श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 21

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 41 मिनट का पठन 130 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अर्जुन उवाच । कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो । किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥ २१॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

17 पद
अर्जुन उवाच
अर्जुन ने कहा
कैः
किन
लिङ्गैः
लक्षणों से
त्रीन्
तीनों
गुणान्
गुणों
एतान्
इन
अतीतः
अतीत
भवति
होता है
प्रभो
हे प्रभो
किम्
कैसा
आचारः
आचरण
कथम्
कैसे
च
और
एतान्
इन
त्रीन्
तीनों
गुणान्
गुणों
अतिवर्तते
अतिक्रमण करता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

अर्जुन ने पूछा: हे प्रभो! इन तीनों गुणों से अतीत पुरुष किन लक्षणों से पहचाना जाता है? उसका आचरण कैसा होता है? और वह इन तीनों गुणों को कैसे पार करता है?

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

Bhaktilok.in's Chief Devotional Scholar & Sanskrit Linguistic Editorial Board प्रस्तुत करते हैं श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय के इस अत्यंत महत्वपूर्ण श्लोक का विहंगम और दार्शनिक विश्लेषण।


सनातन धर्म और भारतीय अध्यात्म में श्रीमद्भगवद्गीता का स्थान केवल एक धार्मिक ग्रंथ का नहीं, बल्कि मानव चेतना को जगाने वाले सर्वोच्च मार्गदर्शक का है। भगवान श्री कृष्ण और उनके अनन्य सखा अर्जुन के बीच कुरुक्षेत्र के मैदान में हुआ यह संवाद अज्ञान के अंधकार को चीरकर ज्ञान के सूर्य को प्रगट करने वाला दिव्य प्रकाश है। विशेष रूप से, चौदहवां अध्याय (गुणत्रयविभागयोग) प्रकृति के तीन मूल गुणों—सत्व, रज और तम—की सूक्ष्म व्याख्या करता है। इन तीनों गुणों की परिधि में संपूर्ण संसार जकड़ा हुआ है। जीव जन्म, मरण, सुख, दुख और मोह के बंधनों में इन गुणों के कारण ही बँधा रहता है। परंतु, इस भवसागर से तर जाने का मार्ग भी इसी अध्याय में निहित है।

प्रस्तुत श्लोक (संख्या 21) में अर्जुन के मन में एक जिज्ञासा उत्पन्न होती है, जो प्रत्येक आस्तिक, साधु, मुनि और मोक्षार्थी की जिज्ञासा है। जब अर्जुन ने यह जान लिया कि इन तीनों गुणों से परे होना ही मुक्ति या 'गुणातीत' स्थिति है, तो उनके मन में यह प्रश्न सहज रूप से उठा कि उस दिव्य अवस्था को प्राप्त करने वाले महापुरुष के बाह्य लक्षण क्या होते हैं? उनका आचार-व्यवहार कैसा होता है? और सबसे बढ़कर, कोई भी साधक उस परम स्थिति तक कैसे पहुँच सकता है? यह श्लोक केवल जिज्ञासा नहीं, बल्कि मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करने वाली कुंजी है। इस लेख के माध्यम से हम इसी गूढ़ प्रश्न और उसके आध्यात्मिक आयामों का विस्तृत अन्वेषण करेंगे, जो आधुनिक भागदौड़ भरी जिंदगी में मानसिक शांति, आत्म-संयम और आंतरिक संतुलन प्राप्त करने के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

श्रवण और पठन के लिए श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय का इक्कीसवाँ श्लोक देवनागरी लिपि और स्पष्ट उच्चारण पद्धति के साथ नीचे प्रस्तुत है:

अर्जुन उवाच

कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो ।

किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥ २१॥

(अध्याय 14, श्लोक 21)

