श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 12

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 40 मिनट का पठन 133 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा । रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥ १२॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
लोभः
लोभ
प्रवृत्तिः
प्रवृत्ति
आरम्भः
आरंभ
कर्मणाम्
कर्मों का
अशमः
अशांति
स्पृहा
स्पृहा (इच्छा)
रजसि
रजोगुण में
एतानि
ये
जायन्ते
उत्पन्न होते हैं
विवृद्धे
बढ़े हुए
भरतर्षभ
हे भरतश्रेष्ठ।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे भरतश्रेष्ठ! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति, कर्मों का आरम्भ, अशांति और इच्छा उत्पन्न होती हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के १४वें अध्याय (गुणत्रयविभाग योग) के दिव्य श्लोक का वृहद एवं दार्शनिक विश्लेषण

विहंगम दृष्टि: रजोगुण का ब्रह्माण्ड और मानव जीवन पर प्रभाव

सनातन वैदिक संस्कृति और श्रीमद्भगवद्गीता के दर्शन में प्रकृति के तीन मूल गुणों—सत्, रज और तम—का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान माना गया है। संपूर्ण ब्रह्माण्ड, जीव जगत और मनुष्य की चेतना इन्हीं त्रिगुणों के परस्पर संतुलन और संघर्ष से संचालित होती है। इसमें 'रजोगुण' (Rajas) को गति, महत्वाकांक्षा, वासना, और अहंकार का प्रतीक माना गया है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को 'भरतर्षभ' (भारतवंशियों में श्रेष्ठ) कहकर संबोधित करते हुए रजोगुण की वृद्धि होने पर मनुष्य के भीतर उत्पन्न होने वाले लक्षणों का अत्यंत सूक्ष्म और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करते हैं।

जब मनुष्य के भीतर रजोगुण की प्रधानता या अतिवृद्धि होती है, तब उसका अंतःकरण शांत नहीं रह पाता। वह निरंतर भोग, संग्रह, और बाह्य उपलब्धियों की दौड़ में भागने लगता है। इस श्लोक में वर्णित पाँच प्रमुख लक्षण—लोभ (Greed), प्रवृत्ति (Activity/Engagement), कर्मणामशमः (Restless initiation of works), अशांति (Internal turbulence), और स्पृहा (Intense desires)—वास्तव में आधुनिक मानव की जीवनशैली के भी सटीक मनोवैज्ञानिक चित्र हैं। वर्तमान युग में जहाँ भौतिक प्रगति और उपभोक्तावाद (Consumerism) चरम पर है, वहाँ यह श्लोक हमें आत्म-अवलोकन का अवसर प्रदान करता है। यह हमें यह समझने में सहायता करता है कि हमारी आंतरिक अशांति और कभी न शांत होने वाली तृष्णाओं का मूल कारण हमारी भौतिक प्रकृति का असंतुलन है। इस पावन लेख के माध्यम से हम रजोगुण के इस शाश्वत स्वरूप, इसके शास्त्रीय संदर्भ, और इससे मुक्ति पाने के आध्यात्मिक उपायों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥ १२॥


(श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय १४, श्लोक १२)

