श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 16

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 41 मिनट का पठन 124 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् । रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥ १६॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
कर्मणः
कर्म का
सुकृतस्य
शुभ (कर्म)
आहुः
कहते हैं
सात्त्विकम्
सात्त्विक
निर्मलम्
निर्मल
फलम्
फल
रजसः
रजोगुण (के कर्म) का
तु
तो
फलम्
फल
दुःखम्
दुःख
अज्ञानम्
अज्ञान
तमसः
तमोगुण (के कर्म) का
फलम्
फल।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

शुभ कर्म का फल सात्त्विक और निर्मल कहा गया है, रजोगुण का फल दुःख है, और तमोगुण का फल अज्ञान है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

सनातन धर्म और वेदान्त दर्शन में 'कर्म' और उसके 'फल' का सिद्धांत अत्यंत गूढ़, वैज्ञानिक और नैतिक आधारशिला है। श्रीमद्भागवतगीता के चौदहवें अध्याय (गुणात्रयविभाग योग) का यह सोलहवां श्लोक मानव जीवन के समस्त क्रियाकलापों और उनके अंतःप्रेरणा स्रोतों का अत्यंत सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत करता है। जगत में जो कुछ भी घटित होता है, वह प्रकृति के तीन गुणों—सत्व, रज और तम—की त्रिविध धाराओं के प्रभाव से संचालित होता है। आचार्य वेद व्यास द्वारा रचित यह श्लोक हमें यह स्पष्ट संदेश देता है कि मनुष्य जैसी प्रवृत्ति या भाव (गुण) से प्रेरित होकर कर्म करता है, वैसा ही फल उसे इस लोक और परलोक में भोगना पड़ता है।

सात्विक कर्म का फल निर्मल, सुखद और ज्ञानवर्धक होता है, जो अंतःकरण को शुद्ध करता है और मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करता है। इसके विपरीत, राजस कर्मों की मूल प्रेरणा आसक्ति, तृष्णा और अहंकार होती है, जिसके परिणाम स्वरूप मनुष्य को अंततः दुःख, अशांति और मानसिक संताप की प्राप्ति होती है। तामसिक कर्म अज्ञान, प्रमाद, आलस्य और मूढ़ता से उत्पन्न होते हैं, जिनका फल अंधकार, भ्रम और आध्यात्मिक पतन के सिवा कुछ नहीं होता। भक्तिलोक.इन के इस विशेष आलेख में हम इसी शाश्वत श्लोक के मर्म, इसके व्याकरणिक स्वरूप, दार्शनिक गहराई और हमारे दैनिक जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों का व्यापक एवं प्रामाणिक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं, जिससे साधक अपने कर्मों की दिशा को सही और सकारात्मक बना सके।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

ॐ श्री परमात्मने नमः

अथ चतुर्दशोऽध्यायः — गुणात्रयविभागयोगः

कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् ।

रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥ १६ ॥

श्लोकोच्चारण एवं पठन की विधि:

