श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 3

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 41 मिनट का पठन 149 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् । सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥ ३॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
मम
मेरी
योनिः
योनी (कारण)
महद्ब्रह्म
महद्ब्रह्म (मूल प्रकृति)
तस्मिन्
उसमें
गर्भम्
गर्भ
दधामि
धारण करता हूँ
अहम्
मैं
सम्भवः
उत्पत्ति
सर्वभूतानाम्
सब प्राणियों की
ततः
उससे
भवति
होती है
भारत
हे भारत।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे भारत! मेरी योनी महद्ब्रह्म (प्रकृति) है, उसमें मैं गर्भ स्थापित करता हूँ, उससे सब प्राणियों की उत्पत्ति होती है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

ब्रह्मांडीय उत्पत्ति और चेतना का परम रहस्य

सनातन संस्कृति और वेदान्त दर्शन में सृष्टि की उत्पत्ति, उसका संचालन और उसमें निहित जीवात्मा के स्वरूप को समझाने के लिए अनगिनत ग्रंथों की रचना की गई है। परंतु श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय (गुणात्रयविभाग योग) का यह तृतीय श्लोक — 'मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्' — समस्त वेदों, उपनिषदों और पुराणों के निष्कर्ष को मात्र एक पंक्ति में अत्यंत सहजता और दिव्यता के साथ उद्घाटित कर देता है। भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन को यह समझाते हैं कि यह संपूर्ण चराचर जगत किस प्रकार परम पिता परमेश्वर और प्रकृति (माया) के संयुक्त समन्वय से उत्पन्न होता है।

आधुनिक विज्ञान आज जिस 'बिग बैंग' सिद्धांत या ऊर्जा और द्रव्य के समीकरण की खोज में व्यस्त है, उसका अत्यंत सूक्ष्म और आध्यात्मिक दृष्टिकोण हमारे ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व वेदों और स्मृतियों में लिपिबद्ध कर दिया था। यहाँ 'महद्ब्रह्म' को आदि प्रकृति या मूल अद्याशक्ति माना गया है, जो इस संपूर्ण ब्रह्मांड की जड़ योनि (सामग्री कारण) है। वहीं, स्वयं पुरुषोत्तम परमात्मा इसमें चेतन रूपी गर्भ स्थापित करते हैं। इस अद्भुत मिलन से ही समस्त चर और अचर जीवों की उत्पत्ति होती है। यह श्लोक केवल एक दार्शनिक सिद्धांत नहीं है, अपितु यह उस शाश्वत सत्य का बोध कराता है जो मनुष्य को भौतिकता के अंधकार से निकालकर अध्यात्म के प्रकाश की ओर ले जाता है।

Bhaktilok.in के इस विशेष पावन अंक में, हम इसी अलौकिक श्लोक के शब्दार्थ, गूढ़ भावार्थ, पौराणिक पृष्ठभूमि और इसके नियमित मनन से मिलने वाले मानसिक व आध्यात्मिक लाभों का विस्तार से अध्ययन करेंगे। यह लेख विशेष रूप से उन साधकों के लिए तैयार किया गया है जो वेदान्त की गहराइयों को सरल हिंदी में समझना चाहते हैं और अपनी आध्यात्मिक चेतना को उन्नत करना चाहते हैं।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक एवं गीता प्रसंग

गीता के चौदहवें अध्याय के इस श्लोक का सस्वर पाठ करने से मन को एकाग्रता और अद्भुत शांति मिलती है। आइए, इसका प्रामाणिक संस्कृत पाठ, उसका देवनागरी स्वरूप तथा उच्चारण विधि को समझें:

अथ चतुर्दशोऽध्यायः (गुणात्रयविभागयोग)

मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्।

सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत॥ ३॥

(श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १४, श्लोक ३)

श्लोक का अन्वय (पद-क्रम):

हे भारत! मम महद् ब्रह्म योनिः अस्मिन अहम् गर्भ दधामि, ततः सर्वभूतानाम् संभवः भवति।

उच्चारण निर्देश:

