श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 24

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 43 मिनट का पठन 128 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः । तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥ २४॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

6 पद
समदुःखसुखः
दुःख-सुख में समान
स्वस्थः
अपने में स्थित
समलोष्टाश्मकाञ्चनः
मिट्टी, पत्थर और सोने में समान
तुल्यप्रियाप्रियः
प्रिय और अप्रिय में समान
धीरः
धीर
तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः
निन्दा और आत्म-स्तुति में समान।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो दुःख-सुख में समान है, स्वस्थ (आत्मस्थ) है, मिट्टी, पत्थर और सोने में समान है, प्रिय-अप्रिय में तुल्य है, धीर है, और निन्दा-स्तुति में समान है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता चौदहवें अध्याय का परम दिव्य और ज्ञानवर्धक श्लोक (अध्याय 14, श्लोक 24)

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय चेतना

सनातन संस्कृति और वैदिक दर्शन में श्रीमद्भगवद्गीता को केवल एक ग्रंथ मात्र नहीं, अपितु साक्षात भगवान श्री कृष्ण के मुखरारविन्द से निकली हुई वह अमृतवाणी माना गया है जो भवसागर के अथाह दुखों से मानव को पार लगाने की सामर्थ्य रखती है। गीता के चौदहवें अध्याय, जिसे 'गुणत्रयविभागयोग' के नाम से जाना जाता है, में प्रकृति के तीन गुणों—सत्व, रज और तम—के विस्तृत विश्लेषण के उपरांत भगवान श्रीकृष्ण ने उन महामानवों या दिव्यत्माओं का अत्यंत सुंदर और सजीव चित्रण किया है जो इन तीनों गुणों के बंधनों से पूरी तरह मुक्त हो चुके होते हैं। ऐसे महापुरुष को भारतीय आध्यात्मिक शब्दावली में 'गुणातीत' कहा जाता है।

जब कोई साधक अपनी साधना, निष्काम कर्मयोग और अगाध ईश्वर भक्ति के बल पर माया के इन त्रिगुणात्मक आवरणों को चीरकर परे निकल जाता है, तब उसकी आंतरिक मानसिक स्थिति कैसी होती है, वह इस भौतिक संसार के सुख-दुखों, मान-अपमान, और राग-द्वेष के द्वंद्वों के बीच किस प्रकार अडिग रहता है—इन सभी प्रश्नों का अत्यंत सारगर्भित उत्तर हमें प्रस्तुत श्लोक "समदुःखसुखः स्वस्थः..." में प्राप्त होता है। यह श्लोक केवल कुछ शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि यह उस परमोच्च आध्यात्मिक अवस्था का जीवंत दस्तावेज है, जिसे प्राप्त कर लेने के बाद मनुष्य जीवन-मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर परमानंद की प्राप्ति कर लेता है।

सांस्कृतिक और ब्रह्मांडीय दृष्टिकोण से यह श्लोक समस्त मानवता को यह सिखाता है कि किस प्रकार बाहरी परिस्थितियों के थपेड़ों के बावजूद आंतरिक शांति और संतुलन को बनाए रखा जाए। आज की इस आधुनिक, भागदौड़ भरी और तनावपूर्ण जीवनशैली में, जहां हर व्यक्ति मानसिक अशांति, अवसाद (Depression) और असुरक्षा की भावना से ग्रस्त है, इस श्लोक का अध्ययन, मनन और आचरण एक अचूक औषधि का कार्य करता है। यह हमें सिखाता है कि हमारा वास्तविक स्वरूप आत्मा है, जो नित्य, पवित्र और आनंदस्वरूप है, और प्रकृति के गुण केवल शरीर तथा मन को प्रभावित करते हैं, आत्मा को नहीं।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

भक्ति भाव और एकाग्र चित्त के साथ श्रीमद्भगवद्गीता के इस चौदहवें अध्याय के चौबीसवें श्लोक का सस्वर पाठ करें। यह पाठ मानसिक एकाग्रता और आंतरिक ऊर्जा को जाग्रत करने में अत्यंत प्रभावी है:

समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥ २४॥

श्लोकांश १ (प्रथम चरण)

समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः

अर्थात्: जो सुख और दुःख में समान भाव रखता है, जो अपनी ही आत्मा में स्थित (स्वस्थ) है, जिसके लिए मिट्टी का ढेला, पत्थर और स्वर्ण (सोना) तीनों समान हैं।

श्लोकांश २ (द्वितीय चरण)

तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः

अर्थात्: जो प्रिय और अप्रिय (प्रिय और अप్రియ वस्तु या व्यक्ति) में समान बुद्धि वाला है, जो धीर है तथा जिसकी निंदा और अपनी स्तुति (प्रशंसा) दोनों में समान दृष्टि है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द का गहन दार्शनिक अर्थ है। आइए, एक विस्तृत तालिका के माध्यम से इसके हर पद की तह तक उतरें और इसके आध्यात्मिक रहस्यों को समझें:

पद / शब्द (Sanskrit Term) सरल हिंदी अर्थ (Literal Meaning) आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ (Spiritual Interpretation)
समदुःखसुखः सुख और दुःख में समान रहने वाला सांसारिक सुखों के मिलने पर हर्षित न होना और दुखों के आने पर विचलित न होना; द्वंद्वों से परे उठकर समभाव रखना।
स्वस्थः अपनी आत्मा में स्थित (स्व + स्थ) जो बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर न रहकर अपनी आंतरिक चेतना और सच्चिदानंद स्वरूप आत्मा में ही सदा तृप्त और स्थिर रहता है।
समलोष्टाश्मकाञ्चनः लोष्टा (मिट्टी का ढेला), अश्म (पत्थर) और काञ्चन (सोना) में समान भाव रखने वाला धन-दौलत, आभूषण और मूल्यहीन पत्थरों या मिट्टी के प्रति मन में कोई लोभ या भेदभाव न रखना; भौतिक मोह का पूर्ण क्षय।
तुल्यप्रियाप्रियः प्रिय (सुखद) और अप्रिय (दुःखद) परिस्थितियों में समान रहने वाला मनचाही वस्तु मिलने पर अतिप्रसन्न न होना और अनचाही घटना घटने पर शोक या क्रोध न करना, दोनों में शांत रहना।
धीरः धैर्यवान, ज्ञानी, विवेकशील पुरुष वह मनुष्य जिसकी बुद्धि काम, क्रोध, मोह और भावनाओं के वेग में कभी विचलित नहीं होती, अपितु विवेक पर टिकी रहती है।
तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः निंदा (बुराई) और आत्मसंस्तुति (अपनी प्रशंसा) को समान समझने वाला दूसरों द्वारा की गई आलोचना से दुखी न होना और अपनी प्रशंसा सुनकर अहम् (अहंकार) से न फूलना; लोक-लाज से मुक्त होना।
गुणातीत (संदर्भित) प्रकृति के तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) से अतीत यह श्लोक उसी गुणातीत महापुरुष के लक्षणों का वर्णन करता है जो माया के परे जाकर साक्षात ब्रह्म चेतना में लीन रहता है।
समता (Equanimity) परम संतुलन की स्थिति चित्त की वह अचल अवस्था जिसमें राग और द्वेष दोनों का पूरी तरह से निर्मूलन हो चुका होता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस चौदहवें अध्याय की पृष्ठभूमि कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान से जुड़ी है, जहां कौरवों और पांडवों की विशाल सेनाएं आमने-सामने खड़ी थीं। अर्जुन अपने स्वजनों को देखकर अत्यंत विषाद और मोह से घिर जाते हैं, और उनके हाथ से गांडीव धनुष छूटने लगता है। तब जगतगुरु भगवान श्रीकृष्ण उन्हें जीवन, मर्म, कर्तव्य और मोक्ष का सर्वोच्च ज्ञान प्रदान करते हैं। इस संवाद की श्रृंखला में जब चौदहवां अध्याय आता है, तब अर्जुन भगवान से पूछते हैं कि हे प्रभु! जो पुरुष इन तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) को पार कर चुका होता है, उसके लक्षण क्या हैं? वह कैसा आचरण करता है और कैसे इन गुणों से अतीत होता है?

अर्जुन के इस अत्यंत गूढ़ प्रश्न का उत्तर देते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने श्लोक 22 से 26 तक गुणातीत पुरुष के पांच प्रमुख लक्षणों का बहुत ही सुंदर और वैज्ञानिक विश्लेषण किया है। प्रस्तुत श्लोक (24वां श्लोक) उसी व्याख्या का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। पौराणिक और ऐतिहासिक संदर्भों में, महर्षि वेद व्यास ने महाभारत के भीष्म पर्व के अंतर्गत श्रीमद्भगवद्गीता की रचना की है। इसमें भगवान कृष्ण ने स्पष्ट किया है कि मनुष्य जन्म से गुणों के अधीन होता है, परंतु अपनी साधना, सत्संग और विवेक के बल पर वह इन गुणों के प्रभाव को समाप्त कर सकता है।

