श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 18

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 35 मिनट का पठन 167 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः । जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥ १८॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
ऊर्ध्वम्
ऊपर
गच्छन्ति
जाते हैं
सत्त्वस्थाः
सत्त्व में स्थित
मध्ये
मध्य में
तिष्ठन्ति
रहते हैं
राजसाः
राजस लोग
जघन्य-गुण-वृत्तिस्थाः
निकृष्ट गुण और वृत्तियों में स्थित
अधः
नीचे
गच्छन्ति
जाते हैं
तामसाः
तामस लोग।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

सत्त्व में स्थित पुरुष ऊर्ध्वगति को प्राप्त होते हैं, राजस लोग मध्य में रहते हैं, और तामस लोग निकृष्ट गुण-वृत्तियों में स्थित होकर अधोगति को जाते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

दिव्य मार्गदर्शन: प्रकृति के त्रिगुणात्मक संसार में मनुष्य की ऊर्ध्व और अधो गतियां

सनातन धर्म, वेदों, उपनिषदों और विशेषकर श्रीमद्भगवद्गीता में प्रकृति के तीन गुणों—सत्त्व, रज और तम—का अत्यंत विस्तृत और वैज्ञानिक विवेचन मिलता है। सम्पूर्ण ब्रह्मांड और इसमें निवास करने वाले समस्त जीव इन तीनों गुणों के जाल से बंधे हुए हैं। भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को गीता के चौदहवें अध्याय में समझाते हैं कि प्रकृति से उत्पन्न ये तीनों गुण (सात्त्विक, राजसिक और तामसिक) किस प्रकार जीवात्मा को शरीर में बांधते हैं और मनुष्य के मरने के बाद या इस जीवन में ही उसकी मानसिक और आत्मिक स्थिति को निर्धारित करते हैं।

प्रस्तुत श्लोक "ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः । जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥१८॥" इसी त्रैगुण्य सिद्धांत का अत्यंत महत्वपूर्ण निष्कर्ष है। यह श्लोक हमें यह स्पष्ट संदेश देता है कि मनुष्य अपने दैनिक जीवन में जिन गुणों का अर्जन करता है, जिस प्रकार की वृत्तियों (आचरण, विचार और कर्म) का पोषण करता है, उसकी आंतरिक और बाह्य गति भी उसी के अनुरूप तय होती है। सात्त्विक प्रकृति वाले लोग उच्च लोकों, दिव्यता और आत्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होते हैं; राजसिक प्रकृति वाले लोग कर्म-प्रधान संसार (मृत्युलोक) में सुख-दुःख के चक्र में मध्य में बने रहते हैं; तथा जघन्य तामसिक गुणों में फंसे हुए लोग अज्ञान, प्रमाद और आलस्य के कारण नीचे यानी अधम योनियों या नरकीय दुखों की ओर गिर जाते हैं।

Bhaktilok.in के इस विस्तृत अध्ययन खंड में हम इस श्लोक के माध्यम से न केवल इसके शाब्दिक अर्थ को समझेंगे, बल्कि इसके दार्शनिक पक्षों, पौराणिक संदर्भों, मानसिक और आध्यात्मिक लाभों का भी गहन विश्लेषण करेंगे। यह मार्गदर्शिका प्रत्येक साधक को उसके आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने, अपने आंतरिक गुणों को पहचानने और सात्त्विकता की ओर प्रेरित करने के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

अथ चतुर्दशोऽध्यायः (गुणात्रयविभागयोग) — श्लोक १८

ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥ १८ ॥


उच्चारण विधि एवं श्लोक पाठ के नियम

इस श्लोक का पाठ करते समय स्पष्ट उच्चारण (संस्कृत वर्णमाला के नियमों के अनुसार) का विशेष ध्यान रखना चाहिए। 'ऊर्ध्वम्' का उच्चारण अनुस्वार के साथ, 'सत्त्वस्थाः' में द्वित्व त्त का बल, और 'जघन्यगुणवृत्तिस्थाः' का सस्वर पाठ मन को एकाग्र करता है। इस श्लोक का दैनिक प्रातःकाल स्नान के पश्चात या संध्यावचन के समय पाठ करने से बुद्धि में सात्त्विक विचारों का उदय होता है और रज-तम गुणों का शमन होता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

