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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 14 · श्लोक 18

अध्याय 14 · श्लोक 18

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः । जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥ १८॥

ūrdhvaṃ gacchanti sattva-sthā madhye tiṣṭhanti rājasāḥ | jaghanya-guṇa-vṛtti-sthā adho gacchanti tāmasāḥ ||18||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

ऊर्ध्वम्: ऊपर; गच्छन्ति: जाते हैं; सत्त्वस्थाः: सत्त्व में स्थित; मध्ये: मध्य में; तिष्ठन्ति: रहते हैं; राजसाः: राजस लोग; जघन्य-गुण-वृत्तिस्थाः: निकृष्ट गुण और वृत्तियों में स्थित; अधः: नीचे; गच्छन्ति: जाते हैं; तामसाः: तामस लोग।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

सत्त्व में स्थित पुरुष ऊर्ध्वगति को प्राप्त होते हैं, राजस लोग मध्य में रहते हैं, और तामस लोग निकृष्ट गुण-वृत्तियों में स्थित होकर अधोगति को जाते हैं।

English Translation

Those established in Sattva go upward; the Rajasic dwell in the middle; and the Tamasic, abiding in the function of the lowest guna, go downward.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

गुणों के अनुसार गति भिन्न होती है: सात्त्विक ऊपर, राजस मध्य, तामस नीचे। The destination varies according to the predominant guna: Sattvic go higher, Rajasic remain in the middle, Tamasic go lower.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।