श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 23

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 40 मिनट का पठन 122 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते । गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥ २३॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
उदासीनवत्
उदासीन के समान
आसीनः
स्थित
गुणैः
गुणों द्वारा
यः
जो
न
नहीं
विचाल्यते
विचलित किया जाता
गुणाः
गुण
वर्तन्ते
व्यवहार कर रहे हैं
इति एव
ऐसा ही
यः
जो
अवतिष्ठति
स्थित रहता है
न
नहीं
इङ्गते
चलायमान होता।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो उदासीन के समान स्थित है, गुणों द्वारा विचलित नहीं होता, और "गुण ही गुणों में बर्त रहे हैं" - ऐसा जानकर जो स्थित रहता है और न तो हिलता है...

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना एवं ब्रह्मांडीय महत्व

सनातन धर्म के सर्वोच्च ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय (गुणात्रयविभाग योग) का यह तेरहवां श्लोक (संख्या २३) मानव चेतना के शिखर और आत्म-साक्षात्कार की पराकाष्ठा का अत्यंत सजीव चित्रण प्रस्तुत करता है। इस लोक-कल्याणकारी श्लोक में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को उस विरले महापुरुष के आंतरिक और बाह्य आचरण से अवगत कराते हैं, जो प्रकृति के तीनों गुणों (सत्व, रज और तम) के प्रभाव से पूरी तरह ऊपर उठ चुका है। जिस प्रकार आकाश में तैरते हुए बादल या विशाल सागर की अथाह गहराई में होने वाली हलचल से उसकी सतह अप्रभावित रहती है, ठीक उसी प्रकार 'गुणातीत' पुरुष संसार के द्वंद्वों, सुख-दुःख, मान-अपमान और जय-पराजय के बीच रहते हुए भी इनसे अलिप्त रहता है।

सांस्कृतिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से यह श्लोक अद्वैत वेदांत और सांख्य दर्शन का सार प्रस्तुत करता है। यह मनुष्य को सिखाता है कि किस प्रकार देह-अध्यास और अहंकार से मुक्त होकर केवल एक द्रष्टा या 'साक्षी' भाव में स्थित हुआ जा सकता है। वर्तमान आधुनिक युग में, जहाँ मानसिक तनाव, भागदौड़, और भौतिकता की अंधी दौड़ ने मनुष्य की शांति को ग्रस लिया है, यह श्लोक एक अचूक आध्यात्मिक औषधि का कार्य करता है। यह सिखाता है कि कर्म शरीर और मन के स्तर पर प्रकृति के गुणों द्वारा किए जा रहे हैं, किंतु शुद्ध आत्मा (क्षेत्रज्ञ) इनसे सर्वथा पृथक, अकर्ता और असंग है। इस दिव्य बोध को आत्मसात करने से साधक जीवन की हर परिस्थिति में अडिग रहता है और समता की उस उच्च अवस्था को प्राप्त करता है जिसे भगवान कृष्ण ने 'स्थितप्रज्ञ' या 'गुणातीत' कहा है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

अथ चतुर्दशोऽध्यायः (श्लोक २३)

उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥ २३॥


"उदासीनवद् आसीनः गुणैः यः न विचाल्यते ।
गुणा वर्तन्ते इत्येव यः अवतिष्ठति न इङ्गते ॥"

श्लोक पाठ की सरल विधि एवं भावपूर्ण उच्चारण:

इस पवित्र श्लोक का दैनिक प्रातःकाल स्नान के पश्चात शांत चित्त से न्यूनतम ११ या १०८ बार जप करना चाहिए। पाठ करते समय साधक को अपनी आँखें बंद करके यह विचार करना चाहिए कि वह शरीर और मन के विकारों से परे एक निर्मल चैतन्य ज्योति है। इस श्लोक का पाठ विशेषकर तब अत्यंत प्रभावी होता है जब व्यक्ति मानसिक उलझनों, संशयों या जीवन के किसी बड़े संकट का सामना कर रहा हो। इसके सस्वर पाठ से एकाग्रता बढ़ती है और अंतःकरण में एक अजीब सी शांति एवं निर्भयता का संचार होता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक पद का गहन व्याकरणिक और दार्शनिक विश्लेषण नीचे दी गई तालिका में प्रस्तुत है:

