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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 17 · श्लोक 21

अध्याय 17 · श्लोक 21

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः। दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्॥२१॥

yat tu pratyupakārārthaṁ phalam uddiśya vā punaḥ | dīyate ca parikliṣṭaṁ tad dānaṁ rājasaṁ smṛtam ||21||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

यत्: which; तु: but; प्रत्युपकारार्थम्: for the sake of getting something in return; फलम्: fruit; उद्दिश्य: aiming at; वा: or; पुनः: again; दीयते: is given; च: and; परिक्लिष्टम्: grudgingly; तत्: that; दानम्: charity; राजसम्: rajasic; स्मृतम्: is considered.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

परन्तु जो दान बदले की भावना से, या फल की इच्छा से, या कष्ट (अरुचि) के साथ दिया जाता है – वह दान राजस कहा गया है।

English Translation

But that gift which is given with a view to receive something in return, or looking for a reward, or which is given reluctantly – that charity is considered rajasic.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

राजस दान वह है जो प्रत्युपकार की आशा में, किसी फल की इच्छा से, या अरुचि एवं कष्ट के साथ दिया जाता है। Rajasic charity is given with the expectation of something in return, or for the sake of a reward, or with reluctance, and is impure in motive.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।