श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 17 (श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 17 · श्लोक 24

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 28 23 मिनट का पठन 137 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः। प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्॥२४॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
तस्मात्
therefore
ॐ
Om
इति
thus
उदाहृत्य
uttering
यज्ञ
sacrifice
दान
charity
तपः
austerity
क्रियाः
acts
प्रवर्तन्ते
begin
विधानोक्ता
as prescribed in the scriptures
सततम्
always
ब्रह्मवादिनाम्
of the followers of the Vedas.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

इसलिए, वेदों के अनुयायी (ब्रह्मवादी) लोग शास्त्र-विधि से नियत यज्ञ, दान और तप की क्रियाओं को "ॐ" का उच्चारण करके ही आरम्भ करते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

तस्मादोमित्युदाहृत्य - आध्यात्मिक व्याख्या एवं महत्व

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

सनातन धर्म की आधारशिला 'ॐ' (ओम्) है, जो न केवल एक ध्वनि है, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड का स्पंदन है। श्रीमद्भगवद्गीता के १७वें अध्याय के २४वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने कर्मयोग की एक ऐसी कुंजी प्रदान की है, जो मनुष्य के प्रत्येक कृत्य को लौकिक से अलौकिक बनाने की क्षमता रखती है। जब हम 'यज्ञ', 'दान' और 'तप' जैसे सात्विक कर्मों का अनुष्ठान करते हैं, तो उनके आरंभ में 'ॐ' का उच्चारण केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक तकनीक है।

यह श्लोक हमें सिखाता है कि कर्म की शुद्धि उसके परिणाम से अधिक उसके आरंभिक संकल्प पर निर्भर करती है। 'ॐ' का उच्चारण करने से साधक का अहंकार विलीन हो जाता है और वह स्वयं को उस परम ब्रह्म के साथ जोड़ लेता है, जो समस्त यज्ञों का भोक्ता है। सांस्कृतिक दृष्टि से, यह श्लोक हमें स्मरण कराता है कि हम जो कुछ भी कर रहे हैं, वह व्यक्तिगत नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय व्यवस्था का हिस्सा है। जब हम 'ॐ' कहकर किसी दान या तप का शुभारंभ करते हैं, तो हम यह स्वीकार करते हैं कि यह शरीर, यह धन और यह समय सब उसी परमात्मा का है। यह बोध ही मनुष्य को 'कर्ता' के अहंकार से मुक्त कर 'निमित्त' बनाता है। इस प्रकार, यह श्लोक कर्म को पूजा में बदलने का मार्ग प्रशस्त करता है, जिससे जीवन का हर क्षण एक यज्ञ बन जाता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्॥२४॥


उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय मन को शांत रखें। 'तस्मात्' में 'त्' का उच्चारण स्पष्ट हो, 'ओम्' को नाभि से उच्चारित करें। 'ब्रह्मवादिनाम्' का उच्चारण करते समय ब्रह्म के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव रखें। यह श्लोक गीता के १७वें अध्याय का २४वां श्लोक है, जो सात्विक कर्मों की विधि को स्पष्ट करता है। वैदिक परंपरा में, किसी भी शुभ कार्य के प्रारंभ में 'ॐ' का उच्चारण करने से उस कार्य में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और कार्य की ऊर्जा सकारात्मक हो जाती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
तस्मात्इसलिएपूर्व में वर्णित सात्विक कर्मों के महत्व के कारण।
ओम्ॐकारपरम ब्रह्म का वाचक, समस्त ध्वनियों का मूल।
इतिइस प्रकारइस विधि का पालन करते हुए।
उदाहृत्यउच्चारण करकेवाणी और मन को पवित्र करके।
यज्ञहवन/पूजास्वार्थ का त्याग कर परोपकार में आहुति देना।
दानवितरणअपनी वस्तुओं को परमात्मा का मानकर दूसरों को देना।
तपसाधनाइंद्रियों के संयम द्वारा आत्म-शुद्धि।
प्रवर्तन्तेप्रारंभ होते हैंकर्मों का अनुष्ठान शुरू होता है।
विधानोक्ताःशास्त्रों के अनुसारविधि-विधान का पालन अनिवार्य है।
ब्रह्मवादिनाम्ब्रह्म को जानने वालेजो सत्य और ब्रह्म में स्थित हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेशों का हिस्सा है। जब अर्जुन ने पूछा कि जो लोग शास्त्रों के विधि-विधान को नहीं जानते, लेकिन श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं, उनकी स्थिति क्या है, तब भगवान ने 'श्रद्धात्रय विभाग योग' के अंतर्गत यह स्पष्ट किया। पौराणिक संदर्भों में, 'ॐ' की महिमा मांडूक्य उपनिषद में विस्तार से वर्णित है, जहाँ इसे 'अ', 'उ', 'म' के रूप में सृष्टि, स्थिति और लय का प्रतीक माना गया है।

