श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 17 (श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 17 · श्लोक 20

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 28 25 मिनट का पठन 142 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे। देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥२०॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
दातव्यम्
fit to be given
इति
thus
यत्
which
दानम्
charity
दीयते
is given
अनुपकारिणे
to one who does no service in return
देशे
at the proper place
काले
at the proper time
च
and
पात्रे
to a worthy person
च
and
तत्
that
दानम्
charity
सात्त्विकम्
sattvic
स्मृतम्
is considered.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो दान उपकार की आशा बिना, केवल "देना कर्तव्य है" ऐसे भाव से, उचित देश, काल और पात्र को दिया जाता है – वह दान सात्त्विक कहा गया है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

सात्त्विक दान का महात्म्य - श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय १७, श्लोक २०

आध्यात्मिक प्रस्तावना: भारतीय संस्कृति में 'दान' को केवल भौतिक वस्तुओं का हस्तांतरण नहीं, बल्कि आत्मा के विस्तार की एक प्रक्रिया माना गया है। श्रीमद्भगवद्गीता के १७वें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने दान को तीन श्रेणियों में विभाजित किया है—सात्त्विक, राजसिक और तामसिक। इनमें 'सात्त्विक दान' को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। यह दान अहंकार के विसर्जन और परोपकार की पराकाष्ठा है। जब मनुष्य किसी वस्तु को 'मेरा' मानने के मोह से मुक्त होकर, उसे केवल अपना कर्तव्य समझकर, बिना किसी प्रतिफल की आकांक्षा के किसी योग्य पात्र को समर्पित करता है, तो वह दान सात्त्विक कहलाता है।

सात्त्विक दान का ब्रह्मांडीय महत्व अत्यंत गहरा है। यह दान दाता के अंतःकरण को शुद्ध करता है और उसे कर्मफल के बंधन से मुक्त करने में सहायक होता है। वेदों और उपनिषदों में दान को 'यज्ञ' का ही एक स्वरूप माना गया है। जब हम उचित स्थान (जैसे तीर्थ), उचित समय (जैसे ग्रहण या पर्व) और उचित पात्र (जैसे विद्वान ब्राह्मण या अभावग्रस्त साधक) को दान देते हैं, तो वह दान ब्रह्मांड की सकारात्मक ऊर्जा के साथ जुड़ जाता है। यह न केवल लेने वाले का कल्याण करता है, बल्कि देने वाले के चित्त में सात्त्विकता का संचार करता है, जिससे व्यक्ति के भीतर दैवीय गुणों का उदय होता है। यह दान ही है जो मनुष्य को संकीर्णता से उठाकर व्यापकता की ओर ले जाता है, जहाँ 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना चरितार्थ होती है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥२०॥


श्लोक का उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक अक्षर का स्पष्ट उच्चारण करें। 'दातव्यम्' में अनुस्वार का ध्यान रखें। 'अनुपकारिणे' शब्द में परोपकार की भावना को हृदयंगम करें। इसे प्रतिदिन प्रातःकाल ध्यान मुद्रा में बैठकर तीन बार पाठ करने से मन में दान की सात्त्विक वृत्ति जागृत होती है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि दान देना कोई एहसान नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक उत्तरदायित्व है जिसे हमें कृतज्ञता के साथ पूर्ण करना चाहिए।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
दातव्यम्देना चाहिएयह कर्तव्य का बोध है, न कि इच्छा का।
इतिऐसा मानकरदान को एक पवित्र संकल्प के रूप में देखना।
यद्दानम्जो दानदान की क्रिया जो निष्काम भाव से की जाए।
दीयतेदिया जाता हैसमर्पण की भावना से युक्त क्रिया।
अनुपकारिणेजिससे उपकार न हो सकेबिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के दान।
देशेउचित स्थान परपवित्रता और सात्त्विकता का स्थान।
कालेउचित समय परदान के लिए शुभ और उपयुक्त अवसर।
पात्रेयोग्य व्यक्ति कोपात्रता का विवेक (ज्ञान और आवश्यकता)।
सात्त्विकम्सात्त्विकगुणों में श्रेष्ठ, प्रकाश और शांति का प्रतीक।
स्मृतम्माना गया हैशास्त्रों और ऋषियों का सर्वसम्मत निर्णय।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

सात्त्विक दान की अवधारणा का मूल महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेशों में निहित है। जब अर्जुन ने दान और त्याग के विषय में जिज्ञासा प्रकट की, तब भगवान ने स्पष्ट किया कि दान का फल उसके देने के तरीके पर निर्भर करता है। पौराणिक कथाओं में राजा बलि का उदाहरण अत्यंत प्रासंगिक है। यद्यपि राजा बलि असुर कुल के थे, किंतु उनका दान 'सात्त्विक' था। जब भगवान विष्णु वामन अवतार लेकर आए, तो बलि ने यह जानते हुए भी कि वे स्वयं भगवान हैं और उनका सर्वस्व ले लेंगे, बिना किसी संकोच के अपना सब कुछ दान कर दिया। यह 'अनुपकारिणे' का श्रेष्ठ उदाहरण है, जहाँ दाता ने यह नहीं देखा कि उसे क्या मिलेगा, बल्कि यह देखा कि पात्र (भगवान) की आवश्यकता क्या है।

