श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 8

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 38 मिनट का पठन 142 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् । प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥ ८॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
तमः
तमोगुण
तु
तो
अज्ञानजम्
अज्ञान से उत्पन्न
विद्धि
जानो
मोहनम्
मोहित करने वाला
सर्वदेहिनाम्
सब देहधारियों को
प्रमाद-आलस्य-निद्राभिः
प्रमाद, आलस्य और निद्रा से
तत्
वह
निबध्नाति
बांधता है
भारत
हे भारत।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे भारत! तमोगुण को अज्ञान से उत्पन्न और सब देहधारियों को मोहित करने वाला जानो। वह प्रमाद, आलस्य और निद्रा के द्वारा बांधता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय संदर्भ

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में 'श्रीमद्भगवद्गीता' को न केवल एक धार्मिक ग्रंथ, बल्कि मानव जीवन के प्रत्येक संशय को भेदने वाले सर्वोच्च ज्ञान-विज्ञान के रूप में देखा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेश में प्रकृति के तीन गुणों—सत्व, रज और तम—का अत्यंत सूक्ष्म और वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। मनुष्य की चेतना, उसके कर्म, उसकी विचार शैली और उसकी संपूर्ण जीवन-यात्रा इन्हीं तीनों गुणों के संतुलन या असंतुलन पर निर्भर करती है। इस शृंखला में चौदहवें अध्याय (गुणात्रयविभाग योग) का यह अष्टम श्लोक 'तमोगुण' के आवरण, उसके प्रभावों और जीव की आत्मा को जकड़ने वाले उसके सूक्ष्म पाशों को अत्यंत स्पष्टता से उजागर करता है।

ब्रह्मांडीय सृष्टि में जब चेतना का स्तर पतन की ओर अग्रसर होता है, तब 'तमस्' (तमोगुण) अपनी चरम सीमा पर सक्रिय होता है। यह वह अंधकार है जो मनुष्य के भीतर के दिव्य प्रकाश को आच्छादित कर देता है, जिससे सत्य और असत्य, कर्तव्य और अकर्तव्य, तथा धर्म और अधर्म का विवेक समाप्त हो जाता है। आधुनिक युग में जहाँ भौतिकता की दौड़ ने मानसिक अवसाद, सुस्ती, अज्ञान और कर्तव्यहीनता को जन्म दिया है, वहाँ इस श्लोक की प्रासंगिकता और भी अधिक बढ़ जाती है। यह श्लोक हमें सचेत करता है कि कैसे अज्ञानजनित मोह हमारे भीतर प्रमाद, आलस्य और अति-निद्रा के रूप में घर कर लेता है और हमें उन्नति के मार्ग से भटका देता है।

भक्तिलोक (Bhaktilok.in) के इस समर्पित अंक में हम इसी गूढ़ श्लोक का प्रामाणिक, व्याकरणिक, दार्शनिक और व्यावहारिक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं। हमारा उद्देश्य प्रत्येक साधक को तमोगुण के बंधनों से मुक्त कराकर सात्त्विक चेतना की ओर उन्मुख करना है, ताकि जीवन में परम शांति, आध्यात्मिक जागृति और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त हो सके।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् ।

प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥ ८॥

श्लोकोच्चारण एवं पाठ विधि

इस श्लोक का पाठ प्रातःकाल ब्रह्म बेला में अथवा संध्यावंदन के समय शांत मन से करना चाहिए। उच्चारण करते समय प्रत्येक पद की मात्रा और स्वर का विशेष ध्यान रखें ताकि कंपन से सूक्ष्म ऊर्जा का संचार हो सके।

अध्याय १४, श्लोक ८ गीता प्रेस गोरखपुर प्रमाणित
श्लोक का अन्वय:

हे भारत! तमः तु अज्ञानजं विद्धि, सर्वदेहिनाम् मोहनम् (तत्) प्रमाद-आलस्य-निद्राभिः निबध्नाति।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

