श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 14

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 40 मिनट का पठन 124 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् । तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥ १४॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
यदा
जब
सत्त्वे
सत्त्व गुण में
प्रवृद्धे
बढ़े हुए
तु
तो
प्रलयम्
मृत्यु को
याति
जाता है
देहभृत्
देहधारी
तदा
तब
उत्तमविदाम्
उत्तम ज्ञानियों के
लोकान्
लोकों को
अमलान्
निर्मल
प्रतिपद्यते
प्राप्त होता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जब सत्त्व गुण के बढ़े रहते हुए देहधारी की मृत्यु होती है, तब वह उत्तम ज्ञानियों के निर्मल लोकों को प्राप्त होता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय महत्ता

सनातन धर्म और भारतीय दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ मात्र नहीं, बल्कि साक्षात् भगवान श्री कृष्ण के मुखकमल से निःसृत अमृतोपम वाणी माना गया है। गीता का प्रत्येक श्लोक मानव जीवन के सबसे गहरे रहस्यों, ब्रह्मांड की संरचना, और आत्मा की अन्नत यात्रा का मार्गदर्शक मानचित्र प्रस्तुत करता है। विशेष रूप से, चौदहवां अध्याय, जिसे 'गुणत्रयविभागयोग' के नाम से जाना जाता है, प्रकृति के तीन मूलभूत गुणों—सत्त्व, रज और तम—की सूक्ष्म गतिशीलता और मनुष्य की चेतना पर उनके प्रभावों का अत्यंत वैज्ञानिक एवं दार्शनिक विश्लेषण करता है। यह अध्याय हमें यह समझाने का प्रयास करता है कि किस प्रकार ये त्रिगुण संपूर्ण जगत को बांधे रखते हैं और कैसे इनसे परे जाकर साधक अपनी वास्तविक आध्यात्मिक मुक्ति (कैवल्य) को प्राप्त कर सकता है।

इस अध्याय का चौदहवां श्लोक—"यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् । तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥ १४॥"—जीवन और मरण के उस अत्यंत सूक्ष्म और गूढ़ विज्ञान को उजागर करता है जहाँ भौतिक शरीर का पतन (मृत्यु) केवल अंत नहीं, बल्कि आत्मा की आगे की गति का निर्धारक बनता है। जब कोई मनुष्य अपने जीवनकाल में अपनी चेतना को सात्त्विक ऊर्जा से परिपूर्ण कर लेता है, और जब इस भौतिक शरीर का प्राणांत होता है, तब उसकी आंतरिक स्थिति ब्रह्मांडीय उच्च लोकों के साथ तन्मय हो जाती है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि हमारी मृत्यु का समय और हमारी अंतिम श्वास के समय हमारे भीतर कौन सा गुण प्रबल है, यह इस बात का निर्णय करता है कि हमारी आत्मा किस लोक की यात्रा करेगी। इस प्रकार, यह श्लोक न केवल परलोक सुधारने का मार्ग दिखाता है, बल्कि वर्तमान जीवन को भी सत्त्वगुण के प्रकाश से आलोकित करने की प्रेरणा देता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

ॐ श्री परमात्मने नमः

अथ श्रीमद्भगवद्गीता चतुर्दशोऽध्यायः (गुणत्रयविभागयोग)

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् ।
तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥ १४॥

(पदच्छेद: यदा, सत्त्वे, प्रवृद्धे, तु, प्रलयम्, याति, देहभृत्, तदा, उत्तमविदां, लोकान्, अमलान्, प्रतिपद्यते)

