आज का पंचांग (Columbus) | सूर्योदय: ०४:३१ PM | सूर्यास्त: ०५:३० AM
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 14 · श्लोक 19

अध्याय 14 · श्लोक 19

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति । गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥ १९॥

nānyaṃ guṇebhyaḥ kartāraṃ yadā draṣṭā anupaśyati | guṇebhyaś ca paraṃ vetti mad-bhāvaṃ so'dhigacchati ||19||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

न: नहीं; अन्यम्: दूसरा; गुणेभ्यः: गुणों से; कर्तारम्: कर्ता; यदा: जब; द्रष्टा: देखने वाला; अनुपश्यति: देखता है; गुणेभ्यः: गुणों से; च: और; परम्: परे; वेत्ति: जानता है; मद्भावम्: मेरे भाव को; सः: वह; अधिगच्छति: प्राप्त होता है।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

जब द्रष्टा (ज्ञानी) गुणों के अतिरिक्त किसी अन्य कर्ता को नहीं देखता और गुणों से परे (तत्व) को जान लेता है, तब वह मेरे भाव को प्राप्त हो जाता है।

English Translation

When the seer beholds no agent other than the gunas and knows That which is beyond the gunas, he attains to My being.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

जब साधक यह समझ लेता है कि केवल गुण ही कर्म कर रहे हैं, और वह स्वयं उनसे परे है, तो वह भगवत्प्राप्ति कर लेता है। When one realizes that the gunas alone act and one is beyond them, they attain the Lord.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।