श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 7

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 35 मिनट का पठन 141 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् । तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ॥ ७॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

9 पद
रजः
रज गुण
रागात्मकम्
राग (आसक्ति) स्वरूप
विद्धि
जानो
तृष्णा-सङ्ग-समुद्भवम्
तृष्णा और आसक्ति से उत्पन्न
तत्
वह
निबध्नाति
बांधता है
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
कर्मसङ्गेन
कर्मों के संग से
देहिनम्
शरीरी को।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे कुन्तीपुत्र! रजोगुण को रागात्मक (आसक्ति स्वरूप) जानो, जो तृष्णा और संग से उत्पन्न होता है। वह कर्मों के संग से देही को बाँधता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भक्तिलोक (Bhaktilok.in) के प्रधान देवर्षि विद्वान एवं संस्कृत भाषाविद् द्वारा प्रस्तुत भगवद्गीता के इस परम पावन श्लोक का विषद् अध्ययन

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्त्व

सनातन धर्म के सर्वोच्च ग्रंथ श्रीमद्भागवतगीता के चौदहवें अध्याय (गुणात्रयविभागयोग) का यह सप्तम श्लोक मानव जीवन के सबसे बड़े और सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक रहस्यों का पर्दाफाश करता है। ब्रह्मांड में जितनी भी ऊर्जा, चेतना और गतिविधियाँ हैं, वे सब प्रकृति के तीन मूलभूत गुणों—सत्त्व, रज और तम—के अधीन संचालित होती हैं। इन तीनों गुणों में से 'रजोगुण' (Rajas) को कर्म, वासना, तृष्णा और चंचलता का प्रतीक माना गया है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को संबोधित करते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि किस प्रकार मनुष्य की आंतरिक इच्छाएँ और अदम्य तृष्णाएँ उसे बाहरी संसार की भौतिक वस्तुओं के प्रति आसक्त कर देती हैं और अंततः उसे जन्म-मृत्यु के चक्र में बांध देती हैं।

भारतीय दर्शन में 'रजस्' शब्द का अर्थ केवल गति या कर्म नहीं है, बल्कि यह उस उत्तेजना, महत्वाकांक्षा और अंतहीन चाहत को दर्शाता है जो कभी शांत नहीं होती। जब एक साधारण मनुष्य किसी वस्तु, व्यक्ति या पद की प्राप्ति के लिए बेचैन होता है, तो वह वस्तुतः रजोगुण के प्रभाव में कार्य कर रहा होता है। यह श्लोक न केवल आध्यात्मिक साधकों के लिए, बल्कि आधुनिक युग के प्रत्येक उस व्यक्ति के लिए एक अचूक मार्गदर्शिका है जो मानसिक अशांति, तनाव, और अति-महत्वाकांक्षा के चक्रव्यूह में फंसा हुआ है। इस श्लोक की महत्ता इस बात में निहित है कि यह हमें हमारी कमजोरी के मूल कारण यानी 'तृष्णा' और 'आसक्ति' से परिचित कराता है, ताकि हम आत्म-अवलोकन (Introspection) के माध्यम से अपनी चेतना को ऊपर उठा सकें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ॥ ७॥

Rajo ragatmakam viddhi trshnasangasamudbhavam |
Tan nibadhnati kaunteya karmasangena dehinam || 7 ||

श्लोक पाठ की सरल विधि एवं आचरण:

इस श्लोक का नियमित उच्चारण और मनन प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में या संध्यावंदنا के समय करना अत्यंत फलदायी माना गया है। पाठ करने से पूर्व मन को शांत करें, भगवान श्रीकृष्ण के चतुर्भुज स्वरूप का ध्यान करें और श्लोक के प्रत्येक शब्द के अर्थ को अपने हृदय में उतारने का प्रयास करें। यह केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि अज्ञान के अंधकार को चीरने वाली एक ज्ञान-मशाल है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्रीमद्भागवतगीता के इस श्लोक के प्रत्येक पद की व्याकरणिक और दार्शनिक व्याख्या निम्नलिखित तालिका में प्रस्तुत है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
रजः (रजः) रजोगुण प्रकृति का वह गुण जो गतिशीलता, उष्णता, चंचलता और संसार के प्रति आकर्षण का मूल स्रोत है।
रागात्मकम् राग या आसक्ति स्वरूप यह स्वभाव से ही राग (मोह, प्रेम, खिंचाव) और इच्छाओं से परिपूर्ण है, जो बिना राग के नहीं टिक सकता।
विद्धि जानो / समझो भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को सचेत करते हुए कहते हैं कि हे पार्थ! इस वास्तविकता को भली-भांति जान लो।
तृष्णा पिपासु इच्छा / तृषा ऐसी अंतहीन प्यास जो कभी बुझती नहीं, बल्कि एक इच्छा पूरी होने पर और अधिक बढ़ जाती है।
सङ्ग आसक्ति / लगाव विषयों, वस्तुओं और व्यक्तियों के साथ मन का अति-समीप संबंध या उनके बिना न रह पाने की दुर्बलता।
समुद्भवम् उत्पन्न होने वाला यह तृष्णा और आसक्ति से ही जन्म लेता है और उन्हीं का पोषण पाकर और अधिक शक्तिशाली बनता है।
तत् वह रजोगुण वही उपर्युक्त प्रवृत्तियों से युक्त रजोगुण जीव को मानसिक रूप से जकड़ लेता है।
निबध्नाति बाँध देता है आत्मा की स्वतंत्रता को सीमित कर देता है और उसे कर्मफल के बंधनों में जकड़ देता है।
कौन्तेय हे कुंतीनंदन अर्जुन! कुंती पुत्र कहकर भगवान अर्जुन को उनके उच्च कुल, वीरता और महान दायित्व का स्मरण कराते हैं।
कर्मसङ्गेन कर्मों की आसक्ति से "मैं ही इस कर्म का कर्ता हूँ और मुझे इसका फल चाहिए" – इस प्रकार की स्वार्थी कर्म-भावना द्वारा।
देहिनम् देहधारी जीव को उस जीवात्मा को जो शरीर में निवास करती है और अपने वास्तविक स्वरूप (आत्मा) को भूल चुकी है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