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पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
उदासीनवत् (उदासीनवद्) उदासीन की भाँति, तटस्थ होकर जो संसार के कार्यों में रुचि न रखते हुए भी तटस्थ भाव से सब देखता है, जैसे कोई तटस्थ दर्शक नाटक देखता है।
आसीनः स्थित रहने वाला, बैठा हुआ अपनी आत्मिक स्थिति में अडिग रूप से प्रतिष्ठित रहना, बाहरी हलचलों से अप्रभावित होकर बैठना।
गुणैः प्रकृति के तीनों गुणों द्वारा (सत्व, रज, तम) माया या प्रकृति के त्रिगुणात्मक आवेग और उनके विभिन्न कार्य, जैसे हर्ष, शोक, मोह, लोभ आदि।
यः जो (महापुरुष / गुणातीत पुरुष) वह विशेष ज्ञानी या साधक जिसने आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया है और देहाध्यास छोड़ दिया है।
न विचाल्यते विचलित नहीं किया जाता / होता जिसे बाहरी परिस्थितियाँ, प्रलोभन या आपदाएँ अपने धर्म और आत्म-स्वरूप से डिगा नहीं सकतीं।
गुणाः वे ही गुण (सत्वादि गुण) शरीर, इन्द्रियाँ और मन के स्तर पर होने वाली समस्त गतिविधियाँ और कर्म।
वर्तन्ते बरत रहे हैं, क्रियाशील हैंगुण ही गुणों में बरत रहे हैं; इन्द्रियाँ अपने विषयों में और मन अपने संकल्प-विकल्प में स्वतंत्र रूप से कार्य कर रहा है।
इत्येव ऐसा ही मानकर / समझकर इस निश्चित और अटल ज्ञान के साथ कि आत्मा कर्ता नहीं, बल्कि केवल अकर्ता साक्षी है।
यः अवतिष्ठति जो भली-भांति स्थित रहता है निरंतर इसी बोध में रमण करना और अपनी सहज अवस्था से कभी न च्युत होना।
न इङ्गते चंचलता नहीं दिखाता, अडिग रहता है मन, बुद्धि और प्राण की समस्त कंपनाओं और चंचलता से मुक्त होकर परम अचूक स्थिरता को प्राप्त करना।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय की यह पृष्ठभूमि महाभारत के महायुद्ध के आरंभिक क्षणों से जुड़ी है, जब कुरुक्षेत्र की रणभूमि में अर्जुन मोहग्रस्त होकर अपने महान कर्तव्यों से विमुख हो रहे थे। तब जगतगुरु भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन के संपूर्ण संशयों को दूर करने के लिए ज्ञान, कर्म और भक्तियोग के महासागर को प्रवाहित किया। अध्याय १४ के आरंभ में भगवान कृष्ण 'विद्याओं में उत्तम उत्तम विद्या' (ब्रह्मविद्या) का वर्णन करते हैं, जो सभी योगियों को इस संसार रूपी भवसागर से पार लगा देती है।

इसी क्रम में अर्जुन ने भगवान से तीन अति महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे थे—(१) त्रिगुणातीत मनुष्य के क्या लक्षण हैं? (२) उसका आचरण कैसा होता है? और (३) वह इन तीनों गुणों से कैसे पार होता है? अर्जुन के इन जिज्ञासा-पूर्ण प्रश्नों के उत्तर में भगवान कृष्ण ने २१वें और २२वें श्लोक में गुणातीत के लक्षणों का बीज रूप में वर्णन करने के पश्चात, इस तेरहवें (२३वें) श्लोक में उसकी मनोवैज्ञानिक और आत्मिक स्थिति का انتہائی सूक्ष्म वैज्ञानिक विश्लेषण किया है।

