पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदश्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
फल की इच्छा न रखते हुए, "तत्" का उच्चारण करके, मोक्ष के इच्छुक पुरुषों द्वारा यज्ञ, तप और दान की विविध क्रियाएँ की जाती हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व
सनातन धर्म के ग्रंथों में 'मोक्ष' को जीवन का अंतिम और सर्वोच्च लक्ष्य माना गया है। श्रीमद्भगवद्गीता का १७वां अध्याय, जो 'श्रद्धात्रय विभाग योग' के नाम से विख्यात है, हमें यह सिखाता है कि किस प्रकार मनुष्य अपनी श्रद्धा और कर्मों के माध्यम से परब्रह्म की प्राप्ति कर सकता है। प्रस्तुत श्लोक—"तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः। दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥"—निष्काम कर्मयोग का वह आधार स्तंभ है, जो साधक को सांसारिक बंधनों से मुक्त करने की कुंजी प्रदान करता है।
जब हम 'तत्' शब्द का उच्चारण करते हैं, तो हम वास्तव में उस निराकार, अनंत और सर्वव्यापी परमात्मा को संबोधित कर रहे होते हैं जो सृष्टि के कण-कण में विद्यमान है। सांस्कृतिक दृष्टिकोण से, यह श्लोक हमें सिखाता है कि यज्ञ, तप और दान केवल भौतिक अनुष्ठान नहीं हैं, बल्कि ये आत्मा की शुद्धि के उपकरण हैं। जब कोई साधक फल की आकांक्षा का त्याग कर देता है, तो उसके द्वारा किए गए कर्म 'कर्म' न रहकर 'योग' बन जाते हैं। यह ब्रह्मांडीय सत्य है कि जो कुछ भी है, वह 'तत्' (वह परमात्मा) ही है। इस बोध के साथ किया गया प्रत्येक कार्य साधक को जन्म-मरण के चक्र से ऊपर उठाकर मोक्ष के द्वार तक ले जाता है। यह श्लोक न केवल एक निर्देश है, बल्कि एक आध्यात्मिक विज्ञान है जो अहंकार के विसर्जन और परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण का मार्ग प्रशस्त करता है।
संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥२५॥
उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय मन को शांत रखें। 'तत्' शब्द पर विशेष ध्यान दें, जो परब्रह्म का वाचक है। इसे प्रतिदिन संध्याकाल में तीन बार जपते हुए अपने दिनभर के कर्मों को परमात्मा को समर्पित करने का संकल्प लें। यह विधि साधक के चित्त में सात्विक भावों का संचार करती है और उसे अहंकारी वृत्तियों से मुक्त करती है।
भावार्थ: जो मनुष्य मोक्ष की इच्छा रखते हैं, वे फल की कामना का त्याग करके, केवल 'तत्' (परब्रह्म) का स्मरण करते हुए यज्ञ, तप और दान रूपी विविध क्रियाएं संपन्न करते हैं। उनके लिए कर्म का फल गौण हो जाता है और परमात्मा की प्राप्ति ही मुख्य लक्ष्य बन जाती है।
पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ
धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि
श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेशों का हिस्सा है। जब अर्जुन ने कर्मों के फल और उनके बंधन के बारे में प्रश्न किया, तब भगवान ने स्पष्ट किया कि बंधन कर्म से नहीं, बल्कि कर्म के प्रति 'आसक्ति' से होता है। पौराणिक संदर्भों में, हम देखते हैं कि राजा बलि, ध्रुव और प्रह्लाद जैसे भक्तों ने इसी 'तत्' भाव को अपनाकर परमात्मा को प्राप्त किया।
वेदों में 'तत्' को 'तत्वमसि' (वह तुम ही हो) के महावाक्य से जोड़ा गया है। उपनिषदों के अनुसार, जब तक मनुष्य 'मैं' और 'मेरा' के भाव में रहता है, तब तक वह संसार के चक्र में फंसा रहता है। महाभारत के युद्ध के दौरान, श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह समझाया कि युद्ध करना तुम्हारा धर्म है, लेकिन यदि तुम इसे 'मेरे लिए' (परमात्मा के लिए) करोगे, तो तुम पाप और पुण्य दोनों से परे हो जाओगे। यह श्लोक उसी दर्शन का सार है। प्राचीन ऋषियों ने इसे 'निष्काम कर्मयोग' का हृदय कहा है। जब हम किसी भी कार्य को 'तत्' (परमेश्वर) को समर्पित करते हैं, तो वह कार्य एक यज्ञ बन जाता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है, जहाँ साधक अपने हर कार्य को ईश्वर की सेवा मानकर करता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि मोक्ष कोई दूर की वस्तु नहीं, बल्कि हमारे कर्मों के प्रति दृष्टिकोण का परिवर्तन है।
नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ
यह सामग्री श्रीमद्भगवद्गीता के १७वें अध्याय के श्लोक २५ पर आधारित है। इसे 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' के अंतर्गत रखा गया है, जिसमें गीता प्रेस गोरखपुर के प्रामाणिक संस्करणों और शंकराचार्य भाष्य के दार्शनिक सिद्धांतों का समन्वय किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को निष्काम कर्मयोग के वास्तविक अर्थ से परिचित कराना है। यह लेख आध्यात्मिक शोध और शास्त्रीय अध्ययन के आधार पर तैयार किया गया है, ताकि भक्त अपनी साधना को और अधिक प्रगाढ़ बना सकें।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जो साधक मोक्ष (मुक्ति) की इच्छा रखते हैं, वे "तत्" का उच्चारण करते हुए तथा फल की आसक्ति न रखते हुए, यज्ञ, तप और दान की विविध क्रियाओं को सम्पन्न करते हैं। "तत्" का अर्थ है "वह परमात्मा" – वे सब कुछ उसी के लिए करते हैं।
Those who long for liberation perform various acts of sacrifice, austerity, and charity uttering "Tat", without any desire for the fruits. They dedicate all actions to the Supreme, seeking only freedom.