श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 6

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 36 मिनट का पठन 148 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् । सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ॥ ६॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
तत्र
उनमें से
सत्त्वम्
सत्त्व गुण
निर्मलत्वात्
निर्मल होने के कारण
प्रकाशकम्
प्रकाशक
अनामयम्
निष्पाप
सुखसङ्गेन
सुख के संग से
बध्नाति
बांधता है
ज्ञानसङ्गेन
ज्ञान के संग से
च
और
अनघ
हे निष्पाप।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

उनमें से सत्त्व गुण निर्मल होने के कारण प्रकाशक और निरोगी (पापरहित) है। हे निष्पाप अर्जुन! वह सुख के संग से और ज्ञान के संग से बाँधता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भारतीय सनातन संस्कृति, विशेषकर श्रीमद्भागवतगीता के दर्शन में, संपूर्ण ब्रह्मांड और मानव मनोविज्ञान का संचालन 'प्रकृति' के तीन मूलभूत गुणों—सत्त्व, रज और तम—द्वारा संचालित माना गया है। भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय (गुणात्रयविभाग योग) का छठा श्लोक, जो कि हमारे आज के विवेचन का केंद्रीय विषय है, आध्यात्मिक साधना के मार्ग में आने वाले सबसे सूक्ष्म और गहन सत्य को उजागर करता है। आम जनमानस में 'सत्त्व गुण' को हमेशा सर्वथा मुक्तिदायक, पवित्र और केवल सकारात्मक रूप में देखा जाता है। लोग यह मानते हैं कि सात्विक होना ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है। परंतु भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अत्यंत गूढ़ रहस्य समझाते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि यद्यपि सत्त्व गुण अत्यंत निर्मल, प्रकाशमय और अनामय (रोग-शोक रहित) है, तथापि यह जीव को पूर्ण रूप से मुक्त नहीं करता, बल्कि वह भी 'सुख' और 'ज्ञान' की मोहक आसक्ति के माध्यम से आत्मा को बंधन में बांध लेता है।

Bhaktilok.in के इस विशेष आध्यात्मिक अंक में हम इसी महान श्लोक का शास्त्रीय, दार्शनिक, वैयाकरण और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं। यहाँ हम समझेंगे कि कैसे ज्ञान का अहंकार और सुख की लालसा भी साधक को उच्च लोकों में तो ले जा सकती है, किंतु वह परम मोक्ष या कैवल्य प्राप्ति में बाधा बन सकती है। इस विस्तृत आलेख के माध्यम से हम वेदों, उपनिषदों और पुराणों के संदर्भों के साथ त्रिगुणों के इस मायाजाल का भेदन करने का प्रयास करेंगे, जिससे एक साधक अपने दैनिक जीवन में आंतरिक शुद्धि के साथ-साथ अहंकाररहित भक्ति और कर्मयोग का मार्ग प्रशस्त कर सके।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

"तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् ।
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ॥ ६॥"


(श्रीमद्भागवतगीता - अध्याय १४, श्लोक ६)

पाठ करने की विधि व मंत्रोच्चार का नियम:

