श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 2

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 40 मिनट का पठन 143 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥ २॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
इदम्
इस
ज्ञानम्
ज्ञान को
उपाश्रित्य
आश्रय लेकर
मम
मेरे
साधर्म्यम्
समान स्वभाव को
आगताः
प्राप्त हुए
सर्गेऽपि
सृष्टि में भी
न
नहीं
उपजायन्ते
उत्पन्न होते
प्रलये
प्रलय में
न
नहीं
व्यथन्ति
व्यथित होते
च
और।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

इस ज्ञान का आश्रय लेकर वे मेरे समान स्वभाव को प्राप्त हो जाते हैं। न तो वे सृष्टि में उत्पन्न होते हैं और न प्रलय में व्यथित होते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अध्याय १४, श्लोक २ का समग्र आध्यात्मिक और ब्रह्मांडीय महत्त्व

सनातन धर्म के सर्वोच्च ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने मानव जाति के कल्याण के लिए अनेक योगों का उपदेश दिया है। चौदहवाँ अध्याय, जिसका शीर्षक 'गुणात्रयविभाग योग' है, विशेष रूप से प्रकृति के तीन गुणों—सत्व, रज और तम—के बंधन और उनसे परे होने के उपायों का अत्यंत सूक्ष्म एवं वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इस अध्याय के द्वितीय श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को उस परम ज्ञान की महिमा बता रहे हैं, जिसे प्राप्त करके मनुष्य न केवल इस भौतिक संसार के बंधनों से मुक्त हो जाता है, बल्कि वह प्रत्यक्ष रूप से भगवत्स्वरूप (मम साधर्म्यम्) को प्राप्त कर लेता है। यह श्लोक केवल एक दार्शनिक कथन नहीं है, बल्कि यह जीवमात्र के लिए जन्म और मृत्यु के अंतहीन चक्र से सदा के लिए छूटने का एक अचूक आध्यात्मिक मार्गदर्शक है।

वैदिक संस्कृति और दर्शन के अनुसार, संपूर्ण ब्रह्मांड भगवान की ही ऊर्जा से संचालित है। जब जीव भौतिक प्रकृति (प्रकृति के त्रिगुणों) के अधीन रहता है, तब तक वह सर्ग (सृष्टि के आरंभ) में जन्म लेता है और प्रलय (महाविनाश या संहार के समय) में पीड़ा का अनुभव करता है। परंतु, जब वह गुरु और शास्त्रों के माध्यम से उस ब्रह्मज्ञान को आत्मसात् कर लेता है, जो समस्त बंधनों से परे है, तब उसका दृष्टिकोण पूरी तरह बदल जाता है। वह माया के आवरण को चीरकर अपनी मूल चैतन्य अवस्था—जो सच्चिदानंद स्वरूप है—में स्थित हो जाता है। इस स्थिति को ही 'साधर्म्य मुक्ति' कहा जाता है, जहाँ जीव भगवान के गुणों और उनकी दिव्य प्रकृति के समान हो जाता है। Bhaktilok.in के इस विस्तृत आलेख में हम इसी गूढ़ श्लोक के हर एक पक्ष का अत्यंत गहन, शास्त्रीय और तार्किक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं, ताकि साधकगण अपने दैनिक जीवन में इसे उतारकर आध्यात्मिक उन्नति की पराकाष्ठा को छू सकें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

श्रीमद्भगवद्गीता — चतुर्दशोऽध्यायः (गुणात्रयविभाग योग) — श्लोक २

इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥ २॥

पदच्छेद (संस्कृत पद विभाजन):

इदम् ज्ञानम् उपाश्रित्य मम साधर्म्यम् आगताः ।
सर्गे अपि न उपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥

अन्वय (पाठ विधि): (हे अर्जुन!) इदं ज्ञानम् उपाश्रित्य मम साधर्म्यम् आगताः (जनाः) सर्गे अपि न उपजायन्ते प्रलये च न व्यथन्ति।
साधारण अर्थ: इस ज्ञान को अच्छी प्रकार से प्राप्त करके जो पुरुष मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं, वे भी सृष्टिकाल में उत्पन्न नहीं होते और प्रलयकाल में भी व्यथित (नष्ट या भयभीत) नहीं होते।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
इदम् (Idam) इस यहाँ 'इदम्' शब्द भगवान श्रीकृष्ण द्वारा आगे और पीछे कहे गए उस विशिष्ट ब्रह्मज्ञान की ओर संकेत करता है जो त्रिगुणमयी माया से पार ले जाता है।
ज्ञानम् (Jnanam) ज्ञान यह साधारण सांसारिक विद्या नहीं, बल्कि आत्मज्ञान, अपरा और परा प्रकृति का विवेक तथा भगवत्स्वरूप का साक्षात अनुभव कराने वाला पराविद्या ज्ञान है।
उपाश्रित्य (Upashritya) आश्रय लेकर / धारण करके ज्ञान को केवल सुन लेना या पढ़ लेना पर्याप्त नहीं है; उसे अपने जीवन का आधार बनाना, उसका आश्रय लेना और उसके अनुसार आचरण करना ही 'उपाश्रित्य' है।
मम (Mama) मेरे यह सर्वेश्वर भगवान श्रीकृष्ण का निज संबोधन है, जो यह स्पष्ट करता है कि ज्ञान का स्रोत स्वयं परम पुरुष परमात्मा हैं।
साधर्म्यम् (Sadharmyam) स्वरूपता / समानता इसका अर्थ भगवान जैसा होना नहीं, बल्कि भगवद्भाव को प्राप्त करना है, जहाँ जीव के गुण भगवान के दिव्य गुणों (आनंद, चैतन्य, अमरता) जैसे हो जाते हैं।
आगताः (Aagatah) प्राप्त हो चुके हैं जो साधक इस अवस्था को पहुँच जाते हैं, वे जीवनमुक्ताः कहलाते हैं। वे जीते-जी संसार के बंधनों से पूरी तरह मुक्त हो चुके होते हैं।
सर्गेऽपि (Sarge 'pi) सृष्टि के आरंभ में भी जब ब्रह्माजी पुनः नई सृष्टि की रचना करते हैं, तब साधारण जीव पुनः जन्म लेते हैं, किंतु ज्ञानियों का पुनः योनि-चक्र में पतन नहीं होता।
न उपजायन्ते (Na Upajayante) उत्पन्न नहीं होते उनके लिए भौतिक जन्म का विधान समाप्त हो जाता है क्योंकि उनका कर्माशय (कर्मों के संस्कार) ज्ञान की अग्नि से भस्म हो चुका होता है।
प्रलये (Pralaye) प्रलयकाल में (महाविनाश के समय) जब संपूर्ण ब्रह्मांडीय तत्व अपने मूल कारणों में विलीन होने लगते हैं, उस भयंकर प्रलय की स्थिति में भी।
न व्यथन्ति च (Na Vyathanti Cha) और व्यथित नहीं होते वे मृत्यु, विनाश, भय या पीड़ा के किसी भी प्रकटन से विचलित नहीं होते क्योंकि उनकी चेतना अमर और अविनाशी आत्मा में स्थिर होती है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय की पृष्ठभूमि कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में तैयार होती है, जहाँ कौरवों और पांडवों की सेनाएँ आमने-सामने खड़ी हैं। अर्जुन भयंकर मानसिक विषाद और कर्तव्य-विमूढ़ता की स्थिति में हैं। भगवान श्रीकृष्ण उन्हें जीवन, मृत्यु, धर्म, कर्म और मुक्ति के रहस्यों को समझाने के लिए योगशास्त्र का उपदेश देते हैं। तेरहवें अध्याय में क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) का भेद समझाने के बाद, चौदहवें अध्याय के आरंभ में भगवान यह घोषणा करते हैं कि "मैं फिर से उस परम ज्ञान को कहूँगा, जो समस्त ज्ञानों में उत्तम है, जिसे जानकर सभी मुनियों ने इस संसार से परासिद्धि को प्राप्त किया है।"

