गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – श्लोक 2

श्लोक २ में बताया गया है कि इस ज्ञान को प्राप्त करने वाला भगवान के समान हो जाता है और जन्म-मृत्यु से मुक्त हो जाता है। Verse 2: One who attains this knowledge becomes like the Lord and transcends birth and death.

संस्कृत श्लोक

इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥ २॥

idaṃ jñānam upāśritya mama sādharmyam āgatāḥ | sarge'pi nopajāyante pralaye na vyathanti ca ||2||

पदच्छेद / शब्दार्थ

इदम्: इस; ज्ञानम्: ज्ञान को; उपाश्रित्य: आश्रय लेकर; मम: मेरे; साधर्म्यम्: समान स्वभाव को; आगताः: प्राप्त हुए; सर्गेऽपि: सृष्टि में भी; न: नहीं; उपजायन्ते: उत्पन्न होते; प्रलये: प्रलय में; न: नहीं; व्यथन्ति: व्यथित होते; च: और।

हिंदी अनुवाद

इस ज्ञान का आश्रय लेकर वे मेरे समान स्वभाव को प्राप्त हो जाते हैं। न तो वे सृष्टि में उत्पन्न होते हैं और न प्रलय में व्यथित होते हैं।

English Translation

Having taken refuge in this knowledge, they attain to unity with Me. They are neither born at the time of creation nor are they disturbed at the time of dissolution.

टीका / Commentary

जो इस ज्ञान को धारण कर लेता है वह भगवत्स्वरूप हो जाता है। फिर उसके लिए न जन्म है न मृत्यु। One who attains this knowledge becomes one with the Lord, beyond birth and death.