श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 11

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 36 मिनट का पठन 137 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते । ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥ ११॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
सर्वद्वारेषु
सब इंद्रियों के द्वारों में
देहे अस्मिन्
इस शरीर में
प्रकाश
प्रकाश
उपजायते
उत्पन्न होता है
ज्ञानम्
ज्ञान
यदा
जब
तदा
तब
विद्यात्
जानना चाहिए
विवृद्धम्
बढ़ा हुआ
सत्त्वम्
सत्त्व गुण
इति
इस प्रकार
उत
निश्चय ही।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जब इस शरीर के सभी द्वारों (इंद्रियों) में प्रकाश (बुद्धि का प्रकाश) उत्पन्न होता है, तब जानना चाहिए कि सत्त्व गुण बढ़ा हुआ है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय (गुणात्रयविभाग योग) के दिव्य श्लोक का वृहद शास्त्रीय एवं दार्शनिक विश्लेषण

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय चेतना

भारतीय सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता को न केवल एक ग्रंथ, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए जीवन का मार्गदर्शक माना गया है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेश केवल उस युद्धभूमि तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे मनुष्य के अंतःकरण में निरंतर चलने वाले मानसिक और आत्मिक संघर्षों का शाश्वत समाधान प्रस्तुत करते हैं। विशेष रूप से चौदहवां अध्याय, जिसका शीर्षक 'गुणात्रयविभाग योग' है, प्रकृति के तीन मूल गुणों—सत्त्व, रज और तम—के सूक्ष्म विश्लेषण पर आधारित है। यह अध्याय हमें यह समझाने का प्रयास करता है कि किस प्रकार ये तीनों गुण मानव चेतना को बांधते हैं और व्यक्ति के आचरण, विचार तथा कर्म को निर्धारित करते हैं।

प्रस्तुत श्लोक "सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते..." इस बात का अत्यंत सुंदर और वैज्ञानिक प्रतिपादन करता है कि जब मनुष्य के भीतर 'सत्त्व गुण' की वृद्धि होती है, तो उसका प्रभाव उसके संपूर्ण शरीर और उसकी दसों इंद्रियों (ज्ञान और कर्म इंद्रियों) पर किस प्रकार पड़ता है। सत्त्व गुण का अर्थ है—प्रकाश, पवित्रता, निर्मलता, संतुलन, ज्ञान और शांति। जब जीवन में इस गुण का प्राधान्य बढ़ता है, तब अज्ञान और मोह का अंधकार छंटने लगता है। इंद्रियां जो सामान्यतः विषयों की ओर भागती हैं, वे संयमित हो जाती हैं और उनके माध्यम से केवल सात्विक, कल्याणकारी और ज्ञानयुक्त प्रवृत्तियों का संचार होने लगता है।

इस ब्रह्मांडीय संदर्भ में, सत्त्व गुण केवल एक मानसिक स्थिति नहीं है, बल्कि यह वह ऊर्जा है जो जीव को भगवद-प्राप्ति और मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर करती है। आधुनिक युग में जहां तनाव, अवसाद, अशांति और भोग-वृत्ति चरम पर है, वहां इस श्लोक का अध्ययन और इसके मर्म को जीवन में उतारना अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है। यह हमें यह सिखाता है कि कैसे हम अपने भीतर सात्विक वृत्तियों को जागृत कर अपने जीवन को प्रकाशमय बना सकते हैं।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय के इस ग्यारहवें श्लोक का पाठ करने से पूर्व मन की एकाग्रता और पवित्रता अत्यंत आवश्यक है। इसे विधि-विधान के साथ उच्चारण करने से साधक के अंतःकरण में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है।