पाठ करते समय 'महद्ब्रह्म' (महत् + ब्रह्म) और 'तस्मिन्गर्भम्' के उच्चारण पर विशेष बल दें। अनुस्वार (म्) का उच्चारण स्पष्ट और शुद्ध होना चाहिए ताकि श्लोक की ऊर्जा और नाद का प्रभाव साधक के मन पर सकारात्मक पड़े।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द का अपना एक गहरा दार्शनिक महत्व है। नीचे दी गई तालिका में शब्दों के सरल हिंदी अर्थ और उनके आध्यात्मिक भावों को स्पष्ट किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
मम (Mama) मेरा / मेरे द्वारा यह दर्शाता है कि संपूर्ण सृष्टि और प्रकृति किसी स्वतंत्र सत्ता से नहीं, बल्कि सीधे परमेश्वर के अधीन और उन्हीं की शक्ति से संचालित है।
योनिः (Yoniḥ) उत्पत्ति का स्थान / प्रकृति / गर्भ यहाँ 'योनि' का अर्थ भौतिक शरीर से नहीं, अपितु उस मूल प्रकृति (Material Cause) से है जिससे समस्त ब्रह्मांडीय आकृतियों का निर्माण होता है।
महद्ब्रह्म (Mahad-brahma) महत् तत्त्व या मूल प्रकृति सांख्य दर्शन के अनुसार यह 'महत्' (बुद्धि तत्त्व) और प्रकृति का मिलाजुला रूप है, जिसे अद्याशक्ति या महामाया भी कहा जाता है।
तस्मिन् (Tasmin) उस (प्रकृति) में परमात्मा अपनी चेतन शक्ति को जड़ प्रकृति के भीतर समाहित करते हैं, जिससे जड़ और चेतन का अद्भुत मिलन संपन्न होता है।
गर्भम् (Garbham) चेतन बीज / जीवात्मा रूपी गर्भ भगवान द्वारा स्थापित वह सूक्ष्म चेतन ऊर्जा या जीवात्मा, जो किसी भी योनि में जन्म लेने वाले शरीर को प्राणवान बनाती है।
दधामि (Dadhami) मैं धारण करता हूँ / स्थापित करता हूँ यह क्रियापद यह सिद्ध करता है कि भगवान निष्क्रिय नहीं हैं, बल्कि वे निरंतर इस ब्रह्मांडीय गर्भधान और पोषण की प्रक्रिया के संचालक हैं।
अहम् (Aham) मैं (स्वयं भगवान श्रीकृष्ण) यहाँ 'अहम्' साक्षात परब्रह्म परमात्मा, वासुदेव श्रीकृष्ण की ओर संकेत करता है जो समस्त कारणों के भी परम कारण हैं।
सम्भवः (Sambhavah) उत्पत्ति / प्रकटीकरण / जन्म विभिन्न योनियों और रूपों में जीवात्माओं का प्रकट होना, जो प्रकृति के तीन गुणों (सत्व, रज, तम) के प्रभाव से होता है।
सर्वभूतानाम् (Sarva-bhutanam) समस्त भूत-प्राणियों के (स्थावर और जंगम) ब्रह्मा से लेकर कीट, पतंग, वृक्ष, पशु और मनुष्य तक — इस सृष्टि में जन्म लेने वाले सभी प्रकार के जीव इसमें सम्मिलित हैं।
ततः (Tatah) उससे (उस संयोग से) प्रकृति और परमात्मा के इस पावन और अनिवार्य संयोग के परिणाम स्वरूप ही संपूर्ण सृष्टि का प्रादुर्भाव होता है।
भवति (Bhavati) होता है / उत्पन्न होता है सृष्टि की निरंतरता और सनातन प्रवाह का द्योतक है, जो कभी रुकता नहीं बल्कि चक्र की भाँति घूमता रहता है।
भारत (Bharata) हे अर्जुन (भारत वंशज) भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को इस महान ज्ञान को ग्रहण करने के लिए संबोधित किया गया विशेष आदरसूचक नाम।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Context)

श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय के आरंभ में ही भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को वेदों का सार बताते हुए कहते हैं — 'परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञातानां ज्ञानमुत्तमम्' (मैं तुम्हें फिर से उस उत्तम ज्ञान को कहूँगा, जो सभी ज्ञानों में श्रेष्ठ है)। इस अध्याय का मुख्य विषय प्रकृति और पुरुष (जीवात्मा और परमात्मा) के संबंधों को स्पष्ट करना तथा तीन गुणों (सत्व, रज, तम) के बंधनों से जीव को मुक्त कराना है।

