श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 15

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 35 मिनट का पठन 123 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते । तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥ १५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
रजसि
रजोगुण में
प्रलयम्
मृत्यु
गत्वा
प्राप्त होकर
कर्मसङ्गिषु
कर्मों में आसक्त मनुष्यों में
जायते
जन्म लेता है
तथा
इसी प्रकार
प्रलीनः
प्रलय को प्राप्त
तमसि
तमोगुण में
मूढयोनिषु
मूढ़ योनियों में
जायते
जन्म लेता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

रजोगुण में मृत्यु पाकर वह कर्मों में आसक्त मनुष्यों में जन्म लेता है, और तमोगुण में मरकर मूढ़ योनियों में जन्म लेता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक एवं ब्रह्मांडीय परिचय

सनातन धर्म के मुकुटमणि और वेदों के सारस्वरूप श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय, जिसका नाम 'गुणात्रयविभागयोग' है, में भगवान श्रीकृष्ण ने प्रकृति के तीन गुणों—सत्त्व, रज और तम—का अत्यंत सूक्ष्म, वैज्ञानिक और दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत किया है। यह संपूर्ण ब्रह्मांड और इसके जीव इन्हीं तीन महाशक्तियों के नियंत्रण में संचालित होते हैं। मनुष्य की चेतना, उसके विचार, उसकी वृत्तियाँ और अंततः उसकी मृत्यु के पश्चात की गति भी इन्हीं गुणों के प्रभाव से निर्धारित होती है।

प्रस्तुत श्लोक संख्या पंद्रह (15) इस अध्याय का अत्यंत मर्मस्पर्शी और जीवन की वास्तविकता को उजागर करने वाला श्लोक है। यह हमें यह चेतावनी भी देता है और यह दिशा भी दिखाता है कि जीवन जीते समय हम अपने भीतर किस गुण को पोषित कर रहे हैं। रजोगुण (आसक्ति, कर्मकाण्ड, कामना और महत्वाकांक्षा) तथा तमोगुण (अज्ञान, आलस्य, प्रमाद और मोह) के प्रभाव में जीवन का अंत होने पर जीव की क्या गति होती है, इसका अत्यंत स्पष्ट चित्रण यहाँ भगवान द्वारा किया गया है। Bhaktilok.in के इस विशेष अध्ययन में हम इसी दिव्य श्लोक के शाब्दिक अर्थ, दार्शनिक गहराई, शास्त्रीय पृष्ठभूमि और हमारे दैनिक जीवन पर इसके प्रभावों का व्यापक विहंगम अवलोकन करेंगे।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक एवं प्रसंग

वैदिक परंपरा में किसी भी श्लोक का उच्चारण उसकी शुद्धता और पवित्रता के साथ किया जाना चाहिए। यहाँ इस श्लोक को उसके पूर्ववर्ती श्लोक के साथ संदर्भ सहित प्रस्तुत किया गया है ताकि इसके भाव को समग्रता से समझा जा सके:

यदा सत्त्वे प्रवृद्धेत प्रलयं याति देहभृत् ।
तदोत्तमविदां लोकानमलां प्रतिपद्यते ॥ १४॥

रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥ १५॥

श्लोकानुकूल सरल पद्यानुवाद (हिंदी कविता रूप में):

जब सत्त्व गुण की वृद्धि में, तनु का अंत हो जाता है।
वह पावन उत्तम लोकों को, ज्ञानी जन सा पाता है॥
पर रज में जिसने प्राण तजे, वह कर्म-संगियों में आता।
और तमोगुण में मृत प्राणी, मूढ़ योनियों में खो जाता॥

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में वेदों और उपनिषदों का अगाध ज्ञान छिपा हुआ है। नीचे दी गई तालिका में शब्दों के अर्थ और उनके दार्शनिक मर्म को विस्तार से समझाया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
रजसि रजोगुण में (स्थित होने पर) जब मनुष्य की चेतना कामना, तीव्र वासना, अहंकार और चंचलता से भरी होती है।
प्रलयं गत्वा मृत्यु को प्राप्त होकर / प्राण छोड़कर भौतिक शरीर का छूटना और प्राणों का इस लोक से गमन करना।
कर्मसङ्गिषु कर्मों में आसक्त मनुष्यों के बीच ऐसे परिवार या योनि में जन्म जहाँ निरंतर कर्म, फल की इच्छा और संसारी भागदौड़ प्रधान हो।
जायते उत्पन्न होता है / जन्म लेता है पुनर्जन्म के चक्र में जीव का पुनः भौतिक देह धारण करना।
तथा और इसी प्रकार / वैसे ही दूसरी स्थिति का वर्णन करने के लिए प्रयुक्त संयोजक शब्द।
प्रलीनः लीन हुआ / मृत्यु को प्राप्त हुआ जिसकी चेतना पूरी तरह से अज्ञान में डूबी हो और उसी अवस्था में मृत्यु हो।
तमसि तमोगुण में (अंधकार, आलस्य में) विवेक शून्य अवस्था, जहाँ धर्म-अधर्म का ज्ञान न हो।
मूढयोनिषु मूढ़ (पशु, कीट, पक्षी आदि) योनियों में विवेकहीन योनियाँ जहाँ चेतना का विकास अत्यंत अवरुद्ध होता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Background)