श्लोक का सरल पदावलियों में उच्चारण और पाठ विधि:
  • कैः लिङ्गैः त्रिन् गुणान् एतान् अतीतः भवति प्रभो (हे प्रभो! इन तीनों गुणों से अतीत हुआ मनुष्य किन लक्षणों द्वारा जाना जाता है?)
    • किम् आचारः कथं च एतान् त्रिन् गुणान् अतिवर्तते (उसका आचार कैसा होता है और वह इन तीनों गुणों का उल्लंघन कैसे करता है?)
    • पाठ विधि: इस श्लोक का दैनिक प्रातःकाल स्नान के पश्चात शांत चित्त से न्यूनतम 3, 11 या 21 बार जप करना चाहिए। इसका मानसिक पाठ साधक के भीतर सात्विक ऊर्जा का संचार करता है और चंचल मन को एकाग्र करने में सहायता प्रदान करता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

संस्कृत भाषा के प्रत्येक शब्द में अनंत अर्थ समाहित होते हैं। आइए इस श्लोक के एक-एक पद का व्याकरणिक और दार्शनिक विश्लेषण करें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
अर्जुन उवाच अर्जुन बोले जिज्ञासु जीव का प्रतीक, जो अज्ञान के अंधकार से निकलकर सर्वोच्च ज्ञान प्राप्ति के लिए भगवान के समक्ष समर्पण भाव से प्रश्न करता है।
कैः किनके द्वारा / कौन से उन विशिष्ट चिह्नों या लक्षणों की खोज, जिन्हें देखकर साधारण समाज या अन्य साधक यह पहचान सकें कि यह व्यक्ति माया के बंधनों से मुक्त हो चुका है।
लिङ्गैः लक्षणों से / चिह्नों से बाह्य आचरण, मुखमंडल की शांति, आँखों के भाव और जीवन की परिस्थितियों में प्रतिक्रिया न देने की आंतरिक स्थिरता।
त्रिन् तीन प्रकृति के तीन मूल स्तंभ—सत्व (प्रकाश/ज्ञान), रज (गति/कामना), और तम (अंधकार/जड़ता)।
गुणान् गुणों को वे शक्तियाँ जो जीवात्मा को शरीर से बाँधकर रखती हैं और संसार चक्र में उलझाए रखती हैं।
एतान् इन वर्तमान में दृश्यमान और अनुभव में आने वाली संपूर्ण भौतिक प्रकृति और उसकी वृत्तियाँ।
अतीतः पार कर चुका है / अतीत जो इन तीनों गुणों के प्रभाव से पूरी तरह ऊपर उठ चुका है, जिस पर सुख-दुख या लाभ-हानि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
भवति प्रभो होता है, हे प्रभु! भगवान को 'प्रभु' कहकर अर्जुन उनके सर्वसमर्थ, नियंत्रक और परम गुरु स्वरूप को स्वीकार करते हैं।
किम् आचारः कैसा आचार वाला है उसका दैनिक जीवन, उठना-बैठना, खाना-पीना और समाज के साथ व्यवहार किस प्रकार का होता है?
कम् च और कैसे वह कौन सी साधना, युक्ति या मार्ग है जिसके माध्यम से कोई साधारण मनुष्य इस दुर्जेय माया को पार कर सकता है?
अतिवर्तते लांघता है / पार करता है गुणों के इस विशाल सागर को तैरकर या इसके पार पहुँचकर अचल स्थिति को प्राप्त करना।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आने वाली श्रीमद्भगवद्गीता केवल दो सेनाओं के बीच युद्ध के मैदान का संवाद मात्र नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मविद्या का वह ग्रंथ है जिसे महर्षि वेद व्यास ने लिपिबद्ध किया है। कुरुक्षेत्र की उस धर्मभूमि पर जब अर्जुन अपने सगे-सम्बन्धियों को सामने देखकर कायरता और मोह से ग्रस्त हो गए, तब उनके सारथी बने भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें कर्तव्य और परम सत्य का पाठ पढ़ाया।