यहाँ इस श्लोक के प्रत्येक शब्द का सरल हिंदी अर्थ तथा उसका गहरा आध्यात्मिक व दार्शनिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
ऊर्ध्वम् (ऊर्ध्वं) ऊपर की ओर, उच्च लोकों में देवलोक, महलोक, जनलोक, तपलोक, सत्यलोक अथवा मोक्ष और चेतना के उच्च स्तर।
गच्छन्ति जाते हैं, प्राप्त करते हैं जीवात्मा की गतिशीलता, कर्मों के अनुसार उसकी चेतना का निरंतर प्रवाह।
सत्त्वस्थाः सत्त्व गुण में स्थित मनुष्य वे साधक जो पवित्रता, ज्ञान, प्रकाश, संतोष और परोपकार के मार्ग पर चलते हैं।
मध्ये मध्य में, बीच में मृत्युलोक, कर्मलोक जहाँ सुख और दुःख दोनों का समान रूप से अनुभव होता है।
तिष्ठन्ति स्थित रहते हैं, ठहरते हैं कर्म बंधनों में बंधे रहना और उसी संसार चक्र में बार-बार आना-जाना।
राजसाः रजोगुण प्रधान व्यक्ति काम, क्रोध, लालसा, अहंकार और अत्यधिक संग्रह की प्रवृत्ति वाले लोग।
जघन्यगुणवृत्तिस्थाः नीच गुणों और वृत्तियों में स्थित वे लोग जो आलस्य, प्रमाद, निद्रा, हिंसा, अज्ञान और निकृष्ट आचरण में लिप्त हैं।
अधः (अधो) नीचे की ओर नरकीय योनि, कीट-पतंग, पशु योनि या अत्यंत कष्टदायक चेतना का स्तर।
तामसाः तमोगुण प्रधान व्यक्ति अंधकार, मूढ़ता और विवेकहीनता से भरे हुए कर्म करने वाले मनुष्य।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत के रणक्षेत्र में गीता का उपदेश और त्रिगुणात्मक प्रसंग

श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय का नाम 'गुणात्रयविभाग योग' है। महाभारत के युद्ध के आरंभ होने से ठीक पहले, जब अर्जुन घोर विषाद में डूबकर अपने गाण्डीव धनुष को रख देते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें जीवन, मरण, कर्म और आत्मा के रहस्यों का ज्ञान देते हैं। कुरुक्षेत्र की उस धर्मभूमि पर अर्जुन द्वारा पूछे गए तीन महत्वपूर्ण प्रश्न—"इन तीनों गुणों से परे मनुष्य कैसे होता है? उसका आचरण कैसा होता है? और वह इन गुणों से कैसे मुक्त होता है?"—के उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण प्रकृति के इन तीन गुणों का अत्यंत सूक्ष्म विश्लेषण करते हैं।

महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आने वाली श्रीमद्भगवद्गीता के इस प्रसंग में भगवान स्पष्ट करते हैं कि प्रकृति (माया) के ये तीन गुण—सत्त्व (प्रकाश और ज्ञान), रज (गतिशीलता और तृष्णा), तथा तम (अंधकार और प्रमाद)—सोने, चांदी और लोहे की जंजीरों की भांति हैं। इनमें से कोई भी जंजीर हो, वह आत्मा को बांधती अवश्य है। सत्त्व गुण ज्ञान और सुख से बांधता है, रज गुण कर्मों की आसक्ति से बांधता है, और तम गुण प्रमाद, आलस्य तथा निद्रा से बांधता है।

पौराणिक कथाओं और सांख्य दर्शन के अनुसार, मनुष्य की मरणोपरांत गति या इस लोक में उसकी मानसिक स्थिति पूरी तरह से इन तीन गुणों के अनुपात पर निर्भर करती है। जिस प्रकार अग्नि की प्रवृत्ति ऊपर उठने की होती है, उसी प्रकार सात्त्विक चेतना निरंतर ऊपर की ओर उठती है। इसके विपरीत, भारी वस्तुएं जैसे पत्थर नीचे गिरते हैं, उसी प्रकार तामसिक वृत्तियां मनुष्य को पतन की ओर ले जाती हैं। महर्षि वेदव्यास और अन्य आचार्यों ने वेदों और पुराणों (जैसे श्रीमद्भागवत पुराण और मार्कण्डेय पुराण) में भी बार-बार इसी बात पर बल दिया है कि सत्संग, सद्चिंतन और भगवान के स्मरण से ही तम और रज का नाश करके सत्त्व गुण की वृद्धि की जा सकती है, जिससे मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

1. मानसिक शांति एवं एकाग्रता

इस श्लोक के मनन और जप से मन में व्याप्त अनावश्यक चिंताएं, तनाव और उद्वेलन शांत होते हैं, जिससे मानसिक स्पष्टता बढ़ती है।

2. सकारात्मक ऊर्जा (Positive Aura) का विस्तार

श्लोक के कंपन से शरीर के आसपास सात्त्विक ऊर्जा का आवरण बनता है, जो नकारात्मक शक्तियों और बुरे विचारों को दूर रखता है।

3. कर्म शुद्धि और विवेक जागरण

यह श्लोक हमें अच्छे और बुरे कर्मों के परिणामों का बोध कराता है, जिससे व्यक्ति विवेकपूर्ण निर्णय लेने में सक्षम होता है।

4. तमोगुण और आलस्य का नाश

नियमित अध्ययन से प्रमाद, अकर्मण्यता, अत्यधिक निद्रा और सुस्ती जैसी तामसिक वृत्तियों का धीरे-धीरे शमन होने लगता है।