पाठ विधि एवं ध्यान: इस श्लोक का पाठ करने से पूर्व साधक को चाहिए कि वह पवित्र होकर पूर्वादेश या उत्तरादेश की ओर मुख करके बैठे। मन को शांत कर भगवान श्री कृष्ण के चतुर्भुज रूप का ध्यान करें। श्लोक का उच्चारण करते समय प्रत्येक शब्द की स्पष्टता और उसके आंतरिक भाव पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। नित्य प्रातः स्नान उपरांत इस श्लोक का तीन, सात या ग्यारह बार सस्वर पाठ करने से मानसिक शुद्धि और सात्त्विक वृत्तियों का जागरण होता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक के प्रत्येक पद का शाब्दिक और दार्शनिक अर्थ निम्नलिखित तालिका में प्रस्तुत है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
यदा जब समय की निरंतरता और विशेष परिस्थिति के आगमन का संकेत।
सत्त्वे सत्त्व गुण में (प्रकाश, ज्ञान और पवित्रता के गुण में) मनुष्य की अंतःचेतना जब मल-विक्षेप से मुक्त होकर ज्ञान और प्रकाश की ओर उन्मुख होती है।
प्रवृद्धे भली-भांति बढ़े हुए होने पर / प्रबल होने पर जब अन्य दोनों गुण (रजस् और तमस्) दब जाते हैं और केवल सात्त्विक ऊर्जा सर्वोच्च शिखर पर होती है।
तु निश्चय ही / लेकिन निश्चयात्मक बोध, जो रज और तम से इस सात्त्विक स्थिति की भिन्नता को स्पष्ट करता है।
प्रलयम् प्रलय को / मृत्यु को / शरीर त्याग को स्थूल भौतिक शरीर का पंचतत्वों में विलीन होना और आत्मा द्वारा इस चोले को छोड़ना।
याति प्राप्त होता है / जाता है आत्मा की निरंतर गतिशील यात्रा, जो रुकती नहीं बल्कि कर्म और गुणों के अनुसार आगे बढ़ती है।
देहभृत् देह को धारण करने वाला मनुष्य (आत्मा) जीव जो शरीर रूपी रथ पर आरूढ़ है और अपने कर्मों तथा गुणों का भार वहन करता है।
तदा तब उस विशिष्ट क्षण का वर्णन जब मृत्यु के समय चेतना अपनी पराकाष्ठा पर होती है।
उत्तमविदाम् उत्तम ज्ञानियों / महर्षियों / देवताओं को जानने वाले पुरुषों के उन उच्च कोटि के योगियों और देवताओं के लोक जो ब्रह्मविद्या और शुद्ध ज्ञान में प्रतिष्ठित हैं।
लोकान् लोकों को (दिव्य लोकों को) स्वर्ग, महः, जनः या अन्य उच्च आध्यात्मिक लोकों की प्राप्ति।
अमलान् मल-रहित / पवित्र / निर्मल लोकों को वे लोक जहाँ भौतिक दुःख, शोक, मोह और काम-क्रोध का कोई मलिन प्रभाव नहीं होता।
प्रतिपद्यते प्राप्त होता है / पहुँच जाता है आत्मा की अंतिम गति, जहाँ वह अपने सात्त्विक कर्मों के अनुरूप दिव्य आयाम में प्रवेश करती है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत के युद्ध के आरंभ से ठीक पहले, जब कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन भयंकर मोह और विषाद से घिर गए थे, तब उनके सारथी बने भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें जीवन के परम सत्यों से अवगत कराया। श्रीमद्भगवद्गीता का यह ज्ञान कुरुक्षेत्र की उस धर्मभूमि पर दिया गया संवाद है, जिसे महर्षि वेद व्यास ने महाभारत के भीष्म पर्व में संकलित किया है। चौदहवें अध्याय के इस प्रसंग में अर्जुन भगवान से पूछते हैं कि हे प्रभु! त्रिगुणों को लांघने वाला मनुष्य किस प्रकार का आचरण करता है और इन गुणों से अतीत होने का उपाय क्या है?

इस प्रश्न के उत्तर में भगवान श्री कृष्ण प्रकृति के तीन गुणों—सत्त्व (प्रकाश और सुख का कारक), रजस् (कर्म, लालसा और आ सकती का कारक), और तमस् (अज्ञान, प्रमाद और आलस्य का कारक)—का विस्तार से वर्णन करते हैं। भगवान अर्जुन को समझाते हैं कि प्रकृति की यह त्रिविध डोरियां पूरे संसार को जकड़े हुए हैं। इन गुणों में जो मनुष्य सत्त्वगुण को अपने जीवन में प्रधान बना लेता है, उसकी बुद्धि हमेशा धर्म, ज्ञान, सेवा और पवित्रता की ओर झुकती है।

पौराणिक संदर्भों और उपनिषदों में भी इस बात का बार-बार उल्लेख मिलता है कि मृत्यु के समय मनुष्य की जैसी मति और गति होती है, उसे वैसी ही योनि या लोक प्राप्त होता है ('यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्')। महर्षि वेदों और पुराणों के अनुसार, जब कोई साधक जीवनभर सत्त्वगुण की साधना करता है—जैसे कि निष्काम कर्म, वेदों का अध्ययन, सत्संग, और परोपकार—तो उसके सूक्ष्म शरीर में सत्त्व की मात्रा इतनी प्रबल हो जाती है कि मृत्यु के समय भी उसकी चेतना नीचे नहीं गिरती। वह सीधे सूर्यलोक, महलोक या उन निर्मल दिव्य लोकों को प्राप्त होता है जहाँ ऋषि-मुनि और देवता निवास करते हैं। यह कथा और इसका दार्शनिक ढांचा हमें यह सिखाता है कि हमारा वर्तमान जीवन ही हमारा भविष्य तय करता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस पावन श्लोक का नियमित पठन, मनन और इसके अर्थ का स्मरण करने से साधक को अनेकानेक आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति एवं स्थिरता

नियमित पाठ से मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाले चिंता, भय और तनाव के तरंगें शांत होती हैं और चित्त में अद्भुत स्थिरता आती है।

2. सात्त्विक ऊर्जा और सकारात्मक आभा (Aura)

यह श्लोक शरीर के चारों ओर एक मजबूत सात्त्विक आवरण का निर्माण करता है, जिससे नकारात्मक ऊर्जा और बुरे विचार दूर रहते हैं।