गीता के प्रत्येक शब्द में अगाध ज्ञान छिपा है। नीचे दी गई तालिका में इस श्लोक के प्रत्येक पद का सरल हिंदी अर्थ तथा उसका गहरा आध्यात्मिक व दार्शनिक भावार्थ प्रस्तुत किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
तमः (Tamah) तमोगुण, अंधकार यह प्रकृति का वह तीसरा गुण है जो अज्ञानता, जड़ता और प्रकाश के अभाव का प्रतीक है।
तु (Tu) निश्चय ही, लेकिन यह अव्यय पिछले गुणों (सत्व और रज) से तमोगुण की भिन्नता और उसकी विशिष्ट प्रकृति को रेखांकित करता है।
अज्ञानजम् (Ajnanajam) अज्ञान से उत्पन्न यह गुण ज्ञान के प्रकाश के बिना पनपता है; जहाँ विवेक का अभाव होता है, वहीं तमोगुण का जन्म होता है।
विद्धि (Viddhi) तू ऐसा जान भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को स्पष्ट आदेश दे रहे हैं कि इस तथ्य को भ्रमरहित होकर भली-भांति समझो।
मोहनम् (Mohanam) मोह पैदा करने वाला यह मनुष्य की बुद्धि को भ्रमित कर देता है, जिससे सही और गलत का भेद समाप्त हो जाता है।
सर्वदेहिनाम् (Sarvadehinam) समस्त शरीरधारियों (जीवों) के लिए यह मोह केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि शरीर धारण करने वाले प्रत्येक जीव को प्रभावित करता है।
प्रमाद (Pramada) सावधानी हटने की स्थिति, प्रमाद अपने कर्तव्य के प्रति असावधान हो जाना, भूल करना और महत्वपूर्ण उत्तरदायित्वों की उपेक्षा करना।
आलस्य (Alasya) सुस्ती, कर्महीनता शारीरिक और मानसिक ऊर्जा के होते हुए भी कार्य करने की इच्छा का अभाव और लगातार टालमटोल करना।
निद्राभिः (Nidrabhih) निद्रा (अति-सोने) के द्वारा आवश्यकता से अधिक सोना या चेतना के स्तर को सुसुप्त अवस्था में रखना, जिससे समय व्यर्थ होता है।
तत् (Tat) वह तमोगुण उक्त सभी नकारात्मक लक्षणों का स्रोत वही प्रमुख अंधकारमय गुण है।
निबध्नाति (Nibandhnati) बांधता है आत्मा को उसकी अनंत स्वतंत्रता से वंचित कर संसार के बंधनों और कर्म-चक्र में जकड़ लेता है।
भारत (Bharata) हे भारत! (अर्जुन को संबोधन) भरतवंश के गौरवशाली वंशज को संबोधित करते हुए उसकी महान विरासत की याद दिलाना ताकि वह इस निकृष्ट गुण से ऊपर उठे।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय की पृष्ठभूमि कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में तैयार होती है, जहाँ कौरव और पाण्डव सेनाएं आमने-सामने खड़ी हैं। अर्जुन अपने सगे-सम्बन्धियों को देखकर विषाद से भर जाते हैं और युद्ध से विरत होने का निर्णय लेते हैं। तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें कर्म, धर्म, आत्मा की अमरता और प्रकृति के तीन गुणों (त्रिविध गुण) का रहस्य समझाते हैं। इसी क्रम में भगवान ने सत्व गुण (जो सुख और ज्ञान से बांधता है) और रज गुण (जो कामनाओं और कर्मों से बांधता है) का वर्णन करने के पश्चात, तमोगुण के इस अत्यंत खतरनाक और पतनकारी स्वरूप का उद्घाटन किया है।