महाभारत काल में, ऋषि-मुनि और ब्रह्मवादी इसी विधि का पालन करते थे। यह श्लोक हमें बताता है कि कर्म की सफलता उसके 'विधि-विधान' में निहित है। जैसे एक बीज को सही ऋतु और मिट्टी में बोने पर ही फल मिलता है, वैसे ही कर्म को 'ॐ' के उच्चारण से शुरू करने पर वह 'यज्ञ' बन जाता है। पुराणों में उल्लेख है कि प्रजापति ब्रह्मा ने जब सृष्टि की रचना की, तो उन्होंने 'ॐ' का ही उच्चारण किया था। अतः, जब हम किसी भी सात्विक कार्य को 'ॐ' से शुरू करते हैं, तो हम उसी सृजनात्मक ऊर्जा से जुड़ जाते हैं। यह श्लोक हमें यह भी सिखाता है कि कर्म केवल शारीरिक क्रिया नहीं है, बल्कि एक मानसिक और आध्यात्मिक अनुष्ठान है। ब्रह्मवादी वे हैं जो ब्रह्म को ही सत्य मानते हैं, और उनके लिए 'ॐ' ही वह सेतु है जो उन्हें नश्वर जगत से अमर ब्रह्म की ओर ले जाता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • एकाग्रता में वृद्धि: 'ॐ' के उच्चारण से मस्तिष्क की तरंगें शांत होती हैं, जिससे ध्यान केंद्रित करने की क्षमता बढ़ती है।
  • कर्मों की शुद्धि: जब हम किसी कार्य को 'ॐ' से जोड़ते हैं, तो हमारा अहंकार कम होता है और कर्म निष्काम भाव की ओर अग्रसर होता है।
  • सकारात्मक ऊर्जा का संचार: यह ध्वनि शरीर के चक्रों को सक्रिय करती है, जिससे नकारात्मकता का नाश होता है।
  • मानसिक शांति: नियमित जप से तनाव और चिंता में कमी आती है, क्योंकि मन परमात्मा के साथ जुड़ जाता है।
  • दैवीय कृपा: शास्त्रों के अनुसार, 'ॐ' का उच्चारण करने वाले पर ईश्वर की कृपा सहज ही बनी रहती है।
  • आत्म-अनुशासन: यह श्लोक हमें सिखाता है कि जीवन में हर कार्य विधि-विधान से करना चाहिए, जिससे अनुशासन आता है।
  • अहंकार का शमन: 'ॐ' का अर्थ है 'मैं नहीं, वह है', जो साधक को विनम्र बनाता है।
  • ब्रह्मांडीय चेतना से जुड़ाव: यह हमें अनुभव कराता है कि हम इस विशाल ब्रह्मांड का एक अभिन्न हिस्सा हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'Bhaktilok.in' के संपादकीय विभाग द्वारा श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय १७, श्लोक २४) के मूल संस्कृत पाठ और विभिन्न भाष्यकारों (जैसे आदि शंकराचार्य और स्वामी रामसुखदास जी) के दृष्टिकोणों के आधार पर 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' है। हमारा उद्देश्य पाठकों को शास्त्रों के गूढ़ अर्थों को सरल और बोधगम्य भाषा में प्रस्तुत करना है। यह लेख किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देता, बल्कि वैदिक जीवनशैली के वैज्ञानिक और आध्यात्मिक पहलुओं को उजागर करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

नहीं, 'ॐ' समस्त ब्रह्मांड का बीज मंत्र है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने इसे 'ब्रह्मवादिनाम्' के लिए कहा है, जिसका अर्थ है जो भी ब्रह्म को जानने का प्रयास कर रहा है, वह इसका उच्चारण कर सकता है। यह किसी जाति या वर्ण का नहीं, बल्कि चेतना का विषय है।

यज्ञ का अर्थ है परोपकार के लिए त्याग, दान का अर्थ है अपनी संपत्ति का सही उपयोग, और तप का अर्थ है इंद्रियों पर नियंत्रण। ये तीनों ही मनुष्य के आध्यात्मिक विकास के लिए अनिवार्य हैं।

निष्फल नहीं, किंतु वे सात्विक फल देने में कम सक्षम होते हैं। 'ॐ' का उच्चारण कार्य को एक दिव्य दिशा और पवित्रता प्रदान करता है, जिससे वह कर्म 'योग' बन जाता है।

ब्रह्मवादी वह है जो ब्रह्म (परम सत्य) के मार्ग पर चलता है और अपने हर कार्य को ब्रह्म को समर्पित करता है। यह एक उच्च आध्यात्मिक अवस्था है।

आप अपने दिन के महत्वपूर्ण कार्यों, जैसे भोजन ग्रहण करने से पहले, अध्ययन शुरू करने से पहले या किसी की सहायता करने से पहले मन में 'ॐ' का उच्चारण करें। यह आपके कर्म को पवित्र बना देगा।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

इसलिए (ॐ तत् सत् के इस निर्देश के अनुसार), वेदों के मार्ग पर चलने वाले (ब्रह्मवादी) लोग शास्त्रों में बताए गए यज्ञ, दान और तप के कर्मों को हमेशा "ॐ" का उच्चारण करके ही प्रारम्भ करते हैं। यह कर्मों को ईश्वर को समर्पित करने का संकेत है।

Therefore, those who follow the Vedic path always begin their acts of sacrifice, charity, and austerity, as prescribed in the scriptures, by uttering "Om". This invocation sanctifies the action and dedicates it to the Supreme.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 17: श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 24 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 24/28 86% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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