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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 14 · श्लोक 6

अध्याय 14 · श्लोक 6

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् । सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ॥ ६॥

tatra sattvaṃ nirmalatvāt prakāśakam anāmayam | sukha-saṅgena badhnāti jñāna-saṅgena cānagha ||6||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

तत्र: उनमें से; सत्त्वम्: सत्त्व गुण; निर्मलत्वात्: निर्मल होने के कारण; प्रकाशकम्: प्रकाशक; अनामयम्: निष्पाप; सुखसङ्गेन: सुख के संग से; बध्नाति: बांधता है; ज्ञानसङ्गेन: ज्ञान के संग से; च: और; अनघ: हे निष्पाप।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

उनमें से सत्त्व गुण निर्मल होने के कारण प्रकाशक और निरोगी (पापरहित) है। हे निष्पाप अर्जुन! वह सुख के संग से और ज्ञान के संग से बाँधता है।

English Translation

Among these, Sattva, being pure, is illuminating and free from evil. It binds by attachment to happiness and by attachment to knowledge, O sinless one.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

सत्त्व गुण सुख और ज्ञान के माध्यम से आत्मा को बांधता है। यद्यपि यह शुद्ध है, फिर भी यह आसक्ति उत्पन्न करता है। Sattva binds through attachment to happiness and knowledge, though it is pure.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।