पुराणों और वेदों में तमोगुण को 'तमस्' या 'अंधकार' कहा गया है, जिसका नियंत्रण भगवान शिव के संहारक स्वरूप या रुद्र रूपों से भी जोड़ा जाता है जहाँ जड़ता और विघटन आवश्यक होता है। परंतु व्यक्तिगत साधना और चेतना के विकास के मार्ग में यह सबसे बड़ा अवरोध है। महर्षि व्यास द्वारा रचित महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आने वाली गीता हमें यह सिखाती है कि कैसे देवता, असुर और मनुष्य सभी इन तीनों गुणों के प्रभाव में जीते हैं। अर्जुन को 'भारत' कहकर संबोधित करना इस बात का प्रतीक है कि वे महान भारतवर्ष के ज्ञानवान और पराक्रमी वंशज हैं; अतः उन्हें तुच्छ आलस्य, अज्ञान और प्रमाद रूपी तमोगुण के वशीभूत नहीं होना चाहिए, बल्कि अपने क्षत्रिय धर्म और आत्मिक स्वरूप को पहचानना चाहिए।

वैदिक ऋषियों ने वेदों में तमोगुण से मुक्ति के लिए 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' (मुझे अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो) की प्रार्थना को सर्वोपरि माना है। यह श्लोक उसी वैदिक मंत्र का दार्शनिक विस्तार है, जो हमें बताता है कि अंधकार से मुक्ति का उपाय केवल ज्ञान के सूर्य को प्रज्वलित करना है।

मुख्य दार्शनिक बिंदु
  • 🔹 प्रकृति का बंधन: तीनों गुण आत्मा को जकड़ने वाली जंजीरें हैं।
  • 🔹 अज्ञान की जननी: तमोगुण से विवेक नष्ट होता है।
  • 🔹 कर्तव्य की उपेक्षा: प्रमाद और आलस्य मनुष्य को पंगु बनाते हैं।
  • 🔹 जागृति का आह्वान: साधक को सात्त्विकता की ओर बढ़ना चाहिए।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

गीता के इस विशिष्ट श्लोक का नियमित मनन, चिंतन और पाठ करने से साधक के जीवन में अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। यहाँ इसके 8 प्रमुख आध्यात्मिक और मानसिक लाभ दिए गए हैं:

1. मानसिक अड़चनों व आलस्य से मुक्ति

नियमित अध्ययन से शरीर और मन की सुस्ती दूर होती है, जिससे कार्यक्षमता में तीव्र वृद्धि होती है।

2. आंतरिक चेतना और विवेक का जागरण

अज्ञान का आवरण छंटता है और व्यक्ति सही तथा गलत का निर्णय पूरी स्पष्टता के साथ कर पाता है।

3. सकारात्मक ऊर्जा (Positive Aura) का विस्तार

तमोगुण जनित नकारात्मक विचार और अवसाद समाप्त होते हैं, जिससे चारों ओर सात्त्विक ऊर्जा फैलती है।

4. कर्म-शुद्धि और उत्तरदायित्व का बोध

प्रमाद और टालमटोल की आदत छूटती है, जिससे व्यक्ति अपने कर्तव्यों का निष्ठावान पालन करता है।

5. गाढ़ी और व्यर्थ निद्रा पर नियंत्रण

असमय और अत्यधिक सोने की प्रवृत्ति नियंत्रित होती है, जिससे ब्रह्मबेला का सदुपयोग संभव होता है।

6. karmic Purification (कर्म बंधनों से मुक्ति)

अज्ञानवश किए जाने वाले पापकर्मों और त्रुटियों से रक्षा होती है, क्योंकि विवेक जागृत रहता है।

7. भगवद् कृपा और आत्मिक शांति

भगवान श्रीकृष्ण के इस उपदेश को आत्मसात् करने से चित्त को अगाध शांति और ईश्वर की अनुभूति होती है।