पौराणिक और सांख्य दर्शन के परिप्रेक्ष्य में, महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आने वाली भगवद्गीता हमें यह सिखाती है कि यह संपूर्ण जगत न तो मात्र संयोग है और न ही किसी अंधकारमय शक्ति का परिणाम। यह भगवान की योगमाया द्वारा रचित एक अत्यंत सुव्यवस्थित व्यवस्था है। जब अर्जुन ने भगवान से यह प्रश्न किया कि हे केशव! यह जीवात्मा किस प्रकार इस शरीर में बंधती है और इस संसार की रचना कैसे होती है, तब भगवान श्रीकृष्ण ने प्रकृति को 'माता' और स्वयं को 'पिता' के रूप में चित्रित करते हुए इस श्लोक का उच्चारण किया।

शास्त्रों में वेदों का उल्लेख करते हुए उपनिषदों में भी यही बात कही गई है— 'एको देवः सर्वभूतेषु गुप्तः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा'। अर्थात, वह एक ही परम देव समस्त भूतों में छिपा हुआ है और सबका अंतरात्मा है। भगवान श्रीकृष्ण ने इस श्लोक में स्पष्ट कर दिया कि प्रकृति (महद्ब्रह्म) केवल साधन है और कर्ता व बीज को स्थापित करने वाले स्वयं परमात्मा हैं। इस प्रकार, जीव और प्रकृति का यह बंधन अनादि काल से चला आ रहा है, जिसे केवल भगवत कृपा या आत्मज्ञान के माध्यम से ही तोड़ा जा सकता है।

यह ऐतिहासिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि हमें यह समझने में सहायता करती है कि हमारा शरीर और यह भौतिक संसार कितना पवित्र है, क्योंकि इसके मूल में सीधे परमेश्वर की चेतन ऊर्जा कार्य कर रही है। जब साधक इस शास्त्रीय दृष्टिकोण को अपने जीवन में उतारता है, तो उसके भीतर हर प्राणी के प्रति करुणा, प्रेम और आदर का भाव स्वतः जागृत हो जाता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के इस पावन श्लोक का नियमित पठन, मनन और इसके अर्थ पर विचार करने से साधक के जीवन में अनेकानेक सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। यहाँ इसके प्रमुख आध्यात्मिक और मानसिक लाभों का वर्णन किया गया है:

मानसिक शांति और एकाग्रता

इस श्लोक के सस्वर पाठ से मस्तिष्क की तरंगे शांत होती हैं। संस्कृत के वेदों-पुराणों के नाद से मानसिक तनाव, चिंता और अवसाद दूर होते हैं तथा ध्यान की गहरी अवस्था प्राप्त होती है।

अहंकार का शमन और विनम्रता

यह बोध होने पर कि हम सब उसी एक परम पिता और प्रकृति की संतान हैं, मनुष्य के भीतर से 'मैं और मेरा' का अहंकार समाप्त हो जाता है और वह अत्यंत विनम्र व परोपकारी बन जाता है।

सकारात्मक और दिव्य औरा (Aura) का निर्माण

नियमित रूप से गीता के श्लोकों का जाप करने से व्यक्ति के चारों ओर एक उच्च कंपन वाली सकारात्मक ऊर्जा का आवरण बनता है, जो नकारात्मक शक्तियों और विचारों को दूर रखता है।

कर्मिक शुद्धि और मोक्ष का मार्ग

प्रकृति और परमात्मा के इस रहस्य को समझने से साधक सांसारिक बंधनों में उलझने के बजाय अपने कर्मों को ईश्वरार्पण करना सीख जाता है, जिससे उसके संचित कर्मों की शुद्धि होती है।

समता भाव और जीव मात्र के प्रति प्रेम

जब यह ज्ञान हो जाता है कि सभी जीवों में एक ही परमात्मा का अंश (गर्भ) विद्यमान है, तो साधक किसी भी प्राणी के प्रति द्वेष या हिंसा नहीं रखता, बल्कि सभी जीवों में ईश्वर के दर्शन करता है।