चौदहवें अध्याय के आरंभ में भगवान कृष्ण ने 'ज्ञानियों में भी उत्तम ज्ञान' का वर्णन किया है, जिसके प्रभाव से ऋषि-मुनि इस संसार से मुक्त होकर परम सिद्धि को प्राप्त हुए हैं। भगवान ने स्पष्ट किया कि संपूर्ण जगत की योनि मूल प्रकृति (महाब्रह्म) है और वे स्वयं उसमें बीच स्थापित करने वाले पिता हैं। प्रकृति से उत्पन्न होने वाले तीन गुण—सत्व, रज और तम—इस अविनाशी जीवात्मा को शरीर में जकड़ लेते हैं। सत्व गुण सुख और ज्ञान से बाँधता है, रज गुण कर्म और वासनाओं से बाँधता है, और तम गुण प्रमाद, आलस्य तथा निद्रा के द्वारा ज्ञान को आच्छादित कर देता है।

जब भगवान श्री कृष्ण ने इन तीनों गुणों के विस्तार और उनके प्रभावों का वर्णन किया, तो अर्जुन के मन में एक अति गहन दार्शनिक प्रश्न जागा। अर्जुन जानते थे कि मनुष्य जीवन का अंतिम लक्ष्य इन गुणों के बंधनों से मुक्त होना है। परंतु यह जानना अति आवश्यक था कि वह गुणातीत (गुणों से परे) मनुष्य कैसा दिखता है? उसका आचरण कैसा होता है? क्या वह समाज में रहता है या जंगलों में भटकता है? इन प्रश्नों के उत्तर के रूप में ही अगले श्लोकों में भगवान कृष्ण ने गुणातीत पुरुष के अचूक लक्षण बताए हैं—जैसे सुख-दुख को समान समझना, पत्थर, सोना और मिट्टी को एक समान देखना, और किसी भी परिस्थिति में विचलित न होना। यह ऐतिहासिक पृष्ठभूमि हमें सिखाती है कि जिज्ञासा ही आध्यात्मिक उन्नति का पहला चरण है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक और इससे जुड़े अध्यायों का नियमित मनन, पठन एवं जप करने से साधक को अलौकिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति और स्थिरता

जीवन की उथल-पुथल, तनाव और अवसाद के बीच इस श्लोक का चिंतन मन को शांत करता है और भावनाओं पर नियंत्रण रखने की क्षमता प्रदान करता है।

2. सकारात्मक ऊर्जा का संचार (Positive Aura)

संस्कृत श्लोकों के शुद्ध उच्चारण से उत्पन्न होने वाले कंपन (Vibrations) शरीर के चक्रों को जाग्रत करते हैं और चारों ओर एक सुरक्षात्मक सकारात्मक आवरण बनाते हैं।

3. कर्मिक शुद्धि (Karmic Purification)

रजोगुण और तमोगुण जनित विकारों—जैसे क्रोध, वासना, लोभ और अहंकार—का शमन होता है, जिससे धीरे-धीरे संचित कर्मों का क्षय होने लगता है।

4. दिव्य कृपा और भगवद् प्राप्ति

भगवान कृष्ण के वचनों के प्रति निष्ठा रखने से साधक को उनकी अहैतुरी कृपा प्राप्त होती है और जीवन के प्रति दृष्टिकोण आध्यात्मिक हो जाता है।

5. मोह और भय से मुक्ति

जब व्यक्ति यह समझ जाता है कि शरीर और गुण प्रकृति के अधीन हैं और आत्मा अमर है, तो मृत्यु का भय और संसार का मोह स्वतः समाप्त हो जाता है।

6. निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता

सात्विक बुद्धि का विकास होने के कारण कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सही और धर्मसंगत निर्णय लेने की विवेक शक्ति जाग्रत होती है।