8. मोह और भ्रम का नाश

संसार के असार पदार्थों में भटकने वाला मन ईश्वर और सत्य के मार्ग पर स्थिर हो जाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: भक्तिलok.in पर प्रस्तुत यह आलेख वेदों, उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता (शंकराचार्य भाष्य और गीता प्रेस संस्करण के संदर्भों सहित) तथा सनातन धर्म के स्थापित ग्रंथों के गहन अध्ययन के पश्चात हमारे विद्वान संस्कृत भाषाविदों और आध्यात्मिक आचार्यों द्वारा तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को त्रुटिहीन, प्रामाणिक और उच्च कोटि की सामग्री प्रदान करना है। इस श्लोक की व्याख्या में व्याकरण के नियमों, शब्दों के मूल धातु और आर्ष परंपरा के अर्थों का पूर्ण ध्यान रखा गया है ताकि किसी भी प्रकार का संशय शेष न रहे। यदि आप अपनी आध्यात्मिक यात्रा को और अधिक सुदृढ़ करना चाहते हैं, तो इस श्लोक का दैनिक अभ्यास आपके जीवन में प्रकाश और चेतना का संचार करेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि तमोगुण मनुष्य के भीतर अज्ञान और मोह को उत्पन्न करता है। यह प्रमाद (असावधानी), आलस्य (कर्महीनता) और निद्रा (अति-सोने) के माध्यम से जीव की आत्मा को संसार के बंधनों में जकड़ लेता है। भगवान श्रीकृष्ण इसके माध्यम से साधक को इस अंधकारमय गुण से ऊपर उठकर सात्त्विक जीवन अपनाने की प्रेरणा देते हैं।

जब किसी व्यक्ति के जीवन में तमोगुण प्रधान होता है, तो उसे अत्यधिक नींद आना, किसी भी कार्य को करने में भारी आलस्य महसूस होना, अपने कर्तव्यों के प्रति उदासीन (प्रमाद) रहना, अज्ञानता में वृद्धि होना और हमेशा निराशा या भ्रम की स्थिति बने रहना—ये सभी इसके प्रमुख लक्षण हैं।

'भारत' शब्द का अर्थ है भरतवंश का वंशज, जो ज्ञान, पराक्रम और तेजस्विता के लिए प्रसिद्ध है। श्रीकृष्ण अर्जुन को यह संबोधन देकर उनके आंतरिक गौरव, उच्च कुल की मर्यादा और उनकी महान जिम्मेदारियों की याद दिलाते हैं, ताकि वे आलस्य और प्रमाद रूपी तमोगुण के आगे न झुकें बल्कि अपने कर्तव्यों का पालन करें।

तमोगुण के प्रभावों से मुक्ति पाने का उपाय सत्व गुण और ज्ञान काार्जन है। ब्रह्मबेला में उठना, नियमित योगासन व प्राणायाम करना, सात्त्विक आहार ग्रहण करना, भगवद्नाम का जप करना और स्वाध्याय (धार्मिक ग्रंथों का पठन) करना तमोगुण के अंधकार को समाप्त कर चेतना को प्रकाश की ओर ले जाता है।

अवश्य। श्रीमद्भगवद्गीता के प्रत्येक श्लोक का नियमित स्मरण या पाठ मंत्र की तरह कार्य करता है। इस श्लोक का दैनिक पाठ करने से मन में कुविचारों, सुस्ती और अज्ञान के प्रति जागरूकता बढ़ती है, जिससे साधक मानसिक रूप से अधिक सतर्क और ऊर्जावान महसूस करता है।

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"तमसो मा ज्योतिर्गमय" — असत्य से सत्य, अंधकार से प्रकाश की ओर।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं कि तमोगुण अज्ञान से उत्पन्न है और समस्त देहधारियों को मोहित करता है। हे भारत! यह प्रमाद, आलस्य और निद्रा के द्वारा जीव को बांधता है। Know Tamas as born of ignorance, deluding all embodied beings; it binds through heedlessness, laziness, and sleep.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

तमोगुण में व्यक्ति आलसी, अज्ञानी और मोहित रहता है। इससे ऊपर उठना आवश्यक है। Under Tamas, one remains lazy, ignorant, and deluded; one must rise above it.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 8 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 8/27 30% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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