श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 17 (श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 17 · श्लोक 23

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 28 24 मिनट का पठन 155 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ॐतत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः। ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा॥२३॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

16 पद
ॐ
Om
तत्
Tat
सत्
Sat
इति
thus
निर्देश
designations
ब्रह्मण
of Brahman (the Supreme)
त्रिविध
threefold
स्मृतः
are considered
ब्राह्मणा
the Brahmins
तेन
by that
वेदाः
the Vedas
च
and
यज्ञाः
sacrifices
च
and
विहिताः
were created
पुरा
in ancient times.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

ॐ, तत्, सत् – यह ब्रह्म (परमात्मा) का तीन प्रकार से निर्देश (नाम) कहा गया है। इसी (तीन नामों) द्वारा प्राचीन काल में ब्राह्मण, वेद और यज्ञ रचे गए।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

ॐ तत् सत् - श्रीमद्भगवद्गीता का दिव्य रहस्य | Bhaktilok.in

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

सनातन धर्म के विशाल वाङ्मय में 'ॐ तत् सत्' को केवल तीन शब्द नहीं, अपितु ब्रह्मांड की आधारशिला माना गया है। श्रीमद्भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय का यह तेईसवाँ श्लोक उस परम सत्य को उद्घाटित करता है जो सृष्टि के आदि से ही अस्तित्व में है। जब हम 'ॐ' का उच्चारण करते हैं, तो हम उस निराकार ब्रह्म का आह्वान करते हैं जो समस्त ध्वनियों का मूल है। 'तत्' का अर्थ है 'वह', जो हमारी इंद्रियों से परे उस परम सत्ता की ओर संकेत करता है, और 'सत्' का अर्थ है 'शाश्वत सत्य', जो काल के प्रवाह में कभी नष्ट नहीं होता।

सांस्कृतिक दृष्टि से, यह त्रिविध निर्देश हमारे कर्मों को पवित्र करने का एक वैज्ञानिक और आध्यात्मिक उपकरण है। प्राचीन काल में, जब भी कोई यज्ञ, दान या तप किया जाता था, तो इन तीन शब्दों का उच्चारण अनिवार्य था। यह उच्चारण न केवल कार्य को शुद्ध करता है, बल्कि कर्ता के अहंकार को मिटाकर उसे परब्रह्म के चरणों में समर्पित कर देता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि सृष्टि की रचना में ब्राह्मण (ज्ञान), वेद (शास्त्र) और यज्ञ (कर्म) का प्रादुर्भाव इसी त्रिविध निर्देश से हुआ है। यह हमारे जीवन को एक दिव्य दिशा प्रदान करता है, जहाँ प्रत्येक क्रिया एक अनुष्ठान बन जाती है। इस श्लोक का चिंतन करने से साधक को यह बोध होता है कि वह स्वयं भी उसी परब्रह्म का एक अंश है। यह ज्ञान मनुष्य को सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठाकर आत्म-साक्षात्कार की ओर अग्रसर करता है, जिससे जीवन में शांति, स्थिरता और दिव्यता का संचार होता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः ।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥ २३ ॥


उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय मन को शांत रखें। 'ॐ' का दीर्घ उच्चारण करें, 'तत्' पर बल दें और 'सत्' को स्थिरता के साथ बोलें। इसे प्रतिदिन प्रातः काल स्नान के पश्चात तीन बार जपने से मानसिक शुद्धि होती है।

यह श्लोक भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को उपदेशित किया गया है। यहाँ 'निर्देश' शब्द का अर्थ है 'नाम' या 'संकेत'। भगवान स्पष्ट करते हैं कि परब्रह्म का स्वरूप तीन प्रकार से जाना जाता है। यह त्रिविध निर्देश ही वेदों के मंत्रों का सार है। जब हम किसी भी शुभ कार्य का आरंभ करते हैं, तो इन शब्दों का स्मरण करना उस कार्य को 'सात्विक' श्रेणी में ले आता है। यह श्लोक हमें स्मरण दिलाता है कि हम जो कुछ भी कर रहे हैं, वह अंततः उसी परब्रह्म की इच्छा और शक्ति से हो रहा है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
ॐप्रणव (परमात्मा का नाम)यह ब्रह्मांड की प्रथम ध्वनि है, जो सृजन का आधार है।
तत्वह (परम सत्ता)यह उस परमात्मा की ओर संकेत करता है जो हमसे परे है।
सत्शाश्वत सत्यजो तीनों कालों में विद्यमान रहे, वही वास्तविक सत्य है।
निर्देशःसंकेत या नामपरब्रह्म को परिभाषित करने का त्रिविध माध्यम।
ब्रह्मणःपरब्रह्म काउस निराकार ईश्वर का जो सर्वव्यापी है।
त्रिविधःतीन प्रकार कातीन अलग-अलग आयामों में ईश्वर की उपस्थिति।
स्मृतःकहा गया हैवेदों और ऋषियों द्वारा स्वीकृत सिद्धांत।
ब्राह्मणाःज्ञानी पुरुष (ब्राह्मण)वे जो ब्रह्म को जानने वाले और वेदों के रक्षक हैं।
वेदाश्चऔर वेदज्ञान का वह भंडार जो सृष्टि के आरम्भ में प्रकट हुआ।
यज्ञाश्चऔर यज्ञपरमात्मा की प्रसन्नता के लिए किए जाने वाले कर्म।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक की पृष्ठभूमि कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में निहित है, जहाँ अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा था कि जो लोग शास्त्रों की विधि को छोड़कर श्रद्धापूर्वक यज्ञ करते हैं, उनकी स्थिति क्या होती है? भगवान ने उत्तर में 'ॐ तत् सत्' के महत्व को समझाया। पौराणिक कथाओं के अनुसार, सृष्टि के सृजन के समय ब्रह्माजी ने जब वेदों का उच्चारण किया, तो सबसे पहले 'ॐ' की ध्वनि ही गुंजायमान हुई थी।

