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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 14 · श्लोक 16

अध्याय 14 · श्लोक 16

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् । रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥ १६॥

karmaṇaḥ sukṛtasyāhuḥ sāttvikaṃ nirmalaṃ phalam | rajasas tu phalaṃ duḥkham ajñānaṃ tamasaḥ phalam ||16||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

कर्मणः: कर्म का; सुकृतस्य: शुभ (कर्म); आहुः: कहते हैं; सात्त्विकम्: सात्त्विक; निर्मलम्: निर्मल; फलम्: फल; रजसः: रजोगुण (के कर्म) का; तु: तो; फलम्: फल; दुःखम्: दुःख; अज्ञानम्: अज्ञान; तमसः: तमोगुण (के कर्म) का; फलम्: फल।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

शुभ कर्म का फल सात्त्विक और निर्मल कहा गया है, रजोगुण का फल दुःख है, और तमोगुण का फल अज्ञान है।

English Translation

The fruit of good action is said to be Sattvika and pure; the fruit of Rajas is pain; and the fruit of Tamas is ignorance.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

प्रत्येक गुण के अनुसार कर्मों के फल अलग-अलग होते हैं: सात्त्विक कर्म सुखद, राजस कर्म दुःखद, तामस कर्म अज्ञानकारक। The fruits correspond to the gunas: Sattvic actions yield purity and happiness; Rajasic, pain; Tamasic, ignorance.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।