श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 22

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 41 मिनट का पठन 119 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रीभगवानुवाच । प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव । न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥ २२॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
श्रीभगवानुवाच
भगवान् ने कहा
प्रकाशम्
प्रकाश (सत्त्व के कार्य)
च
और
प्रवृत्तिम्
प्रवृत्ति (रज के कार्य)
च
और
मोहम्
मोह (तम के कार्य)
एव
ही
च
और
पाण्डव
हे पाण्डव
न
नहीं
द्वेष्टि
द्वेष करता है
सम्प्रवृत्तानि
प्राप्त होने पर
न
नहीं
निवृत्तानि
निवृत्त होने पर
काङ्क्षति
इच्छा करता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

श्रीभगवान् बोले: हे पाण्डव! जो प्रकाश (सत्त्व), प्रवृत्ति (रज) और मोह (तम) के प्राप्त होने पर उनसे द्वेष नहीं करता और उनके निवृत्त होने पर उनकी इच्छा नहीं करता...

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

1. आध्यात्मिक परिचय, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय दृष्टि

भारतीय सनातन संस्कृति और वेदान्त दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता का स्थान सर्वोच्च है। इसे मोक्षशास्त्र और उपनिषदों का सार कहा गया है। विशेष रूप से चौदहवें अध्याय में, जिसे 'गुणत्रयविभागयोग' के नाम से जाना जाता है, भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को प्रकृति के तीन गुणों—सत्व, रज और तम—की सूक्ष्मताओं का विस्तार से ज्ञान देते हैं। इस अध्याय के अंतिम चरणों में भगवान उस महामानव, संत या योगी का जीवन्त और प्रामाणिक चित्रण करते हैं जो इन तीनों गुणों के प्रभाव से परे हो चुका है, जिसे शास्त्र की भाषा में 'गुणातीत' कहा गया है।

प्रस्तुत श्लोक (संख्या २२) उस गुणातीत पुरुष के आंतरिक मनोभावों, मानसिक संतुलन और आध्यात्मिक परिपक्वता का सबसे उत्कृष्ट वैज्ञानिक और दार्शनिक प्रमाण है। सामान्य मानव प्रकृति के किसी भी गुण के प्रकट होने पर या तो सुखी होता है (जैसे सत्व के प्रकट होने पर ज्ञान व सुख का अनुभव) या दुखी होता है (जैसे तम के प्रकट होने पर आलस्य और अज्ञान से द्वेष)। किंतु एक आत्मज्ञानी, जो अपनी चेतना को ब्रह्म में स्थित कर चुका है, वह इन समस्त द्वंद्वों से मुक्त हो जाता है।

सांस्कृतिक और ब्रह्मांडीय दृष्टि से यह श्लोक मनुष्य को उसके जीवन के उतार-चढ़ाव, सुख-दुःख, और मानसिक विकारों से ऊपर उठने की शाश्वत कला सिखाता है। जब कोई साधक इस अवस्था को प्राप्त कर लेता है, तब वह संसार के प्रपंचों में रहते हुए भी कमल के पत्ते की तरह जल से अलिप्त रहता है। Bhaktilok.in के इस विशेष आलेख में हम इसी दिव्य श्लोक के शाब्दिक अर्थ, व्याकरण, पौराणिक पृष्ठभूमि, और दैनिक जीवन में इसके प्रयोगात्मक महत्व का अत्यंत सूक्ष्म और प्रामाणिक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहे हैं, जो साधकों के जीवन को एक नई दिशा प्रदान करेगा।

2. संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

पाठकों की सुविधा के लिए यहाँ श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय के इस पावन श्लोक को देवनागरी और रोमन लिपि में प्रस्तुत किया गया है, ताकि इसके उच्चारण की शुद्धता बनी रहे।

॥ अथ चतुर्दशोऽध्यायः (गुणत्रयविभागयोग) ॥

श्लोक २२

श्रीभगवानुवाच
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति॥ २२॥


Śrī-bhagavān uvāca
Prakāśaṁ ca pravṛttiṁ ca moham eva ca pāṇḍava |
Na dveṣṭi sampravṛttāni na nivṛttāni kāṅṅkṣati || 22 ||

पाठ विधि एवं ध्यान मंत्र:

