श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 4

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 40 मिनट का पठन 152 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः । तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ ४॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
सर्वयोनिषु
सभी योनियों में
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
मूर्तयः
शरीर
सम्भवन्ति
उत्पन्न होते हैं
याः
जो
तासाम्
उन सबकी
ब्रह्म महत्
महद्ब्रह्म
योनिः
योनी
अहम्
मैं
बीजप्रदः
बीज देने वाला
पिता
पिता।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे कुन्तीपुत्र! जितनी भी योनियों में जो-जो मूर्तियाँ (शरीर) उत्पन्न होती हैं, उन सबकी योनी महद्ब्रह्म है और मैं बीज देने वाला पिता हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

प्रस्तावना: सृष्टि का आदि रहस्य और जीवमात्र का आध्यात्मिक संबंध

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति, स्थिति और लय का रहस्य अत्यंत सूक्ष्मता से समझाया गया है। श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय, जिसका नाम 'गुणात्रयविभाग योग' है, उसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को सृष्टि के समस्त रहस्यों से अवगत कराते हैं। प्रस्तुत श्लोक — "सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः..." — इस पूरी सृष्टि के जीव-संसार के मूल आधार को रेखांकित करता है। यह केवल एक दार्शनिक श्लोक नहीं है, बल्कि यह उस परम सत्य की उद्घोषणा है जो यह बताता है कि इस चराचर जगत में जितने भी प्राणी, वृक्ष, कीट, पशु, पक्षी और मनुष्य (जिन्हें यहाँ 'मूर्तियाँ' या भौतिक शरीर कहा गया है) उत्पन्न होते हैं, उन सबकी वास्तविक जननी प्रकृति (माया) है और उनके बीज को स्थापित करने वाले, अर्थात उनके प्राणों व चेतना के प्रदाता स्वयं परमपिता परमात्मा हैं।

वैदिक साहित्य में प्रकृति (अपर प्रकृति या अपरा प्रकृति) को 'महाब्रह्म' या 'महद्ब्रह्म' की संज्ञा दी गई है, जो गर्भधारण करने वाली योनि के समान है। भगवान श्रीकृष्ण यहाँ स्पष्ट करते हैं कि जिस प्रकार किसी जीव की उत्पत्ति के लिए माता गर्भ धारण करती है और पिता अपने बीज से जीवन का संचार करता है, ठीक उसी प्रकार इस विराट ब्रह्मांड की समस्त योनियों में नाना प्रकार के शरीरों की रचना प्रकृति रूपी माता के गर्भ से होती है और चेतना रूपी बीज का आधान परमेश्वर द्वारा किया जाता है। यह श्लोक अद्वैत वेदांत और द्वैताद्वैत दोनों दृष्टियों से मनुष्य को इस बात का बोध कराता है कि हम सब एक ही आदिशक्ति और आदिपुरुष की संतान हैं, जिससे संपूर्ण ब्रह्मांड में एकत्व और वसुधैव कुटुंबकम् की भावना प्रबल होती है। आधुनिक वैज्ञानिक युग में जहाँ जेनेटिक्स और ओरिजिन ऑफ लाइफ पर निरंतर शोध हो रहे हैं, वहाँ गीता का यह सिद्धांत आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दोनों तलों पर पूर्णतः खरा उतरता है, जहाँ भौतिक तत्व और चेतना (Energy and Consciousness) का अद्भुत समन्वय देखा जा सकता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

पाठकर्ता के लिए निर्देश: इस श्लोक का पाठ करते समय प्रत्येक पद का उच्चारण स्पष्ट और सस्वर होना चाहिए ताकि इसके आंतरिक स्पंदन का मानसिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त हो सके।

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ।

तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ ४॥


अध्याय १४, श्लोक ४ — श्रीमद्भगवद्गीता

श्लोक का संदर्भ एवं सस्वर पाठ विधि:

इस श्लोक को पढ़ने की शास्त्रीय विधि यह है कि प्रातःकाल ब्रह्म बेला में स्नान करने के पश्चात शुद्ध वस्त्र धारण कर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके आसन पर बैठें। श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय का विधिवत श्लोक-बद्ध पाठ करें। इस विशेष श्लोक का उच्चारण करते समय अपने भीतर यह भाव जगाएं कि आप स्वयं उस परमात्मा की परम चेतना से जुड़े हुए हैं। निरंतर 108 बार या कम से कम 11 बार इस श्लोक का मानसिक जप करने से चित्त की वृत्तियाँ शांत होती हैं और एकाग्रता में वृद्धि होती है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