महाभारत के कुरुक्षेत्र के मैदान में जब पांडव सेना और कौरव सेना आमने-सामने थीं, तब अर्जुन अपने सगे-सम्बन्धियों को देखकर मोहग्रस्त हो गए और उनका गांडीव हाथ से छूट गया। उस संकट की घड़ी में भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जो ज्ञान दिया, वह आज संपूर्ण मानव जाति के लिए 'श्रीमद्भागवतगीता' के रूप में उपलब्ध है। चौदहवें अध्याय में महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित इन श्लोकों के माध्यम से त्रिगुणात्मक संसार का सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है।

पौराणिक कथाओं और सांख्य दर्शन के अनुसार, संपूर्ण सृष्टि 'प्रकृति' और 'पुरुष' के संयोग से चलती है। प्रकृति के ये तीन गुण (सत्त्व, रज, तम) रस्सियों के तीन अलग-अलग धागों की भाँति हैं जो जीव को बांधे रखते हैं। रजोगुण का इतिहास इस सृष्टि के आदिकाल से जुड़ा हुआ है जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना का संकल्प लिया था। रचना करने के लिए गति, ऊर्जा और तीव्र इच्छा की आवश्यकता होती है, जो रजोगुण से ही प्राप्त होती है। परंतु जब यही ऊर्जा अनियंत्रित हो जाती है, तब यह सृजन के स्थान पर बंधन का कारण बन जाती है।

महर्षि वेद व्यास ने महाभारत और विभिन्न पुराणों में बार-बार इस बात पर बल दिया है कि मनुष्य की सबसे बड़ी शत्रु बाहर कोई राक्षसी शक्ति नहीं, बल्कि उसके अपने भीतर बैठी हुई 'अतृप्त तृष्णा' (Desire) है। ऋषि मुनियों ने अपनी तपस्या के बल पर यह अनुभव किया कि जब तक मनुष्य रजोगुण के इस पाश (फंदे) से मुक्त नहीं होता, तब तक उसे मोक्ष या आत्यंतिक शांति की प्राप्ति नहीं हो सकती। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यही समझाते हैं कि युद्ध करना तुम्हारा कर्तव्य है, परंतु उस युद्ध में या किसी भी कर्म में रजोगुण जनित 'फल की आसक्ति' से मुक्त होकर कार्य करो, तभी तुम इस बंधन को काट सकोगे।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भागवतगीता के चौदहवें अध्याय के इस सातवें श्लोक का नियमित पठन, मनन और इसके अर्थ को जीवन में उतारने से निम्नलिखित आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • मानसिक शांति और स्थिरता: तृष्णा और अति-महत्वाकांक्षा के कम होने से मन की विचलित अवस्था शांत होती है और आंतरिक स्थिरता प्राप्त होती है।
  • सकारात्मक और सात्त्विक आभा (Aura): रजोगुण के अतिरेक पर नियंत्रण पाने से शरीर और मन में सत्त्वगुण का उदय होता है, जिससे सकारात्मक ऊर्जा का विस्तार होता है।
  • कर्मफलों के बंधन से मुक्ति: कर्मों में आसक्ति समाप्त होने से मनुष्य निष्काम कर्मयोग की ओर अग्रसर होता है, जिससे नए कर्मबंध नहीं बनते।
  • तनाव और चिंता का नाश: भविष्य की अनिश्चितता और पाने की अंधी दौड़ से उत्पन्न होने वाले मानसिक अवसाद (Depression) का शमन होता है।
  • आत्म-नियंत्रण और विवेक वृद्धि: व्यक्ति को यह स्पष्ट रूप से समझ आने लगता है कि कौन सा कार्य उसकी आत्मा के कल्याण के लिए उचित है और कौन सा नहीं।
  • दिव्य कृपा की प्राप्ति: अहंकार और स्वार्थी वासनाओं के घटने से भगवान की अहैतुर्जी कृपा और भक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
  • शुद्ध कर्म चेतना: हर कार्य को परमात्मा की सेवा मानकर करने की प्रवृत्ति विकसित होती है, जिससे समाज और परिवार में सद्भाव बढ़ता है।
  • मोक्ष मार्ग का प्रशस्त होना: जन्म-मृत्यु के इस चक्रव्यूह से निकलने की वास्तविक युक्ति साधक के भीतर उतर जाती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context)