भारतीय ऋषि-मुनियों और संतों के इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जिन्होंने इस श्लोक के मर्म को अपने जीवन में उतारा। चाहे वह राजा जनक हों जो 'विदेह' कहलाते हुए भी राजपाट संभालते थे और सोने तथा मिट्टी को समान दृष्टि से देखते थे, अथवा महर्षि शुकदेव जी, जो संसार के تمام प्रलोभनों से परे रहकर ब्रह्म में लीन रहते थे। इन सभी महापुरुषों के चरित्र का मूल आधार यही श्लोक रहा है। यह हमें यह भी सिखाता है कि आध्यात्मिकता केवल जंगलों या गुफाओं में बैठकर आंखें बंद करने का नाम नहीं है, बल्कि इस संसार के बीच रहते हुए भी कमल के पत्ते की तरह जल से अलिप्त रहने का नाम है।

वेदों और उपनिषदों में भी इस प्रकार की समता को सर्वोच्च योग माना गया है। गीता में भगवान कृष्ण ने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि 'समत्वं योग उच्यते'—अर्थात चित्त की समता ही योग है। जब व्यक्ति सुख-दुःख, मान-अपमान और सोने-पत्थर में भेद करना छोड़ देता है, तब उसकी चेतना संकुचित व्यक्तिगत अहंकार से निकलकर विराट ब्रह्मांडीय चेतना के साथ एककार हो जाती है। यही इस श्लोक की सनातन और शाश्वत पृष्ठभूमि है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस पावन श्लोक का नियमित पठन, मनन और इसके अर्थ को जीवन में उतारने से साधक को असीम आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति और स्थिरता (Mental Peace)

श्लोक के नियमित मनन से मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाले अनावश्यक चिंता, तनाव और भय का नाश होता है तथा चित्त में अद्भुत स्थिरता आती है।

2. द्वंद्वों से मुक्ति (Freedom from Duality)

सुख-दुःख और मान-अपमान के प्रति समान भाव विकसित होने से व्यक्ति जीवन के उतार-चढ़ाव से मानसिक रूप से आहत होना बंद कर देता है।

3. सकारात्मक ऊर्जा और औरा (Positive Aura)

समता के भाव को आत्मसात करने से साधक के चारों ओर एक उच्च कोटि की सकारात्मक ऊर्जा का आवरण (Aura) बनता है, जो आसपास के वातावरण को भी पवित्र करता है.

4. कर्म बंधनों से शुद्धि (Karmic Purification)

जब फल की आसक्ति समाप्त हो जाती है और व्यक्ति हर परिस्थिति में समान रहता है, तो नए कर्मबंध बनना बंद हो जाते हैं और पुराने कर्म क्षीण होने लगते हैं।

5. अहंकार का शमन (Ego Dissolution)

निंदा और स्तुति को समान मानने की आदत व्यक्ति के भीतर छिपे हुए सूक्ष्म अहंकार (Ego) को जड़ से समाप्त कर देती है, जिससे विनम्रता का विकास होता है।

6. दिव्य कृपा की प्राप्ति (Divine Grace)

ऐसा गुणातीत पुरुष भगवान को अत्यंत प्रिय होता है, और उसकी साधना स्वतः ही ईश्वर की अहेतुकी कृपा का अनुभव करने लगती है।

7. निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि (Enhanced Decision Making)

भावनाओं के आवेग में बहने के बजाय 'धीर' पुरुष की बुद्धि हर परिस्थिति में निष्पक्ष और सटीक निर्णय लेने में सक्षम होती है।

8. जीवनमुक्ति का मार्ग (Path to Liberation)

यह श्लोक जीव को जीवन जीते हुए ही मुक्ति (जीवनमुक्ति) का मार्ग दिखाता है, जिससे भय और मृत्यु का त्रास समाप्त हो जाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के हमारे समर्पित विद्वान मंडल, संस्कृत भाषाविदों और गूगल हेल्पफुल कंटेंट विशेषज्ञों द्वारा इस लेख को पूरी प्रमाणिकता, शाब्दिक शुद्धता और दार्शनिक गहराई के साथ तैयार किया गया है। श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक की व्याख्या करते समय पारंपरिक टीकाकारों यथा आदि शंकराचार्य, स्वामी रामसुखदास जी और संत ज्ञानेश्वर महाराज के वचनों को आधार बनाया गया है ताकि पाठकों तक सनातन धर्म का शुद्धतम ज्ञान पहुंच सके।