गीता के प्रत्येक शब्द में अनंत अर्थ छिपे हैं। नीचे दी गई तालिका में इस श्लोक के प्रमुख पदों का सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
सर्वयोनिषु समस्त योनियों में (84 लाख योनियाँ) प्रकृति के अंतर्गत आने वाले सभी प्रकार के जन्मस्थान, जिनमें जलचर, नभचर, थलचर, पेड़-पौधे और मनुष्य शामिल हैं।
कौन्तेय हे कुंतीपुत्र (अर्जुन) भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को उनके ननिहाल और माता कुंती के नाम से संबोधित कर यह गोपनीय ज्ञान दे रहे हैं।
मूर्तयः शरीर या भौतिक रूप / मूर्तियाँ जीवों के वे तमाम दृश्य रूप और भौतिक शरीर जो जन्म लेते हैं, वृद्धि को प्राप्त होते हैं और अंततः विलीन हो जाते हैं।
सम्भवन्ति उत्पन्न होती हैं / प्रकट होती हैं भौतिक जगत में प्राकृतिक नियमों के अधीन होने वाली रचना और प्रकटीकरण की निरंतर चलने वाली प्रक्रिया।
याः जो (जितनी भी) संसार में दिखने वाले अनगिनत जीव-प्रकार और उनकी विविधता की ओर संकेत।
तासां उन सबका उन तमाम उत्पन्न होने वाले शरीरों और जीवों का सामूहिक रूप से वर्णन।
ब्रह्म महद् महत् ब्रह्म / मूल प्रकृति (माया) वह मूल उपादान कारण या प्रकृति जो संपूर्ण ब्रह्मांड के गर्भधारण की आधारशिला है (अपरा प्रकृति)।
योनः (योनिरहम्) योनि (माता) है प्रकृति को गर्भ या जन्मदात्री माता के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो रूपों को आकार देती है।
अहम् मैं (स्वयं भगवान श्रीकृष्ण) सर्वोच्च सत्ता, ब्रह्म और पुरुषोत्तम भगवान का प्रत्यक्ष बोध जो इस समस्त प्रक्रिया के नियंत्रक हैं।
बीजप्रदः पिता बीज को स्थापित करने वाला पिता वह चेतन शक्ति या प्राणतत्व जो प्रकृति रूपी योनि में जीव को जीवन प्रदान करता है, वही परमात्मा है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत के रणक्षेत्र और गीता के चौदहवें अध्याय की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता का यह संवाद महाभारत के महायुद्ध के आरंभिक क्षणों में कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमि पर अर्जुन और भगवान श्रीकृष्ण के मध्य हुआ था। जब अर्जुन अपने स्वजनों को सामने देखकर विषाद से ग्रस्त हो गए और युद्ध से विमुख होने लगे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जीवन, मरण, कर्म और धर्म का परम ज्ञान दिया। चौदहवें अध्याय तक आते-आते भगवान अर्जुन को यह समझा चुके हैं कि यह संसार त्रिगुणात्मक (सत्व, रज और तम) है और इन गुणों से परे कैसे हुआ जाए।

इस शláक की पृष्ठभूमि में वेदों और उपनिषदों का वह महान ज्ञान है जिसमें 'पुरुष' और 'प्रकृति' के मिलन से सृष्टि के सृजन का वर्णन मिलता है। सांख्य दर्शन में भी प्रकृति (प्रधान) और पुरुष का यही सिद्धांत प्रधान है। उपनिषदों में ऋषिगण इस बात पर विचार करते थे कि इस जड़ जगत में चैतन्य कैसे आया? भगवान श्रीकृष्ण ने इस दार्शनिक गुत्थी को अत्यंत सरल रूप में सुलझाते हुए खुद को 'बीजप्रद पिता' और प्रकृति को 'महद्ब्रह्म योनि' घोषित किया। महाभारत के अनुशासन पर्व और शांति पर्व में भी इस प्रकार के अध्यात्मिक संवादों का उल्लेख मिलता है जहाँ भीष्म पितामह युधिष्ठिर को सृष्टि के आदिकारण के बारे में बताते हैं।

इस प्रकार, यह श्लोक केवल मौखिक उपदेश नहीं है, बल्कि यह सनातन वेदों के उस सार का मूर्त रूप है जिसे मुनिगण सदियों से जंगलों और गुफाओं में तपस्या के माध्यम से खोजते आए हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने इसे अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानवता के लिए सुलभ कर दिया, ताकि हर साधारण और असाधारण मनुष्य अपने मूल स्रोत — परमात्मा — को पहचान सके और जीवन के बंधनों से मुक्त हो सके।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस दिव्य श्लोक के नियमित स्मरण, मनन और इसके अर्थ के प्रति निष्ठा रखने से साधक को अनेक प्रकार के आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति और स्थिरता

यह जानने से कि हम सब का मूल स्रोत एक ही परमपिता परमात्मा है, मन का अछोह और भटकना बंद हो जाता है, जिससे गहरी मानसिक शांति मिलती है।

2. सकारात्मक ऊर्जा (Positive Aura) का विकास

श्लोक के सस्वर पाठ से उत्पन्न होने वाले ध्वनि कंपन (Sound Vibrations) शरीर के चक्रों को संतुलित करते हैं और सकारात्मक औरा का निर्माण करते हैं।

3. कार्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

प्रकृति और परमात्मा के इस अटूट संबंध को समझने से अहंकार का नाश होता है, जिससे जाने-अनजाने किए गए पाप कर्मों के बंधनों से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

