श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 17 (श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 17 · श्लोक 21

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 28 25 मिनट का पठन 141 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः। दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्॥२१॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
यत्
which
तु
but
प्रत्युपकारार्थम्
for the sake of getting something in return
फलम्
fruit
उद्दिश्य
aiming at
वा
or
पुनः
again
दीयते
is given
च
and
परिक्लिष्टम्
grudgingly
तत्
that
दानम्
charity
राजसम्
rajasic
स्मृतम्
is considered.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

परन्तु जो दान बदले की भावना से, या फल की इच्छा से, या कष्ट (अरुचि) के साथ दिया जाता है – वह दान राजस कहा गया है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

राजस दान का आध्यात्मिक विश्लेषण - श्रीमद्भगवद्गीता

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

दान भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म का एक आधारभूत स्तंभ है। वेदों से लेकर उपनिषदों तक, दान को केवल भौतिक वस्तु का स्थानांतरण नहीं, बल्कि आत्मा के विस्तार की प्रक्रिया माना गया है। श्रीमद्भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने दान को तीन श्रेणियों में विभाजित किया है—सात्विक, राजस और तामस। 'राजस दान' का विषय अत्यंत सूक्ष्म और मनोवैज्ञानिक है। यह दान उस मानवीय प्रवृत्ति को दर्शाता है जहाँ व्यक्ति 'स्व' के अहंकार और 'प्रतिफल' की लालसा से बंधा होता है।

ब्रह्मांडीय दृष्टिकोण से देखें, तो दान का उद्देश्य 'अहं' का विसर्जन है। जब हम राजस भाव से दान करते हैं, तो हम वास्तव में दान नहीं कर रहे होते, बल्कि एक 'सौदा' कर रहे होते हैं। यह ब्रह्मांड के 'लेन-देन' के नियम (Law of Reciprocity) का एक निम्न स्तर है। राजस दान में व्यक्ति की ऊर्जा 'अपेक्षा' (Expectation) में उलझ जाती है, जिससे वह दान का फल तो प्राप्त कर सकता है, परंतु वह 'मोक्ष' या 'आत्म-शुद्धि' के मार्ग से दूर हो जाता है। सांस्कृतिक रूप से, राजस दान को समाज में प्रतिष्ठा पाने का एक माध्यम माना गया है, जहाँ दानदाता अपनी उदारता का प्रदर्शन करके अपनी सामाजिक स्थिति को सुदृढ़ करना चाहता है। यह श्लोक हमें आत्म-अवलोकन के लिए प्रेरित करता है कि क्या हमारा दान निस्वार्थ है या हम किसी अदृश्य प्रतिफल की प्रतीक्षा में हैं।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः।

दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्॥२१॥

उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक अक्षर की स्पष्टता पर ध्यान देना चाहिए। 'यत्तु' में 'त्' का द्वित्व और 'परिक्लिष्टं' में 'क्लि' का उच्चारण शुद्ध होना चाहिए। यह श्लोक अनुष्टुप छंद में निबद्ध है, जो अपनी लयबद्धता के लिए जाना जाता है। इसे शांत चित्त होकर, अपनी सांसों को नियंत्रित करते हुए पढ़ना चाहिए ताकि शब्दों का कंपन आपके अंतर्मन में उतर सके।

व्याख्या: भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि दान की क्रिया मात्र वस्तु देने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके पीछे का 'भाव' ही उसे सात्विक, राजस या तामस बनाता है। राजस दान वह है जो प्रत्युपकार की आशा में, किसी फल की इच्छा से, या अरुचि एवं कष्ट के साथ दिया जाता है। यह दान न तो पूरी तरह त्याज्य है और न ही पूर्णतः प्रशंसनीय, क्योंकि यह कर्ता को संसार के चक्र में ही बांधे रखता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

पद / शब्दसरल हिंदी अर्थआध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
यत्तुजो दानवह क्रिया जो दान के रूप में की जा रही है।
प्रत्युपकारार्थम्बदले में उपकार की आशा सेअहंकार का वह रूप जो सेवा के बदले सेवा चाहता है।
फलमुद्दिश्यकिसी फल की इच्छा सेकर्मफल की आसक्ति, जो बंधन का मुख्य कारण है।
वा पुनःअथवाविकल्पों की ओर संकेत, जो मन की चंचलता दर्शाते हैं।
दीयतेदिया जाता हैदान की क्रिया, जो मन के भावों से संचालित है।
चऔरसमुच्चयबोधक, जो राजस दान के विभिन्न लक्षणों को जोड़ता है।
परिक्लिष्टम्कष्ट या अरुचि के साथमन की अनिच्छा, जो दान को अपवित्र बनाती है।
तद्दानम्वह दानराजस श्रेणी में आने वाला दान।
राजसम्राजसरजोगुण से उत्पन्न, जो चंचलता और आसक्ति का प्रतीक है।
स्मृतम्कहा गया हैशास्त्रों और ऋषियों द्वारा निर्धारित परिभाषा।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता के 17वें अध्याय का यह श्लोक 'श्रद्धात्रयविभागयोग' का हिस्सा है। इस अध्याय में अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा था कि जो लोग शास्त्रों के नियमों का पालन नहीं करते, परंतु फिर भी श्रद्धा के साथ पूजा या दान करते हैं, उनकी स्थिति क्या है? भगवान ने उत्तर देते हुए गुणों के आधार पर दान का वर्गीकरण किया।

