श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 13

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 36 मिनट का पठन 130 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च । तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥ १३॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
अप्रकाशः
अप्रकाश (ज्ञान का अभाव)
अप्रवृत्तिः
अप्रवृत्ति
च
और
प्रमादः
प्रमाद
मोहः
मोह
एव
ही
च
और
तमसि
तमोगुण में
एतानि
ये
जायन्ते
उत्पन्न होते हैं
विवृद्धे
बढ़े हुए
कुरुनन्दन
हे कुरुनन्दन।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे कुरुनन्दन! तमोगुण के बढ़ने पर अप्रकाश (ज्ञान का अभाव), अप्रवृत्ति, प्रमाद और मोह उत्पन्न होते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में प्रकृति के तीन मूलभूत गुणों—सत्त्व, रज और तम—का अत्यंत विस्तृत और वैज्ञानिक विवेचन किया गया है। संपूर्ण ब्रह्मांड और मानव शरीर इन्हीं तीन गुणों (त्रिगुणात्मक माया) के अधीन संचालित होता है। इनमें से 'तमोगुण' अज्ञान, जड़ता, अंधकार और पतन का प्रतीक माना गया है। जब मानव जीवन में तमोगुण की प्रधानता या अतिवृद्धि होती है, तब मनुष्य की चेतना कुंठित हो जाती है और वह अपने परम लक्ष्य, अर्थात आत्म-साक्षात्कार तथा कर्तव्य-कर्म से विमुख हो जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय (गुणात्रयविभाग योग) में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को प्रकृति के इन तीनों गुणों के स्वभाव, उनके बंधनों और उनसे मुक्त होने के उपायों का अत्यंत सूक्ष्म वैज्ञानिक विश्लेषण प्रदान करते हैं। प्रस्तुत श्लोक—"अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च। तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन॥"—तमोगुण के चरम विकास के लक्षणों को उजागर करता है। यह श्लोक न केवल एक दार्शनिक कथन है, बल्कि मनुष्य मात्र के लिए एक गंभीर चेतावनी भी है कि वह अपने भीतर और बाहर व्याप्त जड़ता को पहचाने और उससे ऊपर उठकर सात्विक एवं राजसिक ऊर्जा की ओर अग्रसर हो। आधुनिक संदर्भों में, जहाँ मानसिक अवसाद (Depression), आलस्य, अकर्मण्यता और दिशाहीनता चरम पर है, इस श्लोक का अध्ययन और इसके मर्म को समझना अत्यंत प्रासंगिक और कल्याणकारी सिद्ध होता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय १४, श्लोक १३

अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥ १३ ॥

पदच्छेद: अप्रकाशः, अप्रवृत्तिः च, प्रमादः, मोहः, एव, च, तमसि, एतानि, जायन्ते, विवृद्धे, कुरुनन्दन।

श्लोकोच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में या संध्यावंदन के समय शांत चित्त होकर करना चाहिए। इसका उच्चारण करते समय प्रत्येक शब्द के दीर्घ और ह्रस्व स्वरों का विशेष ध्यान रखना चाहिए, जिससे वाक् शुद्धि के साथ-साथ आंतरिक ऊर्जा का संतुलन भी बना रहे।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

