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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 14 · श्लोक 20

अध्याय 14 · श्लोक 20

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् । जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥ २०॥

guṇān etān atītya trīn dehī deha-samudbhavān | janma-mṛtyu-jarā-duḥkhair vimukto 'mṛtam aśnute ||20||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

गुणान्: गुणों को; एतान्: इन; अतीत्य: अतिक्रम करके; त्रीन्: तीनों; देही: देहधारी; देहसमुद्भवान्: शरीर से उत्पन्न; जन्म-मृत्यु-जरा-दुःखैः: जन्म, मृत्यु, जरा और दुःखों से; विमुक्तः: मुक्त हुआ; अमृतम्: अमृत; अश्नुते: भोगता है (प्राप्त करता है)।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

इन तीनों गुणों को, जो शरीर से उत्पन्न होते हैं, अतिक्रमण करके देही जन्म, मृत्यु, जरा और दुःखों से मुक्त होकर अमृत को प्राप्त होता है।

English Translation

Having transcended these three gunas, which are the cause of the body, the embodied one, freed from birth, death, old age and pain, attains immortality.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

गुणों के पार जाने पर आत्मा जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर अमरत्व प्राप्त करती है। By transcending the gunas, the soul becomes free from the cycle of birth and death and attains immortality.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।