श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 20

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 43 मिनट का पठन 135 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् । जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥ २०॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
गुणान्
गुणों को
एतान्
इन
अतीत्य
अतिक्रम करके
त्रीन्
तीनों
देही
देहधारी
देहसमुद्भवान्
शरीर से उत्पन्न
जन्म-मृत्यु-जरा-दुःखैः
जन्म, मृत्यु, जरा और दुःखों से
विमुक्तः
मुक्त हुआ
अमृतम्
अमृत
अश्नुते
भोगता है (प्राप्त करता है)।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

इन तीनों गुणों को, जो शरीर से उत्पन्न होते हैं, अतिक्रमण करके देही जन्म, मृत्यु, जरा और दुःखों से मुक्त होकर अमृत को प्राप्त होता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय चेतना

सनातन धर्म और भारतीय दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि साक्षात ब्रह्मविद्या और उपनिषदों का सार माना गया है। कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानवता को दिया गया यह ज्ञान मनुष्य को उसके भौतिक अस्तित्व की सीमाओं से ऊपर उठाकर अनंत ब्रह्मांडीय चेतना से जोड़ने का सामर्थ्य रखता है। भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय का यह अत्यंत महत्वपूर्ण श्लोक—"गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् । जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥ २०॥"—वेदांत दर्शन का वह शिखर है, जहाँ जीव अपनी नश्वरता और सांसारिक बंधनों को पीछे छोड़कर अमरता और सच्चिदानंद स्वरूप की अनुभूति करता है।

यह श्लोक प्रकृति के तीन गुणों—सत्व, रज और तम—की व्याख्या और उनसे परे जाने की अनिवार्य प्रक्रिया को रेखांकित करता है। संसार में जितने भी जीव हैं, वे इस भौतिक शरीर में रहते हुए प्रकृति के इन त्रिविध गुणों से बंधे हुए हैं। ये गुण ही मनुष्य के सुख, दुख, मोह, अहंकार, आलस्य और कर्मों के संचालक हैं। जब तक मनुष्य इन गुणों के अधीन रहता है, तब तक वह जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और विभिन्न प्रकार के दैहिक, दैविक एवं भौतिक दुखों के चक्रव्यूह में उलझा रहता है।

वैदिक संस्कृति में 'अमृतमश्नुते' (अमृतत्व की प्राप्ति) का अर्थ केवल शारीरिक अमरता नहीं है, बल्कि उस अद्वैत स्थिति को प्राप्त करना है जहाँ जन्म और मरण का चक्र सदा के लिए समाप्त हो जाता है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि किस प्रकार अंतःकरण की शुद्धि और ज्ञान की ज्योति से साधक इन तीनों गुणों का अतिक्रमण करके जीवनकाल में ही जीवमुक्त (जीवनमुक्त) हो सकता है। भक्तीलोक (Bhaktilok.in) के इस विशेष अध्ययन में हम इसी दिव्य श्लोक के शाब्दिक अर्थ, दार्शनिक गहराई, पौराणिक पृष्ठभूमि और व्यावहारिक जीवन में इसके प्रयोग पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

देवनागरी मूल श्लोक

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् ।
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥ २०॥

(श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १४, श्लोक २०)

उच्चारण विधि एवं संकेत
  • गुणानेतानतीत्य: गुणों + एतान् + अतीत्य (संधि विच्छेद का ध्यान रखें)।
  • त्रीन्देही: त्रीन् + देही (अनुस्वार और विसर्ग का स्पष्ट उच्चारण)।
  • देहसमुद्भवान्: शरीर से उत्पन्न होने वाले तीनों गुण।
  • अमृतमश्नुते: अमृतम् + अश्नुते (अमृतत्व को प्राप्त करता है)।
श्लोक का सरल भावार्थ:

जब यह मनुष्य शरीर की उत्पत्ति के कारणस्वरूप इन तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) को लांघ जाता है, तब वह जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और सब प्रकार के दुखों से मुक्त होकर अमरत्व (ब्रह्मभाव) को प्राप्त हो जाता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ

वैदिक संस्कृत व्याकरण और अद्वैत वेदांत के परिप्रेक्ष्य में इस श्लोक के प्रत्येक पद का सूक्ष्म विश्लेषण निम्नलिखित तालिका में प्रस्तुत है, जो इसके दार्शनिक मर्म को स्पष्ट करता है:

पद / शब्द (Sanskrit Term) सरल हिंदी अर्थ (Literal Meaning) आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ (Philosophical Interpretation)
गुणान् (Gunān) तीनों गुणों को (सत्व, रज, तम) प्रकृति की तीन बुनियादी ऊर्जाएं जो भौतिक सृष्टि का निर्माण करती हैं और आत्मा को बांधती हैं।
एतान् (Etān) इन (पूर्ववर्णित) वे गुण जिनका वर्णन भगवान कृष्ण ने इस अध्याय के आरंभिक श्लोकों में विस्तार से किया है।
अतीत्य (Atītya) लांघकर, पार करके इन गुणों के प्रभाव, आकर्षण और बंधनों से पूरी तरह ऊपर उठ जाना या तटस्थ हो जाना।
त्रीन् (Trīn) तीनों (संख्या में तीन) सत्व (प्रकाश/ज्ञान), रज (गति/कामकाज), और तम (अंधकार/आलस्य) का संपूर्ण त्रय।
देही (Dehī) देहधारी, शरीर में रहने वाला जीव वह जीवात्मा जो भौतिक शरीर रूपी आवरण में निवास करती है, किंतु मूलतः अजर-अमर है।
देहसमुद्भवान् (Dehasamudbhavān) शरीर की उत्पत्ति करने वाले वे गुण जो इस भौतिक शरीर के निर्माण और इसके अस्तित्व के मूल कारण हैं।
जन्ममृत्युजरा (Janmamṛtyujarā) जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था भौतिक संसार के वे अनिवार्य और शाश्वत चक्र व कष्ट जिनसे हर जीव भयभीत रहता है।
दुःखैः (Duḥkhaiḥ) तमाम प्रकार के दुखों से आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक ताप व संताप जो जीवन में अनुभव होते हैं।
विमुक्तः (Vimuktaḥ) पूरी तरह मुक्त होकर बंधन और कर्मफलों की श्रृंखला से सर्वथा और हमेशा के लिए स्वतंत्र हो जाना।
अमृतमश्नुते (Amṛtamaśnute) अमरत्व का अनुभव करता है परमात्मा के साथ अपनी एकता का बोध करते हुए सच्चिदानंद पद को प्राप्त करना।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय का नाम 'गुणात्रयविभाग योग' है। इस संपूर्ण अध्याय की पृष्ठभूमि महाभारत के महासमर से जुड़ी है, जब अर्जुन अपने स्वजनों को सामने देखकर विषादग्रस्त हो जाते हैं और भगवान श्रीकृष्ण उन्हें जीवन, मृत्यु, कर्म और प्रकृति के रहस्यों से अवगत कराते हैं। इस विशेष श्लोक तक पहुँचने से पहले, भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बहुत ही विस्तार से समझाया है कि कैसे प्रकृति के तीन गुण—सत्व, रज और तम—सम्पूर्ण ब्रह्मांड को जकड़े हुए हैं।

पौराणिक कथाओं और वैदिक ग्रंथों (विशेषकर उपनिषदों) में प्रकृति (प्रकृतिः) और पुरुष (आत्मा) के संबंध का बहुत सुंदर वर्णन मिलता है। महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के इस अंश में भगवान कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि सत्व गुण मनुष्य को सुख और ज्ञान के बंधन में बांधता है, रज गुण कर्म और तृष्णा के बंधन में बांधता है, और तम गुण प्रमाद, आलस्य तथा निद्रा के माध्यम से मनुष्य के विवेक को आच्छादित कर लेता है। जब तक कोई साधक इन तीनों में से किसी एक या संमिलित प्रभाव में रहता है, तब तक उसकी आत्मा शरीर के साथ तदाकार (एकरूप) महसूस करती है।