इस श्लोक का दैनिक प्रातःकाल स्नान के पश्चात पूर्व दिशा की ओर मुख करके शांत चित्त से ३, ११ या १०८ बार जप करना चाहिए। जप करते समय यह भावना रखनी चाहिए कि मन की वृत्तियाँ (प्रकाश, प्रवृत्ति और मोह) भगवान की ही शक्ति के खेल हैं और साधक इनसे पूर्णतः तटस्थ एवं साक्षी भाव में स्थित है।

3. पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

श्लोक के प्रत्येक शब्द की गहराई को समझने के लिए नीचे विस्तृत सारणी दी गई है, जो इसके व्याकरणिक और दार्शनिक दोनों पक्षों को उजागर करती है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
श्रीभगवानुवाच श्री भगवान बोले परम ब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण, जो समस्त ज्ञान के सागर और योगेश्वर हैं, अपने मुख से परम सत्य का उपदेश दे रहे हैं।
प्रकाशम् च और प्रकाश को (सत्व गुण का कार्य) ज्ञान, प्रसन्नता, और प्रकाश जो सत्व गुण के प्रकट होने पर मन में उत्पन्न होते हैं।
प्रवृत्तिम् च और प्रवृत्ति को (रजस् गुण का कार्य) कर्मों में आसक्ति, लालसा, महत्वाकांक्षा और भारी सक्रियता जो रजोगुण से उत्पन्न होती है।
मोहम् एव च तथा मोह को भी (तमस् गुण का कार्य) अज्ञान, अकर्मण्यता, भ्रम और जड़ता जो तमोगुण के प्रभाव से मनुष्य को घेरती है।
पाण्डव हे पाण्डव (अर्जुन) पाण्डु पुत्र अर्जुन को संबोधित करते हुए, जो धर्म और साधना के मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ने वाले प्रतीक हैं।
न द्वेष्टि द्वेष नहीं करता है जब ये गुण प्रकट होते हैं, तब योगी उनसे घृणा नहीं करता और न ही उनसे परेशान होता है।
सम्प्रवृत्तानि अच्छी प्रकार से प्रवृत्त हुए (प्रकट हुए) संसार में या शरीर-मन में जब ये तीनों गुण अपनी स्वाभाविक गति से सक्रिय होते हैं।
न निवृत्तानि और न ही निवृत्त होने पर (समाप्त होने पर) जब ये गुण शांत हो जाते हैं, छंट जाते हैं या उनका प्रभाव समाप्त हो जाता है।
काङ्क्षति इच्छा करता है योगी उनके जाने की या उन्हें दोबारा प्राप्त करने की कोई लालसा या कामना नहीं रखता है।
समग्र भावार्थ:

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे पाण्डव! जो पुरुष गुणातीत (गुणों से परे) हो चुका है, वह सत्व गुण के कार्य 'प्रकाश' (ज्ञान/सुख), रजोगुण के कार्य 'प्रवृत्ति' (क्रियाशीलता/कामकाज), और तमोगुण के कार्य 'मोह' (अज्ञान/निद्रा)—इन तीनों में से किसी के भी प्रकट होने पर न तो उनसे द्वेष करता है, और न ही उनके छिप जाने या निवृत्त होने पर उनकी आकांक्षा (इच्छा) करता है। वह पूर्णतः साक्षी भाव में जीवन जीता है।

4. धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय की पृष्ठभूमि कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में रची गई थी, जहाँ महाभारत युद्ध के ठीक आरंभ में कौरवों और पांडवों की सेनाएँ आमने-सामने खड़ी थीं। विषाद और मोह से ग्रस्त अर्जुन ने जब अपने ही सगे-संबंधियों को सामने देखा, तो उनके हाथ से गांडीव धनुष छूट गया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जीवन, मृत्यु, कर्म और प्रकृति के रहस्यों से परिचित कराने के लिए योगशास्त्र का उपदेश दिया।

चौदहवें अध्याय का नाम 'गुणत्रयविभागयोग' है। इस अध्याय के आरंभ में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं को 'महद्ब्रह्म' (प्रकृति) का योनिदाता बताया है, जिससे समस्त चर-अचर जीवों की उत्पत्ति होती है। भगवान बताते हैं कि प्रकृति से उत्पन्न होने वाले तीन गुण—सत्व, रज और तम—इस अविनाशी जीव को शरीर में बांधकर रखते हैं। अर्जुन के मन में जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि इन गुणों से परे कौन है, इनके लक्षण क्या हैं, और इनसे पार कैसे पाया जा सकता है।

महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत आने वाली यह गीता संवाद केवल दो व्यक्तियों की बातचीत नहीं है, बल्कि यह समस्त मानव जाति के लिए उपनिषदों का सार है। प्राचीन वैदिक परंपरा में, विशेषकर सांख्य दर्शन और वेदान्त के आचार्यों (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामानुज और संत ज्ञानेश्वर) ने इस श्लोक की व्याख्या करते हुए इसे 'जीवनमुक्ति' की कुंजी माना है। सांख्य दर्शन के अनुसार, प्रकृति और पुरुष का विवेक ही मुक्ति का मार्ग है। जब तक मनुष्य गुणों के फेर में फंसा रहता है—सत्व से सुख मानकर बंधता है, रज से कर्म में दुख उठाता है, और तम से प्रमाद में डूबता है—तब तक वह जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त नहीं हो सकता।

इस ऐतिहासिक प्रसंग से यह स्पष्ट होता है कि भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को केवल एक योद्धा के रूप में नहीं, बल्कि एक परिपूर्ण आध्यात्मिक साधक के रूप में देखना चाहते थे जो बाहरी युद्ध के साथ-साथ अपने भीतर के विकारों और गुणों के द्वंद्व को भी जीत सके। यही कारण है कि इस श्लोक का अध्ययन और मनन करने से साधक को न केवल मानसिक शांति मिलती है, बल्कि उसे जीवन के हर परिस्थिति में अडिग रहने की आंतरिक शक्ति भी प्राप्त होती है।

5. नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के इस दिव्य श्लोक का नियमित पठन, मनन और स्मरण करने से जीवन में अनेकानेक आत्मीय और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक समता और संतुलन (Emotional Equilibrium)

सुख और दुःख, प्रशंसा और निंदा जैसी विपरीत परिस्थितियों में मन को शांत और स्थिर रखने की अद्भुत क्षमता विकसित होती है।

2. साक्षी भाव की प्राप्ति (Witness Consciousness)

साधक अपने विचारों, भावनाओं और शरीर की अवस्थाओं को केवल एक दर्शक की भांति देखना सीख जाता है, जिससे अहंकार का क्षय होता है।

3. कर्म बंधनों से मुक्ति (Karmic Purification)

गुणों के आने-जाने पर प्रतिक्रिया न देने से नए कर्मों का संचय रुक जाता है, जिससे प्राचीन कर्मों और संस्कारों की शुद्धि होने लगती है।

4. तनाव और चिंता से मुक्ति (Stress & Anxiety Relief)

भविष्य की अनिश्चितताओं और भूतकाल के पछतावे से मुक्ति मिलती है, क्योंकि साधक वर्तमान क्षण में पूर्ण स्थिरता का अनुभव करता है।

5. सकारात्मक ऊर्जा का संचरण (Positive Aura Enhancement)

नियमित जप और चिंतन से शरीर और मन के चारों ओर एक उच्च आध्यात्मिक और सात्विक ऊर्जा का आवरण (Aura) विकसित होता है।

6. वैराग्य और आत्मबोध (Detachment & Self-Realization)

संसार के भोगों और प्रपंचों के प्रति आसक्ति स्वतः समाप्त होने लगती है और आत्मा के वास्तविक स्वरूप का बोध होने लगता है।

7. ईश्वर कृपा की प्राप्ति (Divine Grace)

जो भक्त भगवान के इन वचनों को अपने जीवन में उतारता है, उस पर भगवान श्रीकृष्ण की अहेतुकी कृपा और आशीर्वाद सदा बना रहता है।

8. जीवनमुक्ति का मार्ग (Path to Liberation)

यह श्लोक जीते-जी मुक्त रहने (जीवनमुक्त) की अवस्था को प्राप्त करने का सबसे सरल और प्रामाणिक मार्ग प्रशस्त करता है।

6. संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री (Bhaktilok.in Editorial Desk): Bhaktilok.in पर प्रकाशित यह लेख श्रीमद्भगवद्गीता के प्रामाणिक संस्करणों (जैसे गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित 'तत्वमसि' एवं 'श्रीमद्भगवद्गीता साधक संजीवनी' टीका) तथा वेदान्त के प्राचीन भाष्यों के गहन अध्ययन के आधार पर तैयार किया गया है। हमारे वरिष्ठ विद्वानों और संस्कृत भाषाविदों ने यह सुनिश्चित किया है कि प्रत्येक श्लोक का अर्थ, उसका व्याकरण, और उसकी दार्शनिक गहराई आधुनिक पाठकों के लिए अत्यंत सहज, सरल और बोधगम्य हिंदी में प्रस्तुत हो। हम सनातन संस्कृति के मूल ग्रंथों की पवित्रता और सटीकता को बनाए रखने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। यदि पाठकों का कोई आध्यात्मिक प्रश्न हो, तो वे हमारे मंच के माध्यम से मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं।

7. अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs - Schema Ready)

गुणातीत वह पुरुष है जो प्रकृति के तीन गुणों—सत्व, रज और तम—के प्रभाव और बंधनों से पूरी तरह मुक्त हो चुका है। श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि गुणातीत पुरुष न तो प्रकाश (सत्व), न प्रवृत्ति (रजस्), और न ही मोह (तमस्) के प्रकट होने पर उनसे द्वेष करता है और न ही उनके जाने पर उनकी आकांक्षा रखता है। वह हर परिस्थिति में उदासीन और साक्षी रूप में स्थित रहता है।

इन तीनों शब्दों का संबंध प्रकृति के तीन गुणों से है। 'प्रकाश' सत्व गुण का कार्य है जो ज्ञान, सुख और निर्मलता उत्पन्न करता है। 'प्रवृत्ति' रजोगुण का कार्य है जो भारी कर्मशीलता, लालसा और कामनाओं को जन्म देती है। 'मोह' तमोगुण का कार्य है जो अज्ञान, प्रमाद, आलस्य और भ्रम की स्थिति पैदा करता है। एक ज्ञानी पुरुष इन तीनों अवस्थाओं को प्रकृति का खेल समझकर इनसे आसक्ति या द्वेष नहीं रखता।

दैनिक जीवन में जब भी हमारे सामने कठिन परिस्थितियाँ आएं—चाहे वह अत्यधिक सुख हो (सत्व), कार्यों की व्यस्तता व संघर्ष हो (रजस्), या मानसिक अज्ञान व निराशा हो (तमस्)—हमें इस श्लोक का स्मरण करना चाहिए। यह हमें याद दिलाता है कि ये सभी स्थितियाँ अस्थायी हैं और हमें इनसे घबराने या इनसे चिपकने के बजाय एक तटस्थ साक्षी बनकर इनका सामना करना चाहिए।

कपिच नहीं! गुणों के प्रति उदासीन होने या द्वेष न करने का अर्थ कर्मों से भागना (अकर्मण्यता) नहीं है, बल्कि निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करना है। जब मनुष्य फल की आसक्ति या गुणों के बंधनों से मुक्त होकर कर्म करता है, तब उसके द्वारा किए गए कर्म श्रेष्ठ और समाज कल्याणकारी होते हैं, और वह बंधनकारी नहीं बनते।

चौदहवें अध्याय (गुणत्रयविभागयोग) का मुख्य संदेश यह है कि जीव मूल रूप से आत्मा है, जो प्रकृति के तीन गुणों (सत्व, रज, तम) के संपर्क में आकर बंध जाता है। इन गुणों से मुक्ति पाने का एकमात्र उपाय भगवान की अनन्य भक्ति और अपनी चेतना को भगवत्स्वरूप में स्थित करना है। जो भक्त अनन्य भक्ति योग से भगवान का भजन करता है, वह इन तीनों गुणों को लांघकर ब्रह्मभाव को प्राप्त हो जाता है।

© Bhaktilok.in | सर्वाधिकार सुरक्षित। वेदान्त और सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार हेतु समर्पित।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं: हे पाण्डव! जो पुरुष प्रकाश (सत्त्व), प्रवृत्ति (रज) और मोह (तम) के उपस्थित होने पर उनसे द्वेष नहीं करता और उनके चले जाने पर उनकी इच्छा नहीं करता... The Lord said: O Pandava, he who does not hate illumination, activity, and delusion when they appear, nor longs for them when they disappear...

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

गुणातीत पुरुष गुणों के उतार-चढ़ाव से अप्रभावित रहता है, वह साक्षी भाव में स्थित रहता है। The transcendent one remains unaffected by the play of gunas, abiding as a witness.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 22 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 22/27 81% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!