श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 10

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 35 मिनट का पठन 134 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत । रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥ १०॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
रजः-तमः
रज और तम को
च
और
अभिभूय
अभिभूत करके
सत्त्वम्
सत्त्व गुण
भवति
होता है (बढ़ता है)
भारत
हे भारत
रजः
रज
सत्त्वम्-तमः
सत्त्व और तम को
च
और
एव
ही
तमः
तम
सत्त्वम्-रजः
सत्त्व और रज को
तथा
इसी प्रकार।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे भारत! कभी रज और तम को दबाकर सत्त्व गुण बढ़ता है, कभी सत्त्व और तम को दबाकर रजोगुण बढ़ता है, और कभी सत्त्व और रज को दबाकर तमोगुण बढ़ता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

प्रकृति के त्रिगुणों—सत्त्व, रज और तम—के अद्भूत संघर्ष, संतुलन और मुक्ति का दार्शनिक विश्लेषण

प्रस्तावना: त्रिगुणों का महासमर और मानवीय चेतना का स्पंदन

सनातन संस्कृति और वेदान्त दर्शन में 'प्रकृति' को अचेतन परंतु गतिशील शक्ति माना गया है। यह संपूर्ण भौतिक जगत, जिसमें हमारा शरीर, मन, बुद्धि और अहंकार सम्मिलित हैं, तीन मौलिक धागों या गुणों से मिलकर बना है—सत्त्व गुण (प्रकाश, ज्ञान और सुख), रज गुण (गतिशीलता, वासना, इच्छा और कर्म), तथा तम गुण (अंधकार, अज्ञान, मोह और आलस्य)। श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय, जिसे 'गुणत्रयविभाग योग' के नाम से जाना जाता है, भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि कैसे ये तीनों गुण निरंतर एक-दूसरे को दबाने और अपनी सर्वोच्चता स्थापित करने के लिएसक्रिय रहते हैं।

मानवीय जीवन की प्रत्येक गतिविधि, विचार, निर्णय और भावना इन्हीं तीन गुणों के परस्पर संघर्ष (स्पर्धा) का परिणाम है। जब हमारे जीवन में ज्ञान और शांति का विस्तार होता है, तब हम समझते हैं कि सत्त्व गुण प्रधान हो गया है। इसके विपरीत, जब तृष्णा, भागदौड़ और महत्वाकांक्षाएँ तीव्र हो जाती हैं, तब रजोगुण प्रबल होता है। और जब अज्ञान, प्रमाद, निद्रा और निराशा घेर लेती है, तब तमोगुण हावी होता है। यह श्लोक—"रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत..."—इस बात का अत्यंत सूक्ष्म और वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है कि कैसे ये गुण पल-पल बदलते हैं और एक मनुष्य की चेतना को नियंत्रित करते हैं।

Bhaktilok.in के इस विशेष अध्ययन में हम इस श्लोक के माध्यम से यह समझेंगे कि कैसे एक साधक इन तीनों गुणों के निरंतर चलने वाले चक्र से ऊपर उठकर 'गुणातीत' स्थिति को प्राप्त कर सकता है, जो कि मोक्ष या ब्रह्मचर्या का मार्ग प्रशस्त करती है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

॥ श्रीमद्भगवद्गीता अथ चतुर्दशोऽध्यायः ॥

श्लोक संख्या १०

रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥ १०॥

(रजः तमः च अभिभूय सत्त्वं भवति भारत । रजः सत्त्वं तमः च एव तमः सत्त्वं रजः तथा ॥)

श्लोक का सरल भावार्थ

हे भारत (अर्जुन)! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण उत्पन्न होता है (या बढ़ता है)। इसी प्रकार सत्त्वगुण और तमोगुण को दबाकर रजोगुण बढ़ता है, और वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुण को दबाकर तमोगुण बढ़ता है।