अथ चतुर्दशोऽध्यायः (गुणात्रयविभाग योग) - श्लोक ११

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते ।

ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥ ११ ॥


पदच्छेद: सर्व-द्वारेषु, देहे, अस्मिन्, प्रकाशः, उपजायते, ज्ञानम्, यदा, तदा, विद्यात्, विवृद्धम्, सत्त्वम्, इति, उत।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में वेदों और उपनिषदों का सार छिपा हुआ है। नीचे दी गई सारणी में श्लोक के हर पद का सरल हिंदी अर्थ और उसका विस्तृत दार्शनिक भावार्थ प्रस्तुत किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
सर्वद्वारेषु सभी द्वारों में / इंद्रियों में शरीर के नौ द्वारों (दो आँख, दो कान, दो नासिका, एक मुख, उपस्थ और गुदा) तथा मन रूपी दसवें द्वार का संकेत।
देहेऽस्मिन् इस शरीर में यह नश्वर भौतिक शरीर, जो आत्मा का अस्थायी आवास है और गुणों के अधीन कार्य करता है।
प्रकाशः प्रकाश, दीप्ति, उजाला ज्ञान का वह आलोक जो अज्ञान, मोह और अंधकार को नष्ट कर देता है।
उपजायते उत्पन्न होता है, प्रकट होता है सात्विक कर्मों और विचारों के प्रभाव से स्वतः स्फूर्त होने वाली दिव्य अनुभूति।
ज्ञानम् ज्ञान, बोध, समझ सही और गलत, आत्मा और अनात्मा, नश्वर और शाश्वत का स्पष्ट विवेक।
यदा जब वह विशिष्ट समय या अवस्था जब अंतःकरण निर्मल हो जाता है।
तदा तब उस निश्चित क्षण का बोध जब गुणों का परिवर्तन स्पष्ट होता है।
विद्यात् जानना चाहिए, समझना चाहिए साधक के लिए यह सुनिश्चित निर्देश कि वह इस अवस्था को पहचाने।
विवृद्धम् भली-भांति बढ़ा हुआ, प्रवृद्ध जब सत्त्व गुण अपनी पराकाष्ठा पर हो या अन्य गुणों पर हावी हो जाए।
सत्त्वम् सत्त्व गुण, प्रकाशमय प्रकृति प्रकृति का वह निर्मल गुण जो सुख और ज्ञान से बांधता है।
इत्युत ऐसा कहा जाता है / निश्चय ही वेदों और महर्षियों के सिद्धांतों के अनुसार अकाट्य सत्य।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता का यह चौदहवां अध्याय महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाकाव्य महाभारत के भीष्म पर्व का हिस्सा है। कुरुक्षेत्र के मैदान में जब अर्जुन घोर विषाद और अपने कर्तव्यों के प्रति संशय में डूबे थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जीवन और ब्रह्मांड के गूढ़ रहस्यों से अवगत कराया। शुरुआती अध्यायों में कर्म और भक्ति का मार्ग दिखाने के बाद, भगवान श्रीकृष्ण चौदहवें अध्याय में 'त्रिगुणात्मक प्रकृति' का अत्यंत वैज्ञानिक और दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं।

पौराणिक कथाओं और सांख्य दर्शन के अनुसार, संपूर्ण सृष्टि की रचना प्रकृति के तीन गुणों—सत्त्व (प्रकाश/पवित्रता), रज (गतिशीलता/कामकाज/इच्छा) और तम (अंधकार/आलस्य/मोह)—के संकलन और संतुलन से हुई है। अर्जुन ने भगवान से पूछा था कि हे प्रभु! इन तीनों गुणों को लांघने वाला पुरुष कैसा होता है और उसका आचरण कैसा होता है? इस प्रश्न के उत्तर में भगवान श्रीकृष्ण विस्तार से समझाते हैं कि कैसे ये तीनों गुण मनुष्य पर शासन करते हैं।

प्रस्तुत श्लोक (११वां) विशेष रूप से 'सत्त्व गुण' के लक्षणों को परिभाषित करता है। भगवान कहते हैं कि जब व्यक्ति का मन शुद्ध होता है, वह सत्कर्म करता है, सात्विक आहार ग्रहण करता है और ईश्वर के स्मरण में लीन रहता है, तब उसके शरीर के सभी द्वार (इंद्रियां) एक विशेष प्रकार के दिव्य प्रकाश से जगमगा उठते हैं। आँखें केवल पवित्र दृश्य देखना चाहती हैं, कान केवल भगवद यश सुनना चाहते हैं और वाणी केवल सत्य और प्रिय बोलती है। यह शास्त्रीय पृष्ठभूमि हमें सिखाती है कि भौतिक शरीर मात्र मांस-मज्जा का पुतला नहीं है, बल्कि यह चेतना के स्तर को ऊपर उठाने का एक दिव्य माध्यम है। महर्षि व्यास ने इस प्रसंग के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग हमारे अपने भीतर की वृत्तियों को सुधारने से ही प्रशस्त होता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक का नियमित मनन, पठन और इसके अर्थ का चिंतन करने से साधक को अनेकानेक मानसिक, आध्यात्मिक और शारीरिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति और स्थिरता

सत्त्व गुण के जागरण से मन का भटकाव कम होता है और अत्यधिक चिंता, तनाव तथा मानसिक अशांति से मुक्ति मिलती है।

2. सकारात्मक ऊर्जा (Aura) का विकास

शरीर की दसों इंद्रियों में सात्विक प्रकाश फैलने से व्यक्ति के आसपास एक सकारात्मक ऊर्जा क्षेत्र का निर्माण होता है, जो दूसरों को भी प्रभावित करता है।

3. कर्मों की शुद्धि (Karmic Purification)

जब इंद्रियां ज्ञान से आलोकित हो जाती हैं, तो पाप और अधर्म की प्रवृत्तियां स्वतः समाप्त होने लगती हैं, जिससे संचित कर्म शुद्ध होते हैं।

4. दिव्य कृपा और चेतना का विस्तार

यह श्लोक साधक को भौतिक बंधनों से ऊपर उठाकर उच्चतर आध्यात्मिक लोकों और परमात्मा के साथ योग स्थापित करने में सहायता करता है।