4. सर्वधर्म समभाव एवं अद्वैत बोध

जब यह बोध हो जाता है कि सभी प्राणियों में एक ही परमात्मा का बीज है, तब प्राणी मात्र के प्रति करुणा, प्रेम और भाईचारे की भावना प्रबल होती है।

5. जीवन के प्रति भय से मुक्ति

मृत्यु और जीवन के चक्र को गहराई से समझ लेने के बाद साधक के मन से मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है क्योंकि उसे पता है कि शरीर बदलता है, आत्मा अमर है।

6. एकाग्रता और स्मरण शक्ति में वृद्धि

नियमित रूप से गीता के श्लोकों का पारायण करने से बुद्धि तीव्र होती है और छात्र-युवाओं में ध्यान केंद्रित करने की अद्भुत क्षमता विकसित होती है।

7. ईश्वर के प्रति अनन्य भक्ति

परमपिता परमात्मा के इस विराट स्वरूप के दर्शन करने से हृदय में भक्ति रस का संचार होता है और सांसारिक मोह-माया से विरक्ति मिलती है।

8. मोक्ष और आत्मसाक्षात्कार का मार्ग

यह चौदहवें अध्याय का प्रमुख ज्ञान साधक को तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) से ऊपर उठकर गुणातीत बनने और मोक्ष प्राप्त करने में सहायता करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के इस प्रतिष्ठित मंच पर प्रस्तुत यह आलेख श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक भाष्यों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास जी और स्वामी विवेकानंद के दृष्टिकोण) पर आधारित है। हमारे विद्वान संस्कृत भाषाविदों और सनातन शास्त्रों के विशेषज्ञों ने इस बात का विशेष ध्यान रखा है कि पाठकों तक शुद्ध, त्रुटिहीन और वेदोपनिषदों की मूल भावना के अनुकूल ज्ञान पहुँचे। किसी भी प्रकार के भ्रम से बचने के लिए मूल संस्कृत श्लोक के साथ उसका पदच्छेद, अन्वय और विस्तृत हिंदी व्याख्या प्रस्तुत की गई है ताकि आधुनिक पीढ़ी भी हमारी समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक थाती को सहजता से आत्मसात कर सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

'महद्ब्रह्म' से तात्पर्य मूल प्रकृति या माया से है जो सभी शरीरों को उत्पन्न करने वाली योनि (माता) के समान है। वहीं, 'बीजप्रद पिता' स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हैं जो इस प्रकृति रूपी योनि में चेतना या प्राण रूपी बीज का आधान करते हैं, जिससे समस्त जीवों का जीवन संभव होता है।

यह प्रसिद्ध श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें (14वें) अध्याय, जिसका नाम 'गुणात्रयविभाग योग' है, का चौथा (4th) श्लोक है। इस अध्याय में भगवान ने तीनों गुणों और प्रकृति-पुरुष के संबंधों का विस्तृत वर्णन किया है।

इस श्लोक का स्मरण करने से मनुष्य के भीतर यह स्पष्ट बोध हो जाता है कि इस संसार का रचयिता कोई और नहीं बल्कि परमेश्वर है और प्रकृति उसकी शक्ति है। इससे जीवों के प्रति दया, अहंकार का त्याग और भगवान के प्रति अनन्य प्रेम की भावना जागृत होती है, जो साधना का मुख्य मार्ग है।

हाँ, श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक संपूर्ण मानवता के लिए है। इसके पाठ के लिए किसी जाति, आयु या लिंग का बंधन नहीं है। इसे केवल पवित्र मन, श्रद्धा और शुद्ध उच्चारण के साथ कभी भी और कहीं भी पढ़ा या मनन किया जा सकता है। प्रातःकाल स्नान के पश्चात पढ़ना विशेष फलदायी माना गया है।

निश्चित रूप से। 'सर्वयोनिषु' का अर्थ है सभी प्रकार की योनियाँ। सनातन ग्रंथों के अनुसार चौरासी लाख योनियाँ हैं जिनमें देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट-पतंगे, जलचर और वनस्पतियाँ (पेड़-पौधे) सभी सम्मिलित हैं। इन सबकी जननी प्रकृति और पिता परमात्मा ही हैं।

© Bhaktilok.in — सर्वाधिकार सुरक्षित। सनातन ज्ञान और भक्ति का समर्पित मंच।

संकलन: मुख्य devotional scholar और संस्कृत भाषाविद् टीम द्वारा.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान अर्जुन से कहते हैं कि सभी योनियों में जितने भी शरीर उत्पन्न होते हैं, उन सबकी जननी महद्ब्रह्म (प्रकृति) है और मैं बीज प्रदान करने वाला पिता हूँ। The Lord tells Arjuna that the great Brahman (nature) is the womb of all forms, and He is the seed-giving father.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ईश्वर समस्त जीवों के परम पिता हैं। सभी जीव उनकी संतान हैं, अतः सबमें समान भाव रखना चाहिए। God is the universal father; all living beings are His children, hence we should see equality in all.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 4 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 4/27 15% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!