3. कार्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

ज्ञान के इस प्रकाश से संचित पापकर्मों और दुष्ट वृत्तियों का क्षय होता है, जिससे मन निरंतर पवित्रता की ओर अग्रसर होता है।

4. मृत्यु के भय से मुक्ति

इस श्लोक के गूढ़ अर्थ को समझने से साधक के मन से मृत्यु का अज्ञात भय समाप्त हो जाता है और वह जीवन के अंतिम सत्य को सहज स्वीकार कर लेता है।

5. उच्च आध्यात्मिक लोकों की पात्रता

जीवन के अंत समय में सात्त्विक चेतना बनाए रखने की प्रेरणा मिलती है, जो साधक को उच्च आध्यात्मिक लोकों की यात्रा के योग्य बनाती है।

6. उच्च बौद्धिक क्षमता और विवेक

सत्त्वगुण के बढ़ने से मनुष्य की निर्णय लेने की क्षमता, सही और गलत में भेद करने का विवेक तीव्र हो जाता है।

7. ईश्वर की कृपा और भक्ति की प्राप्ति

सात्त्विक भाव से किए गए पाठ से भगवान श्री कृष्ण की अहेतुत कृपा प्राप्त होती है और भक्ति मार्ग में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं।

8. जीवन शैली में सकारात्मक परिवर्तन

आहार, आचार और विचार में शुद्धि आती है, जिससे समग्र जीवन स्वस्थ, संतुलित और आनंदमय बन जाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के इस प्रतिष्ठित मंच पर प्रस्तुत यह विवेचन श्रीमद्भगवद्गीता के पारंपरिक आचार्यों के भाष्यों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामानुज और स्वामी गीतानंद) के अध्ययन पर आधारित है। हमारे विद्वान भाषाविदों और संस्कृत जानकारों ने यह सुनिश्चित किया है कि इस श्लोक का अर्थ आधुनिक पाठकों के लिए अत्यंत सहज, सरल और प्रामाणिक हिंदी में प्रस्तुत हो, ताकि किसी भी प्रकार के दार्शनिक भ्रम की गुंजाइश न रहे।

संदर्भ ग्रंथ: श्रीमद्भगवद्गीता (गीता प्रेस गोरखपुर संस्करण), महाभारत का भीष्म पर्व, तथा उपनिषदों के त्रिगुण सिद्धांत। यह सामग्री पाठकों को आध्यात्मिक उन्नति और सनातन संस्कृति की गहरी समझ प्रदान करने के उद्देश्य से पूरी निष्ठा और विद्वत्ता के साथ तैयार की गई है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय (गुणत्रयविभागयोग) से लिया गया है। इसका मुख्य विषय प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) का मनुष्य के जीवन और उसकी मृत्यु के उपरांत होने वाली गति पर प्रभाव डालना है। यह बताता है कि सात्त्विक चेतना के साथ प्राण त्यागने वाला जीव उच्च और पवित्र लोकों को प्राप्त करता है।

श्लोक के अनुसार, जब मृत्यु के समय सत्त्वगुण प्रबल होता है, तब वह जीव 'उत्तमविदां लोकान् अमलान्' यानी उन श्रेष्ठ ज्ञानियों, महर्षियों और देवताओं के निर्मल और पवित्र लोकों को प्राप्त होता है जो समस्त मलादि विकारों से पूरी तरह मुक्त हैं।

दैनिक जीवन में सात्त्विक आहार (शुद्ध, शाकाहारी और ताजा भोजन), सात्त्विक आचार (सत्य बोलना, दया, परोपकार, निष्काम भाव), सत्संग, ध्यान, ईश्वर की उपासना, और पवित्र ग्रंथों (जैसे भगवद्गीता) के नियमित पठन-पाठन से सत्त्वगुण को बढ़ाया जा सकता है।

हाँ, मृत्यु के समय मनुष्य के मन में जो विचार और गुण प्रबल होते हैं, वे उसके दीर्घकालिक संस्कारों और कर्मों का ही परिणाम होते हैं। जीवनभर किए गए सत्कर्म और चिंतन ही अंत समय में सत्त्वगुण को जाग्रत करने में सहायक होते हैं। इसीलिए जीवनभर अच्छे कर्म और साधना का अभ्यास करने पर बल दिया गया है।

इस श्लोक का नित्य पाठ करने से मन में शांति, सकारात्मक ऊर्जा और वैराग्य भाव की वृद्धि होती है। यह मनुष्य को उसके जीवन के असली उद्देश्य से जोड़ता है, मानसिक विकारों को दूर करता है और मृत्यु के भय से मुक्ति दिलाते हुए आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं कि जब सत्त्व गुण बढ़ा हुआ हो और उस समय देहधारी की मृत्यु हो, तो वह उत्तम ज्ञानियों के निर्मल लोकों को प्राप्त होता है। When one dies with Sattva predominant, they attain the spotless worlds of the knowers of the Highest.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

अतः सदा सत्त्व बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए, जिससे अन्तकाल में शुभ गति मिले। Therefore, one should always strive to increase Sattva to ensure a good destination at death.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 14 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 14/27 52% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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