7. अहंकार का शमन

"मैं कर्ता हूँ" इस भ्रम का नाश होता है और साधक प्रत्येक कार्य को ईश्वरार्पण समझकर निष्काम भाव से करने की कला सीख जाता है।

8. श्रेष्ठ स्वास्थ्य और दीर्घायु

मानसिक तनाव कम होने और आंतरिक प्रसन्नता बने रहने से शारीरिक स्वास्थ्य पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है, जिससे जीवन ऊर्जावान बनता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

Bhaktilok.in पर प्रस्तुत यह आलेख पारंपरिक वेदों, उपनिषदों और श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक भाष्यों (जैसे शंकराचार्य भाष्य और स्वामी रामसुखदास जी की 'गीताप्रवचन' शैली) पर आधारित है। हमारी संपादकीय नीति यह सुनिश्चित करती है कि पाठकों तक केवल उच्च कोटि की, वेदमार्गी और शास्त्रसम्मत आध्यात्मिक सामग्री पहुँचे। यह संपादकीय रूप से तैयार सामग्री (Editorially curated content) आधुनिक भाषाई और गूगल की Helpful Content गाइडलाइंस को ध्यान में रखते हुए डिजाइन की गई है ताकि ज्ञान के पिपासु पाठकों को एक प्रामाणिक, गरिमामयी और गहन पठन अनुभव मिल सके। किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा दिए बिना, हम वेदों और ग्रंथों के वैज्ञानिक एवं दार्शनिक पक्षों को उजागर करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

'गुणातीत' दो शब्दों से मिलकर बना है—'गुण' (सत्व, रज, तम) और 'अतीत' (परे या पार)। जो मनुष्य प्रकृति के इन तीनों गुणों के प्रभाव से मुक्त हो चुका है, जो सुख-दुख, मान-अपमान, और राग-द्वेष से ऊपर उठकर आत्म-स्वरूप में स्थिर है, उसे गुणातीत कहा जाता है।

जब भगवान कृष्ण ने चौदहवें अध्याय में यह समझाया कि संपूर्ण संसार और जीव इन तीनों गुणों के जाल में फँसे हैं और इनसे मुक्ति पाना ही मोक्ष है, तब अर्जुन के मन में जिज्ञासा जागी कि उस मुक्त पुरुष (गुणातीत) को पहचाना कैसे जाए और उस स्थिति को कैसे प्राप्त किया जाए।

हाँ, बिल्कुल। श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार गुणातीत होने के लिए जंगलों में भागने की आवश्यकता नहीं है। जो व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए मन को भगवान में स्थिर रखता है, फल की आसक्ति छोड़ देता है, और सभी परिस्थितियों में समभाव रहता है, वह गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी गुणातीत बन सकता है।

इस श्लोक और गीता के पाठ से मन की चंचलता समाप्त होती है, ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलती है, क्रोध और अहंकार पर नियंत्रण होता है, तथा जीवन में एक गहरी आध्यात्मिक शांति और संतोष की अनुभूति होती है।

सत्व गुण मनुष्य को सुख और ज्ञान के मोह से बाँधता है, रज गुण इच्छाओं, महत्वाकांक्षाओं और कर्मफल की आसक्ति से बाँधता है, और तम गुण प्रमाद, आलस्य, अज्ञान तथा निद्रा के द्वारा मनुष्य की विवेक शक्ति को ढँककर उसे पतन की ओर ले जाता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

अर्जुन ने कहा: हे प्रभो! वह पुरुष किन लक्षणों से जाना जाता है जो इन तीनों गुणों से परे हो गया है? उसका आचरण कैसा है? और वह इन तीनों गुणों को कैसे पार करता है? Arjuna asked: O Lord, by what marks is one who has transcended these three gunas known? What is his behavior? And how does he go beyond them?

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

गुणातीत अवस्था को जानने की उत्सुकता साधक के मार्ग का अंग है। The curiosity to know the state beyond gunas is part of the seeker's path.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 21 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 21/27 78% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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