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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 14 · श्लोक 7

अध्याय 14 · श्लोक 7

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् । तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ॥ ७॥

rajo rāgātmakaṃ viddhi tṛṣṇā-saṅga-samudbhavam | tan nibadhnāti kaunteya karma-saṅgena dehinam ||7||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

रजः: रज गुण; रागात्मकम्: राग (आसक्ति) स्वरूप; विद्धि: जानो; तृष्णा-सङ्ग-समुद्भवम्: तृष्णा और आसक्ति से उत्पन्न; तत्: वह; निबध्नाति: बांधता है; कौन्तेय: हे कुन्तीपुत्र; कर्मसङ्गेन: कर्मों के संग से; देहिनम्: शरीरी को।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे कुन्तीपुत्र! रजोगुण को रागात्मक (आसक्ति स्वरूप) जानो, जो तृष्णा और संग से उत्पन्न होता है। वह कर्मों के संग से देही को बाँधता है।

English Translation

Know Rajas to be of the nature of passion, born of thirst and attachment; it binds the embodied one, O son of Kunti, by attachment to action.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

रजोगुण में तीव्र इच्छाएँ और आसक्ति होती है। यह व्यक्ति को कर्मों में उलझाकर बांधता है। Rajas is characterized by passion, thirst, and attachment; it binds the soul through involvement in actions.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।