भक्तिलोक (Bhaktilok.in) के इस आलेख को तैयार करते समय उच्च कोटि की शास्त्रीय प्रमाणिकता, संस्कृत व्याकरण की शुद्धता और आधुनिक मनोविज्ञान के समन्वय का विशेष ध्यान रखा गया है। यह सामग्री श्रीमद्भागवतगीता (शंकराचार्य भाष्य और रामानुज भाष्य के संदर्भ सहित) तथा महर्षि वेद व्यास रचित महाभारत के मूल ग्रंथों पर आधारित है। हमारे विद्वान संपादकों और संस्कृत भाषाविदों ने यह सुनिश्चित किया है कि आधुनिक पाठकों को सनातन संस्कृति का यह गूढ़ ज्ञान अत्यंत सरल, सहज और प्रामाणिक हिंदी में प्राप्त हो सके। यह पूर्णतः संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जो पाठकों के आध्यात्मिक उत्थान के लिए समर्पित है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

रजोगुण का मुख्य लक्षण तीव्र इच्छा (राग), वासना और अंतहीन तृष्णा है। यह व्यक्ति को किसी वस्तु, पद या व्यक्ति के प्रति अत्यधिक आसक्त कर देता है और उससे जुड़े कर्मों में ऐसा उलझाता है कि मनुष्य स्वार्थी बनकर केवल फल की प्राप्ति के लिए कार्य करने लगता है। यही आसक्ति और कर्मफल की चाहत उसे बार-बार जन्म और मरण के बंधन में बांध देती है।

पूर्ण रूप से आधुनिक समाज में कर्म या गति (जो रजोगुण का हिस्सा है) के बिना रहना असंभव है। परंतु भगवान श्रीकृष्ण का संदेश यह है कि हमें कर्म करना छोड़ना नहीं है, बल्कि 'कर्मफल की आसक्ति' और 'अतृप्त तृष्णा' का त्याग करना है। जब हम निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हैं, तब रजोगुण के बंधन का प्रभाव क्षीण हो जाता है।

शारीरिक और जीवन के निर्वाह के लिए आवश्यक चाहत को सामान्य आवश्यकता या इच्छा कहा जा सकता है, जो सीमित होती है। इसके विपरीत, 'तृष्णा' वह अदम्य और कभी न बुझने वाली प्यास है जो एक इच्छा पूरी होने पर दस और नई इच्छाओं को जन्म देती है। तृष्णा हमेशा असंतोष और लालच को बढ़ावा देती है, जो मानसिक अशांति का प्रमुख कारण है।

श्रीमद्भागवतगीता का चौदहवां अध्याय 'गुणात्रयविभागयोग' के नाम से प्रसिद्ध है। इसमें प्रकृति के तीनों गुणों—सत्त्व, रज और तम—का विस्तृत वर्णन किया गया है। यह अध्याय बताता है कि ये तीनों गुण कैसे कार्य करते हैं, मनुष्य को कैसे बांधते हैं, और इन गुणों से परे यानी 'गुणातीत' स्थिति को प्राप्त करके मोक्ष कैसे प्राप्त किया जा सकता है।

जब भी आपके मन में किसी वस्तु या पद को पाने की अत्यधिक बेचैनी या लालसा उत्पन्न हो, तब इस श्लोक का स्मरण करें। अपने आपसे पूछें कि क्या यह इच्छा तृष्णा के कारण है? इस आत्म-विश्लेषण से आपकी वासनाएँ शांत होंगी, आप अपने कर्मों में संतुलन बना सकेंगे और तनावमुक्त होकर जीवन जी सकेंगे।

© सर्वाधिकार सुरक्षित Bhaktilok.in | सनातन संस्कृति और प्रामाणिक आध्यात्मिक ज्ञान का विश्वस्त मंच

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं कि रजोगुण आसक्ति स्वरूप है, तृष्णा और संग से उत्पन्न होता है। हे कौन्तेय! यह कर्मों के संग से देही को बांधता है। Know Rajas as passionate, born of desire and attachment; it binds the embodied soul through attachment to action.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

रजोगुण में रहकर व्यक्ति सदा कर्मों में व्यस्त रहता है और फल की आकांक्षा करता है, जिससे बंधन होता है। Under the influence of Rajas, one remains constantly engaged in actions with desire, leading to bondage.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 7 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 7/27 26% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!