हमारा उद्देश्य इंटरनेट पर उपलब्ध आध्यात्मिक सामग्री में गुणवत्ता, प्रामाणिकता और उपयोगिता के उच्चतम मानकों को स्थापित करना है। इस विषय वस्तु को तैयार करने में किसी भी प्रकार के अतिशयोक्तिपूर्ण या अप्रमाणित दावों से बचा गया है, और पूरी तरह से शास्त्रीय व वेदान्त सम्मत दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी गई है ताकि साधक अपने आध्यात्मिक मार्ग पर पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ आगे बढ़ सकें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

उत्तर: 'समलोष्टाश्मकाञ्चनः' का अर्थ मिट्टी के ढेले (लोष्ट), पत्थर (अश्म) और सोने (काञ्चन) को समान समझना है। इसका अभिप्राय भौतिक धन-दौलत का जबरन त्याग करना नहीं है, बल्कि मन से सोने के प्रति लोभ-मोह और मिट्टी-पत्थर के प्रति घृणा या हीनभावना को समाप्त करना है। गुणातीत पुरुष के लिए मूल्यवान आभूषण और साधारण पत्थर दोनों ही प्रकृति के तत्व मात्र होते हैं, वह किसी भी वस्तु से मानसिक रूप से आसक्त नहीं होता।

उत्तर: हाँ, बिल्कुल। श्रीमद्भगवद्गीता का संपूर्ण ज्ञान अर्जुन जैसे योद्धा को युद्ध के मैदान में दिया गया था, जो विशुद्ध रूप से एक गृहस्थ और कर्तव्यनिष्ठ कर्मयोगी थे। इस श्लोक की समता का अर्थ यह नहीं है कि आप काम करना छोड़ दें या संवेदनाहीन हो जाएं; इसका अर्थ यह है कि आप अपने कर्तव्यों का पूरी निष्ठा से निर्वाह करें परंतु सफलता-असफलता, लाभ-हानि और मान-अपमान से अपने आंतरिक आनंद को प्रभावित न होने दें।

उत्तर: संस्कृत व्याकरण और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से 'स्वस्थ' शब्द दो भागों से मिलकर बना है—'स्व' (अपनी आत्मा में) + 'स्थ' (स्थित)। शारीरिक सेहत इसका एक छोटा हिस्सा हो सकती है, परंतु मुख्य अर्थ है—जो अपनी वास्तविक स्वरूप यानी आत्मा में सदा स्थिर और तृप्त रहता है। बाहरी उथल-पुथल जिसकी आंतरिक शांति को डिगा न सके, वही सच्चा 'स्वस्थ' पुरुष है।

उत्तर: मनुष्य का अधिकांश मानसिक तनाव इस बात से जुड़ा होता है कि "लोग मेरे बारे में क्या कहेंगे?" जब कोई हमारी प्रशंसा करता है तो हम अहंकार से भर जाते हैं, और जब कोई निंदा करता है तो हम दुखी या क्रोधित हो जाते हैं। जब हम यह समझ जाते हैं कि लोगों की राय उनके अपने गुणों और विचारों का परिणाम है, और हमारा वास्तविक मूल्य हमारी आत्मा है, तब निंदा और स्तुति दोनों का हमारे ऊपर प्रभाव पड़ना बंद हो जाता है, जिससे तनाव स्वतः समाप्त हो जाता है।

उत्तर: इस श्लोक का पाठ करने के लिए प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त या संध्याकाल का समय सबसे उत्तम माना गया है। स्नान आदि से निवृत्त होकर शांत चित्त से आसन पर बैठें, श्लोक का सस्वर और स्पष्ट उच्चारण करें। पाठ के पश्चात कुछ मिनटों के लिए इसके अर्थ पर मौन मनन (ध्यान) करें। नियमित रूप से ऐसा करने से श्लोक की ऊर्जा धीरे-धीरे आपके स्वभाव में उतरने लगती है।

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श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं: जो दुःख-सुख में समान है, अपने आप में स्थित है, मिट्टी, पत्थर और सोने में समान है, प्रिय-अप्रिय में समान, धीर, और निन्दा-स्तुति में समान है। He who is the same in pain and pleasure, self-abiding, to whom a clod, stone, and gold are alike, same in pleasant-unpleasant, firm, and same in censure and praise.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

यह समत्व ही योग है। यह गुणातीत अवस्था का सूचक है। This equanimity is yoga; it indicates the state beyond gunas.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 24 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 24/27 89% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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