श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 17

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 38 मिनट का पठन 159 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च । प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥ १७॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
सत्त्वात्
सत्त्व से
संजायते
उत्पन्न होता है
ज्ञानम्
ज्ञान
रजसः
रज से
लोभः
लोभ
एव
ही
च
और
प्रमाद-मोहौ
प्रमाद और मोह
तमसः
तम से
भवतः
उत्पन्न होते हैं
अज्ञानम्
अज्ञान
एव
ही
च
और।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

सत्त्व से ज्ञान उत्पन्न होता है, रज से लोभ, और तम से प्रमाद, मोह तथा अज्ञान उत्पन्न होते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भक्तिलोक (Bhaktilok.in) - शास्त्रीय एवं आध्यात्मिक मार्गदर्शिका

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय चेतना

सनातन धर्म के महान ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय (गुणत्रयविभागयोग) का यह सत्रहवां श्लोक मानव जीवन, उसकी वृत्तियों, मनोभावों और कर्मसिद्धांत का सबसे वैज्ञानिक तथा दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। ब्रह्मांड की संपूर्ण रचना तीन मूल गुणों—सत्व, रज और तम—के संतुलन पर आधारित है। इन त्रिगुणों के प्रभाव से ही संपूर्ण चराचर जगत संचालित होता है। जब कोई मनुष्य इस भौतिक संसार में जन्म लेता है, तो उसकी चेतना इन्हीं तीन गुणों के जाल में बंध जाती है। प्रस्तुत श्लोक स्पष्ट रूप से यह उद्घाटित करता है कि किस प्रकार हमारे भीतर उठने वाले विचार, ज्ञान की पिपासु किरणें, लोभ की अदम्य इच्छाएं, तथा अज्ञान एवं प्रमाद का घना अंधकार प्रत्यक्ष रूप से इन त्रिगुणों की उपज हैं।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, यह श्लोक साधकों को अपनी आंतरिक प्रवृत्तियों का निरीक्षण करने की प्रेरणा देता है। जब तक मनुष्य अपने भीतर कार्य कर रहे इन गुणों को नहीं पहचानता, तब तक वह प्रकृति के बंधनों से मुक्त नहीं हो सकता। सत्त्व गुण जहाँ प्रकाश और ज्ञान का प्रतीक है, वहीं रज गुण कर्मठता के साथ-साथ तृष्णा और लोभ को जन्म देता है। इसके विपरीत, तम गुण का आवरण मनुष्य को कर्तव्यविमुख, आलसी, और भ्रमित (प्रमाद और मोह) कर देता है। इस श्लोक की महत्ता इस बात में है कि यह हमें आत्म-अवलोकन (Self-introspection) का एक दिव्य नेत्र प्रदान करता है, जिसके माध्यम से हम अपने दैनिक जीवन के निर्णयों और भावनाओं के मूल कारणों को समझकर उच्चतर आध्यात्मिक चेतना की ओर अग्रसर हो सकते हैं।

ब्रह्मांडीय स्तर पर, यह श्लोक प्रकृति (माया) के कार्यकलापों को भली-भांति समझाता है। भगवान श्री कृष्ण अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानवजाति को यह सिखा रहे हैं कि संसार में सुख-दुःख, ज्ञान-अज्ञान और सफलता-विफलता का आधार बाहरी परिस्थितियां नहीं, बल्कि हमारे भीतर सक्रिय त्रिगुण हैं। इस दिव्य ज्ञान को आत्मसात करने से व्यक्ति अपने जीवन की जटिलताओं को सुलझा सकता है और मानसिक शांति, बौद्धिक स्पष्टता तथा सात्विक जीवनशैली की स्थापना कर सकता है। भक्तिलोक के इस विस्तृत आलेख में हम इस श्लोक के प्रत्येक पहलू का सूक्ष्म विश्लेषण करेंगे, ताकि पाठकगण इसका पूर्ण आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर सकें।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

गीता का गान - श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 14, श्लोक 17

सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥ १७॥

पाठ करने की विधि: इस श्लोक का पाठ प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में या संध्यावंदنا के समय शांत चित्त से करना चाहिए। पाठ से पूर्व अपने इष्टदेव या भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करें, शुद्ध आसन पर बैठें और मन को एकाग्र कर श्लोक का सस्वर उच्चारण करें।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द का शाब्दिक अर्थ और उसका आंतरिक दार्शनिक महत्व निम्नलिखित सारणी में प्रस्तुत है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
सत्त्वात् सत्त्व गुण से (प्रकृति के प्रकाशमय गुण से) जब चेतना शुद्ध, निर्मल और प्रकाशवान होती है, तो उसे सत्त्व गुण की प्रधानता कहा जाता है।
संजायते उत्पन्न होता है / प्रकट होता है किसी भी भाव या वृत्ति का प्रकटीकरण अनायास नहीं होता, बल्कि उसके पीछे संबंधित गुण का बीज कार्य करता है।
ज्ञानम् यथार्थ ज्ञान, विवेक और प्रकाश सत्य और असत्य को अलग करने की बुद्धि, जो मनुष्य को ईश्वर के करीब ले जाती है।
रजसः रजोगुण से (गतिशीलता, कर्म और ऊर्जा से) कामनाओं, इच्छाओं और आसक्ति का वह सागर जो मनुष्य को कभी शांत नहीं बैठने देता।
लोभः लोभ, लालच, और अधिक की चाह जो प्राप्त है उससे असंतुष्ट रहकर लगातार संग्रह करने की प्रवृत्ति, जो रजोगुण का प्रत्यक्ष फल है।
एव च और ही / निश्चित रूप से यह इस बात की पुष्टि करता है कि रजोगुण का स्वभाव ही संचय और तृष्णा को बढ़ाना है।
प्रमादमोहौ प्रमाद (आलस्य/कर्तव्यविमुखता) और मोह (अंधापन/भ्रम) जीवन के वास्तविक कर्तव्यों की उपेक्षा करना और असत्य को सत्य मान लेना तमोगुण के लक्षण हैं।
तमसः तमोगुण से (अंधकार, जड़ता और सुस्ती से) चेतना का वह स्तर जहाँ ऊर्जा का पूर्ण अभाव होता है और व्यक्ति सुप्त अवस्था में रहता है।
भवतः उत्पन्न होते हैं / होते हैं तमोगुण के प्रभावस्वरूप जीव के भीतर नकारात्मक वृत्तियों का विकास होता है।
अज्ञानम् एव च निश्चित रूप से अज्ञान और मूढ़ता अंधकार, चेतना का पतन और स्वयं के वास्तविक स्वरूप (आत्मा) को न पहचान पाना।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय का नाम 'गुणत्रयविभागयोग' है। इस अध्याय की ऐतिहासिक और पौराणिक पृष्ठभूमि कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान से जुड़ी है, जहां कौरवों और पांडवों की सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं। विषाद और मोह से ग्रस्त अर्जुन जब अपने कर्तव्यों से विमुख होने लगे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जीवन, मरण, कर्म, और प्रकृति के रहस्यों का उपदेश देना प्रारंभ किया। इसी क्रम में, अर्जुन ने भगवान से तीन अति महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे—1. इन तीन गुणों (सत्व, रज, तम) को पार करने वाला मनुष्य किस लक्षणों से युक्त होता है? 2. उसका आचरण कैसा होता है? और 3. वह इन गुणों से कैसे अतीत (ऊपर) होता है?

इन प्रश्नों का उत्तर देते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने प्रकृति के इन तीनों गुणों का अत्यंत सूक्ष्म और वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया। महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आने वाली गीता में यह प्रसंग इस सत्य को उजागर करता है कि मानव का संपूर्ण व्यक्तित्व इन्हीं तीन शक्तियों के अधीन है। पुराणों और वेदों में भी त्रिगुणों की महिमा का विस्तृत वर्णन मिलता है। सांख्य दर्शन के अनुसार, प्रकृति (प्रधान) सत्व, रज और तम—इन तीन घटकों से बनी है। जब तक जीव इन गुणों के संपर्क में रहता है, तब तक वह जन्म-मृत्यु के चक्र में फंसा रहता है।

इस श्लोक के माध्यम से भगवान कृष्ण अर्जुन को यह समझाते हैं कि कोई भी कर्म या विचार अचानक उत्पन्न नहीं होता। यदि किसी व्यक्ति के मन में ज्ञान का प्रकाश है, तो वह उसके पूर्वजन्म के या वर्तमान जीवन के सात्विक संस्कारों का परिणाम है। यदि कोई व्यक्ति लोभ, ईर्ष्या और वासना में डूबा है, तो वह रजोगुण के प्रभाव में है। और यदि कोई व्यक्ति आलस्य, अज्ञान, प्रमाद तथा नशीली प्रवृत्तियों में जीवन व्यतीत कर रहा है, तो वह तमोगुण के अधीन है। इस प्रकार, यह शास्त्रीय पृष्ठभूमि हमें सिखाती है कि यदि हमें अपने जीवन की दिशा बदलनी है, तो हमें अपने भीतर सक्रिय इन गुणों के संतुलन को साधना होगा। रज और तम के प्रभावों को कम करके सत्त्व गुण को बढ़ाना ही वास्तविक आध्यात्मिक पुरुषार्थ है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस पावन श्लोक का नियमित मनन, पाठ और इसके अर्थ का चिंतन करने से साधक को अनेकों मानसिक एवं आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति एवं स्थिरता

श्लोक के नियमित स्मरण से मन में उठने वाले अनावश्यक विचारों और उद्वेगों पर नियंत्रण होता है, जिससे गाढ़ी मानसिक शांति की प्राप्ति होती है।

2. सकारात्मक और सात्विक ऊर्जा का संचार

यह श्लोक आंतरिक चेतना को जागृत करता है, जिससे शरीर और मन में रज तथा तम के नकारात्मक प्रभाव कम होकर सात्विक ऊर्जा बढ़ती है।