पाठ विधि एवं साधना

इस अध्याय का पाठ प्रातःकाल स्नान करके शुद्ध मन से करना चाहिए। गीता के इन श्लोकों का मानसिक मनन करने से मन के विकारों (रजस् और तमस) का शमन होता है और सात्त्विक वृत्तियों का जागरण होता है। प्रतिदिन कम से कम तीन बार इस श्लोक का उच्चारण आत्मसंयम सिखाता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक पद का सूक्ष्म व्याकरणिक और दार्शनिक विश्लेषण नीचे दी गई सारणी में प्रस्तुत है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
रजः (रजाः) रजोगुण (गतिशीलता, इच्छा) यह वह ऊर्जा है जो मनुष्य को संसार में भटकाती है, महत्वाकांक्षाओं को जन्म देती है और कर्मों से बांधती है।
तमः च और तमोगुण (अंधकार, आलस्य) यह चेतना को सुप्त करने वाली, अज्ञान, प्रमाद और भ्रम पैदा करने वाली शक्ति है।
अभिभूय दबाकर, परास्त करके प्रकृति में संतुलन का नियम यह है कि कोई एक गुण प्रबल होने के लिए अन्य दो गुणों को अस्थायी रूप से दबा देता है।
सत्त्वम् सत्त्व गुण (प्रकाश, ज्ञान) यह वह पवित्र अवस्था है जहाँ मन शांत, प्रसन्न, निर्मल और ज्ञान प्राप्ति के प्रति उत्सुक रहता है।
भवति होता है, प्रकट होता है मनुष्य की चेतना में निरंतर परिवर्तनशीलता बनी रहती है; कोई भी गुण स्थायी नहीं होता।
भारत हे अर्जुन! (भारतवंशियों में श्रेष्ठ) भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को उनके महान वंश और ज्ञान की परंपरा का स्मरण कराते हुए यह गूढ़ सत्य बता रहे हैं।
रजः (द्वितीय चरण) रजोगुण की प्रधानता जब सत्त्व और तम का प्रभाव कम होता है, तब रजोगुण अपनी पूरी शक्ति से कार्य व्यवहार को संचालित करता है।
सत्त्वं तमः च एव सत्त्व और तम को दबाकर गतिशीलता (रजः) तभी कार्य करती है जब शांति (सत्त्व) और अड़चन (तम) पीछे हटते हैं।
तमः सत्त्वं रजः तथा तथा वैसे ही तमोगुण जब ज्ञान का प्रकाश और कर्म की गतिशीलता मंद पड़ती है, तब आवरण डालने वाला तमोगुण प्रबल हो जाता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता का यह चौदहवाँ अध्याय महाभारत के युद्ध के ठीक पूर्व कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में संवाद के रूप में प्रकट हुआ था। जब अर्जुन अपने सगे-सम्बन्धियों को सामने देखकर मोक्ष और कर्तव्य के असमंजस में पड़ गए, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें आत्मज्ञान देने के लिए इस ब्रह्मांडीय संरचना के रहस्यों को उजागर किया। गीता के रचनाकार महर्षि वेद व्यास हैं, जिन्होंने महाभारत महाकाव्य के भीतर इस दिव्य रत्न को संकलित किया है।

'गुणत्रयविभाग योग' के इस प्रसंग में महर्षि वेदव्यास ने प्रकृति (माया) के उस चक्र को समझाया है जिसमें सम्पूर्ण जीवजगत बंधा हुआ है। पुराणों और सांख्य दर्शन के अनुसार, यह सम्पूर्ण सृष्टि अव्यक्त प्रकृति से उत्पन्न होती है। प्रकृति के ये तीन गुण—सत्त्व, रज, और तम—रस्सी के तीन अलग-अलग धागों की तरह हैं जो जीवात्मा को इस संसार रूपी रथ से बांधकर रखते हैं।

शास्त्रीय कथाओं और वेदान्त के उपनिषदों में भी इस बात का बार-बार उल्लेख मिलता है कि कैसे ऋषि-मुनि और देवता भी इन गुणों के प्रभाव से परे नहीं हैं, जब तक कि वे भगवद्कृपा या आत्मसाक्षात्कार के माध्यम से 'गुणातीत' स्थिति को प्राप्त नहीं कर लेते। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि इन गुणों का यह जो निरंतर संघर्ष (स्पर्धा) है, यही संसार का नियम है। कोई भी मनुष्य हमेशा एक जैसा नहीं रह सकता। आज जो व्यक्ति अत्यधिक सात्त्विक और ज्ञानी प्रतीत होता है, परिस्थिति बदलने पर उसमें रजोगुण या तमोगुण भी उभर सकता है। इसलिए साधक का मुख्य कर्तव्य यह जानना है कि इन गुणों के परे उनकी अपनी शाश्वत आत्मा (ब्रह्म) स्थित है।

