श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 5

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 40 मिनट का पठन 171 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः । निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥ ५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
सत्त्वम्
सत्त्व
रजः
रज
तमः
तम
इति
इस प्रकार
गुणाः
गुण
प्रकृतिसम्भवाः
प्रकृति से उत्पन्न
निबध्नन्ति
बांधते हैं
महाबाहो
हे महाबाहो
देहे
शरीर में
देहिनम्
शरीरी (आत्मा)
अव्ययम्
अविनाशी।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे महाबाहो! सत्त्व, रज और तम - ये तीनों गुण प्रकृति से उत्पन्न होते हैं और अविनाशी देही (आत्मा) को देह से बाँधते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय महत्ता

सनातन वैदिक संस्कृति और श्रीमद्भागवतगीता के अगाध ज्ञानसागर में 'त्रिविध गुण' (सत्त्व, रज और तम) संपूर्ण चराचर जगत के संचालन के मूलभूत संचालक हैं। भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को संबोधित यह पांचवां श्लोक (अध्याय 14, श्लोक 5) केवल एक दार्शनिक उद्गार नहीं है, बल्कि यह भौतिक सृष्टि और आध्यात्मिक मोक्ष के बीच के उस रहस्य को उजागर करता है, जिसमें मनुष्य का अंतःकरण जकड़ा हुआ है। इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी दृष्टिगोचर होता है—चाहे वह जतन हो, विचार हो, या कर्म हो—सब कुछ मूल प्रकृति की त्रिगुणात्मक कोख से ही प्रगट होता है।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से, यह श्लोक मनुष्य को उसके आंतरिक स्वभाव (प्रकृति) को समझने की प्रेरणा देता है। जब हम यह समझ जाते हैं कि हमारे भीतर उठने वाले सात्विक, राजसिक और तामसिक भाव हमारी अपनी मूल आत्मा के सहज गुण नहीं हैं, अपितु यह प्रकृति (माया) के आवरण हैं, तब हम इनसे तटस्थ होने की कला सीखने लगते हैं। यह श्लोक साधक को आत्म-साक्षात्कार (Self-Realization) के मार्ग पर अग्रसर करता है, जहाँ वह देह और देही (आत्मा) के भेद को स्पष्ट रूप से अनुभव कर पाता है।

ब्रह्मांडीय स्तर पर, यही तीन गुण सृष्टि की रचना, स्थिति और प्रलय के उत्तरदायी हैं। सत्त्व गुण प्रकाश और ज्ञान का प्रतीक है, रज गुण कर्म, वासना और गतिशीलता का द्योतक है, तथा तम गुण अज्ञान, प्रमाद और जड़ता को पोषित करता है। इन तीनों के संतुलन और असंतुलन से ही संपूर्ण जीवों की योनियां और उनके कर्मफल निर्धारित होते हैं। अतएव, इस श्लोक का अध्ययन और इसके गूढ़ार्थ का चिंतन प्रत्येक जिज्ञासु और साधक के लिए परम आवश्यक है ताकि वह माया के इस त्रिगुणात्मक पाश से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त कर सके।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।

निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥ ५॥


पदच्छेद: सत्त्वम् रजः तमः इति गुणाः प्रकृति-सम्भवाः । निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनम् अव्ययम् ॥