तमोगुण के बढ़ने पर मनुष्य के भीतर कौन-कौन से दुर्गुण प्रकट होते हैं, इसे स्पष्ट करने के लिए नीचे विस्तृत तालिका प्रस्तुत की गई है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
अप्रकाशः (अप्रकाशः) प्रकाश का अभाव, अंधकार, अज्ञान विवेक बुद्धि का लुप्त हो जाना, जिससे सही और गलत, अच्छे और बुरे का भेद समझ में न आए। यह आंतरिक चेतना का अंधकार है।
अप्रवृत्तिः (अप्रवृत्तिः) प्रवृत्ति का न होना, कार्य न करना, अकर्मण्यता कर्तव्य-कर्मों के प्रति उदासीनता, आलस्य और शारीरिक-मानसिक रूप से किसी भी प्रकार की रचनात्मक गतिविधि में भाग न लेने की स्थिति।
च और इन सभी लक्षणों के समुच्चय (Group) को जोड़ने वाला अव्यय, जो यह दर्शाता है कि ये गुण प्रायः एक साथ ही प्रकट होते हैं।
प्रमादः (प्रमादः) प्रमाद, असावधानी, भूल कर्तव्य की उपेक्षा करना, जो कार्य अनिवार्य रूप से करना चाहिए, उसे भूल जाना या टालते रहना (Procrastination)।
मोहः (मोहः) मोह, भ्रम, अज्ञानजन्य विमूढ़ता वास्तविकता को न समझ पाना, असत्य को सत्य मान लेना और अहितकर चीज़ों को अपने लिए हितकर समझकर उनमें आसक्त हो जाना।
एव ही,निश्चित रूप से इस बात पर बल देना कि जब तमोगुण बढ़ता है, तब ये लक्षण अनिवार्य रूप से उत्पन्न होते ही हैं, इसमें कोई संशय नहीं है।
तमसि (तमसि) तमोगुण में, अंधकारमय स्थिति में मनुष्य की वह मानसिक और भौतिक अवस्था जहाँ अज्ञान और जड़ता ने उसकी पूरी ऊर्जा को आच्छादित (Cover) कर लिया हो।
एतानि (एतानि) ये सभी (उपर्युक्त लक्षण) अप्रकाश, अप्रवृत्ति, प्रमाद और मोह—इन चारों प्रमुख विकारों का समूह जो तमोगुण की वृद्धि का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
जायन्ते (जायन्ते) उत्पन्न होते हैं, प्रकट होते हैं इन दुर्गुणों का मनुष्य के अंतःकरण और व्यवहार में उद्भव होना, जिससे उसका जीवन पतन की ओर अग्रसर होता है।
विवृद्धे (विवृद्धे) अत्यधिक बढ़ने पर, वृद्धि होने पर जब भोजन, संगति, विचारों या आदतों के कारण शरीर और मन में तमोगुण अपनी सीमा लांघकर प्रबल हो जाता है।
कुरुनन्दन (कुरुनन्दन) हे कुरुवंश के श्रेष्ठ नंदन (अर्जुन) भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को इस नाम से संबोधित करने का तात्पर्य यह है कि उच्च कुल में उत्पन्न होने के बावजूद यदि सावधानी न रखी जाए, तो कोई भी तमोगुण के प्रभाव में आ सकता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत के भीष्म पर्व का एक अभिन्न अंग है, जो कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण और पांडव पुत्र अर्जुन के बीच संवाद के रूप में प्रकट हुआ था। जब अर्जुन अपने सगे-सम्बन्धियों को सामने युद्ध में देखकर अत्यधिक विषाद, मोह और कर्तव्य-विमूढ़ता (जो कि स्वयं तमोगुण और रजोगुण का मिश्रण है) से ग्रस्त होकर गांडीव धनुष रख देते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें सांख्य योग, कर्म योग और ज्ञान योग का उपदेश देते हैं।

चौदहवें अध्याय के आरंभ में भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि ज्ञानों में भी जो उत्तम ज्ञान है, उसे वे अर्जुन को बता रहे हैं, जिसे प्राप्त करके ऋषि-मुनिगण इस संसार के बंधन से मुक्त होकर परम सिद्धि को प्राप्त हुए हैं। प्रकृति की गोद में पलने वाला प्रत्येक जीव सत, रज और तम—इन तीनों गुणों के बंधन में बंधा हुआ है। पुराणों और सांख्य दर्शन में इन तीनों गुणों की उत्पत्ति प्रकृति (मूल प्रकृति) से मानी गई है।

महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत और श्रीमद्भगवद्गीता के इस प्रसंग में तमोगुण को 'अज्ञान का आवरण' कहा गया है। पौराणिक कथाओं और आख्यानों में असुरों और राक्षसी वृत्तियों का मूल आधार भी इसी तमोगुण को बताया गया है, जहाँ व्यक्ति अहंकार, आलस्य, हिंसा और विलासिता में डूबा रहता है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को कुरुनन्दन (कुरुवंश के गौरव) कहकर संबोधित करते हैं और यह चेतावनी देते हैं कि महान कुल में जन्म लेने मात्र से कोई गुणों के प्रभाव से नहीं बच जाता; इसके लिए निरंतर सतोगुण की साधना और तमस के त्याग की आवश्यकता होती है। यह ऐतिहासिक संवाद आज भी संपूर्ण मानवता को सुप्त अवस्था से जागृत करने का सबसे बड़ा ग्रंथ है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस तेरहवें श्लोक का नियमित पठन, मनन और इसके अर्थ को जीवन में उतारने से निम्नलिखित अभूतपूर्व आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक स्पष्टता और विवेक की जागृति

तमोगुण के कारण उत्पन्न होने वाले 'अप्रकाश' (अंधकार) का नाश होता है, जिससे मन में सत्य और असत्य को परखने की अद्भुत क्षमता विकसित होती है।

2. आलस्य और अकर्मण्यता का निवारण

'अप्रवृत्ति' यानी कार्य न करने की प्रवृत्ति दूर होती है और व्यक्ति अपने दैनिक कर्तव्यों तथा धार्मिक कार्यों को पूरी ऊर्जा और निष्ठा के साथ संपन्न करता है।

3. प्रमाद और लापरवाही से मुक्ति

जीवन में अनुशासन आता है। व्यक्ति महत्वपूर्ण कार्यों को टालने (Procrastination) की बुरी आदत से छुटकारा पाता है और समय का सदुपयोग करता है।