  • इस श्लोक का पाठ प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान के पश्चात शुद्ध वस्त्र धारण करके करना अत्यंत फलदायी माना गया है।
  • पाठ करने से पूर्व अपने इष्टदेव (विशेषकर भगवान श्रीकृष्ण या नारायण) का मानसिक स्मरण करें।
  • श्लोक का उच्चारण स्पष्ट, उदात्त, अनुदात्त और स्वर के आरोह-अवरोह के साथ करना चाहिए ताकि उच्चारण के कंपन से मन की तरंगे शांत हो सकें।
  • प्रतिदिन कम से कम 108 बार या अपनी श्रद्धा के अनुसार इस श्लोक का जप करने से मानसिक एकाग्रता और बौद्धिक स्पष्टता प्राप्त होती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक पद का शाब्दिक और दार्शनिक अर्थ नीचे दी गई तालिका में विस्तार से समझाया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
तत्र (Tatra) उन तीनों में से / वहाँ प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) में से प्रथम गुण 'सत्त्व' के विषय में कहा जा रहा है।
सत्त्वम् (Sattvam) सत्त्व गुण वह गुण जो प्रकाश, शांति, पवित्रता और सृजनात्मकता का प्रतीक है।
निर्मलत्वात् (Nirmalatvat) मल-रहित होने के कारण / अत्यधिक शुद्धता के कारण यह गुण अन्य दो गुणों (रज और तम) की तरह मैला या आवरणयुक्त नहीं है, बल्कि पारदर्शक काच के समान स्वच्छ है।
प्रकाशकम् (Prakashakam) प्रकाश करने वाला / ज्ञान का द्योतक यह भीतर और बाहर दोनों ओर सत्यों को उजागर करता है, अज्ञान के अंधकार को मिटाता है।
अनामयम् (Anamayam) रोग, शोक और संताप रहित / कल्याणकारी यह मानसिक विकारों, व्याधियों और संतापों से मुक्त रखता है, जिससे जीवन में शांति महसूस होती है।
सुखसङ्गेन (Sukhasangena) सुख की आसक्ति के द्वारा सात्विक व्यक्ति को मिलने वाले आंतरिक आनंद और संतोष से प्रेम हो जाता है, जो आगे चलकर बंधन बनता है।
बध्नाति (Badhnati) बांधता है आत्मा जो कि मूल रूप से मुक्त और अंसग है, वह इस सुख व ज्ञान के मोह से शरीर रूपी कारागार में बंध जाती है।
ज्ञानसङ्गेन (Jnanasangena) ज्ञान की आसक्ति के द्वारा "मैं ज्ञानी हूँ", "मैं शास्त्रज्ञ हूँ" का अभिमान या इस बोध से मोह कि मुझे सब ज्ञात है, आत्मा को जकड़ लेता है।
च (Cha) और यह योजक दोनों बंधनों (सुख और ज्ञान) को एक साथ जोड़ता है जो साधक को जकड़ते हैं।
अनघ (Anagha) हे पाप-रहित अर्जुन! भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को संबोधित करते हुए उन्हें निष्कलंक और पवित्र आत्मा बताते हैं, जो इस गहरे रहस्य को समझने के योग्य हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भागवतगीता का चौदहवां अध्याय 'गुणात्रयविभाग योग' के नाम से विख्यात है। इस अध्याय की पृष्ठभूमि महाभारत के कुरुक्षेत्र के मैदान में रची गई थी, जहाँ कौरव और पांडव सेनाएं आमने-सामने थीं। विषाद में डूबे अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से जीवन के परम रहस्यों, प्रकृति के स्वभाव और मनुष्य की प्रवृत्तियों के बारे में अनेक प्रश्न पूछे। अर्जुन का यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण था कि मनुष्य इन तीनों गुणों से परे कैसे हो सकता है, इनके लक्षण क्या हैं और ये कैसे कार्य करते हैं?

वैदिक और पुराण साहित्य (विशेषकर सांख्य दर्शन और महाभारत के शांति पर्व) में यह विस्तार से वर्णित है कि महर्षि कपिल द्वारा प्रतिपादित सांख्य दर्शन के अनुसार प्रकृति (प्रकृतिः त्रिगुणात्मिका) तीन मोतियों से जड़ी एक सुंदर किंतु लोहे की जंजीर की भांति है। महर्षि वेद व्यास ने महाभारत में इस बात का उल्लेख किया है कि तमोगुण मनुष्य को आलस्य, प्रमाद और निद्रा में बांधता है; रजोगुण मनुष्य को कामना, वासना और कर्म-आसक्ति के जरिए भटकाता है; और सत्त्व गुण मनुष्य को अत्यंत कोमल और स्वर्णिम बंधनों में जकड़ लेता है।

कथाओं और उपनिषदों के संदर्भ में, देवताओं और ऋषियों के मन में भी कई बार सात्विक अहंकार उत्पन्न हुआ है—जैसे यह मान लेना कि "हम तपस्या में श्रेष्ठ हैं" या "हमें वेदों का संपूर्ण ज्ञान है।" भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन और समस्त मानव जाति को यह चेतावनी देते हैं कि मोक्ष केवल गुणों के पार जाने से ही संभव है। भले ही सत्त्व गुण अन्य दो गुणों की तुलना में प्रकाशवान और श्रेष्ठ है, परंतु जब तक "मैं सुखी हूँ" या "मैं ज्ञानी हूँ" का बोध बना रहता है, तब तक आत्मा का पुनरावृत्ति का चक्र समाप्त नहीं होता। यही इस श्लोक की महत्ता और इसकी ऐतिहासिक-दार्शनिक पृष्ठभूमि का सार है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भागवतगीता के इस छठे श्लोक का नियमित मनन, पठन और इसके अर्थ का चिंतन करने से साधक को जीवन में अनेक प्रकार के मानसिक, आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति और स्थिरता

श्लोक के नियमित स्मरण से मस्तिष्क की उथल-पुथल शांत होती है, जिससे ध्यान (Meditation) और एकाग्रता में अभूतपूर्व वृद्धि होती है।

2. सकारात्मक ऊर्जा (Positive Aura) का विकास

सत्त्व गुण के निर्मल स्वरूप के चिंतन से शरीर और मन का आवरण शुद्ध होता है, जिससे आसपास का वातावरण सकारात्मक और ऊर्जावान बनता है।

3. कर्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

यह श्लोक व्यक्ति को तामसिक और राजसिक कर्मों से दूर रखकर सात्विक कर्म करने के लिए प्रेरित करता है, जिससे संचित कर्मों का क्षय होता है।

4. ज्ञान के अहंकार से मुक्ति

यह साधक को यह बोध कराता है कि केवल बौद्धिक ज्ञान या पुस्तकीय ज्ञान मोक्ष नहीं है, बल्कि ज्ञान का अहंकार भी एक बंधन है, जिससे विनम्रता आती है।

