श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 25

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 39 मिनट का पठन 117 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः । सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥ २५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

8 पद
मान-अपमानयोः
मान और अपमान में
तुल्यः
समान
तुल्यः
समान
मित्र-अरि-पक्षयोः
मित्र और शत्रु के पक्ष में
सर्वारम्भ-परित्यागी
सब आरम्भों (कर्मों) का त्यागी
गुणातीतः
गुणातीत
सः
वह
उच्यते
कहा जाता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो मान और अपमान में समान है, मित्र और शत्रु के पक्ष में समान है, और सब आरम्भों (कर्मों) का त्यागी है, वह गुणातीत कहा जाता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आध्यात्मिक प्रस्तावना, सांस्कृतिक महत्व और ब्रह्मांडीय चेतना

सनातन धर्म की अमर धरोहर श्रीमद्भगवद्गीता केवल एक ग्रंथ मात्र नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन के प्रत्येक दुविधा, संशय और मोक्ष मार्ग की वह पावन दिशा-दृष्टि है जो भवसागर से पार उतारने में सक्षम है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेशों में चौदहवें अध्याय (गुणात्रयविभाग योग) का श्लोक संख्या 25 अपने भीतर एक अद्वितीय और अगाध दार्शनिक गहराई समेटे हुए है। यह श्लोक उस परमोच्च अवस्था का सजीव चित्रण करता है जहाँ साधक प्रकृति के तीनों गुणों (सत्व, रज और तम) के बंधनों से पूरी तरह मुक्त होकर शुद्ध चैतन्य यानी 'गुणातीत' स्थिति को प्राप्त कर लेता है।

भारतीय संस्कृति और वेदान्त दर्शन में 'गुणातीत' वह दिव्य अवस्था है जहाँ मनुष्य सुख-दुःख, मान-अपमान, और राग-द्वेष के द्वंद्वों से ऊपर उठ जाता है। आज के इस भौतिकवादी और स्पर्धात्मक युग में जहाँ हर व्यक्ति यश, प्रतिष्ठा, मान, अपमान, शत्रुता और मित्रता के चक्रव्यूह में उलझा हुआ है, यह श्लोक एक अचूक आध्यात्मिक औषधि का काम करता है। यह मनुष्य को सिखाता है कि किस प्रकार बाहरी परिस्थितियों के थपेड़ों के बीच भी अंतःकरण की शांति और स्थिरता को बनाए रखा जा सकता है। जब कोई साधक इस गूढ़ सत्य को अपने जीवन में उतारता है, तो उसका आंतरिक ब्रह्मांडीय विस्तार होता है, और वह समस्त चराचर जगत में एक ही परमात्मा की ऊर्जा का दर्शन करने लगता है। भक्तीलोक (Bhaktilok.in) के इस विशेष आलेख में हम इसी पावन श्लोक के शाब्दिक अर्थ, दार्शनिक मर्म, पौराणिक पृष्ठभूमि और इसके व्यावहारिक जीवन में उपयोग पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय 14, श्लोक 25

मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥ २५॥


उच्चारण विधि एवं पाठ का नियम:

इस श्लोक का उच्चारण करते समय प्रत्येक शब्द के दीर्घ और ह्रस्व स्वरों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। 'मान-अपमानयोः' का उच्चारण संधि-विच्छेद के अनुसार स्पष्ट होना चाहिए। ब्रह्ममुहूर्त में स्नानोपरांत शांत चित्त से पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके इस श्लोक का कम से कम 108 बार मानसिक जप करने से चित्त की वृत्तियां शांत होती हैं और एकाग्रता में वृद्धि होती है।