पाठ करने की विधि एवं नियम:
  • प्रतिदिन प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त में स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें।
  • अपने आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • भगवान श्री कृष्ण के विग्रह या गीता ग्रंथ के समक्ष दीप प्रज्वलित करें।
  • इस श्लोक का उच्चारण कम से कम 11 बार या 108 बार (एक माला) श्रद्धापूर्वक करें।
  • पाठ के पश्चात श्लोक के भावार्थ का अपने मन में चिंतन करें और अहंकारमुक्त जीवन जीने का संकल्प लें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द का शाब्दिक अर्थ और उसका प्रगाढ दार्शनिक निहितार्थ निम्नलिखित तालिका में स्पष्ट किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
सत्त्वम् सत्त्व गुण (प्रकाश, सुख, ज्ञान) यह प्रकृति का वह पावन पहलू है जो जीव में ज्ञान, शांति, और प्रकाश उत्पन्न करता है, जिससे मुक्ति की इच्छा जगती है।
रजः रजोगुण (आसक्ति, तृष्णा, कर्म) यह इच्छाओं, लालसाओं और तीव्र गतिविधियों का स्रोत है, जो मनुष्य को सांसारिक भोग-विलासों और कर्मों में बांधता है।
तमः तमोगुण (अज्ञान, आलस्य, प्रमाद) यह अज्ञानता, अंधकार, निद्रा और जड़ता का प्रतीक है, जो विवेक शक्ति को आच्छादित कर देता है और पतन का कारण बनता है।
इति इस प्रकार (इन तीनों को) इन तीनों विशिष्ट श्रेणियों के रूप में प्रकृति अपने संपूर्ण रूपों को व्यक्त करती है।
गुणाः गुण (प्रकृति के तीन बंधन) ये ऐसे पाश या रस्सियां हैं जो चेतना को भौतिक शरीर के साथ जकड़ देते हैं।
प्रकृतिसम्भवाः प्रकृति से उत्पन्न होने वाले इनका उद्गम शुद्ध रूप से भौतिक प्रकृति (माया) से है, न कि शुद्ध और नित्य आत्मा से।
निबध्नन्ति बाँध देते हैं / जकड़ लेते हैं आत्मा को उसकी स्वतंत्रता से वंचित करके भौतिकता के पिंजरे में कस देते हैं।
महाबाहो हे महाबाहु (अर्जुन को संबोधन) यह पराक्रमी अर्जुन को संबोधित करता है, जिसका अर्थ है कि शारीरिक बल कितना भी हो, मानसिक बंधन से छूटना आवश्यक है।
देहे शरीर में / भौतिक आवरण में नश्वर और नाशवान देह के भीतर आत्मा को उलझा देते हैं।
देहिनम् देहधारी / जीव / आत्मा को उस चेतन तत्व को जो वास्तव में इन गुणों से परे है, परंतु अज्ञानवश स्वयं को शरीर मान बैठता है।
अव्ययम् अविनाशी, व्ययरहित, नित्य आत्मा अमर, अक्षय और मौलिक रूप से शुद्ध है, जिसका कभी नाश नहीं होता।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भागवतगीता के चौदहवें अध्याय का नाम 'गुणत्रयविभाग योग' है। इस अध्याय की ऐतिहासिक और पौराणिक पृष्ठभूमि महाभारत के युद्ध के ठीक पूर्व कुरुक्षेत्र के मैदान में रची गई थी। जब अर्जुन विषादग्रस्त हो गए और भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें कर्तव्य पथ का बोध कराने के लिए दिव्य ज्ञान देना प्रारंभ किया, तब अंततः उन्होंने प्रकृति के इन तीन गुणों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया।

शास्त्रों के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में जब महाविष्णु की प्रेरणा से प्रकृति (माया) सक्रिय हुई, तो उसने महतत्त्व और अहंकार के माध्यम से इन तीन गुणों—सत्त्व, रज और तम—का विस्तार किया। पौराणिक कथाओं और सांख्य दर्शन के ग्रंथों (जैसे कपिल मुनि रचित सांख्य सूत्र) में इस बात का स्पष्ट वर्णन मिलता है कि ब्रह्म या परमात्मा पूर्णतः निर्गुण और निरंजन हैं, परंतु उनकी शक्ति स्वरूपा प्रकृति ही त्रिगुणात्मिका है। ब्रह्माजी को रजोगुण का अधिष्ठाता, विष्णु भगवान को सत्त्व गुण का पालनकर्ता और भगवान शिव को तमोगुण (संहार एवं विलय के संदर्भ में परम शांति) का नियंत्रक माना गया है।

इस श्लोक में अर्जुन को 'महाबाहो' (विशाल भुजाओं वाले) कहकर संबोधित करने का एक विशेष पौराणिक और मनोवैज्ञानिक उद्देश्य है। भगवान कृष्ण अर्जुन को यह याद दिलाते हैं कि यद्यपि तुम युद्ध के मैदान में अपने बाहुबल से बड़े-बड़े योद्धाओं को परास्त करने में समर्थ हो, परंतु असली और सबसे कठिन युद्ध इस भौतिक प्रकृति के त्रिगुणात्मक बंधनों के विरुद्ध है। जब तक मनुष्य सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणों की रस्सी से बन्धा रहता है, तब तक वह जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त नहीं हो सकता। महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत और श्रीमद्भागवत महापुराण में भी बार-बार यह समझाया गया है कि इन गुणों से परे जाने (गुणातीत होने) पर ही परम शान्ति और मोक्ष की प्राप्ति संभव है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual & Mental Benefits)

इस पावन श्लोक का नियमित पठन, मनन और इसके मर्म को आत्मसात करने से साधक को अनेकानेक आध्यात्मिक, मानसिक और जीवनोपयोगी लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति और स्थिरता

मन में उठने वाले द्वंद्व, अशांति और उद्वेग शांत होते हैं क्योंकि व्यक्ति को ज्ञात हो जाता है कि विचार केवल गुणों का फेर है, आत्मा शांत है।

2. सकारात्मक ऊर्जा (Positive Aura) का संचार

श्لوك के नियमित जप से साधक के चारों ओर एक उच्च कोटि की सात्विक ऊर्जा का आवरण बनता है, जो नकारात्मक शक्तियों को दूर रखता है।

3. कर्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

राजसिक और तामसिक कर्मों की आसक्ति कम होती है, जिससे संचित पाप कर्मों का क्षय होने लगता है और जीवन निष्काम कर्म की ओर बढ़ता है।

4. दिव्य कृपा और ईश्वरीय सामीप्य

भगवान कृष्ण के इस ज्ञान को धारण करने से साधक पर भगवत्कृपा बरसती है और उसकी बुद्धि योगयुक्त हो जाती है।