पौराणिक कथाओं और वेदान्त के इतिहास में महर्षि वेद व्यास ने इस प्रसंग के माध्यम से यह स्थापित किया है कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप शरीर नहीं बल्कि सच्चिदानंद स्वरूप आत्मा है। जब तक मनुष्य प्रकृति के गुणों को अपना स्वरूप मानता है, तब तक वह जन्म-मृत्यु और सुख-दुःख के चक्र में फंसा रहता है। जैसे ही वह 'साक्षी भाव' को धारण करता है—अर्थात यह देखता है कि मन सोच रहा है, शरीर काम कर रहा है और प्रकृति अपने नियमों के अनुसार चल रही है, किंतु मैं (आत्मा) इन सबसे पूर्णतः अलिप्त हूँ—वह जीवनमुक्त हो जाता है। महाभारत काल से लेकर आज तक, आदि शंकराचार्य, स्वामी विवेकानंद और रमण महर्षि जैसे महान संतों ने इसी श्लोक के दर्शन को अपने जीवन का आधार बनाया और दुनिया को आत्मानुभूति का मार्ग दिखाया।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

इस दिव्य श्लोक के निरंतर स्मरण, मनन और इसके अर्थ को जीवन में उतारने से साधक को निम्नलिखित असीम आध्यात्मिक एवं मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. परम मानसिक शांति (Mental Peace)

संसार की उथल-पुथल और तनाव के बीच मन को अडिग रखने की शक्ति मिलती है। चिंता और अवसाद स्वतः दूर होने लगते हैं क्योंकि व्यक्ति हर परिस्थिति को साक्षी भाव से देखने लगता है।

2. साक्षी भाव की जागृति (Awakening of Witness Consciousness)

व्यक्ति अपने सुख-दुःख, लाभ-हानि और मान-अपमान से ऊपर उठकर एक तटस्थ द्रष्टा बन जाता है, जिससे अहंकार का स्वतः शमन हो जाता है।

3. कर्म बंधनों से मुक्ति (Karmic Purification)

'मैं कर्ता हूँ' इस भ्रम का नाश होता है। जब कर्तापन का भाव समाप्त हो जाता है, तब नए कर्मों के बंधन (कर्मफल) बनना बंद हो जाते हैं और साधक निष्काम कर्म की ओर अग्रसर होता है।

4. सकारात्मक ऊर्जा और औरा का विस्तार (Positive Aura)

श्लोक के नियमित उच्चारण और इसके गूढ़ार्थ के चिंतन से शरीर के चारों ओर एक उच्च आध्यात्मिक और सकारात्मक ऊर्जा का आवरण (Aura) विकसित होता है, जो नकारात्मक शक्तियों को दूर रखता है।

5. समता की प्राप्ति (Equanimity in Life)

गीता के अनुसार 'समत्वं योग उच्यते'। यह श्लोक साधक को जीवन की हर परिस्थिति—चाहे वह अनुकूल हो या प्रतिकूल—में एकसमान और शांत रहना सिखाता है।

6. आत्म-साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त (Self-Realization)

यह श्लोक अद्वैत ज्ञान का द्वार खोलता है, जिससे साधक अपनी वास्तविक आत्मा (ब्रह्म) को पहचानकर मोक्ष की दिशा में तेजी से आगे बढ़ता है।

7. भय और शोक का नाश (Fearlessness)

जब मनुष्य यह जान लेता है कि गुण ही गुणों में बरत रहे हैं और आत्मा अमर तथा अछूती है, तब उसके मन से मृत्यु, हानि और भविष्य का समस्त भय सदा के लिए मिट जाता है।

8. भगवान की अतुकांत कृपा प्राप्ति (Divine Grace)