श्लोक का सरल भाव: जो पुरुष मान और अपमान में एक जैसा रहता है, मित्र और शत्रु के पक्ष में भी जो समान भाव रखता है, और जो समस्त सकाम कर्मों (फल की इच्छा से किए जाने वाले कर्मों) का आरंभ करने वाला नहीं है, वह पुरुष 'गुणातीत' (तीनों गुणों से परे) कहा जाता है।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक पद में वेदान्त दर्शन का सार छिपा है। आइए, तालिका के माध्यम से इसके हर एक शब्द के साधारण और आध्यात्मिक अर्थ को समझें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
मान आदर, प्रतिष्ठा, प्रशंसा संसार द्वारा मिलने वाली प्रशंसा जिससे अहंकार पुष्ट होता है। गुणातीत पुरुष इसमें हर्षित नहीं होता।
अपमानयोः और अनादर, तिरस्कार में दूसरों द्वारा मिलने वाली अवहेलना। गुणातीत मनुष्य इसे अपनी आत्मा पर नहीं लेता, बल्कि देह का धर्म मानता है।
तुल्यः समान, एक जैसा रहने वाला समत्व भाव। जहां सुख और दुःख, जय और पराजय में मन विचलित न हो।
तुल्यः मित्रारिपक्षयोः मित्र और शत्रु पक्ष में समान भाव राग और द्वेष से परे होना। जो अपना है उससे अत्यधिक मोह नहीं और जो विरोधी है उससे द्वेष नहीं।
सर्व समस्त, सभी प्रकार के माया से जुड़े हुए सभी सांसारिक विषय और प्रपंच।
आरम्भ कर्मों का आरंभ, संकल्प फल की कामना से किए जाने वाले संकल्प या नए कर्मों की शुरुआत।
परित्यागी त्याग करने वाला कर्मफल की आसक्ति का पूर्ण त्याग, कर्तापन के अभिमान का विसर्जन।
गुणातीतः सत्व, रज, तम इन तीनों गुणों से अतीत (परे) प्रकृति के बंधनों से पूर्णतः मुक्त, जीवन्मुक्त अवस्था को प्राप्त महापुरुष।
सः वह पुरुष वह विशिष्ट और विरला योगी या भक्त।
उच्यते कहा जाता है साक्षात् वेदों और ऋषियों के द्वारा मान्यता प्राप्त ज्ञानी पुरुष।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय का नाम 'गुणात्रयविभाग योग' है। इस अध्याय के आरंभ में भगवान श्रीकृष्ण ने ज्ञानियों के भी ज्ञान यानी पराविद्या का उपदेश देते हुए प्रकृति और पुरुष के मिलन से सृष्टि की उत्पत्ति का रहस्य समझाया है। भगवान अर्जुन को बताते हैं कि यह संपूर्ण जगत सत्व, रज और तम—इन तीन गुणों के बंधन से बंधा हुआ है। मनुष्य जब तक इन गुणों के प्रभाव में रहता है, तब तक वह जन्म, मरण, भय, और शोक के चक्र से मुक्त नहीं हो सकता।

अर्जुन के मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि हे प्रभु! इन तीनों गुणों को लांघने वाला पुरुष कैसा होता है? उसके लक्षण क्या हैं? वह कैसे उठता-बैठता है और उसका आचरण कैसा होता है? अर्जुन के इन अत्यंत महत्वपूर्ण और व्यावहारिक प्रश्नों का उत्तर देते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने चौदहवें अध्याय के 22वें से लेकर 25वें श्लोक तक 'गुणातीत' पुरुष के लक्षणों का विस्तार से वर्णन किया है।

पौराणिक संदर्भों और महर्षि वेद व्यास रचित महाभारत के इस प्रसंग से यह स्पष्ट होता है कि भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानवता को यह संदेश दे रहे हैं कि आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग जंगलों या गुफाओं में छिपने का नाम नहीं है, बल्कि संसार के बीच रहकर भी मान-अपमान और राग-द्वेष से ऊपर उठने का नाम है। प्राचीन काल में राजा जनक, महर्षि वशिष्ठ और शुकदेव जैसे महापुरुषों ने इसी 'गुणातीत' अवस्था को अपने जीवन में चरितार्थ किया था। वे राजपाट और पारिवारिक उत्तरदायित्वों का निर्वाह करते हुए भी पूरी तरह अनासक्त और शांतचित्त रहते थे। यही इस पावन श्लोक की मूल ऐतिहासिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ (Spiritual Benefits)

इस पावन श्लोक का निरंतर स्मरण, पठन और इसके मर्म को जीवन में उतारने से साधक को अनेकानेक मानसिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:

1. मानसिक शांति एवं स्थिरता

मान और अपमान के विकारों से मुक्ति मिलने के कारण साधक का मन सदा शांत रहता है। बाहरी परिस्थितियां उसे विचलित नहीं कर पातीं।

2. राग-द्वेष और शत्रुता का अंत

मित्र और शत्रु में समान भाव रखने से हृदय से ईर्ष्या, द्वेष और प्रतिशोध की भावना हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है, जिससे सार्वभौमिक प्रेम का उदय होता है।

3. कर्मफल के बंधनों से मुक्ति

सकाम कर्मों और उनकी विफलताओं के भय से मुक्ति मिलती है। व्यक्ति निष्काम भाव से अपने कर्तव्य का पालन करता है जिससे नया कर्मबंध नहीं बनता।

4. सकारात्मक ऊर्जा और aura का विकास

नियमित रूप से इस श्लोक का जप करने से शरीर के चारों ओर एक उच्च कोटि की सकारात्मक ऊर्जा (Aura) का निर्माण होता है, जो नकारात्मक शक्तियों को दूर रखती है।

5. अहंकार का शमन

'मैं श्रेष्ठ हूँ' या 'मेरा अपमान हुआ है' जैसी अहंता गलने लगती है, जिससे साधक में सहज विनम्रता और दिव्यता प्रकट होती है।

6. निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि

भावनाओं में बहकर गलत निर्णय लेने की प्रवृत्ति समाप्त हो जाती है और बुद्धि विवेकशील एवं पारदर्शी बन जाती है।

