गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – श्लोक 23
श्लोक २३ में गुणातीत का लक्षण: वह उदासीन रहता है, गुणों के द्वारा विचलित नहीं होता, और जानता है कि गुण ही गुणों में क्रिया कर रहे हैं। Verse 23: He remains unconcerned, unperturbed by the gunas, knowing that only the gunas act.
संस्कृत श्लोक
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते । गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥ २३॥
udāsīna-vad āsīno guṇair yo na vicālyate | guṇā vartanta ity eva yo'vatiṣṭhati neṅgate ||23||
पदच्छेद / शब्दार्थ
उदासीनवत्: उदासीन के समान; आसीनः: स्थित; गुणैः: गुणों द्वारा; यः: जो; न: नहीं; विचाल्यते: विचलित किया जाता; गुणाः: गुण; वर्तन्ते: व्यवहार कर रहे हैं; इति एव: ऐसा ही; यः: जो; अवतिष्ठति: स्थित रहता है; न: नहीं; इङ्गते: चलायमान होता।
हिंदी अनुवाद
जो उदासीन के समान स्थित है, गुणों द्वारा विचलित नहीं होता, और "गुण ही गुणों में बर्त रहे हैं" - ऐसा जानकर जो स्थित रहता है और न तो हिलता है...
English Translation
He who sits like one unconcerned, unperturbed by the gunas, thinking "the gunas indeed act," and remains steady and unmoved...
टीका / Commentary
गुणातीत पुरुष गुणों के कार्यों को देखकर भी निष्क्रिय साक्षी बना रहता है। He remains like a witness, thinking that the gunas are acting among themselves, and is not moved.