हो जाओगे। यह श्लोक उसी दर्शन का सार है। प्राचीन ऋषियों ने इसे 'निष्काम कर्मयोग' का हृदय कहा है। जब हम किसी भी कार्य को 'तत्' (परमेश्वर) को समर्पित करते हैं, तो वह कार्य एक यज्ञ बन जाता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है, जहाँ साधक अपने हर कार्य को ईश्वर की सेवा मानकर करता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि मोक्ष कोई दूर की वस्तु नहीं, बल्कि हमारे कर्मों के प्रति दृष्टिकोण का परिवर्तन है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • अहंकार का नाश: 'तत्' का स्मरण करने से व्यक्ति को बोध होता है कि वह कर्ता नहीं, बल्कि निमित्त मात्र है।
  • मानसिक शांति: फल की चिंता न करने से चित्त की चंचलता समाप्त होती है और तनाव से मुक्ति मिलती है।
  • कर्म शुद्धि: निष्काम भाव से किए गए कर्मों में पाप का अंश नहीं रहता, जिससे चित्त शुद्ध होता है।
  • ईश्वरीय कृपा: जो स्वयं को परमात्मा को समर्पित कर देता है, उस पर ईश्वर की विशेष कृपा बनी रहती है।
  • एकाग्रता में वृद्धि: तप और यज्ञ के माध्यम से मन की एकाग्रता बढ़ती है, जो ध्यान के लिए आवश्यक है।
  • सकारात्मक ऊर्जा: 'तत्' शब्द का कंपन शरीर और मन में सात्विक ऊर्जा का संचार करता है।
  • मोक्ष का मार्ग: यह श्लोक साधक को धीरे-धीरे सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठाकर मोक्ष की ओर ले जाता है।
  • कर्तव्य बोध: यह हमें सिखाता है कि बिना किसी स्वार्थ के समाज और धर्म के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन कैसे करें।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री श्रीमद्भगवद्गीता के १७वें अध्याय के श्लोक २५ पर आधारित है। इसे 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' के अंतर्गत रखा गया है, जिसमें गीता प्रेस गोरखपुर के प्रामाणिक संस्करणों और शंकराचार्य भाष्य के दार्शनिक सिद्धांतों का समन्वय किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को निष्काम कर्मयोग के वास्तविक अर्थ से परिचित कराना है। यह लेख आध्यात्मिक शोध और शास्त्रीय अध्ययन के आधार पर तैयार किया गया है, ताकि भक्त अपनी साधना को और अधिक प्रगाढ़ बना सकें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

केवल उच्चारण पर्याप्त नहीं है। 'तत्' का अर्थ है परब्रह्म के प्रति पूर्ण समर्पण। जब यह उच्चारण आपके कर्मों में, आपके व्यवहार में और आपके त्याग में झलकता है, तब वह मोक्ष का मार्ग बनता है।

बिल्कुल नहीं। निष्काम कर्म का अर्थ है कर्म को पूरी कुशलता से करना, लेकिन उसके फल (परिणाम) की चिंता न करना। यह कर्म के प्रति अनासक्ति का भाव है।

आधुनिक जीवन में यज्ञ का अर्थ है निस्वार्थ सेवा और तप का अर्थ है अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण और अपने लक्ष्यों के प्रति अनुशासन।

हाँ, गीता के अनुसार मोक्ष का मार्ग सबके लिए खुला है। यदि गृहस्थ अपने कर्तव्यों का पालन 'तत्' को समर्पित होकर करे, तो वह भी मोक्ष का अधिकारी है।

प्रत्येक कार्य को करने से पूर्व मन में यह भाव लाएं कि यह कार्य मैं ईश्वर के लिए कर रहा हूँ। कार्य के अंत में उसका फल ईश्वर को समर्पित कर दें।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो साधक मोक्ष (मुक्ति) की इच्छा रखते हैं, वे "तत्" का उच्चारण करते हुए तथा फल की आसक्ति न रखते हुए, यज्ञ, तप और दान की विविध क्रियाओं को सम्पन्न करते हैं। "तत्" का अर्थ है "वह परमात्मा" – वे सब कुछ उसी के लिए करते हैं।

Those who long for liberation perform various acts of sacrifice, austerity, and charity uttering "Tat", without any desire for the fruits. They dedicate all actions to the Supreme, seeking only freedom.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 17: श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 25 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 25/28 89% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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