यह ऐतिहासिक एवं दार्शनिक संवाद केवल अर्जुन के लिए नहीं, बल्कि समस्त मानवजाति के लिए मानसिक विकारों से उबरने और आत्म-विकास का सबसे प्राचीन और प्रामाणिक मार्गदर्शक दस्तावेज है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक और इसके मर्म का नियमित अध्ययन और मनन करने से साधक को निम्नलिखित अद्भूत आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • 1
    मानसिक शांति और स्थिरता: त्रिगुणों के इस खेल को समझकर मनुष्य अपने मन के उतार-चढ़ाव (सुख-दुःख, उत्साह-निराशा) को तटस्थ भाव से देखना सीख जाता है।
  • 2
    सकारात्मक ऊर्जा का संचार (Positive Aura): श्लोक के नियमित पाठ से सात्त्विक वृत्तियाँ जागृत होती हैं, जिससे शरीर और मन के चारों ओर एक सकारात्मक और पवित्र ऊर्जा का आवरण बनता है।
  • 3
    कर्मों की शुद्धि (Karmic Purification): यह ज्ञान व्यक्ति को तामसिक (आलस्य, हिंसा) और राजसिक (अंधाधुंध महत्वाकांक्षा) कर्मों से बचाकर सात्त्विक एवं लोककल्याणकारी कर्मों की ओर प्रेरित करता है।
  • 4
    निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि: जब मन भ्रम और अज्ञान (तमोगुण) से मुक्त होता है, तब बुद्धि अधिक स्पष्ट, विवेकशील और सही निर्णय लेने में सक्षम होती है।
  • 5
    दिव्य कृपा की प्राप्ति: भगवान के वचनों के प्रति समर्पण और उनकी गहराई में उतरने से साधक को ईश्वरीय अनुकंपा और आंतरिक संतोष की अनुभूति होती है।
  • 6
    तनाव एवं चिंता से मुक्ति: सांसारिक मोह-माया और स्पर्धा से उत्पन्न होने वाले मानसिक तनाव इस दार्शनिक समझ से स्वतः ही समाप्त होने लगते हैं।
  • 7
    आत्म-अनुशासन और संयम: यह श्लोक सिखाता है कि कैसे अपने भीतर के आलस्य (तमः) और उत्तेजना (रजः) को नियंत्रित कर शांति (सत्त्व) को स्थापित किया जाए।
  • 8
    मोक्ष का मार्ग प्रशस्तर: गुणों के इस संघर्ष को समझकर इनसे ऊपर उठने (गुणातीत होने) की प्रक्रिया मोक्ष और आत्मज्ञान का सीधा द्वार खोलती है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

यह लेख Bhaktilok.in के संपादकीय मंडल द्वारा सनातन ग्रंथों, श्रीमद्भगवद्गीता के पारंपरिक भाष्य (विशेषकर आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और श्री स्वामी शिवानंद जी महाराज के दृष्टिकोण) के गहन अध्ययन के पश्चात संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के रूप में प्रस्तुत किया गया है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक वेदान्त के शाश्वत सत्यों को अत्यंत सरल, प्रामाणिक और वैज्ञानिक भाषा में पहुँचाना है, ताकि आधुनिक जीवन की भागदौड़ के बीच आध्यात्मिक चेतना का दीप प्रज्वलित रह सके। इस सामग्री का उद्देश्य किसी भी धार्मिक भावना को आहत किए बिना केवल उच्च कोटि का दार्शनिक ज्ञान प्रदान करना है।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

त्रिगुण से तात्पर्य प्रकृति की तीन मौलिक शक्तियों से है—सत्त्व (प्रकाश, ज्ञान, शांति), रज (गतिशीलता, कर्म, इच्छा), और तम (अंधकार, अज्ञान, आलस्य)। संपूर्ण भौतिक संसार और मनुष्य का मन इन्हीं तीनों गुणों के संचलन से संचालित होता है।

इस वाक्यांश का संदेश यह है कि जब मनुष्य के भीतर से रजोगुण (वासना/भागदौड़) और तमोगुण (आलस्य/अंधकार) का प्रभाव कम या दब जाता है, तब सात्त्विक गुण यानी ज्ञान, शांति और प्रसन्नता स्वतः ही प्रकट हो जाती है। यह चेतना की परिवर्तनशीलता को दर्शाता है।

हाँ, श्रीमद्भगवद्गीता के इसी चौदहवें अध्याय के आगे के श्लोकों में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि जो मनुष्य इन तीनों गुणों के कार्य-व्यापार को तटस्थ होकर देखता है और इनसे आसक्ति छोड़ देता है, वह 'गुणातीत' (गुणों से परे) होकर अमृतत्व या मोक्ष को प्राप्त कर लेता है।

जब भी हमारे मन में आलस्य (तम) या अत्यधिक बेचैनी और लालसा (रज) उत्पन्न हो, हमें सचेत होकर सत्त्व गुण यानी संयम, स्वाध्याय, ध्यान और सात्विक विचारों के माध्यम से उन्हें शांत करना चाहिए। यह आत्म-जागरूकता जीवन में संतुलन लाती है।

Bhaktilok.in का उद्देश्य आधुनिक पाठकों को सनातन संस्कृति के मूल ग्रंथों के गूढ़ रहस्यों से आसान हिंदी में जोड़ना है। इन श्लोकों का प्रामाणिक अध्ययन मानसिक शांति, चारित्रिक विकास और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं कि कभी सत्त्व गुण रज और तम को दबाकर बढ़ता है, कभी रज सत्त्व और तम को, और कभी तम सत्त्व और रज को दबाकर बढ़ता है। Sometimes Sattva prevails by overpowering Rajas and Tamas; similarly Rajas or Tamas prevail at other times.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

मनुष्य के व्यवहार में ये गुण बदलते रहते हैं। साधना द्वारा सत्त्व को बढ़ाना और अंततः तीनों को पार करना चाहिए। These gunas constantly shift in human behavior; one should cultivate Sattva and ultimately transcend all three.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 10 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 10/27 37% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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