4. मोह और भ्रम का नाश

संसार की नश्वर वस्तुओं में अत्यधिक आसक्ति और अज्ञानजनित मोह समाप्त होता है, जिससे चित्त में शांति और स्थिरता बनी रहती है।

5. सकारात्मक ऊर्जा (Positive Aura) का विस्तार

तमोगुण के क्षीण होने से सात्विक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है, जिससे आसपास का वातावरण पवित्र और सकारात्मक बनता है।

6. कार्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

गलत कर्मों और बुरी आदतों से मुक्ति मिलने के कारण संचित कर्मों का भार हल्का होता है और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।

7. अवसाद (Depression) और मानसिक तनाव से राहत

आधुनिक मनोविज्ञान के दृष्टिकोण से भी, तमोगुण के लक्षण जैसे सुस्ती, उदासीनता और निराशा का शमन मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करता है।

8. ईश्वर की कृपा और भगवद् प्राप्ति

त्रिगुणों के बंधन से ऊपर उठकर जब साधक शुद्ध सात्विकता या गुणातीत अवस्था को प्राप्त होता है, तब उसे भगवद् प्राप्ति का सहज अवसर मिलता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के इस लेख को शास्त्रीय परंपरा, वैदिक व्याकरण और श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक भाष्यों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज के दृष्टिकोण) के आधार पर अत्यंत सावधानीपूर्वक तैयार किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों को सरल, वैज्ञानिक और व्यावहारिक भाषा में पहुँचाना है।

प्रस्तुत विवेचन में किसी भी प्रकार के अतिशयोक्तिपूर्ण या असत्यापित दावों से बचा गया है तथा वेद, पुराण और महाकाव्यों के स्थापित सांस्कृतिक मूल्यों का पूर्ण सम्मान किया गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

उत्तर: श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय के तेरहवें श्लोक के अनुसार, तमोगुण के चार मुख्य लक्षण हैं—अप्रकाश (अज्ञान/अंधकार), अप्रवृत्ति (कार्य न करने की प्रवृत्ति/आलस्य), प्रमाद (असावधानी/लापरवाही) और मोह (भ्रम/अविवेक)। जब ये चारों लक्षण किसी व्यक्ति में अत्यधिक बढ़ जाते हैं, तो यह माना जाता है कि उस पर तमोगुण का प्रभाव हावी हो चुका है।

उत्तर: तमोगुण के बढ़ने से व्यक्ति का जीवन जड़ और unproductive हो जाता है। वह अपने कर्तव्यों से भागता है, स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह रहता है, नशे या बुरी संगति की ओर आकर्षित होता है और निरंतर मानसिक तनाव, अवसाद तथा पतन की स्थिति में चला जाता है। इससे उसकी आध्यात्मिक और भौतिक प्रगति दोनों बाधित होती हैं।

उत्तर: तमोगुण से मुक्ति पाने के लिए मनुष्य को सात्विक आहार, सत्संग, नियमित योगाभ्यास, सूर्योदय से पूर्व उठना (ब्रह्ममुहूर्त), निष्काम कर्म और भगवान के नाम का जप या स्मरण करना चाहिए। सतोगुण और राजस गुण के समुचित संतुलन से तमोगुण के अंधकार को धीरे-धीरे समाप्त किया जा सकता है।

उत्तर: हाँ, आधुनिक मनोविज्ञान और मनोचिकित्सा (Psychiatry) में भी तमोगुण के लक्षणों से मिलती-जुलती अवस्थाओं का वर्णन मिलता है। 'अप्रकाश' और 'मोह' को संज्ञानात्मक भ्रम (Cognitive biases) या भ्रम की स्थिति माना जाता है, जबकि 'अप्रवृत्ति' और 'प्रमाद' को अवसाद (Depression), लेथर्जी (Lethargy) और प्रेरणा की कमी (Lack of motivation) के रूप में देखा जाता है।

उत्तर: 'कुरुनन्दन' का अर्थ है कुरुवंश का श्रेष्ठ बालक। अर्जुन एक महान और पराक्रमी योद्धा कुल से थे। भगवान श्रीकृष्ण इस संबोधन के माध्यम से यह संकेत देते हैं कि उच्च कुल या अच्छे पारिवारिक पृष्ठभूमियों में जन्म लेने के बाद भी यदि मनुष्य अपनी मानसिक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण न रखे, तो वह भी अज्ञान और तमोगुण के पाश में बंध सकता है। अतः हर व्यक्ति को सचेत रहने की आवश्यकता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं कि हे कुरुनन्दन! जब तमोगुण बढ़ता है तो अप्रकाश (अज्ञान), अप्रवृत्ति, प्रमाद और मोह उत्पन्न होते हैं। When Tamas increases, there is darkness (ignorance), inactivity, carelessness, and delusion.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

तमोगुण के बढ़ने पर व्यक्ति आलसी, मूढ़ और भ्रमित रहता है। Under Tamas, one becomes lazy, deluded, and confused.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 13 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 13/27 48% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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