इस श्लोक का पाठ करने से पूर्व साधक को चाहिए कि वह पवित्र एकाग्रता के साथ अपने इष्टदेव या भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करे। श्लोक के प्रत्येक शब्द का उच्चारण स्पष्ट और सस्वर होना चाहिए। 'कर्मणः' का उच्चारण विसर्ग के साथ, 'सुकृतस्याहुः' में दीर्घ स्वर की स्पष्टता, तथा 'सात्त्विकं निर्मलं फलम्' में अनुस्वार की शुद्धता का ध्यान रखना आवश्यक है। नित्य प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में या संध्यावंदन के समय इस श्लोक का 11 या 21 बार मानसिक जप करने से बुद्धि में सात्विक गुणों का उदय होता है और मनुष्य दूषित कर्मों से अपनी रक्षा करने में समर्थ होता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्रीमद्भागवतगीता के इस श्लोक के प्रत्येक पद का शाब्दिक और दार्शनिक विश्लेषण निम्नलिखित तालिका में प्रस्तुत है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
कर्मणः कर्म का मन, वचन और शरीर द्वारा किए जाने वाले समस्त ऐहिक एवं पारलौकिक व्यापार।
सुकृतस्य श्रेष्ठ, पवित्र या पुण्यमय कर्म का वह कर्म जो परोपकार, सत्य, धर्म और निष्काम भावना से प्रेरित होकर किया गया हो।
आहुः कहते हैं (ऋषि-मुनि या ज्ञानीजन) वेदवेत्ता मनीषियों और भगवान श्रीकृष्ण का सार्वभौमिक एवं अकाट्य सिद्धांत।
सात्त्विकम् सत्व गुण से उत्पन्न प्रकाशमय, शांतिदायक, ज्ञानवर्धक और पवित्रता से परिपूर्ण भाव।
निर्मलं मल-रहित, पवित्र, स्वच्छ जिसमें राग-द्वेष या अहंकार का कोई भी आवरण या मैल न हो।
फलम् परिणाम, प्रतिफल कर्म के अनुसार प्रकृति द्वारा स्वतः मिलने वाला आवश्यक परिणाम या प्रतिक्रिया।
रजसः तु और रजोगुण का (फल) कामना, तृष्णा, आसक्ति और संघर्षयुक्त कर्मों का विशेष परिणाम।
दुःखम् दुःख, संताप, अशांति मानसिक व्याधि, चिंता, अहंकार का क्षय और अंतहीन इच्छाओं का कष्ट।
अज्ञानम् अंधकार, मूढ़ता, विवेकहीनता सत्य और असत्य को न पहचान पाने की मानसिक स्थिति (अविद्या)।
तमसः फलम् तमोगुण का फल आलस्य, प्रमाद, निद्रा और अनैतिक कृत्यों का अंतिम विनाशकारी परिणाम।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत के युद्ध के आरंभ में कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमि पर जब अर्जुन किंकर्तव्यविमूढ़ होकर अपने स्वजनों के विरुद्ध शस्त्र उठाने से मना कर देते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें जीवन के परम सत्य का बोध कराते हैं। गीता का चौदहवां अध्याय विशेष रूप से प्रकृति के तीन गुणों (सत्व, रज और तम) के विस्तृत स्वरूप को समझने के लिए समर्पित है। महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित इस महाकाव्य के माध्यम से भगवान अर्जुन को समझाते हैं कि यह संपूर्ण संसार प्रकृति की गोद में पल रहा है और प्रकृति के ये तीन गुण ही मनुष्य की बुद्धि, उसके स्वभाव और उसके कर्मों को नियंत्रित करते हैं।

पौराणिक कथाओं और वेदान्त के उपन्यासों में इस बात का बार-बार उल्लेख मिलता है कि देवता सत्व गुण के प्रतीक हैं, मनुष्य (विशेषकर सांसारिक जीव) रजोगुण के प्रभाव में संघर्षरत रहते हैं, और अधम प्रवृत्तियां तथा राक्षस तमोगुण के अधीन होते हैं। जब ऋषिगण और महर्षि जंगलों में बैठकर तपस्या करते थे, तब वे अपने चित्त को सतोगुण में स्थिर करने का निरंतर प्रयास करते थे ताकि उन्हें निर्मल आध्यात्मिक आनंद की प्राप्ति हो सके। इसके विपरीत, आसुरी प्रवृत्तियों वाले लोग रजोगुण और तमोगुण के प्रभाव में आकर अहंकारवश ऐसे कर्म करते हैं जिनका परिणाम अंततः उनके अपने विनाश और समाज के पतन का कारण बनता है। यह ऐतिहासिक और शास्त्रीय पृष्ठभूमि हमें सिखाती है कि यदि हमें जीवन में सुख और शांति चाहिए, तो हमें अपने कर्मों को सतोगुण की ओर अग्रसर करना होगा।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस पावन श्लोक का नित्य स्मरण और इसके अर्थ का मनन करने से साधक को अनेकानेक आध्यात्मिक, मानसिक और नैतिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • मानसिक शांति और स्थिरता: श्लोक के भाव को आत्मसात करने से मन के भीतर चल रहे द्वंद और उथल-पुथल शांत होती है।
  • कर्मों की शुद्धि: व्यक्ति अपने दैनिक क्रियाकलापों में सत्व गुण को प्रधानता देने लगता है, जिससे अनीतिपूर्ण कर्म स्वतः छूट जाते हैं।
  • सकारात्मक ऊर्जा का संचार: नियमित पठन से आसपास के वातावरण में सकारात्मक और दिव्य ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है।
  • अहंकार का शमन: राजस और तामसिक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण पाने से अहंकार और क्रोध का नाश होता है।
  • विवेक बुद्धि का विकास: क्या उचित है और क्या अनुचित, इसका भेद करने की आंतरिक क्षमता (विवेक) तीव्र होती है।
  • पारमार्थिक उन्नति: यह श्लोक साधक को मोक्ष और भगवदप्राप्ति के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।
  • कष्टों से मुक्ति: राजस कर्म जनित दुःख और तामस कर्म जनित अज्ञानता के बंधनों से धीरे-धीरे मुक्ति मिलती है।
  • दिव्य कृपा प्राप्ति: भगवान श्रीकृष्ण के वचनों का आदर करने से साधक पर ईश्वर की अहैतुकी कृपा बरसती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: भक्तिलोक.इन पर प्रस्तुत यह आलेख वेदों, उपनिषदों और श्रीमद्भागवतगीता जैसे सनातन धर्म के मूल ग्रंथों के अध्ययन पर आधारित है। हमारे विद्वान संस्कृत भाषाविदों और आध्यात्मिक आचार्यों ने यह सुनिश्चित किया है कि श्लोक का अनुवाद, उसकी व्याख्या और उसके दार्शनिक निहितार्थ पूरी प्रामाणिकता के साथ पाठकों तक पहुंचें। इस सामग्री का उद्देश्य किसी धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाए बिना, सनातन ज्ञान के वैज्ञानिक और नैतिक पहलुओं को आधुनिक पाठकों के समक्ष सरल हिंदी में प्रस्तुत करना है। सभी संदर्भ श्रीमद्भागवतगीता के चौदहवें अध्याय (गुणात्रयविभाग योग) के स्वीकृत पाठों से लिए गए हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

