गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – श्लोक 4
श्लोक ४ में भगवान कहते हैं कि सभी योनियों में उत्पन्न होने वाले शरीरों की माता प्रकृति है और वे स्वयं बीज देने वाले पिता हैं। Verse 4: The Lord is the father who sows the seed, and nature is the mother of all forms.
संस्कृत श्लोक
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः । तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ ४॥
sarva-yoniṣu kaunteya mūrtayaḥ sambhavanti yāḥ | tāsāṃ brahma mahad yonir ahaṃ bīja-pradaḥ pitā ||4||
पदच्छेद / शब्दार्थ
सर्वयोनिषु: सभी योनियों में; कौन्तेय: हे कुन्तीपुत्र; मूर्तयः: शरीर; सम्भवन्ति: उत्पन्न होते हैं; याः: जो; तासाम्: उन सबकी; ब्रह्म महत्: महद्ब्रह्म; योनिः: योनी; अहम्: मैं; बीजप्रदः: बीज देने वाला; पिता: पिता।
हिंदी अनुवाद
हे कुन्तीपुत्र! जितनी भी योनियों में जो-जो मूर्तियाँ (शरीर) उत्पन्न होती हैं, उन सबकी योनी महद्ब्रह्म है और मैं बीज देने वाला पिता हूँ।
English Translation
Whatever forms are produced in all wombs, O son of Kunti, the great Brahman is their womb, and I am the seed-giving father.
टीका / Commentary
भगवान स्पष्ट करते हैं कि सभी शरीरों की जननी प्रकृति है और वे स्वयं बीजरूप जीव के दाता पिता हैं। The Lord clarifies that nature is the mother of all bodies and He is the father who gives the seed of life.