7. जीवनमुक्ति का अनुभव

जीते जी संसार के बंधनों से मुक्त होने का अनुभव यानी जीवन्मुक्ति का आनंद प्राप्त होता है, जो सभी दुखों की आत्यंतिक निवृत्ति है।

8. ईश्वर की अहैतुकी कृपा

समत्व भाव धारण करने वाले भक्त पर भगवान श्रीकृष्ण अत्यंत प्रसन्न होते हैं, क्योंकि ऐसा साधक भगवान को अत्यंत प्रिय होता है (गीता अध्याय 12)।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

संपादकीय रूप से तैयार सामग्री: Bhaktilok.in के इस धार्मिक और आध्यात्मिक आलेख को तैयार करते समय शास्त्रीय ग्रंथों, महर्षि वेद व्यास रचित श्रीमद्भगवद्गीता के विभिन्न प्रामाणिक संस्करणों, और आद्य शंकराचार्य तथा स्वामी रामानुजाचार्य के वेदान्त भाष्यों का गहन अध्ययन किया गया है। हमारी संपादकीय टीम यह सुनिश्चित करती है कि सनातन धर्म के मूल ग्रंथों का संदेश बिना किसी मिलावट, अतिशयोक्ति या भ्रामक दावों के सीधे पाठकों तक पहुंचे।

इस सामग्री का उद्देश्य किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है, बल्कि वेदों, उपनिषदों और गीता के वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक सत्यों को आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत करना है। हमारे विद्वान भाषाविदों और संस्कृत जानकारों ने यह प्रयास किया है कि प्रत्येक श्लोक का हिंदी अनुवाद सरल, सुबोध और शास्त्रीय मर्यादाओं के पूर्ण अनुकूल हो, ताकि हर आयु वर्ग के साधक इसका लाभ उठा सकें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

'गुणातीत' दो शब्दों से मिलकर बना है—गुण + अतीत। 'गुण' का अर्थ प्रकृति के तीन गुण (सत्व, रज, तम) है और 'अतीत' का अर्थ पार या परे जाना है। जो मनुष्य इन तीनों गुणों के प्रभाव, मोह, और बंधनों से ऊपर उठ चुका है, जो सुख-दुःख और मान-अपमान में समान रहता है, उसे गुणातीत कहते हैं।

बिल्कुल नहीं। आत्म-सम्मान देह और अहंकार से जुड़ा होता है, जबकि गुणातीत अवस्था आत्मा की दिव्यता से जुड़ी होती है। मान और अपमान में समान रहने का अर्थ है कि बाहरी लोगों की प्रशंसा से व्यक्ति अहंकारी नहीं बनता और उनकी निंदा या अपमान से मानसिक रूप से टूटता या क्रोधित नहीं होता। उसकी आंतरिक शांति और कर्तव्यनिष्ठा अपरिवर्तित रहती है।

इसका अर्थ कर्मों का भौतिक त्याग नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण गीता में स्पष्ट कहते हैं कि कोई भी मनुष्य एक क्षण भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता। 'सर्वारम्भपरित्यागी' का अर्थ है—फल की कामना से किए जाने वाले सकाम कर्मों और स्वार्थी संकल्पों का त्याग। ऐसा पुरुष अपने कर्तव्यों का पालन करता है परंतु उसके मन में 'मैं इस कर्म का कर्ता हूँ' ऐसा अहंकार या फल की आसक्ति नहीं होती।

दैनिक जीवन में अभ्यास करने के लिए जब भी आपको कोई विशेष यश या अपमान मिले, तो मन को यह याद दिलाएं कि यह केवल परिस्थिति है, आपकी वास्तविक पहचान आत्मा है। कार्यालय या परिवार में किसी से मतभेद होने पर भी शत्रुभाव न रखकर अपने कर्तव्य पर ध्यान दें। प्रतिदिन सुबह इस श्लोक का पाठ और मनन करने से धीरे-धीरे यह स्वभाव में उतरने लगता है।

यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय (गुणात्रयविभाग योग) का 25वां श्लोक है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को प्रकृति के तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) के प्रभाव और उनसे मुक्त होने के उपायों का अत्यंत सुंदर और वैज्ञानिक विश्लेषण समझाया है।

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सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं: जो मान और अपमान में समान है, मित्र और शत्रु के पक्ष में समान है, और सब आरम्भों (सकाम कर्मों) का त्यागी है, वह गुणातीत कहा जाता है। He who is same in honour and dishonour, same to friend and foe, and who has renounced all undertakings—he is called transcendent of the gunas.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

गुणातीत पुरुष द्वन्द्वों से परे होता है और निष्काम भाव से रहता है। The transcendent one is beyond all dualities and lives desirelessly.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 25 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 25/27 93% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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