5. आध्यात्मिक विवेक की प्राप्ति

साधक में अच्छे और बुरे के साथ-साथ गुणों और गुणातीत अवस्था के बीच भेद करने की अद्भुत क्षमता विकसित होती है।

6. तनाव और अवसाद (Depression) से मुक्ति

सुख और दुख के द्वंद्वों से ऊपर उठने की प्रेरणा मिलने के कारण मन में अनावश्यक चिंताओं और अवसाद का शमन होता है।

7. भगवद् कृपा और भक्ति की प्राप्ति

इस गूढ़ रहस्य को समझने से भक्त भगवान के चरणों में अनन्य भाव से समर्पित होता है, जिससे आत्मिक आनंद की प्राप्ति होती है।

8. गुणातीत अवस्था की ओर अग्रसर

यह साधक को तीनों गुणों से परे (त्रिगुणातीत) होकर भगवान की परम शरण प्राप्त करने का सीधा मार्ग दिखाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख सनातन ग्रंथों, आचार्यों के भाष्यों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामानुज और स्वामी गीतानंद के भगवद्गीता भाष्य) तथा आधुनिक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण के समन्वय से तैयार किया गया है। हमारी संपादकीय टीम यह सुनिश्चित करती है कि पाठकों तक प्राचीन वैदिक ज्ञान पूरी शुद्धता, प्रामाणिकता और सुगम भाषा में पहुँचे।

इस शlek की व्याख्या में हमने किसी भी प्रकार के अतिशयोक्तिपूर्ण दावों से परहेज किया है और विशुद्ध रूप से श्रीमद्भागवतगीता के मूल संदेश—"गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भभावं सोऽधिगच्छति"—को केंद्र में रखा है। यदि आप इस विषय पर और अधिक गहराई से अध्ययन करना चाहते हैं, तो भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय के संपूर्ण श्लोकों का पारायण और वेदान्त दर्शन के ग्रंथों का स्वाध्याय अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

उत्तर: सत्त्व गुण अपने स्वभाव से शुद्ध और ज्ञानवर्धक है, परंतु सात्विक व्यक्ति को अपने ज्ञान पर और आंतरिक सुख पर अभिमान या मोह हो जाता है। वह यह मान बैठता है कि "मैं सुखी हूँ" या "मैं ज्ञानी हूँ", और यही सूक्ष्म आसक्ति (attachment) उसके लिए बंधन बन जाती है, जो उसे पुनर्जन्म के चक्र में बांधे रखती है।

उत्तर: बिल्कुल नहीं! सात्विक जीवन शैली (शुद्ध आहार, आचार, विचार और सत्संग) मोक्ष के मार्ग की पहली और अनिवार्य सीढ़ी है। जब तक मन रजोगुण और तमोगुण से मुक्त होकर सात्विक नहीं बनता, तब तक वह उच्च आध्यात्मिक चिंतन के योग्य नहीं हो सकता। भगवान श्रीकृष्ण का तात्पर्य यह है कि सात्विक बनकर रुकना नहीं है, बल्कि इस गुण के मोह से ऊपर उठकर 'गुणातीत' (ईश्वर परायण) होना है।

उत्तर: इस श्लोक का स्मरण करने से व्यक्ति में अहंकार की भावना समाप्त होती है। जब कोई व्यक्ति अपने ज्ञान या परोपकार पर गर्व करने लगता है, तब यह श्लोक उसे याद दिलाता है कि अहंकार किसी भी रूप में हो, वह बंधनकारी ही है। इससे साधक विनम्र और निष्काम बनता है।

उत्तर: चौदहवें अध्याय (गुणात्रयविभाग योग) का मुख्य उद्देश्य प्रकृति के तीनों गुणों (सत्त्व, रज, तम) की कार्यप्रणाली को समझाना, उनके बंधनों से मनुष्य को अवगत कराना और इन गुणों से पार पाकर भगवान की अनन्य भक्ति द्वारा परम मुक्ति प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त करना है।

उत्तर: 'अनामयम्' का शाब्दिक अर्थ है- जो रोग, शोक, संताप या पीड़ा से रहित हो। आध्यात्मिक दृष्टि से, सत्त्व गुण शारीरिक और मानसिक व्याधियों को दूर करता है और एक निर्मल अवस्था प्रदान करता है जहाँ किसी प्रकार का आधि-व्याधि का क्लेश नहीं रहता।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं कि तीनों गुणों में सत्त्व निर्मल, प्रकाशक और पापरहित है। हे अनघ अर्जुन! यह सुख के संग और ज्ञान के संग से जीव को बांधता है। Among the three, Sattva is pure, illuminating, and free from evil; it binds the soul through attachment to happiness and knowledge.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

सत्त्व गुण में भी आसक्ति नहीं करनी चाहिए। सुख और ज्ञान के प्रति मोह भी बंधन का कारण है। Even Sattva, being a guna, creates bondage if one becomes attached to its effects like happiness and knowledge.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 6 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 6/27 22% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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पंचांग
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