उत्तर: सात्विक कर्म सत्य, परोपकार, धर्म और निष्काम भाव से किए जाते हैं। इनमें किसी भी प्रकार का स्वार्थ, छल या अहंकार नहीं होता। इसलिए इनसे उत्पन्न होने वाला फल मन को शांति, पवित्रता और ज्ञान प्रदान करता है, जिसमें किसी भी प्रकार का संताप या मैल नहीं होता, अतः इसे निर्मल फल कहा गया है।

उत्तर: राजस कर्मों की मूल प्रेरणा अत्यधिक आसक्ति, तृष्णा, कामना और महत्वाकांक्षा होती है। जब मनुष्य फल की तीव्र इच्छा रखकर कर्म करता है, तो मन में ईर्ष्या, संघर्ष, भय और क्रोध उत्पन्न होते हैं। इच्छाओं की पूर्ति न होने पर या उनके नाश होने पर अंततः घोर मानसिक दुःख और संताप की प्राप्ति होती है।

उत्तर: तामसिक कर्म अज्ञान, आलस्य, प्रमाद, हिंसा और मूढ़ता से प्रेरित होते हैं। ऐसे कर्मों का फल अंधकार (अज्ञान) और पतन होता है। इनसे न केवल व्यक्ति की विवेक बुद्धि नष्ट होती है, बल्कि समाज में भी नकारात्मकता और विनाश का विस्तार होता है।

उत्तर: सात्विक आहार का सेवन करके, सत्संग में समय बिताकर, नित्य ईश्वर का स्मरण एवं ध्यान करके, और अपने प्रत्येक कर्म को निष्काम भाव से समाज कल्याण या ईश्वरार्पण मानकर करने से रजस और तमस गुणों का शमन होता है तथा सत्व गुण की वृद्धि होती है।

उत्तर: यह श्लोक श्रीमद्भागवतगीता के चौदहवें अध्याय 'गुणात्रयविभाग योग' के अंतर्गत आता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने प्रकृति के तीन गुणों—सत्व, रज और तम—का विस्तार से वर्णन किया है और यह समझाया है कि कैसे ये गुण मनुष्य के स्वभाव और कर्मों को प्रभावित करते हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं कि शुभ कर्मों का फल सात्त्विक और निर्मल होता है, रजोगुणी कर्मों का फल दुःख है, और तमोगुणी कर्मों का फल अज्ञान है। The fruit of good (Sattvic) action is pure; the fruit of Rajasic action is pain; the fruit of Tamasic action is ignorance.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

इसलिए मनुष्य को सात्त्विक कर्म करने चाहिए और राजस-तामस कर्मों से बचना चाहिए। Hence, one should perform Sattvic actions and avoid Rajasic and Tamasic ones.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 16 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 16/27 59% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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