5. एकाग्रता और स्मरण शक्ति में वृद्धि

विद्यार्थियों और ज्ञान के साधकों के लिए इस श्लोक का स्मरण बुद्धि को तीव्र करता है और विषयों को समझने की क्षमता को बढ़ाता है।

6. अहंकार और मोह का नाश

तमोगुण के कारण उत्पन्न होने वाला अज्ञान और रजोगुण के कारण उत्पन्न होने वाली लालसा इस प्रकाश में कपूर की तरह उड़ जाती है।

7. उत्तम स्वास्थ्य और जीवन शैली

सात्विक विचारों का सीधा सकारात्मक प्रभाव हमारे शारीरिक स्वास्थ्य, पाचन तंत्र और तंत्रिका तंत्र पर पड़ता है।

8. मोक्ष और आत्मानुभूति का मार्ग

यह श्लोक साधक को भवसागर से पार उतारने के लिए सीढ़ी का काम करता है, अंततः आत्मा को परमात्मा में लीन होने की प्रेरणा देता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री (Editorially Reviewed Content): Bhaktilok.in के इस विशेष आलेख को तैयार करते समय श्रीमद्भगवद्गीता के विभिन्न प्रामाणिक भाष्यों—विशेष रूप से आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास जी और स्वामी गीतानंद जी के दृष्टिकोणों—का गहन अध्ययन किया गया है। हमारी संपादकीय टीम यह सुनिश्चित करती है कि सनातन धर्म के ग्रंथों में निहित ज्ञान को आधुनिक पाठकों के लिए अत्यंत सरल, स्पष्ट और तथ्यात्मक रूप से प्रस्तुत किया जाए।

इस श्लोक की व्याख्या करते समय भाषा की शुद्धता और दार्शनिक गहराई का पूर्ण ध्यान रखा गया है ताकि किसी भी प्रकार का भ्रामक संदेश न फैले। हमारा उद्देश्य पाठकों को वेदों, उपनिषदों और पुराणों के शाश्वत ज्ञान से जोड़ना है, जिससे वे अपने दैनिक जीवन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के संतुलन को प्राप्त कर सकें। सभी संदर्भ प्राचीन संस्कृत टीकाओं और वेदान्त के मानदंडों पर आधारित हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

सत्त्व गुण प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) में से सबसे श्रेष्ठ और पवित्र गुण है। यह प्रकाश, ज्ञान, शांति और निर्मलता का प्रतीक है। जब शरीर में सत्त्व गुण की वृद्धि होती है, तो मनुष्य की सभी इंद्रियां (ज्ञान और कर्म इंद्रियां) अज्ञान के आवरण से मुक्त होकर विवेकशील और सात्विक कार्यों में प्रवृत्त हो जाती हैं।

'सर्वद्वारेषु' का शाब्दिक अर्थ है 'सभी द्वारों में'। वेदान्त दर्शन के अनुसार, इस भौतिक शरीर में नौ प्राकृतिक द्वार (दो आँखें, दो कान, दो नासिका छिद्र, एक मुख, उपस्थ और गुदा) और मन रूपी दसवां द्वार है। इन सभी द्वारों के माध्यम से जीव बाहरी संसार से जुड़ता है। जब सत्त्व गुण बढ़ता है, तो इन सभी द्वारों से केवल पवित्र ज्ञान और सकारात्मक ऊर्जा बाहर प्रकट होती है।

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय, जिसका नाम 'गुणात्रयविभाग योग' है, का ग्यारहवां श्लोक है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) के स्वभाव, उनके प्रभावों और उन्हें पार करने के उपायों का विस्तार से वर्णन कर रहे हैं।

दैनिक जीवन में सत्त्व गुण को बढ़ाने के लिए सात्विक आहार (शाकाहारी, ताजा और पवित्र भोजन) ग्रहण करना चाहिए, प्रतिदिन सत्संग, ईश्वर स्मरण, ध्यान, योग करना चाहिए तथा सकारात्मक और परोपकारी कार्य करने चाहिए। इसके साथ ही क्रोध, लोभ, अहंकार और तामसिक प्रवृत्तियों से दूर रहना आवश्यक है।

हाँ, इस दिव्य श्लोक का नियमित पाठ और इसके अर्थ का मनन करने से मन में व्याप्त अज्ञान और चिंता का अंधकार दूर होता है। यह आंतरिक शांति प्रदान करता है और तंत्रिका तंत्र को शांत कर मानसिक स्पष्टता और स्थिरता को बढ़ाता है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं कि जब इस शरीर के सभी इंद्रिय-द्वारों में ज्ञान का प्रकाश दिखाई देता है, तब समझना चाहिए कि सत्त्व गुण बढ़ गया है। When the light of intelligence shines through all the gates of the body, then one should know that Sattva is predominant.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

सत्त्व के बढ़ने पर मनुष्य ज्ञानी, शांत और विवेकशील हो जाता है। With the rise of Sattva, one becomes wise, calm, and discerning.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 11 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 11/27 41% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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