वेदों, उपनिषदों और पुराणों में इस बात की बार-बार पुनरावृत्ति की गई है कि इस संसार (संसार चक्र) का मूल कारण अज्ञान (विद्या का अभाव) और प्रकृति के तीन गुण—सत्व, रज और तम हैं। जब तक जीव इन तीनों गुणों के जाल में फंसा रहता है, तब तक वह प्रकृति के नियमों के अंतर्गत बंधा रहता है। पुराणों में महर्षि वेद व्यास, नारद मुनि, सनत्कुमार और शुकदेव जैसे महान ऋषियों के आख्यानों में इसी 'साधर्म्य मुक्ति' का वर्णन मिलता है। उदाहरण के लिए, जब राजा परीक्षित को शुकदेव जी ने श्रीमद्भागवत महापुराण का ज्ञान दिया, तो परीक्षित जी मृत्यु के भय से पूरी तरह मुक्त हो गए। प्रलय या मृत्यु उनके लिए कोई भय का विषय नहीं रही, बल्कि वह एक दिव्य यात्रा बन गई। यही इस श्लोक का मूल ऐतिहासिक और पौराणिक आधार है जो यह सिद्ध करता है कि भगवान का यह उपदेश कालजयी है और हर युग के मानव के लिए प्रासंगिक है।

त्रिगुण से परे होने का रहस्य

"गुणात्रयविभाग योग" केवल वैराग्य की बात नहीं करता, बल्कि यह प्रकृति के संचालन को गहराई से समझने की दृष्टि देता है।

  • ✅ सत्व गुण: सुख और ज्ञान से बांधता है।
  • ✅ रज गुण: कामना और कर्म-आसक्ति से बांधता है।
  • ✅ तम गुण: प्रमाद, आलस्य और निद्रा से बांधता है।
  • ✅ ब्रह्मज्ञान: इन तीनों गुणों के पार ले जाकर साधक को 'गुणातीत' और 'मम साधर्म्य' बना देता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के इन पावन श्लोकों का नियमित पठन, मनन और इनके अर्थ का स्मरण करने से मानव जीवन में असीम सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। यहाँ इसके प्रमुख आध्यात्मिक और मानसिक लाभों की सूची दी गई है:

1. जन्म-मरण के भय से मुक्ति

इस श्लोक के गूढ़ अर्थ को हृदयंगम करने से मनुष्य के मन से मृत्यु का अस्वाभाविक भय सदा के लिए समाप्त हो जाता है और वह आत्मा की अमरता को अनुभव करता है।

2. मानसिक शांति और स्थिरता

प्रकृति के द्वंद्वों (सुख-दुःख, मान-अपमान, लाभ-हानि) में विचलित न होने की अद्भुत मानसिक शक्ति प्राप्त होती है, जिससे चित्त शांत रहता है।

3. कार्मिक शुद्धि (कर्मों का बंधन काटना)

दिव्य ज्ञान के प्रकाश में किए गए कार्य और विचारों का शुद्धिकरण होता है, जिससे पुराने संचित कर्मों (कर्माशय) का क्षय होने लगता है।

4. दिव्य आभा (Aura) का विस्तार

श्लोक का उच्चारण और ध्यान करने से साधक की सूक्ष्म ऊर्जा तरंगें उच्च आयामों से जुड़ती हैं, जिससे शरीर और मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

5. भगवत्कृपा की प्राप्ति

जो साधक भगवान के इस परम ज्ञान को अपने जीवन का लक्ष्य बनाता है, उस पर साक्षात योगेश्वर श्रीकृष्ण की अहैतुषी कृपा बरसती है।

6. प्रलयकालीन आपदाओं में धैर्य

जीवन की बड़ी से बड़ी उथल-पुथल या संकट (जिसे यहाँ प्रलय कहा गया है) आने पर भी साधक का विवेक और धैर्य डगमगाता नहीं है।

7. अहंभाव का शमन

'मैं शरीर हूँ' इस भ्रांति का नाश होता है और 'मैं शुद्ध चेतना हूँ' इस बोध की स्थापना होती है, जिससे अहंकार स्वतः गल जाता है।

8. मोक्ष और सायुज्य की पात्रता

साधक इस भौतिक जगत की सीमाओं से ऊपर उठकर परब्रह्म परमात्मा में लीन होने की पात्रता सहज ही प्राप्त कर लेता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत Bhaktilok.in की विशेषज्ञ शोध टीम यह सुनिश्चित करती है कि सनातन धर्म के मूल ग्रंथों—विशेषकर श्रीमद्भगवद्गीता (वेदव्यासकृत महाभारत), श्रीमद्भागवत महापुराण, और विभिन्न आचार्यों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामानुज और स्वामी गीतानंद) के भाष्यों का पूर्ण सम्मान करते हुए प्रामाणिक अर्थ प्रस्तुत किए जाएं। इस आलेख में उद्धृत श्लोक का विश्लेषण केवल शाब्दिक अनुवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आधुनिक युग के पाठकों की मानसिक और आध्यात्मिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए दार्शनिक गहराई के साथ प्रस्तुत किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों को बिना किसी भ्रम के शुद्ध, सनातन और वेदान्त सम्मत ज्ञान प्रदान करना है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

