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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 14 · श्लोक 12

अध्याय 14 · श्लोक 12

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा । रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥ १२॥

lobhaḥ pravṛttir ārambhaḥ karmaṇām aśamaḥ spṛhā | rajasy etāni jāyante vivṛddhe bharatarṣabha ||12||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

लोभः: लोभ; प्रवृत्तिः: प्रवृत्ति; आरम्भः: आरंभ; कर्मणाम्: कर्मों का; अशमः: अशांति; स्पृहा: स्पृहा (इच्छा); रजसि: रजोगुण में; एतानि: ये; जायन्ते: उत्पन्न होते हैं; विवृद्धे: बढ़े हुए; भरतर्षभ: हे भरतश्रेष्ठ।

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

हे भरतश्रेष्ठ! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति, कर्मों का आरम्भ, अशांति और इच्छा उत्पन्न होती हैं।

English Translation

Greed, activity, undertaking of actions, restlessness, longing—these arise when Rajas predominates, O best of the Bharatas.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

रजोगुण के लक्षण: लोभ, अत्यधिक सक्रियता, आरम्भ, अशांति और तीव्र इच्छाएँ। Characteristics of Rajas: greed, constant activity, initiating many works, restlessness, and desires.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।