गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – श्लोक 22

श्लोक २२ में गुणातीत पुरुष का पहला लक्षण: वह गुणों के आने-जाने पर द्वेष या आसक्ति नहीं रखता। Verse 22: The first sign: He neither hates the gunas when they appear nor longs for them when they disappear.

संस्कृत श्लोक

श्रीभगवानुवाच । प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव । न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥ २२॥

śrī-bhagavān uvāca | prakāśaṃ ca pravṛttiṃ ca moham eva ca pāṇḍava | na dveṣṭi sampravṛttāni na nivṛttāni kāṅkṣati ||22||

पदच्छेद / शब्दार्थ

श्रीभगवानुवाच: भगवान् ने कहा; प्रकाशम्: प्रकाश (सत्त्व के कार्य); च: और; प्रवृत्तिम्: प्रवृत्ति (रज के कार्य); च: और; मोहम्: मोह (तम के कार्य); एव: ही; च: और; पाण्डव: हे पाण्डव; न: नहीं; द्वेष्टि: द्वेष करता है; सम्प्रवृत्तानि: प्राप्त होने पर; न: नहीं; निवृत्तानि: निवृत्त होने पर; काङ्क्षति: इच्छा करता है।

हिंदी अनुवाद

श्रीभगवान् बोले: हे पाण्डव! जो प्रकाश (सत्त्व), प्रवृत्ति (रज) और मोह (तम) के प्राप्त होने पर उनसे द्वेष नहीं करता और उनके निवृत्त होने पर उनकी इच्छा नहीं करता...

English Translation

The Blessed Lord said: O Pandava, he who does not hate illumination (Sattva), activity (Rajas) and delusion (Tamas) when they appear, nor longs for them when they disappear...

टीका / Commentary

गुणातीत पुरुष गुणों के आने-जाने पर न तो द्वेष करता है, न आसक्ति। The transcendent one neither hates the gunas when they appear nor desires them when they vanish.