पौराणिक संदर्भ में, दान की महिमा का वर्णन महाभारत के 'अनुशासन पर्व' में भी मिलता है। भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को दान के विभिन्न प्रकारों के बारे में विस्तार से बताया था। राजस दान का एक उत्कृष्ट उदाहरण हमें राजा बलि के प्रसंग में आंशिक रूप से देखने को मिलता है, जहाँ दान का उद्देश्य अपनी कीर्ति और यश का विस्तार करना था। यद्यपि राजा बलि दानी थे, परंतु जब दान में 'अहं' का समावेश हो जाता है, तो वह सात्विक न रहकर राजस हो जाता है।

शास्त्रों के अनुसार, दान का अर्थ है 'त्याग'। जब हम किसी को कुछ देते हैं, तो हम अपने स्वामित्व का त्याग करते हैं। यदि उस त्याग के बदले हम मन में यह सोचते हैं कि "अगली बार यह व्यक्ति मेरे काम आएगा" (प्रत्युपकार), तो वह दान 'व्यापार' बन जाता है। राजस दान का यह सिद्धांत हमें सिखाता है कि दान की शुद्धता केवल वस्तु की गुणवत्ता पर निर्भर नहीं करती, बल्कि दानदाता के मन की पवित्रता पर निर्भर करती है। यह श्लोक हमें सचेत करता है कि हम अपने जीवन में 'रजोगुण' के प्रभाव को पहचानें और धीरे-धीरे 'सत्व' की ओर अग्रसर हों।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

  • आत्म-अवलोकन की क्षमता: इस श्लोक का चिंतन करने से व्यक्ति अपने दैनिक कार्यों में छिपे स्वार्थ को पहचानने में सक्षम होता है।
  • अहंकार का शमन: जब हम यह समझते हैं कि राजस दान बंधन का कारण है, तो हम धीरे-धीरे निस्वार्थ भाव (सात्विक दान) की ओर बढ़ने लगते हैं।
  • मानसिक स्पष्टता: राजस दान से उत्पन्न होने वाली मानसिक अशांति और अपेक्षाओं का बोझ कम होता है, जिससे मन शांत रहता है।
  • कर्म की शुद्धि: यह श्लोक हमें सिखाता है कि कैसे अपने कर्मों को 'निष्काम' बनाया जाए, जो आध्यात्मिक उन्नति के लिए अनिवार्य है।
  • सकारात्मक आभा (Aura): निस्वार्थ दान से उत्पन्न सकारात्मक ऊर्जा व्यक्ति के व्यक्तित्व को तेजस्वी बनाती है।
  • ईश्वरीय कृपा का अनुभव: जब दान में अपेक्षा का अभाव होता है, तो व्यक्ति को ईश्वरीय अनुग्रह का अनुभव सहज ही होने लगता है।
  • सामाजिक संबंधों में सुधार: अपेक्षाओं के बिना किए गए व्यवहार से संबंधों में मधुरता आती है और कटुता समाप्त होती है।
  • मोक्ष का मार्ग: गुणों के प्रभाव को समझकर उनसे ऊपर उठना ही मोक्ष का प्रथम सोपान है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

यह सामग्री श्रीमद्भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय के 21वें श्लोक पर आधारित है। इसे 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' के अंतर्गत रखा गया है, जिसमें गीता प्रेस गोरखपुर के प्रामाणिक संस्करणों और भाष्यकारों के सिद्धांतों का समन्वय किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को शास्त्र सम्मत ज्ञान प्रदान करना है ताकि वे अपने आध्यात्मिक जीवन में स्पष्टता ला सकें। यह लेख किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देता, बल्कि आत्म-चिंतन और विवेकपूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा देता है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

राजस दान पाप नहीं है, परंतु यह आध्यात्मिक उन्नति में बाधक है। यह व्यक्ति को संसार के चक्र में बांधे रखता है। शास्त्र इसे 'अपूर्ण' मानते हैं क्योंकि इसमें सात्विक भाव का अभाव होता है।

सात्विक दान बिना किसी अपेक्षा के, सही समय और स्थान पर, योग्य व्यक्ति को दिया जाता है। इसके विपरीत, राजस दान में फल की इच्छा, प्रतिफल की आशा या मन में कष्ट का भाव होता है।

हाँ, यदि दान देते समय मन में अरुचि है या ऐसा लग रहा है कि यह वस्तु मेरे पास होती तो अच्छा था, तो वह दान राजस श्रेणी में आता है। दान सदैव प्रसन्न मन से होना चाहिए।

निश्चित रूप से। जब हम अपने दान के पीछे के उद्देश्य को 'स्वार्थ' से हटाकर 'ईश्वर सेवा' या 'परोपकार' की ओर मोड़ते हैं, तो वह धीरे-धीरे सात्विक दान में परिवर्तित होने लगता है।

शास्त्रों के अनुसार, दान का कोई निश्चित समय नहीं होता, परंतु जब भी कोई पात्र व्यक्ति सामने आए और मन में करुणा का भाव हो, वही दान का उत्तम समय है। दान गुप्त रूप से और विनम्रता के साथ करना चाहिए।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

राजस दान वह है जो बदले में कुछ पाने की इच्छा से, या किसी फल (पुण्य, लाभ) की आशा से दिया जाता है, या जिसे देते समय दिल में कष्ट या अरुचि होती है (जैसे मजबूरी में देना)।

Rajasic charity is that which is given with the expectation of something in return, or with the aim of gaining some reward, or which is given reluctantly and with a feeling of distress.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 17: श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 21 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 21/28 75% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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