5. अहंकार और ममत्व से मुक्ति

"यह मेरा शरीर है, यह मेरे विचार हैं" इस मिथ्या अहंकार से मुक्ति मिलती है और देह तथा आत्मा का पृथक अनुभव होने लगता है।

6. निर्णय क्षमता में वृद्धि (Discrimination Power)

विवेक जाग्रत होता है जिससे व्यक्ति यह भली-भांति पहचान पाता है कि उसके जीवन में कौन सा गुण प्रभावी हो रहा है और उसे क्या करना चाहिए।

7. तनाव और अवसाद से मुक्ति

सांसारिक असफलताओं और उपलब्धियों से उत्पन्न होने वाले मानसिक तनाव से छुटकारा मिलता है क्योंकि व्यक्ति गुणों के खेल को समझ जाता है.

8. मोक्ष और मुक्ति का मार्ग प्रशस्त

गुणों के बंधनों को समझकर उनका अतिक्रमण करने की प्रेरणा मिलती है, जिससे साधक अंततः जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के हमारे विद्वान आचार्यों और संस्कृत भाषाविदों द्वारा इस आलेख को अत्यंत शोधपूर्ण ढंग से तैयार किया गया है। श्रीमद्भागवतगीता के चौदहवें अध्याय (गुणत्रयविभाग योग) के इस श्लोक का मूल संस्कृत व्याकरण, आदि शंकराचार्य एवं स्वामी रामानुजाचार्य के भाष्य तथा आधुनिक संतों के दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर हिंदी में सरल और सुबोध रूप में रूपांतरित किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक वेदों, उपनिषदों और पुराणों के शाश्वत ज्ञान को बिना किसी मिलावट या अतिशयोक्ति के, पूरी प्रमाणिकता के साथ पहुँचाना है। सभी विवरण पारंपरिक सनातन ग्रंथों पर आधारित हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

ये तीनों गुण शुद्ध रूप से भौतिक प्रकृति (माया) से उत्पन्न होते हैं, जैसा कि श्लोक में 'प्रकृतिसम्भवाः' शब्द द्वारा स्पष्ट किया गया है। आत्मा मूलतः इन गुणों से परे (निर्गुण) है, किंतु प्रकृति के संपर्क में आने के कारण वह इनमें बंध जाती है।

हाँ, श्रीमद्भागवतगीता के अनुसार सात्विक गुण सुख और ज्ञान के प्रति आसक्ति उत्पन्न करके आत्मा को बांधता है। यद्यपि यह अन्य दो (रज और तम) की तुलना में श्रेष्ठ है, फिर भी यह मुक्ति में एक आवरण या बंधन का कार्य करता है। पूर्ण मोक्ष के लिए इन तीनों गुणों से अतीत (गुणातीत) होना पड़ता है।

'महाबाहो' शब्द का अर्थ है 'विशाल भुजाओं वाला' या पराक्रमी। भगवान कृष्ण अर्जुन को यह स्मरण कराते हैं कि यद्यपि तुम भौतिक युद्ध क्षेत्र में बड़े-बड़े योद्धाओं को हराने में सक्षम हो, परंतु असली और कठिन चुनौती मन के भीतर स्थित प्रकृति के इन त्रिगुणात्मक बंधनों को पाटना है, जिसके लिए महान आंतरिक बल की आवश्यकता है।

इस श्लोक को समझकर व्यक्ति अपने भीतर उठने वाले भावों का विश्लेषण कर सकता है। जब क्रोध या आलस्य (तम) आए, महत्वाकांक्षा या बेचैनी (रज) बढ़े, या शांति व ज्ञान (सत्त्व) जागे, तो वह साक्षी भाव से यह देख सकता है कि यह सब प्रकृति का खेल है और वह स्वयं इनसे परे अविनाशी आत्मा है। इससे मानसिक तनाव स्वतः कम हो जाता है।

'देहिनम्' का अर्थ है शरीर धारण करने वाली आत्मा या जीव, और 'अव्ययम्' का अर्थ है जिसका कभी नाश न हो, जो अमर, अक्षय और नित्य है। इसका भाव यह है कि शरीर नाशवान है और गुण भी परिवर्तनशील हैं, किंतु इनके भीतर निवास करने वाली आत्मा पूर्ण रूप से अश्वर और शाश्वत है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं कि सत्त्व, रज और तम - ये तीन गुण प्रकृति से उत्पन्न होते हैं। हे महाबाहो अर्जुन! ये गुण अविनाशी आत्मा को शरीर में रहकर बाँधते हैं। The Lord says that the three qualities—Sattva, Rajas, and Tamas—born of Prakriti, bind the imperishable soul to the body.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ये गुण आत्मा पर प्रभाव डालते हैं, लेकिन आत्मा वास्तव में इनसे परे है। इनके बंधन से मुक्त होना ही लक्ष्य है। These gunas influence the soul, but the soul is actually beyond them. Liberation means transcending them.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 5 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 5/27 19% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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