इसी प्रकार, कर्ण का दान भी सात्त्विक दान की श्रेणी में आता है। कर्ण ने अपने कवच और कुंडल तब दान किए जब उसे पता था कि इसके बिना उसकी मृत्यु निश्चित है। यहाँ 'देश, काल और पात्र' का पूर्ण विवेक था। शास्त्रों में कहा गया है कि दान वही है जो गुप्त रूप से दिया जाए। 'एक हाथ से दिया गया दान दूसरे हाथ को पता न चले'—यही सात्त्विक दान की कसौटी है। वेदों में अग्नि को दान का देवता माना गया है, क्योंकि अग्नि में जो भी आहुति दी जाती है, वह शुद्ध होकर देवत्व को प्राप्त होती है। सात्त्विक दान भी हमारे भीतर की अग्नि को प्रज्वलित करता है, जिससे हमारे अहंकार का भस्म होना निश्चित है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि दान केवल भौतिक वस्तु नहीं, बल्कि प्रेम और करुणा का प्रवाह है जो दाता और ग्रहीता दोनों को जोड़ता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • अहंकार का शमन: नियमित पाठ से 'मैं दे रहा हूँ' का भाव समाप्त होकर 'ईश्वर दे रहा है' का भाव जागृत होता है।
  • मानसिक शांति: निष्काम भाव से दान करने की प्रेरणा मिलने से मन में ईर्ष्या, द्वेष और लोभ का नाश होता है।
  • सकारात्मक आभा (Aura): सात्त्विक दान करने वाले व्यक्ति के चारों ओर एक दिव्य और शांत आभा का निर्माण होता है।
  • कर्मिक शुद्धि: यह श्लोक पुराने संचित कर्मों के प्रभाव को कम करने और नए शुभ कर्मों के बीज बोने में सहायक है।
  • विवेक की जागृति: उचित पात्र और समय का ज्ञान होने से व्यक्ति के निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि होती है।
  • दैवीय कृपा: सात्त्विक दान करने वाले पर ईश्वर की कृपा सदैव बनी रहती है, क्योंकि वह ईश्वर के ही अंश को दान दे रहा होता है।
  • आंतरिक संतोष: सांसारिक वस्तुओं के प्रति मोह कम होता है और व्यक्ति को आत्मिक संतुष्टि प्राप्त होती है।
  • सामाजिक सामंजस्य: जब समाज में सात्त्विक दान की भावना बढ़ती है, तो समाज में प्रेम और सहयोग का वातावरण निर्मित होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री 'श्रीमद्भगवद्गीता' के १७वें अध्याय (श्रद्धात्रयविभागयोग) के श्लोक २० पर आधारित है। इसे Bhaktilok.in के मुख्य विद्वानों द्वारा शास्त्रीय ग्रंथों, जैसे कि शंकराचार्य भाष्य और गीता प्रेस की टीकाओं के संदर्भ में 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' के रूप में प्रस्तुत किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को सनातन धर्म के गूढ़ सिद्धांतों को सरल और प्रामाणिक भाषा में उपलब्ध कराना है। यह लेख किसी भी प्रकार के अंधविश्वास से परे, पूर्णतः शास्त्र-सम्मत और तार्किक आधार पर तैयार किया गया है ताकि साधक अपने जीवन में सात्त्विक दान के महत्व को समझ सकें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

सात्त्विक दान कर्तव्य भाव से किया जाता है, जबकि राजसिक दान प्रशंसा या प्रतिफल की इच्छा से और तामसिक दान अपमानजनक तरीके से या गलत पात्र को दिया जाता है।

नहीं, दान ज्ञान, समय, सेवा, भोजन और अभय (किसी को डर से मुक्त करना) का भी हो सकता है। सात्त्विक दान में वस्तु का मूल्य नहीं, भावना का मूल्य होता है।

पात्र वह है जिसे वास्तव में आवश्यकता हो और जो उस दान का उपयोग धर्म और लोक कल्याण के लिए करे। विद्वान, साधु और अभावग्रस्त व्यक्ति को दान देना श्रेष्ठ माना गया है।

शास्त्रों के अनुसार, दान देने से दरिद्रता नहीं आती, बल्कि लक्ष्मी का प्रवाह बढ़ता है। जो संचय करता है, वह रुक जाता है; जो दान करता है, वह नदी की तरह बहता रहता है।

हाँ, गुप्त दान अहंकार को नष्ट करने में सबसे अधिक प्रभावी है। जब कोई नहीं जानता कि दान किसने दिया, तो दाता के मन में 'मैंने दिया' का भाव नहीं आता, जो सात्त्विकता की पराकाष्ठा है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान् अब दान के तीन प्रकार बताते हैं। सात्त्विक दान वह है जो बिना किसी बदले की भावना के, केवल इसलिए दिया जाता है कि देना कर्तव्य है। वह उचित स्थान पर, उचित समय पर और योग्य पात्र को दिया जाता है।

The Lord now describes the threefold charity. Sattvic charity is that which is given without any expectation of return, with the sense that it is one's duty, and it is given at the right place, at the right time, and to a worthy person.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 17: श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 20 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 20/28 71% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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