उच्चारण विधि: इस श्लोक का पाठ प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में अथवा संध्यावहन के समय शांत चित्त से करना चाहिए। प्रत्येक पद का उच्चारण स्पष्ट रूप से करते हुए रजोगुण के प्रभावों से अपनी चेतना को मुक्त करने का मानसिक संकल्प लेना चाहिए।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक में प्रयुक्त प्रत्येक शब्द का अपना एक विशिष्ट दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक निहितार्थ है। आइए इसे तालिका के माध्यम से समझें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
लोभः (Lobhah) लोभ, लालच प्राप्त वस्तुओं से संतुष्ट न होकर दूसरों के धन, पद या संसाधनों को अनैतिक या अत्यधिक रूप से पाने की मानसिक प्रवृत्ति।
प्रवृत्तिः (Pravrittih) सक्रियता, प्रवृत्ति इन्द्रियों को बाह्य विषयों की ओर मोड़ने की अत्यधिक और अनियंत्रित गतिशीलता, जिससे व्यक्ति क्षण भर भी स्थिर नहीं बैठ पाता।
आरम्भः (Aarambhah) नए कर्मों का आरंभ बिना सोचे-समझे निरंतर नए कार्यों, योजनाओं और भौतिक उपक्रमों को शुरू करने की जिद, जिसका कोई आध्यात्मिक अंत नहीं होता।
कर्मणामशमः (Karmanam-ashamah) कर्मों में अशांति/असंतोष किए गए कार्यों में मानसिक अशांति, भय और इस बात की चिंता कि परिणाम अनुकूल होगा या नहीं।
स्पृहा (Spriha) तीव्र इच्छा / तृष्णा विषयों और भोगों को प्राप्त करने की अदम्य लालसा, जो आग में घी का काम करती है और कभी तृप्त नहीं होती।
रजसि (Rajasi) रजोगुण के बढ़ने पर जब प्रकृति का दूसरा गुण (रजस्) अपने सन्तुलन को लांघकर मन और बुद्धि पर पूरी तरह हावी हो जाता है।
एतानि (Eitani) ये सभी (लक्षण) उपर्युक्त बताए गए सभी मानसिक और शारीरिक विकार एक साथ उत्पन्न होते हैं।
जायन्ते (Jaayante) उत्पन्न होते हैं मनुष्य के अंतःकरण, विचारों और आचरण में प्रकट होते हैं।
विवृद्धे (Vivriddhe) विशेष रूप से बढ़ने पर जब सत्व और तमोगुण को दबाकर रजोगुण अत्यधिक प्रबल हो जाता है।
भरतर्षभ (Bharatarsabha) हे अर्जुन (भारतवंशियों में श्रेष्ठ) भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को उनके महान कुल की याद दिलाते हुए विवेकवान बनने का परोक्ष संकेत।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत के युद्ध के ठीक पूर्व कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमि पर जब अर्जुन अपने कर्तव्यों से विमुख होकर विषाद में डूब गए थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जो ज्ञान दिया, वही श्रीमद्भगवद्गीता के रूप में अमर हो गया। चौदहवें अध्याय का नाम 'गुणत्रयविभाग योग' है, जिसमें महर्षि वेद व्यास ने प्रकृति के तीन गुणों—सत्व, रज और तम—का अत्यंत वैज्ञानिक और आध्यात्मिक वर्णन किया है।

पौराणिक कथाओं और सांख्य दर्शन के अनुसार, संपूर्ण सृष्टि की रचना प्रकृति (माया) के द्वारा होती है। प्रकृति के ये तीन धागे (गुण) हर जीव को बांधते हैं। महर्षि व्यास महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत गीता के इन अध्यायों के माध्यम से यह समझाते हैं कि जीव जब तक इन तीनों गुणों के जाल में फंसा रहता है, तब तक वह जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त नहीं हो सकता। 'रजोगुण' को वेदों और पुराणों में 'काम' (इच्छा) का स्रोत बताया गया है। पुराणों में कथा आती है कि किस प्रकार देवताओं, असुरों और मनुष्यों—सभी पर इन गुणों का प्रभाव रहता है। जब राजा बलि या अन्य महाबली अपनी महत्वाकांक्षाओं के चरम पर पहुँचकर अहंकार से भर जाते थे, तब वह रजोगुण की अतिवृद्धि का ही परिणाम होता था।

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को 'भरतर्षभ' कहकर संबोधित करते हैं क्योंकि भारत वंश का इतिहास वीरता, त्याग और धर्म का रहा है। भगवान का यह संबोधन इस बात का प्रतीक है कि एक श्रेष्ठ मनुष्य को रजोगुण के इन पाशों—लोभ, अशांति और तीव्र तृष्णा—से ऊपर उठकर 'गुणातीत' (गुणों से परे) स्थिति को प्राप्त करना चाहिए। वेदों में भी निष्काम कर्म की जो प्रेरणा दी गई है, उसका मूल उद्देश्य रजोगुण जनित विकारों को शांत करना ही है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय के इस श्लोक का नियमित पठन, मनन और इसके मर्म को जीवन में उतारने से साधक को अनेकों आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति एवं स्थिरता

निरंतर भागदौड़ और मानसिक अशांति से जूझ रहे व्यक्ति को इस श्लोक के चिंतन से अंतःकरण में शीतलता और ठहराव का अनुभव होता है।

2. लोभ और तृष्णा पर नियंत्रण

यह श्लोक हमें हमारी अंधी इच्छाओं (स्पृहा) का आईना दिखाता है, जिससे अनावश्यक उपभोग और लालच से मुक्ति मिलने लगती है।

3. सकारात्मक और शुद्ध औरा (Aura)

रजोगुण के उग्र प्रभावों को पहचानकर सत्वगुण की ओर बढ़ने से शरीर और मन का ऊर्जा क्षेत्र (औरा) शांत और सकारात्मक बनता है।

4. कर्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

बिना सोचे-समझे नए कर्मों को आरंभ करने की आदत छूटती है, जिससे संचित कर्मों का बोझ हल्का होता है और निष्काम कर्म की भावना जागृत होती है।

5. तनाव और एंग्जायटी से मुक्ति

'कर्मणामशमः' (कर्मों में अशांति) के कारणों को समझकर आधुनिक जीवन के तनाव, डिप्रेशन और एंग्जायटी को आसानी से प्रबंधित किया जा सकता है।

