गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – श्लोक 19

श्लोक १९ में बताया गया है कि गुणों से परे तत्व को जानकर साधक भगवत्प्राप्ति करता है। Verse 19: When one realizes that the gunas are the only agents and knows the Supreme beyond them, one attains to the Lord.

संस्कृत श्लोक

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति । गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥ १९॥

nānyaṃ guṇebhyaḥ kartāraṃ yadā draṣṭā anupaśyati | guṇebhyaś ca paraṃ vetti mad-bhāvaṃ so'dhigacchati ||19||

पदच्छेद / शब्दार्थ

न: नहीं; अन्यम्: दूसरा; गुणेभ्यः: गुणों से; कर्तारम्: कर्ता; यदा: जब; द्रष्टा: देखने वाला; अनुपश्यति: देखता है; गुणेभ्यः: गुणों से; च: और; परम्: परे; वेत्ति: जानता है; मद्भावम्: मेरे भाव को; सः: वह; अधिगच्छति: प्राप्त होता है।

हिंदी अनुवाद

जब द्रष्टा (ज्ञानी) गुणों के अतिरिक्त किसी अन्य कर्ता को नहीं देखता और गुणों से परे (तत्व) को जान लेता है, तब वह मेरे भाव को प्राप्त हो जाता है।

English Translation

When the seer beholds no agent other than the gunas and knows That which is beyond the gunas, he attains to My being.

टीका / Commentary

जब साधक यह समझ लेता है कि केवल गुण ही कर्म कर रहे हैं, और वह स्वयं उनसे परे है, तो वह भगवत्प्राप्ति कर लेता है। When one realizes that the gunas alone act and one is beyond them, they attain the Lord.