अर्जुन ने जिज्ञासा प्रकट की थी कि हे प्रभु! इन तीनों गुणों से परे हुआ मनुष्य किन लक्षणों को धारण करता है और उसका आचरण कैसा होता है? उसी के उत्तर में भगवान ने यह श्लोक कहा। इस प्रसंग का संबंध सांख्य दर्शन से भी है, जहाँ प्रकृति के चौबीस तत्वों से परे पुरुष (आत्मा) की स्वतंत्र सत्ता को स्वीकार किया गया है। जब साधक निष्काम कर्मयोग, ध्यान योग और गुरु कृपा के माध्यम से अपने अंतःकरण को इन गुणों के द्वंद्व (राग-द्वेष, मान-अपमान, सुख-दुख) से ऊपर उठा लेता है, तब वह देहाध्यास (शरीर ही मैं हूँ ऐसा भ्रम) से मुक्त हो जाता है।

शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि महर्षि शुकदेव, राजा जनक और प्रह्लाद जैसे महापुरुषों ने इसी अवस्था को अपने जीवन में प्राप्त किया था। यह श्लोक भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का वह मेरुदमरु है जो हमें यह याद दिलाता है कि हमारा वास्तविक स्वरूप शरीर या मन नहीं, बल्कि उससे परे अनंत चैतन्य है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के इस पावन श्लोक का नियमित पठन, मनन और इसके अर्थ को जीवन में उतारने से साधक को अनेक प्रकार के मानसिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:

मानसिक शांति एवं स्थिरता

इस श्लोक का चिंतन करने से मन में उत्पन्न होने वाले अनावश्यक चिंता, तनाव और भय समाप्त होते हैं। व्यक्ति सुख-दुख की परिस्थितियों में सम रहना सीख जाता है।

सकारात्मक और दिव्य ऊर्जा (Aura) का विकास

श्लोक के उच्चारण से उत्पन्न होने वाले ध्वनि कंपन (Vibrations) शरीर के चक्रों को जाग्रत करते हैं, जिससे साधक के चारों ओर एक सकारात्मक और पवित्र ऊर्जा क्षेत्र बनता है।

कर्मों की शुद्धि और कर्मफल से मुक्ति

जब मनुष्य गुणों के प्रभाव से मुक्त होकर निष्काम भाव से कार्य करता है, तो उसके संचित और प्रारब्ध कर्मों का क्षय होने लगता है, जिससे पुनर्जन्म का चक्र रुकता है।

आत्म-साक्षात्कार और दिव्‍य दृष्टि

यह श्लोक व्यक्ति को 'अहं ब्रह्मास्मि' की अनुभूति के निकट ले जाता है। साधक शरीर और आत्मा के भेद को स्पष्ट रूप से अनुभव करने लगता है।

भय और मृत्यु के मोह से मुक्ति

मृत्यु का भय केवल शरीर से जुड़ी हुई आसक्ति के कारण होता है। इस श्लोक के मर्म को समझने वाला व्यक्ति मृत्यु को वस्त्र बदलने समान सहज मानता है।

दिव्य कृपा और मोक्ष की प्राप्ति

भगवान श्रीकृष्ण की इस वाणी का प्रतिदिन स्मरण करने से भगवद्कृपा प्राप्त होती है और साधक जीवन के अंतिम लक्ष्य 'अमृतत्व' को प्राप्त करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री—भक्तीलोक (Bhaktilok.in) के संपादकीय मंडल और वरिष्ठ संस्कृत विद्वानों द्वारा यह आलेख श्रीमद्भगवद्गीता (वेद व्यास कृत महाभारत का अंश), आदि शंकराचार्य के गीता भाष्य, और स्वामी रामसुखदास जी महाराज के प्रवचनों के गहन अध्ययन के आधार पर तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक सनातन धर्म के मूल ग्रंथों का शुद्ध, प्रामाणिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से परिपूर्ण ज्ञान पहुंचाना है।