5. उच्च आध्यात्मिक लोकों की प्राप्ति

सात्त्विक भावों में निरंतर स्थित रहने से जीवात्मा की गति ऊर्ध्वगामी होती है, जो आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष का द्वार खोलती है।

6. आत्म-अनुशासन और संयम

राजसिक तृष्णाओं और लालसाओं पर नियंत्रण पाने की शक्ति मिलती है, जिससे जीवन में अनुशासन और संतुलन आता है।

7. ईश्वर कृपा और भक्ति भाव की वृद्धि

हृदय में भगवान के प्रति गाढ़ निष्ठा और शरणागति का भाव जागृत होता है, जिससे साधक भवसागर से पार उतरने लगता है।

8. जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति का मार्ग

गुणतीत होने की प्रेरणा मिलने से साधक त्रिगुणात्मक बंधनों को पार कर परम पद को प्राप्त करने के योग्य बनता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in का यह लेख सनातन धर्म के मूल ग्रंथों, विशेष रूप से महर्षि वेदव्यास रचित 'श्रीमद्भगवद्गीता' के चौदहवें अध्याय (गुणात्रयविभाग योग) के प्रामाणिक श्लोकों, आदि शंकराचार्य और स्वामी रामानुजचार्य के भाष्यों तथा पारंपरिक वैदिक विद्वानों के मार्गदर्शन पर आधारित है। हमारे विशेषज्ञ संपादकीय दल द्वारा यह सुनिश्चित किया गया है कि श्लोक का अर्थ, उसका दार्शनिक महत्व और आधुनिक जीवन में उसकी उपादेयता पाठकों तक सरल, स्पष्ट और तथ्यात्मक रूप से पहुंचे।

संदर्भ ग्रंथ: श्रीमद्भगवद्गीता (शांकर भाष्य सहित), महाभारत (भीष्म पर्व), तथा विभिन्न वैदिक दर्शन के ग्रंथ। किसी भी आध्यात्मिक या दार्शनिक जिज्ञासा के समाधान के लिए पारंपरिक आचार्यों और प्रामाणिक ग्रंथों का अध्ययन करने की सलाह दी जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

उत्तर: 'ऊर्ध्वं' का अर्थ है ऊपर की ओर यानी उच्च लोक या मोक्ष की स्थिति; 'मध्ये' का अर्थ है मध्य में यानी मृत्युलोक जहाँ मनुष्य सुख-दुःख दोनों भोगता है; और 'अधः' का अर्थ है नीचे की ओर यानी नरकीय योनि या अज्ञान और निकृष्ट जीवन की स्थिति। यह सब मनुष्य के गुणों और कर्मों पर निर्भर करता है।

उत्तर: ज्ञान, प्रकाश, संतोष, परोपकार और शांति की भावना 'सत्त्व गुण' के लक्षण हैं। कर्मों की अधिकता, तृष्णा, लालसा, अहंकार और बेचैनी 'रजोगुण' को दर्शाती है। इसके विपरीत, अत्यधिक आलस्य, प्रमाद, अज्ञान, निद्रा और हिंसा की प्रवृत्ति 'तमोगुण' की पहचान है।

उत्तर: हाँ, मनुष्य अपनी इच्छाशक्ति, सत्संग, अच्छे कर्मों, स्वाध्याय और ईश्वर की भक्ति के माध्यम से रज और तम गुणों को नियंत्रित कर सकता है तथा सत्त्व गुण को बढ़ाकर अपने जीवन की दिशा और गति दोनों को बदल सकता है। प्रकृति के ये गुण परिवर्तनशील हैं।

उत्तर: यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय (गुणात्रयविभाग योग) का अट्ठारवां (18वां) श्लोक है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण प्रकृति के तीनों गुणों के प्रभाव और उनसे मुक्त होने के उपायों का विस्तार से वर्णन करते हैं।

उत्तर: नियमित पाठ करने से साधक को अपने भीतर छिपे विकारों (रज और तम) का बोध होता है, वैराग्य और विवेक की प्राप्ति होती है, मानसिक एकाग्रता बढ़ती है और वह धीरे-धीरे 'गुणतीत' (गुणों से परे परमात्मा) होने की अवस्था की ओर अग्रसर होता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं कि सत्त्वगुण में स्थित लोग ऊपर (देवलोक आदि) जाते हैं, राजस लोग मध्य (मनुष्यलोक) में रहते हैं, और तामस लोग नीचे (पशु-आदि योनियों) में जाते हैं। Those in Sattva go upward; the Rajasic stay in the middle; the Tamasic go downward.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

मनुष्य अपने गुणों के अनुसार ही अपनी गति स्वयं निर्धारित करता है। A person determines their own destiny by the gunas they cultivate.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 18 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 18/27 67% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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