पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
9 पदश्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हे कुन्तीपुत्र! रजोगुण को रागात्मक (आसक्ति स्वरूप) जानो, जो तृष्णा और संग से उत्पन्न होता है। वह कर्मों के संग से देही को बाँधता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भक्तिलोक (Bhaktilok.in) के प्रधान देवर्षि विद्वान एवं संस्कृत भाषाविद् द्वारा प्रस्तुत भगवद्गीता के इस परम पावन श्लोक का विषद् अध्ययन
आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्त्व
सनातन धर्म के सर्वोच्च ग्रंथ श्रीमद्भागवतगीता के चौदहवें अध्याय (गुणात्रयविभागयोग) का यह सप्तम श्लोक मानव जीवन के सबसे बड़े और सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक रहस्यों का पर्दाफाश करता है। ब्रह्मांड में जितनी भी ऊर्जा, चेतना और गतिविधियाँ हैं, वे सब प्रकृति के तीन मूलभूत गुणों—सत्त्व, रज और तम—के अधीन संचालित होती हैं। इन तीनों गुणों में से 'रजोगुण' (Rajas) को कर्म, वासना, तृष्णा और चंचलता का प्रतीक माना गया है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को संबोधित करते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि किस प्रकार मनुष्य की आंतरिक इच्छाएँ और अदम्य तृष्णाएँ उसे बाहरी संसार की भौतिक वस्तुओं के प्रति आसक्त कर देती हैं और अंततः उसे जन्म-मृत्यु के चक्र में बांध देती हैं।
भारतीय दर्शन में 'रजस्' शब्द का अर्थ केवल गति या कर्म नहीं है, बल्कि यह उस उत्तेजना, महत्वाकांक्षा और अंतहीन चाहत को दर्शाता है जो कभी शांत नहीं होती। जब एक साधारण मनुष्य किसी वस्तु, व्यक्ति या पद की प्राप्ति के लिए बेचैन होता है, तो वह वस्तुतः रजोगुण के प्रभाव में कार्य कर रहा होता है। यह श्लोक न केवल आध्यात्मिक साधकों के लिए, बल्कि आधुनिक युग के प्रत्येक उस व्यक्ति के लिए एक अचूक मार्गदर्शिका है जो मानसिक अशांति, तनाव, और अति-महत्वाकांक्षा के चक्रव्यूह में फंसा हुआ है। इस श्लोक की महत्ता इस बात में निहित है कि यह हमें हमारी कमजोरी के मूल कारण यानी 'तृष्णा' और 'आसक्ति' से परिचित कराता है, ताकि हम आत्म-अवलोकन (Introspection) के माध्यम से अपनी चेतना को ऊपर उठा सकें।
संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ॥ ७॥
Rajo ragatmakam viddhi trshnasangasamudbhavam |
Tan nibadhnati kaunteya karmasangena dehinam || 7 ||
श्लोक पाठ की सरल विधि एवं आचरण:
इस श्लोक का नियमित उच्चारण और मनन प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में या संध्यावंदنا के समय करना अत्यंत फलदायी माना गया है। पाठ करने से पूर्व मन को शांत करें, भगवान श्रीकृष्ण के चतुर्भुज स्वरूप का ध्यान करें और श्लोक के प्रत्येक शब्द के अर्थ को अपने हृदय में उतारने का प्रयास करें। यह केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि अज्ञान के अंधकार को चीरने वाली एक ज्ञान-मशाल है।
पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)
श्रीमद्भागवतगीता के इस श्लोक के प्रत्येक पद की व्याकरणिक और दार्शनिक व्याख्या निम्नलिखित तालिका में प्रस्तुत है:
धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि
महाभारत के कुरुक्षेत्र के मैदान में जब पांडव सेना और कौरव सेना आमने-सामने थीं, तब अर्जुन अपने सगे-सम्बन्धियों को देखकर मोहग्रस्त हो गए और उनका गांडीव हाथ से छूट गया। उस संकट की घड़ी में भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जो ज्ञान दिया, वह आज संपूर्ण मानव जाति के लिए 'श्रीमद्भागवतगीता' के रूप में उपलब्ध है। चौदहवें अध्याय में महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित इन श्लोकों के माध्यम से त्रिगुणात्मक संसार का सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है।
पौराणिक कथाओं और सांख्य दर्शन के अनुसार, संपूर्ण सृष्टि 'प्रकृति' और 'पुरुष' के संयोग से चलती है। प्रकृति के ये तीन गुण (सत्त्व, रज, तम) रस्सियों के तीन अलग-अलग धागों की भाँति हैं जो जीव को बांधे रखते हैं। रजोगुण का इतिहास इस सृष्टि के आदिकाल से जुड़ा हुआ है जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना का संकल्प लिया था। रचना करने के लिए गति, ऊर्जा और तीव्र इच्छा की आवश्यकता होती है, जो रजोगुण से ही प्राप्त होती है। परंतु जब यही ऊर्जा अनियंत्रित हो जाती है, तब यह सृजन के स्थान पर बंधन का कारण बन जाती है।
महर्षि वेद व्यास ने महाभारत और विभिन्न पुराणों में बार-बार इस बात पर बल दिया है कि मनुष्य की सबसे बड़ी शत्रु बाहर कोई राक्षसी शक्ति नहीं, बल्कि उसके अपने भीतर बैठी हुई 'अतृप्त तृष्णा' (Desire) है। ऋषि मुनियों ने अपनी तपस्या के बल पर यह अनुभव किया कि जब तक मनुष्य रजोगुण के इस पाश (फंदे) से मुक्त नहीं होता, तब तक उसे मोक्ष या आत्यंतिक शांति की प्राप्ति नहीं हो सकती। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यही समझाते हैं कि युद्ध करना तुम्हारा कर्तव्य है, परंतु उस युद्ध में या किसी भी कर्म में रजोगुण जनित 'फल की आसक्ति' से मुक्त होकर कार्य करो, तभी तुम इस बंधन को काट सकोगे।
नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ
श्रीमद्भागवतगीता के चौदहवें अध्याय के इस सातवें श्लोक का नियमित पठन, मनन और इसके अर्थ को जीवन में उतारने से निम्नलिखित आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं:
संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context)
भक्तिलोक (Bhaktilok.in) के इस आलेख को तैयार करते समय उच्च कोटि की शास्त्रीय प्रमाणिकता, संस्कृत व्याकरण की शुद्धता और आधुनिक मनोविज्ञान के समन्वय का विशेष ध्यान रखा गया है। यह सामग्री श्रीमद्भागवतगीता (शंकराचार्य भाष्य और रामानुज भाष्य के संदर्भ सहित) तथा महर्षि वेद व्यास रचित महाभारत के मूल ग्रंथों पर आधारित है। हमारे विद्वान संपादकों और संस्कृत भाषाविदों ने यह सुनिश्चित किया है कि आधुनिक पाठकों को सनातन संस्कृति का यह गूढ़ ज्ञान अत्यंत सरल, सहज और प्रामाणिक हिंदी में प्राप्त हो सके। यह पूर्णतः संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है, जो पाठकों के आध्यात्मिक उत्थान के लिए समर्पित है।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)
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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कहते हैं कि रजोगुण आसक्ति स्वरूप है, तृष्णा और संग से उत्पन्न होता है। हे कौन्तेय! यह कर्मों के संग से देही को बांधता है। Know Rajas as passionate, born of desire and attachment; it binds the embodied soul through attachment to action.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
रजोगुण में रहकर व्यक्ति सदा कर्मों में व्यस्त रहता है और फल की आकांक्षा करता है, जिससे बंधन होता है। Under the influence of Rajas, one remains constantly engaged in actions with desire, leading to bondage.