गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – श्लोक 16
श्लोक १६ में तीनों गुणों के कर्मों के फल बताए गए हैं: सात्त्विक का निर्मल फल, राजस का दुःख, तामस का अज्ञान। Verse 16: The fruit of Sattvic action is pure, of Rajasic is pain, and of Tamasic is ignorance.
संस्कृत श्लोक
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् । रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥ १६॥
karmaṇaḥ sukṛtasyāhuḥ sāttvikaṃ nirmalaṃ phalam | rajasas tu phalaṃ duḥkham ajñānaṃ tamasaḥ phalam ||16||
पदच्छेद / शब्दार्थ
कर्मणः: कर्म का; सुकृतस्य: शुभ (कर्म); आहुः: कहते हैं; सात्त्विकम्: सात्त्विक; निर्मलम्: निर्मल; फलम्: फल; रजसः: रजोगुण (के कर्म) का; तु: तो; फलम्: फल; दुःखम्: दुःख; अज्ञानम्: अज्ञान; तमसः: तमोगुण (के कर्म) का; फलम्: फल।
हिंदी अनुवाद
शुभ कर्म का फल सात्त्विक और निर्मल कहा गया है, रजोगुण का फल दुःख है, और तमोगुण का फल अज्ञान है।
English Translation
The fruit of good action is said to be Sattvika and pure; the fruit of Rajas is pain; and the fruit of Tamas is ignorance.
टीका / Commentary
प्रत्येक गुण के अनुसार कर्मों के फल अलग-अलग होते हैं: सात्त्विक कर्म सुखद, राजस कर्म दुःखद, तामस कर्म अज्ञानकारक। The fruits correspond to the gunas: Sattvic actions yield purity and happiness; Rajasic, pain; Tamasic, ignorance.