इस आलेख में प्रस्तुत प्रत्येक श्लोक का अर्थ पारंपरिक आचार्यों की टीकाओं के अनुरूप है, ताकि किसी भी प्रकार की दार्शनिक भ्रान्ति से बचा जा सके। हम पाठकों से अनुरोध करते हैं कि वे केवल पाठ तक सीमित न रहें, बल्कि इन वेदान्त वाक्यों को अपने दैनिक आचरण में ढालकर अपने जीवन को सार्थक बनाएं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

सांख्य और गीता दर्शन के अनुसार, भौतिक शरीर प्रकृति के उपादानों से बनता है। प्रकृति का मूल स्वभाव ही इन त्रिविध गुणों (सत्व-प्रकाश/सुख, रज-कर्म/तृष्णा, तम-आलस्य/मोह) से युक्त है। जब जीवात्मा इस भौतिक शरीर के साथ तादात्म्य स्थापित करती है, तो ये गुण शरीर के माध्यम से उसके विचारों, भावनाओं और कर्मों को प्रभावित करने लगते हैं, जिसे 'देहसमुद्भवान्' कहा गया है।

नहीं, "अमृतमश्नुते" का अर्थ भौतिक शरीर से अमर होना नहीं है। यह नाशवान शरीर तो एक दिन अवश्य नष्ट होता है। यहाँ 'अमृत' का अर्थ आत्मा की उस शाश्वत, अजर, अमर और सच्चिदानंद स्थिति से है, जो जन्म और मृत्यु के चक्र से परे है। जब साधक अपने आपको शरीर न मानकर आत्मा अनुभव करता है, तब वह जीवित रहते हुए ही उस अमर ब्रह्मभाव को प्राप्त कर लेता है।

इन गुणों को लांघने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने इसी अध्याय के अंत में अनन्य भक्ति और निष्काम कर्मयोग का मार्ग बताया है। जब व्यक्ति अपने सभी कर्मों को भगवदार्पण करते हुए साक्षी भाव (दृष्टा भाव) से जीवन जीता है—यानी सुख में हर्षित और दुख में विचलित नहीं होता—तब वह धीरे-धीरे इन गुणों के प्रभाव से ऊपर उठ जाता है।

श्लोक का पाठ और श्रवण करना आध्यात्मिक मार्ग की एक अत्यंत शुभ और शक्तिशाली शुरुआत है। यह मानसिक शुद्धि और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है। हालांकि, पूर्णमुक्ति या अमरत्व की प्राप्ति के लिए केवल पाठ पर्याप्त नहीं है; इसके मर्म को समझकर अपने आचरण में उतारना, राग-द्वेष का त्याग करना और भगवत्कृपा पर पूर्ण विश्वास रखना अनिवार्य है।

वेदांत दर्शन के अनुसार, सत्व गुण सोने की जंजीर की तरह है जो भले ही रज (लोहे) और तम (काले) लोहे से बेहतर हो, किंतु है तो बंधन ही। सत्व गुण मनुष्य को ज्ञान और सुख के अहंकार से बांधता है। जब तक जीव किसी भी प्रकार के बंधन (चाहे वह अच्छा ही क्यों न हो) में बंधा है, तब तक वह पूर्ण स्वतंत्र नहीं हो सकता। इसलिए परम मुक्ति के लिए सत्व गुण से भी परे 'गुणातीत' होना आवश्यक है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं कि इन तीनों गुणों को, जो शरीर से उत्पन्न हैं, पार करके देहधारी आत्मा जन्म, मृत्यु, जरा और दुःखों से मुक्त होकर अमृतत्व को प्राप्त होती है। Having transcended these three gunas, the embodied soul, freed from birth, death, old age, and pain, attains immortality.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

गुणातीत होना ही मोक्ष का मार्ग है। Transcending the gunas is the path to liberation.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 20 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 20/27 74% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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