ईश्वरीय शरणागति की प्राप्ति

यह श्लोक साधक को यह अहसास कराता है कि इस जीवन का असली नियंता ईश्वर है। इससे भगवान के चरणों में अगाध भक्ति और पूर्ण शरणागति (Surrender) का भाव उत्पन्न होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in पर प्रकाशित यह लेख वेदान्त दर्शन, श्रीमद्भगवद्गीता (श्रीमद्भगवद्गीता शांकर भाष्य एवं विभिन्न पारंपरिक टीकाओं), और सांख्य दर्शन के मूल सिद्धांतों के गहन अध्ययन के पश्चात हमारे वरिष्ठ विद्वानों और संस्कृत भाषाविदों द्वारा तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक सनातन धर्म के गूढ़ सत्यों को अत्यंत प्रामाणिक, सरल और बिना किसी भ्रामक दावे के पहुँचाना है।

संदर्भ ग्रंथ: श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय १४, श्लोक ३), महर्षि वेद व्यास रचित महाभारत (भीष्म पर्व), तथा स्वामी रामसुखदास जी एवं आदि शंकराचार्य जी की गीता टीकाएँ। इस लेख का उद्देश्य पाठकों में आध्यात्मिक जिज्ञासा जगाना और उन्हें भारतीय संस्कृति के मूल ग्रंथों से जोड़ना है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

'महद्ब्रह्म' का शाब्दिक अर्थ महान ब्रह्म या मूल प्रकृति (अद्याशक्ति/माया) है। सांख्य दर्शन के अनुसार यह वह आदि शक्ति है जो समस्त भौतिक पदार्थों और तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार) की योनि या कारण है। भगवान श्रीकृष्ण इसे अपनी ही शक्ति (अपरा प्रकृति) बताते हैं।

इसका तात्पर्य यह है कि यद्यपि प्रकृति (महद्ब्रह्म) इस संसार की सामग्री कारण है, परंतु वह जड़ है। जब तक उसमें परमात्मा (चेतन पुरुष) अपनी चेतन शक्ति या जीवात्मा रूपी बीज (गर्भ) को स्थापित नहीं करते, तब तक सृष्टि में जीवन का संचार नहीं हो सकता। भगवान यह स्पष्ट करते हैं कि जड़ प्रकृति और चेतन परमात्मा के मिलन से ही सब जीव उत्पन्न होते हैं।

गीता का चौदहवां अध्याय 'गुणात्रयविभाग योग' कहलाता है। इस अध्याय में मुख्य रूप से प्रकृति के तीन गुणों — सत्व, रज और तम — का विस्तृत वर्णन किया गया है। यह अध्याय यह समझाता है कि ये तीनों गुण किस प्रकार जीवात्मा को शरीर में बांधते हैं और इनसे परे जाकर मोक्ष या ब्रह्मभाव को कैसे प्राप्त किया जा सकता है।

इस श्लोक का नियमित मनन करने से व्यक्ति के भीतर यह गहरी समझ विकसित होती है कि इस संसार का हर जीव ईश्वर का अंश है। इससे मन का अहंकार मिटता है, मानसिक शांति मिलती है, क्रोध व ईर्ष्या कम होती है और समस्त चराचर जगत के प्रति प्रेम और करुणा का भाव जागृत होता है।

निश्चित रूप से! श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक हर उस मनुष्य के लिए है जो जीवन के सत्यों को समझना चाहता है। गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी यदि कोई साधक भगवद्गीता के इन श्लोकों का नियमित पाठ और चिंतन करता है, तो वह अपने पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों को निभाते हुए भी आध्यात्मिक रूप से उन्नत हो सकता है।

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पवित्र ग्रंथों का अध्ययन करें, अपने जीवन को सार्थक बनाएं। हरिः ओम् तत् सत्।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं कि उनकी योनी (कारण) महद्ब्रह्म (मूल प्रकृति) है। उस प्रकृति में वे जीवात्मा रूप गर्भ स्थापित करते हैं, जिससे सभी प्राणियों की उत्पत्ति होती है। The Lord says that His womb is the great Brahman (primordial nature); He places the seed (souls) in it, and thus all beings are born.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

भगवान समस्त सृष्टि के पिता हैं और प्रकृति माता। सभी जीव उन्हीं के अंश हैं। The Lord is the father of all creation, and nature is the mother; all souls are parts of Him.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 3 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 3/27 11% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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