महाभारत के युद्ध के आरंभ होने से ठीक पहले कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में अर्जुन अपने सगे-संबोधियों को सामने देखकर मोहग्रस्त हो जाते हैं। तब जगतगुरु भगवान श्रीकृष्ण उन्हें जो उपदेश देते हैं, वही श्रीमद्भगवद्गीता के रूप में संपूर्ण मानवता का मार्गदर्शन कर रहा है। 'गुणात्रयविभागयोग' नामक चौदहवें अध्याय में महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित यह प्रसंग इस बात पर प्रकाश डालता है कि जीव की गति उसकी आंतरिक प्रकृति पर निर्भर करती है, न कि केवल बाहरी दिखावे पर।

शास्त्रों में इस बात का बार-बार उल्लेख मिलता है कि प्रकृति (प्रकृतिः त्रिगुणात्मिका) तीन रस्सियों की तरह है—सत्त्व (सफेद, प्रकाश), रज (लाल, गतिविधि और लालसा), और तम (काला, अंधकार और जड़ता)। जब अर्जुन पूछते हैं कि हे भगवान! इन तीन गुणों को पार करने वाला मनुष्य किस लक्षण से युक्त होता है और उसकी मृत्यु के पश्चात गति क्या होती है, तब भगवान श्रीकृष्ण विस्तार से समझाते हैं कि जीवन भर मनुष्य जिस गुण का संग करता है, मृत्यु के समय उसकी वही वासना प्रबल हो जाती है।

वैदिक दर्शन के अनुसार, 'रजसि प्रलयं गत्वा' का अर्थ है कि यदि मनुष्य अत्यधिक संसारी इच्छाओं, धन-दौलत, मान-सम्मान और अहम्‌ की भावना (रजोगुण) में लिप्त रहकर शरीर त्यागता है, तो उसे पुनः ऐसे ही कर्मकांडी और सांसारिक बंधनों से जकड़े हुए मनुष्य योनि में आना पड़ता है जहाँ सुख-दुःख का चक्र अनंत काल तक चलता रहता है। इसके विपरीत, यदि कोई व्यक्ति आलस्य, निद्रा, नशा, प्रमाद और अज्ञान (तमोगुण) में जीवन बिताते हुए मृत्यु को प्राप्त होता है, तो उसकी चेतना का पतन इतना अधिक हो जाता है कि उसे पशु, पक्षी या कीट-पतंगों (मूढ़ योनियों) जैसी नीच योनियों में जन्म लेना पड़ता है जहाँ आध्यात्मिक उन्नति का अवसर बिल्कुल नहीं होता। यह सिद्धांत कर्मफल की न्याय व्यवस्था का एक अभिन्न अंग है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के इस ज्ञान का अध्ययन, मनन और स्मरण करने से साधक को जीवन में अनेक प्रकार के मानसिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. कर्मों के प्रति सचेत दृष्टि

यह श्लोक हमें दैनिक जीवन में अत्यधिक लालच और कर्म-आसक्ति से बचने की प्रेरणा देता है, जिससे मानसिक तनाव कम होता है।

2. तमोगुण और आलस्य का नाश

नियमित रूप से इस अध्याय के पाठ से प्रमाद, अकर्मण्यता और नकारात्मक विचारों का शमन होता है तथा ऊर्जा का संचार होता है।

3. आत्म-विश्लेषण की क्षमता

साधक अपने भीतर उठने वाले विचारों (सत्त्व, रज, तम) की पहचान करना सीख जाता है और अपनी चेतना को ऊपर उठाने का प्रयास करता है।

4. पुनर्जन्म चक्र की समझ

मृत्यु और जन्म के रहस्य को वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से समझकर जीव भयमुक्त और शांत हो जाता है।

5. मानसिक शांति और स्थिरता

गीता के वचनों का स्मरण चित्त को शांत करता है और जीवन की कठिनाइयों का सामना करने का अदम्य साहस प्रदान करता है।

6. मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर होना

त्रिगुणात्मक संसार से ऊपर उठकर परम ब्रह्म की प्राप्ति की इच्छा प्रबल होती है, जो वास्तविक पुरुषार्थ है।

7. सात्विक वृत्तियों का विकास

रज और तम के दोषों को समझकर व्यक्ति अपने जीवन को सात्विक गुणों (दया, प्रेम, ज्ञान, सेवा) से परिपूर्ण बनाता है।

8. ईश्वरीय कृपा की प्राप्ति

भगवान श्रीकृष्ण के इन शाश्वत वचनों का आदर करने से साधक पर भगवान की अहेतुकी कृपा बरसती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in का यह लेख वेदों, उपनिषदों और श्रीमद्भगवद्गीता के पारंपरिक टीकाओं (जैसे शंकराचार्य भाष्य, ज्ञानेश्वरी और स्वामी रामसुखदास जी की साधना प्रकाशनी) के गहन अध्ययन के पश्चात हमारे विद्वान संस्कृत भाषाविदों द्वारा तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक सनातन धर्म के मूल ग्रंथों का शुद्ध, वैज्ञानिक और भ्रांति-मुक्त संदेश पहुँचाना है। इस सामग्री में किसी भी प्रकार के काल्पनिक या अप्रमाणित दावों का समावेश नहीं किया गया है, अपितु मूल श्लोकों के शाब्दिक और दार्शनिक स्वरूप को अक्षुण्ण रखा गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

इसका अर्थ है कि जिस व्यक्ति की मृत्यु रजोगुण (कामना, अत्यधिक लालसा, अहम्, और कर्मों में गहरी आसक्ति) के प्रभाव में होती है, वह मृत्यु के पश्चात पुनः संसारी कर्मों से जुड़े मनुष्यों के बीच ही जन्म लेता है। उसे सुख और दुःख के संघर्ष से भरे इस संसार में दोबारा लौटना पड़ता है।

भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं कि 'तमसि मूढयोनिषु जायते'। अर्थात अज्ञान, आलस्य, प्रमाद और अंधकार में जीवन बिताकर मरने वाला जीव मूढ़ योनियों (जैसे पशु, पक्षी, कीट और अन्य विवेकहीन योनियाँ) में जन्म ग्रहण करता है, जहाँ चेतना अत्यंत दबी हुई होती है।

हाँ, बिल्कुल। मनुष्य योनि ही एकमात्र ऐसी योनि है जहाँ पुरुषार्थ के माध्यम से तम और रजोगुण को नियंत्रित करके सत्त्व गुण की वृद्धि की जा सकती है। सात्विक आहार, सत्संग, ईश्वर स्मरण, स्वाध्याय और निष्काम कर्म के द्वारा कोई भी व्यक्ति अपनी प्रकृति को उन्नत कर सकता है।

चौदहवें अध्याय का नाम 'गुणात्रयविभागयोग' है। इसका मुख्य विषय प्रकृति के तीनों गुणों (सत्त्व, रज और तम) के प्रभाव, उनके लक्षणों, मनुष्य के जीवन पर उनके परिणाम और इन तीनों गुणों से परे (गुणातीत) होकर मोक्ष या परम अवस्था को प्राप्त करने के मार्ग का वर्णन करना है।

यह श्लोक हमें आत्म-नियंत्रण और सचेत जीवन जीने की प्रेरणा देता है। यह हमें याद दिलाता है कि हमारे कर्म और विचार केवल वर्तमान को ही नहीं, बल्कि हमारी संपूर्ण आध्यात्मिक यात्रा को प्रभावित करते हैं, जिससे हम गलत आदतों और वासनाओं से दूर रहकर एक सार्थक जीवन जी सकें।

© Bhaktilok.in - All Rights Reserved | Sarve Bhavantu Sukhinah

प्रस्तुत लेख सनातन संस्कृति के प्रचार और आत्म-कल्याण हेतु समर्पित है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं कि रजोगुण में मृत्यु होने पर व्यक्ति कर्मों में आसक्त मनुष्यों में जन्म लेता है, और तमोगुण में मरने पर मूढ़ योनियों (पशु आदि) में जन्म लेता है। Dying in Rajas, one is born among those attached to action; dying in Tamas, one is born in deluded wombs.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

अतः मनुष्य को चाहिए कि वह अपने गुणों को सुधारे और सत्त्व बढ़ाए, ताकि उत्तम गति प्राप्त हो। Hence, one should refine one's nature and cultivate Sattva for a better future.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 15 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 15/27 56% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!