6. आत्म-अवलोकन (Self-Introspection) की क्षमता

साधक अपने भीतर उठने वाले विकारों को तटस्थ भाव से देखना सीख जाता है, जिससे उसकी निर्णय लेने की क्षमता (विवेक) तीव्र होती है।

7. भगवद् कृपा की प्राप्ति

प्रकृति के गुणों के बंधनों से ऊपर उठने का प्रयास करने वाले पर भगवान श्रीकृष्ण की अहैतुरी कृपा बरसती है, और वह गुणातीत बनता है।

8. मोक्ष और आत्मज्ञान का मार्ग प्रशस्त

रज और तम को पार कर सत्वगुण में स्थित होते हुए अंततः परमब्रह्म की प्राप्ति का मार्ग सुगम हो जाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के इस प्रतिष्ठित मंच पर प्रस्तुत यह विस्तृत आलेख सनातन धर्म के मूल ग्रंथों, विशेषकर महर्षि वेद व्यास रचित श्रीमद्भगवद्गीता (श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप, शंकराचार्य भाष्य और विभिन्न संतों के टीका-ग्रंथों) के गहन अध्ययन के पश्चात तैयार किया गया है। हमारी संपादकीय टीम यह सुनिश्चित करती है कि पाठकों तक शास्त्रों का मूल संदेश बिना किसी मिलावट, अतिशयोक्ति या भ्रामक दावों के पहुँचे।

इस आलेख का उद्देश्य केवल भाषाई अनुवाद प्रस्तुत करना नहीं है, बल्कि आधुनिक युग के पाठकों को मानसिक शांति और आध्यात्मिक उत्थान का मार्ग दिखाना है। यदि आपके मन में इस श्लोक या इसके दर्शन से संबंधित कोई भी जिज्ञासा है, तो आप नीचे दिए गए अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों (FAQs) का संदर्भ ले सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

प्रकृति के तीन गुणों (सत्व, रज, तम) में से 'रजोगुण' गति, कर्म, वासना, महत्वाकांक्षा और लोभ का प्रतीक है। जब यह गुण मनुष्य के भीतर अत्यधिक बढ़ जाता है, तो वह कभी संतुष्ट नहीं होता और निरंतर भोग-विलास तथा बाह्य उपलब्धियों की दौड़ में भागता रहता है।

आज की कॉर्पोरेट और उपभोक्तावादी संस्कृति में यह श्लोक पूर्णतः चरितार्थ होता है। लोग निरंतर नए प्रोजेक्ट्स शुरू करते हैं (आरम्भ), अधिक से अधिक धन और वस्तुएं पाना चाहते हैं (लोभ और स्पृहा), और परिणाम की चिंता व प्रतिस्पर्धा के कारण हमेशा तनाव में रहते हैं (कर्मणामशमः)।

शास्त्रीय दृष्टि से रजोगुण प्रारंभ में कर्म और पुरुषार्थ के लिए आवश्यक है क्योंकि इसके बिना कोई कार्य नहीं हो सकता (तमोगुण अक्रिय है)। परंतु जब रजोगुण अपनी सीमा लांघकर अतिवृद्धि को प्राप्त होता है, तब यह लोभ, अशांति और पतन का कारण बन जाता है। इसे नियंत्रित कर सत्वगुण की ओर ले जाना ही साधना है।

नियमित ध्यान, सत्संग, सात्विक आहार, भगवद नाम का जप और अपने कर्मों को फल की आसक्ति से मुक्त होकर (निष्काम भाव से) करने से रजोगुण के उग्र प्रभावों को शांत किया जा सकता है। इससे मन में संतुलन और शांति स्थापित होती है।

'भरतर्षभ' का अर्थ है भरतवंशियों में श्रेष्ठ। अर्जुन के पूर्वज महान राजा और त्यागी हुए थे। श्रीकृष्ण अर्जुन को उनके उच्च कुल और महानता की याद दिलाते हुए यह संदेश देते हैं कि एक श्रेष्ठ पुरुष को साधारण मनुष्य की तरह लोभ और तृष्णा के अधीन नहीं होना चाहिए, बल्कि अपने विवेक का प्रयोग कर गुणों से परे (गुणातीत) स्थिति प्राप्त करनी चाहिए।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं कि हे भरतर्षभ! जब रजोगुण बढ़ता है तो लोभ, प्रवृत्ति, कर्मों का आरम्भ, अशांति और इच्छाएँ उत्पन्न होती हैं। When Rajas predominates, greed, activity, undertaking of actions, restlessness, and desire appear.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

रजोगुण के प्रभाव में व्यक्ति अशांत और लालसापूर्ण कर्मों में लगा रहता है। Under the influence of Rajas, one remains restless and engaged in desire-prompted actions.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 12 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 12/27 44% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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