भगवान कृष्ण के वचनों को अपने जीवन का ध्येय बनाने वाले भक्त पर साक्षात श्री हरि की कृपा बरसती है, और उसका अंतःकरण सदा भगवद्भक्ति से ओतप्रोत रहता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के इस लेख को हमारे वरिष्ठ वैदिक विद्वानों, संस्कृत भाषाविदों और सनातन शास्त्रों के मर्मज्ञों द्वारा अत्यंत सूक्ष्म शोध और प्रामाणिक टीकाओं (जैसे आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास और श्रीमद भगवद्गीता यथारूप) के अध्ययन के पश्चात संकलित किया गया है। हमारा मुख्य उद्देश्य आधुनिक पाठकों और सनातन धर्म के जिज्ञासुओं तक वेदों, उपनिषदों और श्रीमद्भगवद्गीता के मूल सिद्धांतों को सरल, सटीक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ पहुँचाना है। इस सामग्री में प्रस्तुत प्रत्येक श्लोक का अर्थ व्याकरण की कसौटी और परंपरासम्मत दार्शनिक मान्यताओं पर पूरी तरह खरा उतरता है, ताकि साधक को किसी भी प्रकार के संशय का सामना न करना पड़े।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि गुणातीत (तीनों गुणों से परे) महापुरुष संसार के सभी कार्यों के बीच रहते हुए भी एक तटस्थ साक्षी की तरह रहता है। वह यह अच्छी तरह जानता है कि शरीर, मन और इन्द्रियाँ प्रकृति के गुणों के अधीन कार्य कर रही हैं, किंतु शुद्ध आत्मा इन सबसे पूर्णतः अलिप्त और अकर्ता है।

नहीं, 'उदासीनवत्' का अर्थ निष्क्रिय या आलसी होना नहीं है। इसका अर्थ है—पक्षपात रहित होना और तटस्थ रहना। जिस प्रकार एक न्यायाधीश या खेल का रेफरी खेल में उपस्थित रहते हुए भी उससे भावनात्मक रूप से नहीं जुड़ता, ठीक वैसे ही ज्ञानी पुरुष संसार में अपने सभी कर्तव्य निभाते हुए भी आंतरिक रूप से अंसग रहता है।

सत्व गुण ज्ञान, सुख और प्रकाश का बंधक है; रज गुण काम, तृष्णा और कर्म की आसक्ति का बंधक है; तथा तम गुण प्रमाद, आलस्य और निद्रा का बंधक है। साधारण मनुष्य इन गुणों के आवेग में आकर ही सुखी या दुखी होता है, किंतु गुणातीत पुरुष इन तीनों के प्रभाव को समझकर इनसे ऊपर उठ जाता है।

गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन निष्काम भाव से कर सकता है। परिवार, व्यापार या नौकरी के कार्यों को करते समय यह भाव रखें कि "मैं केवल निमित्त मात्र हूँ, कर्म प्रकृति के अनुसार हो रहे हैं और फल ईश्वर के अधीन है।" यह आंतरिक दृष्टिकोण ही गृहस्थ को गुणातीत स्थिति के निकट ले जाता है।

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय (गुणात्रयविभाग योग) के अंतर्गत आया है। इस अध्याय में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को प्रकृति के तीनों गुणों के स्वरूप, उनके बंधनों और उन गुणों से पूरी तरह मुक्त होने (गुणातीत होने) के अत्यंत रहस्यमयी और कल्याणकारी उपायों का विस्तार से वर्णन किया है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं: जो उदासीन की भाँति बैठा है, गुणों द्वारा विचलित नहीं होता, और यह जानकर कि "गुण ही गुणों में बर्त रहे हैं" स्थित रहता है और चलायमान नहीं होता। He who sits like one unconcerned, not disturbed by the gunas, thinking "the gunas act," and remains steady and unmoved.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

यह साक्षी भाव ही गुणातीतता की कुंजी है। This witness attitude is the key to transcending the gunas.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 23 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 23/27 85% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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