3. आत्म-विश्लेषण (Self-Introspection) की क्षमता

साधक अपने भीतर उत्पन्न होने वाले लोभ, मोह और ज्ञान का सूक्ष्म विश्लेषण करने में सक्षम होता है, जिससे वह गलत निर्णयों से बच जाता है।

4. कर्मों की शुद्धि और निष्काम भाव

लोभ और प्रमाद से मुक्ति मिलने पर व्यक्ति निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करता है, जिससे उसके कर्म बंधन कटते हैं।

5. बौद्धिक तीक्ष्णता और विवेक वृद्धि

सत्त्व गुण की वृद्धि से बुद्धि तीव्र, निर्मल और सत्यग्राही बनती है, जिससे कठिन परिस्थितियों में भी उचित निर्णय लेना सरल हो जाता है।

6. मोह और अज्ञान का नाश

तमोगुण जनित अज्ञान और भ्रम का अंधकार छटता है, जिससे जीवन के वास्तविक लक्ष्य (मोक्ष और भगवद्प्राप्ति) का मार्ग प्रशस्त होता है।

7. दिव्य कृपा और उच्च लोकों की प्राप्ति

सात्विक जीवनशैली अपनाने से भगवान की कृपा प्राप्त होती है और मृत्योपरांत उच्च सात्विक लोकों की प्राप्ति का मार्ग खुलता है।

8. तनाव और अवसाद से मुक्ति

आधुनिक जीवन की व्यस्तता और मानसिक तनाव से जूझ रहे व्यक्तियों के लिए यह श्लोक एक अचूक आध्यात्मिक औषधि का कार्य करता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री (Editorial Note): भक्तिलोक (Bhaktilok.in) के संपादकीय मंडल और संस्कृत भाषाविदों द्वारा यह आलेख श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक भाष्यों (विशेषकर आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और स्वामी ज्ञाननानंद जी महाराज के दृष्टिकोण) का गहन अध्ययन करके तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य सनातन धर्म के मूल ग्रंथों के गूढ़ रहस्यों को आधुनिक पाठकों तक अत्यंत सरल, स्पष्ट और शास्त्रीय शुद्धता के साथ पहुँचाना है। इस आलेख में उद्धृत श्लोक का अर्थ पूरी तरह से व्यास रचित महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत गीता के मूल संस्कृत व्याकरण और परंपराओं पर आधारित है। पाठकों से अनुरोध है कि वे इस ज्ञान को अपने जीवन में उतारकर आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि मनुष्य के भीतर उत्पन्न होने वाले विभिन्न भाव और वृत्तियाँ प्रकृति के तीन गुणों (सत्व, रज, तम) से संचालित होती हैं। सत्व गुण से ज्ञान, रज गुण से लोभ, और तम गुण से प्रमाद, मोह तथा अज्ञान उत्पन्न होते हैं। यह हमें अपने स्वभाव को समझकर सात्विक बनने की प्रेरणा देता है।

रजोगुण का स्वभाव ही कर्म, गतिशीलता और आसक्ति है। यह गुण व्यक्ति को कभी संतुष्ट नहीं होने देता। जो वस्तु प्राप्त है, उसके प्रति और अधिक लालसा रखना तथा संग्रह करने की प्रवृत्ति रखना रजोगुण का मूल स्वभाव है, जिसके कारण लोभ उत्पन्न होता है।

तमोगुण अंधकार, जड़ता और आलस्य का प्रतीक है। इसके प्रभाव से व्यक्ति प्रमाद (कर्तव्यहीनता), मोह (भ्रम) और अज्ञान से घिर जाता है। वह सही और गलत में भेद करने में असमर्थ हो जाता है और उसका जीवन अंधकारमय हो जाता है।

सत्त्व गुण को बढ़ाने के लिए सात्विक आहार (शुद्ध, शाकाहारी भोजन), नियमित ईश्वर स्मरण, सत्संग, स्वाध्याय (धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन), सदाचरण, और निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करना आवश्यक है। इससे रज और तम गुणों का प्रभाव स्वतः कम होने लगता है।

हाँ, श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार जो साधक निरंतर भक्ति, योग और ज्ञान के मार्ग पर चलकर त्रिगुणों से अतीत (गुणातीत) हो जाता है, वह इस संसार के बंधनों (जन्म, मरण, बुढ़ापा और दुःख) से मुक्त होकर परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त कर लेता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं कि सत्त्व से ज्ञान उत्पन्न होता है, रज से लोभ, और तम से प्रमाद, मोह तथा अज्ञान उत्पन्न होते हैं। From Sattva arises knowledge; from Rajas, greed; from Tamas, heedlessness, delusion, and ignorance.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

इसलिए ज्ञान की प्राप्ति के लिए सत्त्व बढ़ाना आवश्यक है, और लोभ-मोह से बचने के लिए रज-तम का ह्रास करना चाहिए। Therefore, to attain knowledge one must increase Sattva, and to avoid greed and delusion one should reduce Rajas and Tamas.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 17 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 17/27 63% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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