वेदों में उल्लेख है कि 'ॐ' से ही संपूर्ण जगत का विस्तार हुआ है। 'तत्' शब्द का प्रयोग उपनिषदों में 'तत्त्वमसि' (वह तुम ही हो) के रूप में हुआ है, जो जीव और ब्रह्म की एकता को दर्शाता है। 'सत्' शब्द का महत्व 'सत्यमेव जयते' के सिद्धांत में निहित है। जब ऋषि-मुनि यज्ञ करते थे, तो वे इन तीन शब्दों का उच्चारण करके अपने यज्ञ को पूर्णता प्रदान करते थे। यह परंपरा महाभारत काल से भी पूर्व की है, जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में पुनर्जीवित किया। यह श्लोक हमें यह भी बताता है कि ब्राह्मणों का अस्तित्व, वेदों का ज्ञान और यज्ञों की पवित्रता—ये सब इसी त्रिविध निर्देश पर आधारित हैं। यदि कोई यज्ञ 'ॐ तत् सत्' के भाव के बिना किया जाए, तो वह निष्फल माना जाता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि धर्म केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि एक चेतना है जो हमें उस परम सत्य से जोड़ती है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • मानसिक शांति: 'ॐ' के उच्चारण से मस्तिष्क की तरंगें शांत होती हैं और तनाव कम होता है।
  • सकारात्मक आभा (Aura): इस मंत्र के निरंतर जप से साधक के चारों ओर एक दिव्य सुरक्षा कवच का निर्माण होता है।
  • कर्म शुद्धि: किसी भी कार्य से पूर्व इस मंत्र का स्मरण करने से वह कार्य निष्काम भाव में बदल जाता है।
  • एकाग्रता में वृद्धि: यह मंत्र मन को भटकने से रोकता है और ध्यान (Meditation) में गहराई लाता है।
  • अहंकार का नाश: 'तत्' और 'सत्' का बोध साधक को यह एहसास दिलाता है कि वह स्वयं कर्ता नहीं है।
  • दैवीय कृपा: शास्त्रों के अनुसार, इस मंत्र का जप करने वाले पर भगवान की विशेष कृपा बनी रहती है।
  • वाक् सिद्धि: निरंतर शुद्ध उच्चारण से वाणी में ओज और सत्य का प्रभाव आता है।
  • मोक्ष का मार्ग: यह त्रिविध निर्देश साधक को जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होने की प्रेरणा देता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री श्रीमद्भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय (श्रद्धात्रयविभागयोग) के आधार पर 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' है। हमने इसे प्रामाणिक भाष्यों, जैसे कि आदि शंकराचार्य और स्वामी रामसुखदास जी के दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए तैयार किया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को सनातन धर्म के गूढ़ रहस्यों को सरल भाषा में समझाना है। यह लेख किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देता, बल्कि वेदों और उपनिषदों में वर्णित ज्ञान को वैज्ञानिक और आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

हाँ, यह मंत्र सार्वभौमिक है। इसे कोई भी व्यक्ति, चाहे वह किसी भी पंथ का हो, श्रद्धा के साथ जप सकता है। यह किसी विशेष जाति या संप्रदाय तक सीमित नहीं है।

दैनिक जीवन में भोजन ग्रहण करने से पूर्व, किसी महत्वपूर्ण कार्य को शुरू करने से पहले या रात को सोने से पहले इसका मानसिक जप करने से कार्य में सात्विकता आती है।

यहाँ 'ब्राह्मण' का अर्थ केवल जाति नहीं, बल्कि 'ब्रह्म को जानने वाला' है। यह निर्देश उन लोगों के लिए मार्गदर्शक है जो ज्ञान और धर्म के मार्ग पर चलते हैं।

यज्ञ का अर्थ केवल अग्नि में आहुति देना नहीं है। अपने प्रत्येक अच्छे कर्म को ईश्वर को समर्पित करना ही यज्ञ है। अतः यह मंत्र हर स्थिति में प्रभावी है।

इसे प्रतिदिन तीन बार सस्वर पाठ करें। धीरे-धीरे इसका अर्थ मन में उतारें। जब आप अर्थ समझ जाएंगे, तो यह स्वतः ही आपके स्मरण में बस जाएगा।

© 2024 Bhaktilok.in - सनातन धर्म के प्रचार हेतु समर्पित।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान् अब "ॐ तत् सत्" के रहस्य का उद्घाटन करते हैं। ये तीन शब्द परम ब्रह्म (परमात्मा) के तीन नाम या संकेत हैं। सृष्टि के प्रारम्भ में इन्हीं तीन नामों के द्वारा ब्राह्मण (वेदों के ज्ञाता), वेद और यज्ञों की रचना हुई।

The Lord reveals the significance of "Om Tat Sat". These three words are the threefold designation of the Supreme Brahman. In ancient times, by these were created the Brahmins, the Vedas, and the sacrifices.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 17: श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 23 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 23/28 82% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!