'मम साधर्म्यमागताः' का अर्थ भगवान बन जाना नहीं है, बल्कि भगवान के समान दिव्य गुणों, आनंद, और अमरता को प्राप्त कर लेना है। वेदांत दर्शन के अनुसार, जीव अपनी मूल प्रकृति में सच्चिदानंद स्वरूप है, किंतु माया के कारण वह अपने को भूल जाता है। जब वह ब्रह्मज्ञान पा लेता है, तो वह भगवान के स्वभाव और चेतना के साथ एकरूप (साधर्म्य) हो जाता है।

हाँ, जो पुरुष इस परम ज्ञान को पाकर जीवनमुक्त हो जाते हैं और अपने चित्त को पूरी तरह परमात्मा में स्थिर कर लेते हैं, वे महाप्रलय के पश्चात जब नई सृष्टि (सर्ग) होती है, तब साधारण जीवों की तरह कर्मवश योनि-चक्र में उत्पन्न नहीं होते। यदि वे इस लोक में आते भी हैं, तो वे लोकसंग्रह के लिए स्वेच्छा से आने वाले महापुरुष या अवतारी सत्ता के रूप में आते हैं, न कि कर्मों के बंधन के कारण।

इसे जीवन में उतारने के लिए सबसे पहले हमें अपने भीतर बैठे सत्व, रज और तम गुणों को पहचानना होगा। तामसिक (आलस्य, अज्ञान) और राजसिक (अत्यधिक कामना, बेचैनी) प्रवृत्तियों को कम करके सात्विक भाव को बढ़ाना होगा। इसके साथ ही, नित्यप्रति भगवद्गीता का अध्ययन, ध्यान, और निष्काम भाव से कर्म करने की आदत डालकर इस ज्ञान को अपने आचरण में लाया जा सकता है।

सामान्य मनुष्य अपनी पहचान अपने नाशवान शरीर और मन से जोड़ता है, इसलिए जब शरीर या संसार का नाश (प्रलय) होता है, तो उसे भारी मानसिक पीड़ा और भय होता है। इसके विपरीत, ज्ञानी पुरुष अपनी पहचान अविनाशी आत्मा से करते हैं। वे जानते हैं कि शरीर केवल वस्त्र की तरह बदलता है, इसलिए प्रलयकाल में भी उनकी आंतरिक चेतना पूरी तरह शांत और निर्विकार रहती है।

शास्त्रों स्पष्ट करते हैं कि केवल श्लोक का उच्चारण या पाठ एक बीज मंत्र की तरह कार्य करता है, जो सकारात्मक ऊर्जा और सद्बुद्धि देता है। परंतु, पूर्ण मुक्ति (साधर्म्य) के लिए केवल पाठ पर्याप्त नहीं है; श्लोक में बताए गए ज्ञान को 'उपाश्रित्य' (यानी अपने आचरण, विचार और जीवनशैली में गहराई से धारण करना) भी अनिवार्य है। साधना, भक्ति और ज्ञान का समन्वय ही सफलता की कुंजी है।

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Editor: Chief Devotional Scholar & Sanskrit Linguist, Bhaktilok Editorial Board.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

इस ज्ञान का आश्रय लेने से साधक भगवान के समान धर्म वाला हो जाता है। वह सृष्टि के आरम्भ में जन्म नहीं लेता और प्रलय में भयभीत नहीं होता। By resorting to this knowledge, one attains the same nature as the Lord, and remains unaffected by creation and dissolution.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

आत्मज्ञानी पुरुष प्रकृति के कार्यों से परे हो जाता है। वह सृष्टि और प्रलय के समय भी अविकारी रहता है। The self-realized soul transcends the workings of nature and remains immutable during cosmic changes.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 2 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 2/27 7% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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