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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 14 · श्लोक 17

अध्याय 14 · श्लोक 17

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च । प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥ १७॥

sattvāt sañjāyate jñānaṃ rajaso lobha eva ca | pramāda-mohau tamaso bhavato'jñānam eva ca ||17||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

सत्त्वात्: सत्त्व से; संजायते: उत्पन्न होता है; ज्ञानम्: ज्ञान; रजसः: रज से; लोभः: लोभ; एव: ही; च: और; प्रमाद-मोहौ: प्रमाद और मोह; तमसः: तम से; भवतः: उत्पन्न होते हैं; अज्ञानम्: अज्ञान; एव: ही; च: और।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

सत्त्व से ज्ञान उत्पन्न होता है, रज से लोभ, और तम से प्रमाद, मोह तथा अज्ञान उत्पन्न होते हैं।

English Translation

From Sattva arises knowledge; from Rajas, greed; and from Tamas arise heedlessness and delusion, and also ignorance.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

गुणों के स्रोत से विभिन्न भाव निकलते हैं: सत्त्व से ज्ञान, रज से लोभ, तम से मोह और अज्ञान। From each guna arise different dispositions: knowledge from Sattva, greed from Rajas, delusion and ignorance from Tamas.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।